ऋषभदेव

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
ऋषभदेव
प्रथम तीर्थंकर
Photo of lord adinath bhagwan at kundalpur.JPG
ऋषभनाथ की प्रतिमा, कुण्डलपुर, मध्य प्रदेश
विवरण
अन्य नाम आदिनाथ, ऋषभनाथ, वृषभनाथ
शिक्षाएं अहिंसा
अगले तीर्थंकर अजितनाथ
गृहस्थ जीवन
वंश इक्ष्वाकु
पिता नाभिराज
माता महारानी मरूदेवी
पुत्र भरत चक्रवर्ती, बाहुबली
पुत्री ब्राहमी और सुंदरी
पंच कल्याणक
जन्म चैत्र कृष्ण ९
जन्म स्थान अयोध्या
मोक्ष माघ कृष्ण १४
मोक्ष स्थान कैलाश पर्वत
लक्षण
रंग स्वर्ण
चिन्ह वृषभ (बैल)
ऊंचाई ५०० धनुष (१५०० मीटर)
आयु ८,४००,००० पूर्व (५९२.७०४ × १०१८ वर्ष)
शासक देव
यक्षिणी चक्रेश्वरी

ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर (जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। ऋषभदेव जी को आदिनाथ भी कहा जाता है। भगवान ऋषभदेव वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम दिगम्बर जैन मुनि थे।[1]

जीवन चरित्र[संपादित करें]

जैन पुराणों के अनुसार अन्तिम कुलकर राजा नाभिराज के पुत्र ऋषभदेव हुये। भगवान ऋषभदेव का विवाह यशावती देवी और सुनन्दा से हुआ। ऋषभदेव के १०० पुत्र और दो पुत्रियाँ थी।[2] उनमें भरत चक्रवर्ती सबसे बड़े थे एवं प्रथम चक्रवर्ती सम्राट हुए जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पडा। दुसरे पुत्र बाहुबली भी एक महान राजा एवं कामदेव पद से बिभूषित थे। इनके आलावा ऋषभदेव के वृषभसेन, अनन्तविजय, अनन्तवीर्य, अच्युत, वीर, वरवीर आदि ९९ पुत्र तथा ब्राम्ही और सुन्दरी नामक दो पुत्रियां भी हुई, जिनको ऋषभदेव ने सर्वप्रथम युग के आरम्भ में क्रमश: लिपिविद्या (अक्षरविद्या) और अंकविद्या का ज्ञान दिया।[3][4] बाहुबली और सुंदरी की माता का नाम सुनंदा था। भरत चक्रवर्ती, ब्रह्मी और अन्य ९८ पुत्रों की माता का नाम सुमंगला था। ऋषभदेव भगवान की आयु ८४ लाख पूर्व की थी जिसमें से २० लाख पूर्व कुमार अवस्था में व्यतीत हुआ और ६३ लाख पूर्व राजा की तरह|[5]

केवल ज्ञान[संपादित करें]

ऋषभदेव भगवान केवलज्ञान प्राप्ति के बाद

जैन ग्रंथो के अनुसार लगभग १००० वर्षो तक तप करने के पश्चात ऋषभदेव को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। ऋषभदेव भगवान के समवशरण में निम्नलिखित व्रती थे :[6]

  • ८४ गणधर
  • २२ हजार केवली
  • १२,७०० मुनि मन: पर्ययज्ञान ज्ञान से विभूषित [7]
  • ९,००० मुनि अवधी ज्ञान से
  • ४,७५० श्रुत केवली
  • २०,६०० ऋद्धि धारी मुनि
  • ३,५०,००० आर्यिका माता जी [8]
  • ३,००,००० श्रावक

हिन्दु ग्रन्थों में वर्णन[संपादित करें]

वैदिक धर्म में भी ॠषभदेव का संस्तवन किया गया है। भागवत में अर्हन् राजा के रूप में इनका विस्तृत वर्णन है। इसमें भरत आदि 100 पुत्रों का कथन जैन धर्म की तरह ही किया गया है। अन्त में वे दिगम्बर (नग्न) साधु होकर सारे भारत में विहार करने का भी उल्लेख किया गया है। ॠग्वेद आदि प्राचीन वैदिक साहित्य में भी इनका आदर के साथ संस्तवन किया गया है।

हिन्दूपुराण श्रीमद्भागवत के पाँचवें स्कन्ध के अनुसार मनु के पुत्र प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुये जिनके पुत्र राजा नाभि (जैन धर्म में नाभिराय नाम से उल्लिखित) थे। राजा नाभि के पुत्र ऋषभदेव हुये जो कि महान प्रतापी सम्राट हुये। भागवतपुराण अनुसार भगवान ऋषभदेव का विवाह इन्द्र की पुत्री जयन्ती से हुआ। इससे इनके सौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनमें भरत चक्रवर्ती सबसे बड़े एवं गुणवान थे।[9] उनसे छोटे कुशावर्त, इलावर्त, ब्रह्मावर्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पृक, विदर्भ और कीकट ये नौ राजकुमार शेष नब्बे भाइयों से बड़े एवं श्रेष्ठ थे। उनसे छोटे कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन ये नौ पुत्र राजकुमार भागवत धर्म का प्रचार करने वाले बड़े भगवद्भक्त थे। इनसे छोटे इक्यासी पुत्र पिता की की आज्ञा का पालन करते हुये पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करने से शुद्ध होकर ब्राह्मण हो गये।[10]

प्रतिमा[संपादित करें]

भगवान ऋषभदेव जी की एक विशाल प्रतिमा बडवानी (मध्यप्रदेश) (भारत) के पास बावनगजा मे है। यह ८४ फीट की है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ब.क. जैन २०१३, प॰ 31.
  2. Sangave 2001, प॰ 105.
  3. जैन 1998, प॰ 47-48.
  4. आदिनाथपुराण और चौबीस तीर्थंकर-पुराण
  5. जैन २०१५, प॰ 181.
  6. Champat Rai Jain 2008, प॰ 126-127.
  7. Champat Rai Jain 2008, प॰ 126.
  8. Champat Rai Jain 2008, प॰ 127.
  9. श्रीमद्धभागवत पञ्चम स्कन्ध, चतुर्थ अध्याय, श्लोक ९
  10. श्रीमद्धभागवत पञ्चम स्कन्ध, चतुर्थ अध्याय, श्लोक १३

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]