तारणपंथ

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      ।। वंदे  श्री गुरु   तारणं।।
   आबादी -१००००० 
   मुख्य स्थल - निसई जी 
   संस्थापक  -संत तारण 
    मंदिर संख्या -150 के लगभग
    निवास स्थल संख्या -450


तारणपंथ की स्थापना १५०५ ईसा पूर्व जैनों ने की थी। जिस समय धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला था तब तारण नाम के व्यक्ति ने इस पंथ को जन्म दिया । जो आगे चलकर संत तारण के नाम से विख्यात हुआ यह पंथ मूर्ति पूजा के विरोध में उत्पन्न हुआ। संत तारण के द्वारा प्रतिरूप होने के कारण यहां पंथ तारणपंथ के नाम से ख्यात हुआ। संत तारण में १४ ग्रंथों की रचना की थी ।इनका टीकाकरण ब्र.शीतलप्रसाद ने किया। तारण पंथी १८क्रियाओं का पालन करने वालों को कहते हैं।तारण पंथ का अर्थ है-मोक्ष मार्ग। उनके अनुयाई मूर्ति पूजा नहीं करते थे एवं वह अपने चैत्यालयों में [1] विराजमान शास्त्रों की पूजा करते हैं। इनके यहां संत तारण द्वारा रचित ग्रंथों के अतिरिक्त [2] दिगंबर जैन जैनाचायों के ग्रंथों की भी मान्यता है। संत तारण का प्रभाव मध्य प्रांतों के ही कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहा है । इनके चार तीर्थ हैं

   निसईजी जिला अशोक नगर 
   निसईजी सूखा जिला दमोह 
   सेमरखेडी जिला विदिशा 
    बिल्हेरी जिला कटनी

तारण पंथ की आबादी बीस हजार से एक लाख के मध्य है । तारण समाज ४५० से नगरों में बसती है।तारण समाज बासोदा व भोपाल में सर्वाधिक बसती है।तारण पंथ के ६ समुदाय हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Smarika, Sarva Dharma Sammelan, 1974, Taran Taran Samaj, Jabalpur
  2. "Books I have Loved". Osho.nl. http://osho.nl/New-Osho-NL/EnglBooks/BooksIHave.htm. अभिगमन तिथि: १३ दिसम्बर २०१५.