तमिल जैन

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तमिल जैन भारत में जैन धर्म के दिगंबर संप्रदाय का हिस्सा है। वे ज्यादातर पहली शताब्दी ई.पू. के बाद से तमिलनाडु राज्य में रहते हैं। इन तमिल जैनियों ने तमिल साहित्य और संस्कृति के लिए बहुत योगदान दिया है। वे मातृभाषा के रूप में तमिल बोलते हैं। उत्तर भारत के जैनियों के विपरीत, वे अपनी सीमा शुल्क और परंपराओं में भिन्न होते हैं। वे अधिक उत्तरी तमिलनाडु के जिलों में रह रहे हैं। जैसे चेन्नई, विल्लुपुरम, कांचीपुरम और तिरुवन्नामलई जिलों में. तमिलनाडु में उनकी जनसंख्या 85000 के आसपास है।

तमिलनाडु में जैन धर्म की उत्पत्ति

कुछ विद्वानों के अनुसार जैन दर्शन 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में दक्षिण भारत में आया होगा| साहित्यिक स्रोतों और श्रवणबेलगोला से प्राप्त शिलालेख के अनुसार उत्तरी भारत में चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में 12 साल के लंबे अकाल आने के कारण, अपनी चर्या का निर्वाह करने हेतु आचार्य भद्रबाहु अपने संघ जिसमे 12,000 जैन संत थे दक्षिण भारत की और आया था, राजा चन्द्रगुप्त भी मुनि दीक्षा ले उनके साथ आये थे| श्रवणबेलगोला पहुंचने पर भद्रबाहु अपना अंत कर जान कर मुनि चंद्रगुप्त के साथ चंदागिरी पहाड़ी पर ही रहने का फैसला किया है और अपने १२,००० शिष्यों को निर्देश दिया की वेह चोल और पांडिया के राज्यों में जाए |

अन्य विद्वानों के अनुसार, जैन धर्म को अच्छी तरह से भद्रबाहु और चंद्रगुप्त की यात्रा से पहले दक्षिण भारत में ही अस्तित्व में है चाहिए। मदुरै, त्रिची, कन्याकुमारी, तंजौर के आसपास जैन शिलालेख और जैन देवताओं के साथ पाए जाते हैं 4 शताब्दी के रूप में पुराने के रूप में गुफाओं के बहुत सारे हैं।

तमिल ब्राह्मी शिलालेख की एक संख्या दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तारीख है कि तमिलनाडु में पाए गए हैं। वे जैन भिक्षुओं के साथ जुड़ा हुआ है और भक्तों रखना जा करने के लिए माना जाता है

जैन मंदिर

Thirupanamur Digambar जैन मंदिर
Mannargudi Mallinatha Swamy जैन मंदिर
अरहंतगिरी जैन मठ
Karandai दिगंबर जैन मंदिर
पोंनुर हिल्स
मेल सिथामुर जैन मठ

इन्हें भी देखें




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जैन धर्म प्रवेशद्वार

आचार्य अमितगति ने कहा है:

सत्वेषु मैत्रिं गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्।

माध्यस्थ्यभावं विपरीतवृतौ, सदा ममात्मा विदधातु देवः॥


हे जिनेन्द्र! सब जीवों से हों मैत्री भाव हमारे,

गुणधारी सत्पुरुषन पर हों हर्षित मन अधिकारे।

दुःख दर्द पीडित प्राणिन पर करुँ दया हर बारे,

नहीं प्रेम नहिं द्वेष वहाँ विपरीत भाव जो धारे॥


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जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है ।

जैन किसे कहते हैं?

'जैन' कहते हैं उन्हें, जो 'जिन' के अनुयायी हों। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने-जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं 'जिन'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान्‌ का धर्म।

जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र 'णमोकार मंत्र' है-

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं॥

ऐसो पञ्च णमोकारो, सव्वपावप्पणासणो॥ मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं होई मंगलम ॥


अर्थात अरिहंतो को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। इन्हें पाँच परमेष्ठी (जो परम पद में स्थित हैं ) कहा जाता है.

यह पञ्च नमस्कार मन्त्र सभी पापों का नाश करता है और सभी मंगलों में पहला मंगल है। णमोकार मंत्र जैन धर्म के दिगंबर एवं श्वेताम्बर दोनों संप्रदायों में सामान रूप से मान्य है.

यह मंत्र 'प्राकृत भाषा' में है और जैनागम के अधिकतर मूल ग्रन्थ प्राकृत में ही लिखे गए हैं। जैनागम के अनुसार 'णमोकार मंत्र' अनादिनिधन है अर्थात यह मन्त्र हमेशा से है और हमेशा रहेगा। परन्तु इस युग में सबसे पहले इस मंत्र का सर्वप्रथम प्रयोग 'षट्खंडागम' नामक ग्रन्थ में 'मंगलाचरण' के रूप में हुआ है । इस ग्रन्थ के रचनाकार दो बहुप्रतिभाशाली जैनाचार्य थे : आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि।


तीर्थंकर

जो धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते हैं और जिनके पाँच कल्याणक (गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक) मनाये जाते हैं उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार श्री ऋषभदेव से लेकर श्री महावीर पर्यंत 24 तीर्थंकर हुए हैं जिन्होंने समय-समय पर धर्म की पुनर्स्थापना की है। वर्तमान में २४ वें तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर का शासनकाल चल रहा है.

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चयनित लेख

जैन प्रतीक चिन्ह

वर्ष १९७५ में १००८ भगवान महावीर स्वामी जी के २५००वें निर्वाण वर्ष अवसर पर समस्त जैन समुदायों ने जैन धर्म के प्रतीक चिह्न का एक स्वरूप बनाकर उस पर सहमति प्रकट की थी। आजकल लगभग सभी जैन पत्र-पत्रिकाओं, वैवाहिक कार्ड, क्षमावाणी कार्ड, भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस, दीपावली आमंत्रण-पत्र एवं अन्य कार्यक्रमों की पत्रिकाओं में इस प्रतीक चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यह प्रतीक चिह्न हमारी अपनी परम्परा में श्रद्धा एवं विश्वास का द्योतक है। जैन प्रतीक चिह्न किसी भी विचारधारा, दर्शन या दल के ध्वज के समान है, जिसको देखने मात्र से पता लग जाता है कि यह किससे संबंधित है, परंतु इसके लिए किसी भी प्रतीक चिह्न का विशिष्ट (यूनीक) होना एवं सभी स्थानों पर समानुपाती होना बहुत ही आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि प्रतीक ध्वज का प्रारूप बनाते समय जो मूल भावनाएँ इसमें समाहित की गई थीं, उन सभी मूल भावनाओं को यह चिह्न अच्छी तरह से प्रकट करता है।


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चयनित ग्रंथ

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क्या आप जानते हैं??

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विकिपरियोजनाएं

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चयनित चित्र

पद्मसान मुद्रा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की यह प्राचीन प्रतिमा कुण्डलपुर, मध्य प्रदेश में विराजमान हैं
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जैन धर्म

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