प्रमाणसागर

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Muni Pramansagar
व्यक्तिगत जानकारी
जन्म नाम नवीन कुमार जैन
जन्म 27 जून 1967
झारखण्ड
माता-पिता श्री सुरेंद्र कुमार जैन, श्रीमती सोहनी देवी जैन
शुरूआत
सर्जक आचार्य_विद्यासागर
दीक्षा के बाद
जालस्थल www.munipramansagar.net

मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज दिगंबर जैन साधु हैं। वे इस युग के सबसे बड़े जैन संत, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य हैं। उन्होंने जैन धर्म की पारंपरिक जटिलताओं को सहज भाषा में परिभाषित कर इसे जीवन में व्यावहारिक बनाया है। उनके उपदेशों और प्रयासों के माध्यम से समाज में गुणात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। उन्होंने वर्ष 2015 में संथारा की जैन परंपरा, जिसे सल्लेखना के नाम से भी जाना जाता है, को बचाने के लिए एक विश्व व्यापी अभियान का नेतृत्व किया, [1] जिसमें राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध जैन समुदाय के लाखों सदस्यों ने दुनिया भर के कई शहरों और कस्बों में बड़े पैमाने पर रैलियां निकालीं एवं मौन प्रदर्शन किया [2] . गुणायतन उनकी महत्वपूर्ण धार्मिक पहलों में से एक है जो सच्चे अर्थों में आत्म-विकास का केंद्र बनने जा रहा है। उनके प्रवचन और शंका समाधान कार्यक्रम को जिनवाणी चैनल और पारस टीवी चैनल पर प्रसारित किया जाता है।

जीवन[संपादित करें]

मुनि प्रमासागरजी का जन्म 27 जून 1967 को हजारीबाग, झारखंड में श्री सुरेंद्र कुमार जैन और श्रीमती सोहनी देवी जैन के घर में नवीन कुमार जैन के रूप में हुआ था [3][4]. 4 मार्च 1984 को उनके वैराग्य-जीवन की शुरुवात हुई. आचार्य विद्यासागर जी ने 31 मार्च 1988 को श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र सोनागिरी, मध्यप्रदेश में उन्हैं दिगंबर जैन साधु के रूप में दीक्षा प्रदान की । [5]

सल्लेखना विवाद के मुद्दे पर, उन्होंने कहा: "संथारा आत्महत्या नहीं है। जैन धर्म आत्महत्या को पाप मानता है। प्रत्येक धर्म के अनुयायी अलग-अलग साधनों के माध्यम से तपस्या करते हैं और जैन धर्म में भी आत्म-शुद्धि के लिए सल्लेखना व्रत धारण किया जाता है" [6] मुनि प्रमाणसागरजी एक दिगंबर साधु हैं, जिन्होंने राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा सल्लेखना पर प्रतिबंध लगाने के फैसले का विरोध करने के लिए धर्म बचाओ आंदोलन का आह्वान किया था. [7] राजस्थान उच्च न्यायालय का निर्णय बाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थगित कर दिया गया था [8][9]. उन्होंने जयपुर में जैन महामंत्र नमोकार मंत्र का १ करोड़ बार जप करने का कार्यक्रम भी आयोजित किया। [10] गुणायतन उनकी अन्य धार्मिक पहलों में से एक है। उनके प्रवचन और शंका समाधन कार्यक्रम जिनवाणी और पारस टीवी चैनल पर प्रसारित होते हैं। [11]

जैन श्रमणों के लिए धार्मिक परम्पराओं के अनुसार, मुनि प्रमाणसागरजी भी वर्षाऋतु के मौसम (चातुर्मास) के 4 महीने को छोड़कर, एक जगह पर नहीं रहते हैं। वे एक जगह से दूसरी जगह निरन्तर पदविहार करते रहतें है. उनका 2016 का चातुर्मास अजमेर, राजस्थान में हुआ था। उन्होंने जून 2016 में कुचामन, राजस्थान को भी विहार किया था। [12][13]


लेखन[संपादित करें]

मुनि प्रमासागरजी हिंदी, संस्कृत, प्राकृत और अंग्रेजी भाषाओं के एक प्रसिद्ध विद्वान हैं। उन्होंने जैन धर्म और जैन दर्शन पर कई ग्रंथों की रचना की हैं. उनके द्वारा रचित प्रसिद्ध साहित्य की सूची इस प्रकार है: - जैन धर्म और दर्शन, जैन तत्व विद्या, [14] दिव्य जीवन का द्वार, [15] ज्योतिर्मय जीवन, जीवन उत्कर्ष का आधार, लक्ष्य जीवन का, अंतस की आंखें, जीवन की संजीवनी, जैन सिद्धान्त शिक्षण, पाठ पढ़े नव जीवन का, अन्दाज जीवन जीने का, घर को कैसे स्वर्ग बनाएं, सुख जीवन की राह, धर्म साधिये जीवन में, मर्म जीवन का, आदि।

मुनि प्रमासागरजी ने शरीर को स्वस्थ, मन को शांत और आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए 'यद भावते तद् भवति' के प्राचीन भारतीय सूत्र को आधुनिक रूप में परिभाषित करके भावना योग का विकास किया है। [16]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Muni Shri Praman Sagar talks about the tradition of Santhara", News18, Uttar Pradesh, ETV Rajasthan, 13 September 2015
  2. The Jain religion and the right to die by Santhara, Rajasthan, द_इंडियन_एक्सप्रेस, 2 September 2015
  3. "Muni Shri 108 Praman Sagar Ji Maharaj", Jain Muni Locator
  4. Jaipuriar, Vishvendu (30 May 2013), Jumbo chariot cheer amid ‘holy’ rain, Hazaribagh: The Telegraph
  5. "Jain Muni Pramansagar ji Maharaj disciple of Acharya Vidyasagar ji Maharaj would discourse on Ramayana and Geeta at the local Zila school ground from November 7 to 11. The four day programme being organised by Vishwa Dharma Jagaran Manch is expected to garner huge crowd in wake of the popularity that Maharaj has gained while giving similar discourse in other cities of the country.", द_टाइम्स_ऑफ़_इण्डिया, 27 October 2010
  6. Staff, Pratika (11 August 2015), "Fatal blow: why the Jain practice of voluntary death is a crime", Catch News
  7. Sharma, Lalit (10 August 2015), "Rajasthan high court bans Jain ritual of fasting unto death", Hindustan Times, Jaipur
  8. viadyanathan, A, Jain 'Santhara' Ritual of Fast Unto Death Can Continue for Now, Says Court
  9. Staff, BBC, India top court lifts ban on Jains' santhara death fast
  10. Singh, Mahim Pratap (1 September 2015), "Hours after SC ruling, octogenarian 'resumes' Santhara in Bikaner", The Indian Express, Jaipur
  11. Programs, Jinvani channel
  12. "दिखावे का भक्ति में कोई स्थान नहीं हैं : मुनि", Dainik Bhaskar, 11 June 2016
  13. "चातुर्मास के लिए बैठक कल", Dainik Bhaskar, 29 April 2016, मूल से 18 August 2018 को पुरालेखित, अभिगमन तिथि 16 August 2016
  14. Pramansagar, Muni (2008), Jain tattvavidya, India: Bhartiya Gyanpeeth, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-263-1480-5
  15. Muni Shri 108 Praman Sagar Ji Maharaj, Jinaagamsaar
  16. Pramansagar, Muni (2020), Bhavna Yog, India: Nirgranth Foundation, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-943516-0-3

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]