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जैन ग्रंथ

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जैन साहित्य बहुत विशाल है। अधिकांश में वह धार्मिक साहित्य ही है। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में यह साहित्य लिखा गया है।

भगवान महावीरस्वामी की प्रवृत्तियों का केंद्र मगध रहा है, इसलिये उन्होंने यहाँ की लोकभाषा अर्धमागधी में अपना उपदेश दिया जो उपलब्ध जैन आगमों में सुरक्षित है। ये आगम ४५ हैं और इन्हें श्वेतांबर जैन प्रमाण मानते हैं, दिगंबर जैन नहीं। दिंगबरों के अनुसार आगम साहित्य कालदोष से विच्छिन्न हो गया है। दिगंबर षट्खंडागम को स्वीकार करते हैं जो १२वें अंगदृष्टिवाद का अंश माना गया है। दिगंबरों के प्राचीन साहित्य की भाषा शौरसेनी है। आगे चलकर अपभ्रंश तथा अपभ्रंश की उत्तरकालीन लोक-भाषाओं में जैन पंडितों ने अपनी रचनाएँ लिखकर भाषा साहित्य को समृद्ध बनाया।

आदिकालीन साहित्य में जैन साहित्य के ग्रन्थ सर्वाधिक संख्या में और सबसे प्रमाणिक रूप में मिलते हैं। जैन रचनाकारों ने पुराण काव्य, चरित काव्य, कथा काव्य, रास काव्य आदि विविध प्रकार के ग्रंथ रचे। स्वयंभू , पुष्प दंत, आचार्य हेेमचंद्रजी, सोमप्रभ सूरीजी आदि मुख्य जैन कवि हैं। इन्होंने हिंदुओं में प्रचलित लोक कथाओं को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाया और परंपरा से अलग उसकी परिणति अपने मतानुसार दिखाई।

आगम-साहित्य की प्राचीनता[संपादित करें]

जैन आगम की पारम्परिक गणना

जैन-साहित्य का प्राचीनतम भाग ‘आगम’ के नाम से कहा जाता है। ये आगम ४६ हैं-

  • (क) १२ अंग : आयारंग, सूयगडं, ठाणांग, समवायांग, भगवती, नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अंतगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, पण्हवागरण, विवागसुय, दिठ्ठवाय।
  • (ख) १२ उपांग : ओवाइय, रायपसेणिय, जीवाभिगम, पन्नवणा, सूरियपन्नति, जम्बुद्दीवपन्नति, निरयावलि, कप्पवडंसिया, पुप्फिया, पुप्फचूलिया, वण्हिदसा।
  • (ग) १० पइन्ना : चउसरण, आउरपचक्खाण, भत्तपरिन्ना, संथर, तंदुलवेयालिय, चंदविज्झय, देविंदत्थव, गणिविज्जा, महापंचक्खाण, वोरत्थव।
  • (घ) ६ छेदसूत्र : निसीह, महानिसीह, ववहार, आचारदसा, कप्प (बृहत्कल्प), पंचकप्प।
  • (च) ४ मूलसूत्र : उत्तरज्झयण, आवस्सय, दसवेयालिय।
  • (छ) २ चूलिकासूत्र : पिंडनिज्जुति नंदि और अनुयोग।

आगम ग्रन्थ काफी प्राचीन है, तथा जो स्थान वैदिक साहित्य क्षेत्र में वेद का और बौद्ध साहित्य में त्रिपिटक का है, वही स्थान जैन साहित्य में आगमों का है। आगम ग्रन्थों में महावीर स्वामी के उपदेशों तथा जैन संस्कृति से सम्बन्ध रखने वाली अनेक कथा-कहानियों का संकलन तथा जीवन उपयोगी सूत्र और बोहुत कुछ है।

जैन परम्परा के अनुसार महावीर स्वामी निर्वाण (ईसवी सन् के पूर्व 527) के 160 वर्ष पश्चात (लगभग ईसवी सन् के 367 पूर्व) मगध देशों में बहुत भारी दुष्काल पड़ा, जिसके फलस्वरूप जैन साधुओं को अन्यत्र विहार करना पड़ा। दुष्काल समाप्त हो जाने पर श्रमण पाटलिपुत्र (पटना) में एकत्रित हुए और यहाँ खण्ड-खण्ड करके ग्यारह अंगों का संकलन किया गया, बारहवाँ अंग किसी को स्मरण नहीं था, इसलिए उसका संकलन न किया जा सका। इस सम्मेलन को 'पाटलिपुत्र-वाचना' के नाम से जाना जाता है। कुछ समय पश्चात जब आगम साहित्य का फिर विच्छेद होने लगा तो महावीर स्वामी निर्वाण के 827 या 840 वर्ष बाद (ईसवी सन् के 300-313 में) जैन साधुओं के दूसरे सम्मेलन हुए। एक आर्यस्कन्दिल की अध्यक्षता में मथुरा में तथा दूसरा नागार्जुन सूरि की अध्यक्षता में वलभी में।

मथुरा के सम्मेलन को 'माथुरी-वाचना' की संज्ञा दी गयी है। तत्पश्चात लगभग 150 वर्ष बाद, महावीर स्वामी निर्वाण के 980 या 993 वर्ष बाद ( ईसवी सन् 453-466 में) वल्लभी में देवर्धिगणि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में साधुओं का चौथा सम्मेलन हुआ, जिसमें सुव्यवस्थित रूप से आगमों का अन्तिम बार संकलन किया गया। यह सम्मेलन 'वलभी-वाचना' के नाम से जाना जाता है। वर्तमान आगम साहित्य इसी संकलना का रूप है।

जैन आगमों की उक्त तीन संकलनाओं के इतिहास से पता लगता है कि समय-समय पर आगम साहित्य को काफी क्षति उठानी पड़ी, और यह साहित्य अपने मौलिक रूप में सुरक्षित नहीं रह सका।

महत्व[संपादित करें]

ईसा के पूर्व लगभग चौथी शताब्दी से लगाकर ईसवी सन् पाँचवी शताब्दी तक की भारतवर्ष की आर्थिक तथा सामाजिक दशा का चित्रण करने वाला यह साहित्य अनेक दृष्टियों से महत्त्व का है। आचारांग, सूयगडं, उत्तराध्ययन सूूत्र, दसवैकालिक आदि ग्रन्थों में जो जैन श्रमण के आचार-चर्या का विस्तृत वर्णन है, और डॉ. विण्टरनीज आदि के कथानानुसार वह श्रमण-काव्य (Ascetic poetry) का प्रतीक है। भाषा और विषय आदि की दृष्टि से जैन आगमों का यह भाग सबसे प्राचीन मालूम होता है।

भगवती कल्पसूत्र, ओवाइय, ठाणांग, निरयावलि आदि ग्रन्थों में श्रमण भगवान महावीर, उनकी चर्या, उनके उपदेशों तथा तत्कालीन राजा, राजकुमार और उनके युद्ध आदि का विस्तृत वर्णन है, जिससे जैन इतिहास की लुप्तप्राय अनेक अनुश्रुतियों का पता लगता है। नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अन्तगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, विवागसुय आदि ग्रन्थों में महावीर स्वामीजी द्वारा कही हुई अनेक कथा-कहानियाँ तथा उनकी शिष्य-शिष्याओं का वर्णन है, जिसमें जैन परम्परा सम्बन्धी अनेक बातों का परिचय मिलता है। रायपणेसिय, जीवाभिगम, पन्नवणा आदि ग्रन्थों में वास्तुशास्त्र, संगीत, वनस्पति आदि सम्बन्धी अनेक महत्वपूर्ण विषयों का वर्णन है जो प्रायः अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता है।

छेदसूत्रों में साधुओं के आहार-विहार तथा प्रायश्चित आदि का विस्तृत वर्णन है, जिसकी तुलना बौद्धों के विनयपिटक से की सकती है। वृहत्कल्पसूत्र (1-50) में बताया गया है कि जब भगवान महावीर साकेत (अयोध्या) सुभुमिभाग नामक उद्यान में विहार करते थे तो उस समय उन्होंने अपने भिक्षु-भिक्षुणियों को साकेत के पूर्व में अंग-मगध तक दक्षइ के कौशाम्बी तक, तथा उत्तर में कुणाला (उत्तरोसल) तक विहार करने की अनुमति दी। इससे पता लगता है कि आरम्भ में जैन धर्म का प्रचार सीमित था, तथा जैन श्रमण मगध और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों को छोड़कर अन्यत्र नहीं जा सकते थे। निस्सन्देह छेदसूत्रों का यह भाग उतना ही प्राचीन है जितने स्वयं महावीर।

तत्पश्चात राजा कनिष्क के समकालीन मथुरा के जैन शिलालेखों में भिन्न-भिन्न गण, कुल और शाखाओं का उल्लेख है, वह भद्रवाहु स्वामी के कल्पसूत्र में वर्णित गण, कुल और शाखाओं के साथ प्रायः मेल खाता है। इससे भी जैन आगम ग्रन्थों की प्रामाणिकता का पता चलता है। वस्तुतः इस समय तक जैन परम्परा में श्वेताम्बर और दिगम्बर का भेद नहीं मालूम होता। जैन आगमों के विषय, भाषा आदि में जो पालि वह भी इस साहित्य की प्राचीनता को द्योतित करती है।

पालि-सूत्रों की अट्टकथाओं की तरह आगमों की भी अनेक टीका-टिप्पणियाँ, दीपिका, निवृत्ति, विवरण, अवचूरि आदि लिखी गयी हैं। इस साहित्य को सामान्यता निर्युक्ति, भाष्य, चूर्णि और टीका-इन चार विभागों में विभक्त किया जा सकता है। आगम को मिलाकर इसे 'पांचांगी' के नाम से कहते हैं। आगम साहित्य की तरह यह साहित्य भी बहुत महत्त्व का है। इसमें आगमों के विषय का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है। इस साहित्य में अनेक अनुश्रुतियाँ सुरक्षित हैं, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। वृहत्कल्पभाष्य, व्यवहारभाष्य, निशीथचूर्णि, आवश्यकचूर्णि, आवश्यकटीका, उत्तराध्ययन टीका आदि टीका-ग्रन्थों में पुरातत्व सम्बन्धी विविध सामग्री भरी पड़ी है, जिससे भारत के रीति-रिवाज, मेले त्यौहार, साधु-सम्प्रदाय, दुष्काल, बाढ़, चोर-लुटेरे, सार्थवाह, व्यापार के मार्ग, शिल्प, कला, भोजन-शास्त्र, मकान, आभूषण, आदि विविध विषयों पर बहुत प्रकाश पड़ता है।

लोक-कथा और भाषा शास्त्र की दृष्टि से भी यह साहित्य बहुत महत्त्व का है। डॉ० विण्टरनीज के शब्दों में-

जैन टीका-ग्रन्थों में भारतीय प्राचीन-कथा साहित्य के अनेक उज्वल रत्न विद्यामान हैं, जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं होते।

चूर्णि-साहित्य में प्राकृत मिश्रित संस्कृत का उपयोग किया गया है, जो भाषाशास्त्र की दृष्टि से विशेष महत्त्व का है, और साथ यह उस महत्त्वपूर्ण काल का द्योतक है जब जैन विद्वान प्राकृत का आश्रय छोड़कर संस्कृत भाषा की ओर बढ़ रहे थे।

प्रमुख ग्रन्थ[संपादित करें]

अन्य ग्रन्थ[संपादित करें]

समयसार,

प्रवचनसार,

रत्नकरण्ड श्रावकाचार,

पुरुषार्थ सिद्धयुपाय,

इष्टोपदेश,

धवला टीका,

महाधवला टीका,

कसायपाहुड,

जयधवला टीका,

योगसार,

पंचास्तिकायसार,

बारसाणुवेक्खा,

आप्तमीमांसा,

अष्टशती टीका,

अष्टसहस्री टीका,

तत्त्वार्थराजवार्तिक टीका,

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक टीका,

समाधितन्त्र,

भगवती आराधना,

मूलाचार,

गोम्मतसार,

द्रव्यसंग्रह,

भद्रबाहु संहिता

आचार्य तारण स्वामी विरचित- मालारोहण, पंडित पूजा, कमलबत्तीसी, तारण तरण श्रावकाचार, न्यानसमुच्चय साथ, उपदेशशुद्ध सार, त्रिभंगीसार, चौबीस ठाणा, ममलपाहुड, षातिकाविशेष, सिद्धस्वभाव, सुन्नस्वभाव, छद्मस्थवाणी, नाममाला।

प्रथामानयोग[संपादित करें]

तत्त्वार्थ सूत्र[संपादित करें]

तत्त्वार्थ सूत्र, आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित जैन ग्रन्थ है। इसे "मोक्ष-शास्त्र" भी कहते हैं।

जैन ग्रन्थों की बृहद सूची[संपादित करें]

षट्खंडागम -- आचार्य पुष्पदंत, आचार्य भूतबलि

समयसार -- आचार्य कुंदकुंद

नियमसार -- आचार्य कुंदकुंद

प्रवचनसार -- आचार्य कुंदकुंद

अष्टपाहुड़ -- आचार्य कुंदकुंद

पंचास्तिकाय -- आचार्य कुंदकुंद

रयणसार -- आचार्य कुंदकुंद

दश भक्ति -- आचार्य कुंदकुंद

वारसाणुवेक्खा -- आचार्य कुंदकुंद

तत्त्वार्थसूत्र -- आचार्य उमास्वामी

आप्तमीमांसा -- आचार्य समन्तभद्र

स्वयंभू स्तोत्र -- आचार्य समन्तभद्र

रत्नकरण्ड श्रावकाचार -- आचार्य समन्तभद्र

स्तुति विद्या -- आचार्य समन्तभद्र

युक्त्यनुशासन -- आचार्य समन्तभद्र

तत्त्वसार -- आचार्य देवसेन

आराधना सार -- आचार्य देवसेन

आलाप पद्धति -- आचार्य देवसेन

दर्शनसार -- आचार्य देवसेन

भावसंग्रह -- आचार्य देवसेन

लघु नयचक्र -- आचार्य देवसेन

इष्टोपदेश -- आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)

समाधितंत्र -- आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)

सर्वार्थसिद्धि -- आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)

वैद्यक शास्त्र -- आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)

सिद्धिप्रिय स्तोत्र -- आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)

जैनेन्द्र व्याकरण -- आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)

परमात्म प्रकाश -- आचार्य योगीन्दु देव

योगसार -- आचार्य योगीन्दु देव

नौकार श्रावकाचार -- आचार्य योगीन्दु देव

तत्त्वार्थ टीका -- आचार्य योगीन्दु देव

अमृताशीति -- आचार्य योगीन्दु देव

सुभाषित तंत्र -- आचार्य योगीन्दु देव

अध्यात्म संदोह -- आचार्य योगीन्दु देव

सन्मति सूत्र -- आचार्य सिद्धसेन दिवाकर

कल्याण मंदिर -- आचार्य सिद्धसेन दिवाकर

अष्टशती -- आचार्य अकलंकदेव

लघीयस्त्रय -- आचार्य अकलंकदेव

न्यायविनिश्चय सवृत्ति -- आचार्य अकलंकदेव

सिद्धिविनिश्चय सवृत्ति -- आचार्य अकलंकदेव

प्रमाण संग्रह सवृत्ति -- आचार्य अकलंकदेव

तत्त्वार्थ राजवार्तिक -- आचार्य अकलंकदेव

हरिवंश पुराण -- आचार्य जिनसेन (प्रथम)

आदिपुराण -- आचार्य जिनसेन

उत्तरपुराण -- आचार्य गुणभद्र

आत्मानुशासन -- आचार्य गुणभद्र

अष्टसहस्री -- आचार्य विद्यानंद

श्लोक वार्तिक -- आचार्य विद्यानंद

आप्तपरीक्षा -- आचार्य विद्यानंद

प्रमाणपरीक्षा -- आचार्य विद्यानंद

पत्र परीक्षा -- आचार्य विद्यानंद

क्षत्रचूड़ामणि -- आचार्य वादीभसिंह सूरि

गद्यचिंतामणि -- आचार्य वादीभसिंह सूरि

कार्तिकेयानुप्रेक्षा -- आचार्य कार्तिकेय स्वामी

तत्वार्थसार -- आचार्य अमृतचंद

पुरुषार्थसिद्धिउपाय -- आचार्यअमृतचंद्र

आत्मख्याति टीका -- आचार्य अमृतचंद्र

लघुतत्त्वस्फोट -- आचार्य अमृतचंद्र

तत्त्वप्रदीपिका टीका -- आचार्य अमृतचंद्र

वरांग चरित्र -- श्री जटासिंह नन्दि

चन्द्रप्रभ चरित्र -- आचार्य वीरनन्दी

कषाय पाहुड -- आचार्य गुणधर

गोम्मटसार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती

पाषणाहचरिउ -- मुनि पद्मकीर्ति

त्रिलोकसार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती

लब्धिसार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती

क्षपणासार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती

तिलोयपण्णत्ति -- आचार्य यतिवृषभ

जम्बूद्वीप पण्णत्ति -- आचार्य यतिवृषभ

धवला टीका -- आचार्य वीरसेन

यशस्तिलक चंपू -- आचार्य सोमदेव

नीतिवाक्यामृत -- आचार्य सोमदेव

अध्यात्मतरंगिणी -- आचार्य सोमदेव

सिद्धिविनिश्चय टीका -- बृहद् अनंतवीर्य

प्रमाणसंग्रहभाष्य -- बृहद् अनंतवीर्य

शाकटायन शब्दानुशासन -- आचार्य शाकटायन

केवली भुक्ति -- आचार्य शाकटायन

लघु द्रव्य संग्रह -- आचार्य नेमिचन्द्र

वृहद् द्रव्य संग्रह -- आचार्य नेमिचन्द्र

प्रमेय-कमल-मार्तण्ड -- आचार्य प्रभाचंद्र

न्याय कुमुदचन्द्र -- आचार्य प्रभाचंद्र

तत्वार्थ-वृत्तिपद-विवरण -- आचार्य प्रभाचंद्र

शाकटायन-न्यास -- आचार्य प्रभाचंद्र

शब्दाम्भोज भास्कर -- आचार्य प्रभाचंद्र

गद्यकथाकोष -- आचार्य प्रभाचंद्र

प्रद्युम्नचरित्र -- आचार्य महासेन

भक्तामर स्तोत्र -- आचार्य मानतुंग

पद्मनंदी पंचविंशतिका -- आचार्य पद्मनंदी (द्वितीय)

मूलाचार -- आचार्य वट्टकेर स्वामी

ज्ञानार्णव -- शुभचन्द्राचार्य जी

भगवती आराधना -- आचार्य शिवार्य (शिवकोटि)

अमितगति श्रावकाचार -- आचार्य अमितगति

धर्म परीक्षा -- आचार्य अमितगति

सुभाषित रत्न संदोह -- आचार्य अमितगति

तत्त्व भावना -- आचार्य अमितगति

पंच संग्रह -- आचार्य अमितगति

भावना द्वात्रिंशतिका -- आचार्य अमितगति

नियमसार टीका -- आचार्य पद्मप्रभमलधारिदेव

पार्श्वनाथ स्तोत्र -- आचार्य पद्मप्रभमलधारिदेव

धर्मामृत -- आचार्य नयसेन

समयसारतात्पर्यवृत्तिटीका -- आचार्य जयसेन (द्वितीय)

नियमसारतात्पर्यवृत्तिटीका -- आचार्य जयसेन (द्वितीय)

पंचास्तिकायतात्पर्यवृत्तिटीका -- आचार्य जयसेन (द्वितीय)

तत्त्वानुशासन -- आचार्य रामसेन

प्रमेयरत्नमाला -- आचार्य लघु अनंतवीर्य

सिद्धांतसार संग्रह -- आचार्य नरेंद्रसेन

परीक्षामुख -- आचार्य माणिक्यनंदी

न्यायदीपिका -- आचार्य धर्मभूषण यति

द्रव्य प्रकाशक नयचक्र -- आचार्य माइल्ल धवल

पद्मपुराण -- आचार्य रविषेण

मूलाचार -- आचार्य वट्टकेर स्वामी

गणितसार संग्रह -- आचार्य महावीर

श्रीपाल चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

शांतिनाथ चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

वर्धमान चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

मल्लिनाथ चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

यशोधर चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

धन्यकुमार चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

सुकमाल चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

सुदर्शन चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

जम्बूस्वामी चरित्र -- आचार्य सकलकीर्ति

मूलाचार प्रदीप -- आचार्य सकलकीर्ति

पार्श्वनाथ पुराण -- आचार्य सकलकीर्ति

सिद्धांतसार दीपक -- आचार्य सकलकीर्ति

तत्त्वार्थसार दीपक -- आचार्य सकलकीर्ति

आगमसार -- आचार्य सकलकीर्ति

मेरु मन्दर पुराण -- श्री वामन मुनि जी

प्रमाण ग्रंथ -- आचार्य वज्रनन्दि

चौबीसी पुराण -- आचार्य शुभचन्द्र

श्रेणिक चरित्र -- आचार्य शुभचन्द्र

श्री पांडव पुराण -- आचार्य शुभचन्द्र

श्री श्रेणिक चरित्र -- आचार्य शुभचन्द्र

चन्द्रप्रभ चरित्र -- आचार्य शुभचन्द्र

करकण्डु चरित्र -- आचार्य शुभचन्द्र

चन्दना चरित्र -- आचार्य शुभचन्द्र

जीवंधर चरित्र -- आचार्य शुभचन्द्र

अध्यात्मतरंगिणी -- आचार्य शुभचन्द्र

प्राकृत लक्षण -- आचार्य शुभचन्द्र

गणितसार संग्रह -- आचार्य श्रीधर

त्रिलोकसारटीका -- आचार्य माधवचन्द

योगसार प्राभृत -- आचार्य अमितगति

बृहत्कथाकोश -- आचार्य हरिषेण

आराधनासार -- आचार्य रविभद्र

आचारसार -- आचार्य वीरनन्दी

वर्धमान चरित्र -- आचार्य असग

सुदंसण चरिउ -- आचार्य नयनन्दि

एकीभाव स्तोत्र -- आचार्य वादिराज

पुराणसार संग्रह -- आचार्य श्रीचन्द

वसुनन्दी श्रावकाचार -- आचार्य वसुनन्दी

भावना पद्धति -- आचार्य पद्मनन्दि

अनगार धर्मामृत -- पंडित आशाधर

सागार धर्मामृत -- पंडित आशाधर

भरतेश वैभव -- महाकवि रत्नाकर जी

समयसार नाटक -- पण्डित बनारसीदास

ब्रह्म विलास -- भैया भगवतीदास

छहढाला -- पंडित द्यानतराय

क्रिया कोश -- पंडित दौलतराम (प्रथम)

भाव दीपिका -- पंडित दीपचन्द

चिद विलास -- पंडित दीपचन्द

पार्श्व पुराण -- पंडित भूधरदास

जिन शतक -- पंडित भूधरदास

मोक्षमार्ग प्रकाशक -- पंडित टोडरमल

गोम्मटसार टीका -- पंडित टोडरमल

लब्धिसार टीका -- पंडित टोडरमल

क्षपणासार टीका -- पंडित टोडरमल

त्रिलोकसार टीका -- पंडित टोडरमल

पुरुषार्थसिद्धिउपायटीका -- पंडित टोडरमल

जैन सिद्धांत प्रवेशिका -- पं गोपालदासजी बरैया

छहढाला -- पं. दौलतरामजी (द्वितीय)

रत्नकरंड वचनिका -- पं. सदासुखदास

समयसार वचनिका -- पं. जयचन्द छावड़ा

छहढाला -- पंडित बुधजन

महावीराष्टक स्तोत्र -- पंडित भागचन्द

जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश -- क्षुल्लक जिनेन्द्र वर्णी

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]