मल्लिनाथ
| श्री मल्लिनाथ | |
|---|---|
|
राजस्थान में स्थापित भगवान मल्लिनाथ की प्राचीन प्रतिमा | |
| विवरण | |
| शिक्षाएं | अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम एवं मोक्षमार्ग |
| पूर्व तीर्थंकर | अरनाथ |
| अगले तीर्थंकर | मुनिसुव्रतनाथ |
| गृहस्थ जीवन | |
| वंश | इक्ष्वाकु वंश |
| पंच कल्याणक | |
| जन्म कल्याणक | मिथिला |
| दीक्षा कल्याणक | मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, मिथिला |
| लक्षण | |
| वृक्ष | अशोक |
| शासक देव | |
| यक्ष | कुबेर |
| यक्षिणी | धरणप्रिया |
मल्लिनाथ (संस्कृत: मल्लिनाथ, प्राकृत: मल्लीणाह) जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं। जैन परंपरा के अनुसार उनका जन्म मिथिला (मिथिलापुरी) में इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा कुम्भराज तथा माता का नाम रानी रक्षिता देवी था। उनका लाञ्छन (चिह्न) कलश है तथा उनका कैवल्य ज्ञान अशोक वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ। अंततः उन्होंने सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वत) पर निर्वाण प्राप्त किया, जो जैन धर्म का एक प्रमुख तीर्थ है।
दिगंबर और श्वेतांबर परंपराओं में भगवान मल्लिनाथ के संबंध में एक महत्वपूर्ण मतभेद पाया जाता है। दिगंबर परंपरा उन्हें पुरुष तीर्थंकर मानती है, जबकि श्वेतांबर परंपरा के अनुसार वे जैन धर्म की एकमात्र स्त्री तीर्थंकर थीं। यह विषय जैन दर्शन और इतिहास में विशेष महत्व रखता है तथा अनेक धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
भगवान मल्लिनाथ का जीवन अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम तथा मोक्ष मार्ग के आदर्शों का प्रतीक माना जाता है। जैन आगमों के अनुसार उन्होंने दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात कठोर तपस्या द्वारा कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया और असंख्य जीवों को धर्मोपदेश देकर मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। उनके प्रमुख गणधर अभीक्षक स्वामी माने जाते हैं तथा उनके संघ में अनेक साधु, साध्वियाँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थीं।
जैन परंपरा में भगवान मल्लिनाथ का कल्याणक अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है और भारत के अनेक जैन मंदिरों में उनकी प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं। उनका जीवन जैन धर्म के पंचमहाव्रतों तथा आत्मशुद्धि के आदर्श का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
दीक्षा एवं केवलज्ञान
[संपादित करें]राजकीय जीवन व्यतीत करने के पश्चात् भगवान मल्लिनाथ ने संसार की नश्वरता का अनुभव किया और वैराग्य धारण किया। जैन परम्परा के अनुसार उन्होंने मिथिला में मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन राजवैभव का त्याग कर दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के दो दिन बाद उन्होंने खीर द्वारा प्रथम पारणा किया।
कठोर तप, संयम और ध्यान के उपरान्त भगवान मल्लिनाथ को अशोक वृक्ष के नीचे कैवल्य ज्ञान (केवलज्ञान) की प्राप्ति हुई। केवलज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उन्होंने समवसरण में धर्मोपदेश दिया और असंख्य जीवों को सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् चरित्र का मार्ग बताया।
उपदेश
[संपादित करें]भगवान मल्लिनाथ के उपदेशों का मूल आधार आत्मसंयम, अहिंसा और मोक्षमार्ग था। उन्होंने जीवों को राग-द्वेष का त्याग कर आत्मकल्याण की प्रेरणा दी। उनके प्रमुख उपदेश इस प्रकार हैं—
गणधर एवं संघ
[संपादित करें]जैन आगमों के अनुसार भगवान मल्लिनाथ के 28 गणधर थे। इनमें अभीक्षक स्वामी प्रथम गणधर माने जाते हैं। उनके समवसरण में असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक तथा श्राविकाएँ सम्मिलित होकर धर्मोपदेश सुनते थे।
निर्वाण
[संपादित करें]भगवान मल्लिनाथ ने दीर्घकाल तक धर्मप्रवर्तन करने के पश्चात् सम्मेद शिखर (वर्तमान पारसनाथ पर्वत) पर फाल्गुन शुक्ल द्वितीया के दिन 500 साधुओं के साथ निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। जैन धर्म में सम्मेद शिखर को अत्यन्त पवित्र तीर्थ माना जाता है, क्योंकि 24 में से 20 तीर्थंकरों ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था।
मोक्ष की प्राप्ति
[संपादित करें]जैन परंपरा के अनुसार भगवान श्री मल्लिनाथ ने राजवैभव का त्याग कर मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को मिथिलापुरी में दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के उपरान्त उन्होंने कठोर तप, संयम तथा ध्यान का पालन किया। दीक्षा के दो दिन पश्चात उन्होंने खीर से प्रथम पारणा किया।[1]
एक दिन-रात्रि के घोर तप के पश्चात मिथिलापुरी में अशोक वृक्ष के नीचे उन्हें कैवल्य ज्ञान (सर्वज्ञत्व) की प्राप्ति हुई। इसके बाद उन्होंने समवसरण में धर्मोपदेश देकर असंख्य जीवों को सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र का मार्ग बताया। उनके प्रथम गणधर अभीक्षक स्वामी थे तथा कुल 28 गणधर माने जाते हैं।[2]
भगवान मल्लिनाथ ने अपने उपदेशों में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम तथा आत्मकल्याण पर विशेष बल दिया। उनके उपदेशों से बड़ी संख्या में श्रमण, श्रमणी, श्रावक और श्राविकाएँ धर्ममार्ग पर अग्रसर हुए।
जैन परंपरा के अनुसार फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को भगवान मल्लिनाथ ने सम्मेद शिखर (वर्तमान पारसनाथ पर्वत, झारखंड) पर 500 मुनियों के साथ निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। यह स्थान जैन धर्म के सबसे पवित्र सिद्धक्षेत्रों में से एक माना जाता है।[3]
श्वेताम्बर और दिगम्बर परंपरा में मल्लिनाथ
[संपादित करें]भगवान मल्लिनाथ के संबंध में जैन धर्म की दो प्रमुख परंपराओं—श्वेताम्बर और दिगम्बर—के मतों में उल्लेखनीय भिन्नता पाई जाती है।
श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार भगवान मल्लिनाथ का जन्म राजा कुम्भराज और रानी रक्षिता के यहाँ मिथिलापुरी में हुआ था तथा वे स्त्री (राजकुमारी मल्ली) थीं। श्वेताम्बर मत उन्हें जैन धर्म की एकमात्र महिला तीर्थंकर मानता है।[4]
इसके विपरीत, दिगम्बर परंपरा के अनुसार सभी 24 तीर्थंकर पुरुष थे। इसलिए दिगम्बर मत में भगवान मल्लिनाथ को पुरुष माना जाता है। दिगम्बर आचार्यों का मत है कि तीर्थंकर पद की प्राप्ति के लिए पूर्ण दिगम्बर संयम आवश्यक है, जिसे वे पुरुष शरीर में ही संभव मानते हैं।[3]
यद्यपि दोनों परंपराओं में भगवान मल्लिनाथ के लिंग के विषय में मतभेद है, तथापि दोनों ही उन्हें उन्नीसवें तीर्थंकर के रूप में समान श्रद्धा से स्वीकार करती हैं। उनके जीवन, तप, केवलज्ञान, धर्मोपदेश तथा मोक्ष की महत्ता दोनों परंपराओं में समान रूप से वर्णित है।[5]
पूजा एवं महत्व
[संपादित करें]भगवान मल्लिनाथ जैन धर्म में उन्नीसवें तीर्थंकर के रूप में अत्यंत श्रद्धा से पूजे जाते हैं। जैन परंपरा में उनका जीवन संयम, वैराग्य, तप, अहिंसा और मोक्षमार्ग के आदर्शों का प्रतीक माना जाता है। भक्त उनके चरणों में वंदना करके आत्मशुद्धि, शांति और धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।[6]
भगवान मल्लिनाथ का लाञ्छन कलश है, जो पवित्रता, पूर्णता, कल्याण और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। जैन मंदिरों में उनकी प्रतिमाएँ प्रायः ध्यानमग्न मुद्रा में स्थापित की जाती हैं। प्रतिमा के आधार या आसन पर कलश चिह्न अंकित होने से उनकी पहचान की जाती है।[5]
जैन समुदाय में भगवान मल्लिनाथ के जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक को श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। इन अवसरों पर मंदिरों में पूजा, अभिषेक, स्वाध्याय, प्रवचन, तप और धर्मसभाओं का आयोजन किया जाता है। विशेष रूप से फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को उनके निर्वाण दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है।[3]
भगवान मल्लिनाथ का उपदेश जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों—अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम और आत्मकल्याण—पर आधारित माना जाता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि आत्मसंयम, तप और सम्यक् चरित्र के माध्यम से जीव कर्मबंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है।[7]
सम्मेद शिखर (श्री सम्मेद शिखरजी), जहाँ भगवान मल्लिनाथ ने निर्वाण प्राप्त किया, जैन धर्म का एक प्रमुख सिद्धक्षेत्र है। इस कारण भगवान मल्लिनाथ की आराधना केवल एक तीर्थंकर के रूप में ही नहीं, बल्कि मोक्षमार्ग के आदर्श के रूप में भी की जाती है।[8]
चित्र दीर्घा
[संपादित करें]- भगवान मल्लिनाथ की प्रतिमा
- तीर्थंकर प्रतिमा की पारंपरिक शैली
- सम्मेद शिखरजी, जहाँ भगवान मल्लिनाथ ने निर्वाण प्राप्त किया
- जैन मंदिर की स्थापत्य कला
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]संदर्भ
[संपादित करें]- ↑ Yativṛṣabha. Tiloya Paṇṇatti. Jain Granth Mala.
- ↑ Hemachandra. Trishashti Shalaka Purusha Charitra. Jain Publication Society.
- 1 2 3 Dundas, Paul (2002). The Jains. Routledge. ISBN 9780415266055.
- ↑ Jaini, Padmanabh S. (1991). Gender and Salvation: Jaina Debates on the Spiritual Liberation of Women. University of California Press. ISBN 9780520068209.
- 1 2 Cort, John E. (2001). Jains in the World: Religious Values and Ideology in India. Oxford University Press. ISBN 9780195132342.
- ↑ Jaini, Padmanabh S. (1979). The Jaina Path of Purification. University of California Press. ISBN 9780520031685.
- ↑ Jain, Vijay K. (2011). Essentials of Jainism. Vikalp Printers.
- ↑ Jain, Kailash Chand (1991). History of Jainism. Motilal Banarsidass.
- Jaini, Padmanabh S. (1979). The Jaina Path of Purification. University of California Press. ISBN 9780520031685.
- Dundas, Paul (2002). The Jains (2nd ed.). Routledge. ISBN 9780415266055.
- Cort, John E. (2001). Jains in the World: Religious Values and Ideology in India. Oxford University Press. ISBN 9780195132342.
- Shah, Umakant P. (1987). Jaina-Rūpa-Maṇḍana (Jaina Iconography). Abhinav Publications. ISBN 9788170172086.
- Jain, Kailash Chand (1991). History of Jainism. Motilal Banarsidass.
- Sangave, Vilas Adinath (1990). The Jaina Community. Popular Prakashan.
- Jain, Vijay K. (2012). Acarya Umasvami's Tattvarthsutra. Vikalp Printers.
- “Mallinatha”. Encyclopaedia of Jainism. (1998). Anmol Publications.
- "Lord Mallinath". Jain Quantum. अभिगमन तिथि: 2026-07-05.
- "19th Tirthankara Mallinath". Jainpedia. अभिगमन तिथि: 2026-07-05.
- "Mallinath Bhagwan". Jain Universe. मूल से से 26 जुलाई 2013 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 2026-07-05.
- "Jainism". Encyclopaedia Britannica. अभिगमन तिथि: 2026-07-05.