ब्रह्मचर्य

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ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है| ये वैदिक वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार ये ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है।

व्युत्पत्ति[संपादित करें]

ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।

योग[संपादित करें]

योग में ब्रह्मचर्य का अर्थ अधिकतर यौन संयम समझा जाता है। यौन संयम का अर्थ अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग समझा जाता है, जैसे विवाहितों का एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहना, या आध्यात्मिक आकांक्षी के लिये पूर्ण ब्रह्मचर्य।

जैन धर्म में ब्रह्मचर्य[संपादित करें]

ब्रह्मचर्य, जैन धर्म में पवित्र रहने का गुण है, यह जैन श्रावक के पांच महान प्रतिज्ञा में से एक है (अन्य है सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह )| जैन मुनि और अर्यिकाओं दीक्षा लेने के लिए कर्म, विचार और वचन में ब्रह्मचर्य अनिवार्य है | जैन श्रावक के लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ है शुद्धता । यह यौन गतिविधियों में भोग को नियंत्रित करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास के लिए है | जो अविवाहित हैं, उन जैन श्रावको के लिए, विवाह से पहले यौनाचार से दूर रहना अनिवार्य है |

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]