जैन मुनि

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आचार्य भूतबली जी की प्रतिमा
पिच्छी, कमंडल, शास्त्र

जैन मुनि जैन धर्म में संन्यास धर्म का पालन करने वाले व्यक्तियों के लिए किया जाता हैं। जैन मुनि के लिए निर्ग्रन्थ शब्द का प्रयोग भी किया जाता हैं। मुनि शब्द का प्रयोग पुरुष संन्यासियों के लिए किया जाता हैं और आर्यिका शब्द का प्रयोग स्त्री संन्यासियों के लिए किया जाता हैं।[1][2] श्रमण शब्द का प्रयोग भी किया जाता हैं 

दिगम्बर जैन मुनि [संपादित करें]

दिगंबर आचार्य, ज्ञानसागर

दिगम्बर का अर्थ होता हैं: "दिशाएं ही जिनका अम्बर (वस्त्र) हों।[3] दिगम्बर मुनि केवल कमंडल, पिच्छी और शास्त्र ही रख सकते हैं। [4] आचार्य कुन्दकुन्द इस काल के प्रमुख दिगम्बर आचार्य थे।[5] प्रत्येक दिगम्बर मुनि को २८ मूल-गुणों का पालन करना अनिवार्य हैं, यह हैं-[6]

व्रत नाम अर्थ
महाव्रत-
तीर्थंकर आदि महापुरुष जिनका पालन करते है
१. अहिंसा किसी भी जीव को मन, वचन, काय से पीड़ा नहीं पहुँचाना।
२. सत्य हित, मित, प्रिय वचन बोलना।
३. अस्तेय जो वस्तु नहीं दी जाई उसे ग्रहण नहीं करना।
४. ब्रह्मचर्य मन, वचन, काय से मैथुन कर्म का पूर्ण त्याग करना।
५. अपरिग्रह पदार्थों के प्रति ममत्वरूप परिणमन का पूर्ण त्याग
समिति-
प्रवृत्तिगत सावधानी [6]
६.ईर्यासमिति सावधानी पूर्वक चार हाथ जमीन देखकर चलना
७.भाषा समिति निन्दा व दूषित भाषाओं का त्याग
८.एषणासमिति श्रावक के यहाँ छियालीस दोषों से रहित आहार लेना
९.आदाननिक्षेप धार्मिक उपकरण उठाने रखने में सावधानी
१०.प्रतिष्ठापन निर्जन्तुक स्थान पर मल-मूत्र का त्याग
पाँचेंद्रियनिरोध ११.१५ पाँचों इंद्रियों पर नियंत्रण
छः आवश्यक
आवश्यक करने योग्य क्रियाएँ
१६. सामायिक (समता) समता धारण कर आत्मकेन्द्रित होना
१७. स्तुति २४ तीर्थंकरों का स्तवन
१८. वंदन भगवान की प्रतिमा और आचार्य को प्रणाम
१९.प्रतिक्रमण ग़लतियों का शोधन
२०.प्रत्याख्यान त्याग
२१.कायोत्सर्ग देह के ममत्व को त्यागकर आत्म स्वरूप में लीन होना
अन्य-
७ अन्य
२२. अस्नान स्नान नहीं करना
२३. अदंतधावन दातौन नहीं करना
२४. भूशयन चटाई, जमीन पर विश्राम करना
२५. एकभुक्ति दिन में एक बार भोजन
२६. स्थितिभोजन खड़े रहकर दोनो हाथो से आहार लेना
२७. केश लोंच सिर और दाड़ी के बाल हाथों से उखाड़ना
२८. नग्नता दिगम्बर अवस्था में रहना

प्रत्येक जैन संत और श्रावक को पांच व्रतों का पालन करना अनिवार्य हैं [7]

केश लोंच[संपादित करें]

प्रत्येक जैन मुनि को केश-लोंच करना अनिवार्य हैं।[8]

बाईस परिषह[संपादित करें]

जैन ग्रंथों के अनुसार मुनियों के लिए बाईस परिषह सहने होते हैं

  1. भूख,
  2. पियास,
  3. सर्दी,
  4. गर्मीं,
  5. दशंमशक,
  6. किसी अनिष्ट वस्तु से अरुचि,
  7. नग्नता,
  8. भोगों का आभाव,
  9. स्त्री,[note 1]
  10. चर्या,
  11. अलाभ,
  12. रोग,
  13. याचना,
  14. आक्रोश,
  15. वध,
  16. मल,
  17. सत्कारपुरस्कार,
  18. जमीन पर सोना
  19. प्रज्ञा,
  20. अज्ञान,
  21. अदर्शन
  22. बैठने की स्थिति

पद[संपादित करें]

  • आचार्य: मुनि संघ के नेता
  • उपाध्याय: संघ के नए मुनियों को ज्ञान-अर्जन में सहयोग करते हैं।
  • मुनि
  • एलक
  • क्षुल्लक
  • आर्यिका 
  • क्षुल्लिका

चातुर्मास[संपादित करें]

बारिश (मानसून) के ४ महीनों में अहिंसा धर्म की रक्षा के लिए जैन साधू विहार आदि  नहीं करते। [9]

जैन आचार्य परम्परा[संपादित करें]

जैन आचार्य परम्परा

भगवान महावीर के पश्चात इस परंम्परा में कई मुनि एवं आचार्य हुये हैं -

  • भगवान महावीर के पश्चात 62 बर्ष में तीन केवली (527-465 B.C.)
  1. आचार्य गौतम गणधर (607-515 B.C.)
  2. आचार्य सुधर्मास्वामी (607-507 B.C.)
  3. आचार्य जम्बूस्वामी (542-465 B.C.)
  • इसके पश्चात 100 बर्षो में पॉच श्रुत केवली (465-365 B.C.)
  1. आचार्य नन्दी या विष्णु कुमार
  2. आचार्य नन्दिमित्र या नन्दिपुत्र
  3. आचार्य अपराजित्
  4. आचार्य गोवर्धन्
  5. आचार्य भद्रबाहु- अंतिम श्रुत केवली (433-357)
  • इसके पश्चात 183 बर्षो में (११ अंग १० पूर्व के ज्ञाता) ग्यारह आचार्य (365-182 B.C.)
  1. आचार्य बिशाख
  2. आचार्य प्राष्ठिल्ल्
  3. आचार्य छत्रिय
  4. आचार्य जयसेन
  5. आचार्य नागसेन्
  6. आचार्य सिद्दार्थ्
  7. आचार्य घृतसेन्
  8. आचार्य विजय
  9. आचार्य बुद्दिल
  10. आचार्य गंगदेव्
  11. आचार्य सुधर्मस्वामी
  • इसके पश्चात 220 बर्षो में पॉच आचार्य (182 B.C.-38 A.D.)
  1. आचार्य नक्षत्र
  2. आचार्य जयपाल
  3. आचार्य पाण्डू
  4. आचार्य धुरबसेन
  5. आचार्य कंस
  • इसके पश्चात 118 बर्षो में चार आचार्य (
  1. आचार्य सुभद्र
  2. आचार्य यशोभद्र
  3. आचार्य यशोंबाहु
  4. आचार्य लोहाचार्य
  • एवम अन्य आचार्य
  1. आचार्य अह्द्रबलि
  2. आचार्य माघनन्दि
  3. आचार्य धरसेन
  4. आचार्य पुष्पदंत
  5. आचार्य भूतबली
  6. आचार्य जिनचन्द
  7. आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ( 8 ई.पू.-44 ई.)
  8. आचार्य उमास्वामी (
  9. आचार्य समन्तभद्र (120-185 ई.)
  10. आचार्य शिवकोटि
  11. आचार्य शिवायन
  12. आचार्य सिद्धसेन दिवाकर
  13. आचार्य पुज्यपाद (474-525)
  14. आचार्य अकलंकदेव (720-780)
  15. आचार्य वीरसेन (790-825)
  16. आचार्य जिनसेन (800-880)
  17. आचार्य नेमिचन्द

नोट[संपादित करें]

  1. स्त्री की मीठी आवाज़, सौंदर्य, धीमी चाल आदि का मुनि पर कोई असर नहीं पड़ता, यह एक परिषह हैं जैसे कछुआ कवछ से अपनी रक्षा करता हैं, उसी प्रकार मुनि भी अपने धर्म की रक्षा, मन और इन्द्रियों को वश में करके करता हैं

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Cort, John E. (2001).
  2. Paul Dundas (2002).
  3. Zimmer 1953, पृ॰ 210.
  4. Singh 2008, पृ॰ 316.
  5. Jain 2011, पृ॰ vi.
  6. प्रमाणसागर २००८, पृ॰ १८९.
  7. Pravin Shah, Five Great Vows (Maha-vratas) of Jainism Jainism Literature Center, Harvard University Archives (2009)
  8. Singh 2007, पृ॰ 29.
  9. Mehta, Makrand (1991). Indian merchants and entrepreneurs in historical perspective: with special reference to shroffs of Gujarat, 17th to 19th centuries. Academic Foundation. प॰ 98. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7188-017-7. http://books.google.co.in/books?id=9lz3gNDMbWEC. 

संदर्भग्रंथ सूची[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]