ब्रह्मचर्य

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ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है| ये वैदिक वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार ये ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है।

व्युत्पत्ति[संपादित करें]

ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।

योग[संपादित करें]

योग में ब्रह्मचर्य का अर्थ अधिकतर यौन संयम समझा जाता है। यौन संयम का अर्थ अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग समझा जाता है, जैसे विवाहितों का एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहना, या आध्यात्मिक आकांक्षी के लिये पूर्ण ब्रह्मचर्य।

ब्रह्मचर्य और खानपान[संपादित करें]

ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल यौन संयम से ही नहीं है, बल्कि इसका अर्थ अपने खान-पान पर भी नियंत्रण करना है। बहुत से ब्रह्मचारी माँस से, अत्यधिक खट्टे या नमकीन भोजन से और बहुत मसालेदार भोजन से भी संयम रखते हैं। गांधीजी, जो की एक जाने माने ब्रह्मचारी भी थे, ने अपने पूरे जीवनभर सादा ही भोजन किया और उनका ये भोजन उनके ३५ वर्षों तक किये गये सुधारों का परिणाम है, जिसे गांधी-भोजन के नाम से भी जाना जाता है इस प्रकार है:

  • १ लीटर गाय या बकरी का दुध।
  • १७० ग्राम अन्न।
  • ८५ ग्राम पत्तिदार सब्ज़ियाँ।
  • १४० ग्राम अन्य सब्ज़ियाँ।
  • ३० ग्राम कच्ची सब्ज़ियाँ।
  • ४० ग्राम घी।
  • ६० ग्राम मक्खन।
  • ४० ग्राम गुड़ या चीनी।
  • अपने स्वाद और जेबानुसार फ़ल।
  • २ खट्टे नींबू।
  • नमक स्वादानुसार।

जैन धर्म में ब्रह्मचर्य[संपादित करें]

ब्रह्मचर्य, जैन धर्म में पवित्र रहने का गुण है, यह जैन श्रावक के पांच महान प्रतिज्ञा में से एक है (अन्य है सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह )| जैन मुनि और अर्यिकाओं दीक्षा लेने के लिए कर्म, विचार और वचन में ब्रह्मचर्य अनिवार्य है | जैन श्रावक के लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ है शुद्धता । यह यौन गतिविधियों में भोग को नियंत्रित करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास के लिए है | जो अविवाहित हैं, उन जैन श्रावको के लिए, विवाह से पहले यौनाचार से दूर रहना अनिवार्य है |

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

ब्रह्मचर्य विषय पर सप्रमाण एवं व्यावहारिक जानकारी