तारणपंथ

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तारण पंथ एक दिगंबर जैन धर्म का पंथ है।यह एक अनादिनिधन पंथ है।

निसईजी मल्हारगढ़[संपादित करें]

अशोकनगर की मुगांवली तहसील से १४ व कुरवाई से२० किलोमीटर दूर निसईजी तारण पंथ का सर्वप्रमुखधाम हैं।यहाँ अति विशाल मंदिर-धर्मशाला है।यहाँ तारण स्वामी का समाधि स्थल है।यहां धर्मशाला में ३१५ कमरे हैं।यहाँ संत तारण को तीन बार नदी में डुबाया तीन टापू बन गए।

निसई जी सूखा[संपादित करें]

यह तारण पंथ का दूसरा प्रमुख धाम है।यहाँ संत तारण ने अपना प्रचार प्रसार केंद्र बनाया।यह तारण स्वामी की विहार स्थली है।यहाँ स्वर्ण जड़ित वेदी है।यहाँ कांच जड़ित मंदिर व सर्व सुविधा युक्त १०५ धर्मशाला है।यहाँ पानी की कमी थी वह संत तारण के प्रभाव से कम हो गई।

निसई जी सेमरखेड़ी[संपादित करें]

यह तारण स्वामी का तीसरा प्रमुख क्षेत्र है।यहां संत तारण ने अपनी साधना की।यह तारण स्वामी की दीक्षा भूमि है।यहाँ गुरुकुल संचालित है ।यहाँ विशाल मंदिर व२५० कमरों की धर्मशाला है।यहाँ तारण स्वामी को जहर पिलाया तो अमृत बन गया।

पुष्पावति बिल्हेरी[संपादित करें]

यह तारण पंथ का चौथा प्रमुख धाम है।यहाँ तारण स्वामी ने जन्म लिया व बाल्य काल बिताया।यहाँ विशाल मंदिर व १५० कमरों की धर्मशाला है।यहाँ जब पिता के कागज़ ज़ल गए तो तारण ने नए तैयार करके दिए।

आहर्ताएं[संपादित करें]

जो सप्त व्यसन के त्याग पूर्वक अठारह क्रियाओं का पालन करता है वह तारण पंथी कहलाता है।ये अपनी पूजा को मंदिर विधी कहते हैं।ये मंदिर को चैत्यालय कहते हैं।ये अभिवादन के रूप में जय तारण तरण कहते हैं।

विवरण[संपादित करें]

  • आबादी -१०००००
  • मुख्य स्थल - निसई जी
  • संस्थापक -संत तारण
  • मंदिर संख्या -150 के लगभग
  • निवास स्थल संख्या -450


तारणपंथ की स्थापना १५०५ ईसा पूर्व जैनों ने की थी। जिस समय धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला था तब तारण नाम के व्यक्ति ने इस पंथ को जन्म दिया । जो आगे चलकर संत तारण के नाम से विख्यात हुआ यह पंथ मूर्ति पूजा के विरोध में उत्पन्न हुआ। संत तारण के द्वारा प्रतिरूप होने के कारण यहां पंथ तारणपंथ के नाम से ख्यात हुआ। संत तारण में १४ ग्रंथों की रचना की थी ।इनका टीकाकरण ब्र.शीतलप्रसाद ने किया। तारण पंथी १८क्रियाओं का पालन करने वालों को कहते हैं।तारण पंथ का अर्थ है-मोक्ष मार्ग। उनके अनुयाई मूर्ति पूजा नहीं करते थे एवं वह अपने चैत्यालयों में [1] विराजमान शास्त्रों की पूजा करते हैं। इनके यहां संत तारण द्वारा रचित ग्रंथों के अतिरिक्त [2] दिगंबर जैन जैनाचायों के ग्रंथों की भी मान्यता है। संत तारण का प्रभाव मध्य प्रांतों के ही कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहा है।

अतिरिक्त तीर्थ क्षेत्र[संपादित करें]

  • ग्यारसपुर - पहला चातुर्मास किया।
  • गढ़ौला - दर्शन मात्र से मंत्र सिध्द हुआ।
  • मधुवन - २० तीर्थंकर मोक्ष गए।
  • चांद - प्रमुख शिष्य हिमांऊ पांडे की साधना भूमि है।

जनसंख्या[संपादित करें]

तारण पंथ की आबादी बीस हजार से एक लाख के मध्य है । तारण समाज ४५० से नगरों में बसती है।तारण समाज बासोदा व भोपाल में सर्वाधिक बसती है।

समुदाय[संपादित करें]

तारण पंथ के ६ समुदाय हैं।

  • समैया
  • असाटी
  • चरणागर
  • अयोध्या वासी
  • दो सके
  • गोलालारे

तारण तरण श्री संघ[संपादित करें]

तारण पंथ में जो ब्रम्हचारी होते हैं उन्हें श्री संघ कहते हैं।वर्तमान में श्री संघ के प्रमुख ब्र. आत्मानंदब्र. बसंत हैं। श्री संघ में लगभग ११५ ब्रम्हचारी हैं।तारण स्वामी ने अपने तिलक में लिखा है - "श्री संघम् उवन्नं जयं - जयं"।

सन्दर्भ[संपादित करें]

सम्यक तारण द्वारा एक पुस्तक लिखी जा रही है प्रकाशित होने पर अवश्य पढ़ें।नाम-हमारी तारण समाज । इसके प्रेरणादायी ब्रम्हचारी आत्मा नंद जी

इन्हें भी देखिए[संपादित करें]