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प्रवेशद्वार:जैन धर्म

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जैन धर्म प्रवेशद्वार

चित्र:Jain hand.svg

जैन धर्म अति प्राचीन धर्म है य़ह आदि अनादि काल से चला आ रहा प्राचीनतम धर्म है. जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों का एक कालखण्ड होता है उसे एक चौबीसी के नाम से भी जाना जाता है. इस तरह की अनंत चौबीसी भूत काल में हुई है और अनंत चौबीसी भविष्य काल में भी होने वालीं है, सभी चौबीसी का समय चक्र और कालखण्ड जैन धर्म में पहले से ही निर्धारित है. जिस प्रकार वर्तमान काल के चौबीस तीर्थंकरों के नाम पूर्व निर्धारित है उसी प्रकार से भूत काल की चौबीसी के 24 (चौबीस) तीर्थंकरों के नाम भी जैन धर्म के शास्त्रो में मौजूद है, इन्हें जैन धर्म के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थल सम्मैद शिखर जी के भीती चित्रों पर देखा जा सकता है जैन धर्म की प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण देश विदेश में पुरातत्व मह्त्व के स्थलों की ख़ुदाई में निकलने वाली दर्जनों जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं. इससे बड़ा कोई प्रमाण नहीं हो सकता है य़ह सर्व विदित है और सम्पूर्ण विश्व में समय समय पर देखने को मिलता रहता है भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । 'जैन' कहते हैं उन्हें, जो 'जिन' के अनुयायी हों। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने-जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं 'जिन'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान्‌ का धर्म।

जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र है-

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं॥

अर्थात अरिहंतो को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। ये पाँच परमेष्ठी हैं।


जैन धर्म मे 24 तीर्थंकरों को माना जाता है |

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चयनित लेख

जैन प्रतीक चिन्ह
जैन प्रतीक चिन्ह

वर्ष १९७५ में १००८ भगवान महावीर स्वामी जी के २५००वें निर्वाण वर्ष अवसर पर समस्त जैन समुदायों ने जैन धर्म के प्रतीक चिह्न का एक स्वरूप बनाकर उस पर सहमति प्रकट की थी। आजकल लगभग सभी जैन पत्र-पत्रिकाओं, वैवाहिक कार्ड, क्षमावाणी कार्ड, भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस, दीपावली आमंत्रण-पत्र एवं अन्य कार्यक्रमों की पत्रिकाओं में इस प्रतीक चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यह प्रतीक चिह्न हमारी अपनी परम्परा में श्रद्धा एवं विश्वास का द्योतक है। जैन प्रतीक चिह्न किसी भी विचारधारा, दर्शन या दल के ध्वज के समान है, जिसको देखने मात्र से पता लग जाता है कि यह किससे संबंधित है, परंतु इसके लिए किसी भी प्रतीक चिह्न का विशिष्ट (यूनीक) होना एवं सभी स्थानों पर समानुपाती होना बहुत ही आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि प्रतीक ध्वज का प्रारूप बनाते समय जो मूल भावनाएँ इसमें समाहित की गई थीं, उन सभी मूल भावनाओं को यह चिह्न अच्छी तरह से प्रकट करता है।


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चयनित ग्रंथ

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क्या आप जानते हैं??

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विकिपरियोजनाएं

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चयनित चित्र

पद्मसान मुद्रा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की यह प्राचीन प्रतिमा कुण्डलपुर, मध्य प्रदेश में विराजमान हैं
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