पूज्यपाद

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

आचार्य पूज्यपाद विक्रम सम्वत की छठीं और ईसा की पाँचवीं शती के बहुश्रुत विद्वान एवं जैन आचार्य हैं। जैन मुनि बनने से पूर्व इनका नाम देवनन्दि था।

  • ये तार्किक, वैयाकरण, कवि और स्तुतिकार हैं।
  • तत्त्वार्थसूत्र पर लिखी गयी विशद व्याख्या सर्वार्थसिद्धि में इनकी दार्शनिकता और तार्किकता अनेक स्थलों पर उपलब्ध होती है।[1]
  • इनका एक न्याय-ग्रन्थ 'सार-संग्रह' रहा है, जिसका उल्लेख आचार्य वीरसेन ने किया है और उनमें दिये गये नयलक्षण को धवला-टीका में उद्धृत किया है।
  • इष्टोपदेश- [1]
  • जैनेन्द्रव्याकरण, समाधिशतक, निर्वाणभक्ति आदि अनेक रचनाएँ भी इन्होंने लिखी हैं

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Jain 2014, पृ॰ xiv.

सन्दर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • Jain, Vijay K (2014-03-26), Acarya Pujyapada's Istopadesa – the Golden Discourse, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788190363969