समन्तभद्र

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आचार्य समन्तभद्र दूसरी सदी के एक प्रमुख दिगम्बर आचार्य थे। वह जैन दर्शन के प्रमुख सिद्धांत, अनेकांतवाद के महान प्रचारक थे।[1][2] उनका जन्म कांचीनगरी (शायद आज के कांजीवरम) में हुआ था। उनकी सबसे प्रख्यात रचना रत्नकरण्ड श्रावकाचार हैं।[3]

जैन ग्रन्थ[स्रोत सम्पादित करें]

 रत्नकरण्ड श्रावकाचार का अंग्रेजी अनुवाद
  • अप्त-मीमंसा- ११४ श्लोकों में जैन धर्म के अनुसार केवल ज्ञान समझाया गया हैं इसमें केवली के गुणों का वर्णन हैं। [7]
  • युक्तानुशासन

व्याधि[स्रोत सम्पादित करें]

आचार्य समन्तभद्र मुनि को संन्यास जीवन के शुरुवाती वर्षों में भस्मक नाम की व्याधि हो गयी थी जिसमें तिर्ष्ण भूख लगती हैं। चूँकि दिगंबर मुनि एक बार से ज्यादा आहार नहीं लेते, उन्हें इससे काफी कष्ट होने लगा[9] जिसके कारण अंत में उन्होंने सल्लेखना व्रत धारण करने का सोचा जब उन्होंने अपने गुरु से इसके लिए आज्ञा मांगी तो गुरु ने इसकी आज्ञा नहीं दी।[10] उनके गुरु ने उन्हें मुनि व्रतों का त्याग कर रोग उपचार करने को कहा।[9] उपचार के बाद आचार्य समन्तभद्र स्वामी दोबारा मुनि व्रतों को धारण किया और महान आचार्य हुए।[11]

सन्दर्भ[स्रोत सम्पादित करें]

  1. Ghoshal 2002, पृ॰ 7-19.
  2. Jain 2015, पृ॰ xvi.
  3. Jain 1917, पृ॰ iv.
  4. Samantabhadra, Ācārya (2006-07-01). Ratnakaranda Shravakacara. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788188769049. https://books.google.co.in/books?id=9ZComgEACAAJ. 
  5. Jain 1917, पृ॰ v.
  6. Ghoshal 2002, पृ॰ 7.
  7. Jain 2015, पृ॰ xvii.
  8. Jain 2015, पृ॰ xi.
  9. Jain 2015, पृ॰ xviii.
  10. Long 2013, पृ॰ 110.
  11. Jain 2015, पृ॰ xx.

ग्रन्थ[स्रोत सम्पादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[स्रोत सम्पादित करें]