उत्तराध्ययन सूत्र
उत्तराध्ययन सूत्र जैन धर्म के श्वेताम्बर पन्थ का धर्मग्रन्थ है। कहते हैं कि महावीर स्वामी के निर्वाण के कुछ समय पहले दिए गये उपदेश इसमें संग्रहित हैं।
इस शास्त्र को जैन जगत में भगवान महावीर की अन्तिम वाणी माना जाता है जिसका मौलिक आधार यह है कि इन अध्ययनों का प्राचीन नाम 'महावीर भासियाइ' था। उसी के साथ अतिम देशना श्रद्धा से जुड़ जाने से भगवान की अन्तिम वाणी मोक्ष जाते समय उपदिष्ट अध्ययन कहलाये जाने लगे।
वैसे तो जैन धर्म को समझने के लिए दशवैकालिक सूत्र, भगवती सूत्र, तत्वार्थ सूत्र से जैन दर्शन समझा जा सकता है, लेकिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण "उत्तराध्ययन सूत्र" है। उत्तराध्ययन सूत्र को जैन धर्म की "गीता" कहा जाए तो अनुपयुक्त नहीं होगा। यह एक ऐसा आगम है जिसमें भगवान महावीर की अंतिम देशना को 36 उत्तर से समझा जा सकता है। श्री जैन श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार इस सूत्र को इतना महत्व देते है कि दीवाली के दूसरे दिन साधुगण इस सूत्र को खड़े होकर वाचन करते हैं क्योंकि यह महावीर भगवान द्वारा रचित है और उन्होंने अपने निर्वाण के पूर्व ही उपदेश दिया इसलिए इस सूत्र को आदर दिया गया है।
संरचना
[संपादित करें]इस सूत्र में जो वर्णन है वह जैन दर्शन का सम्पूर्ण सार है। इस सूत्र में भगवान महावीर ने बिना पूछे ही 36 उत्तर दिए और इन्हीं 36 प्रश्नों के प्रत्येक एक प्रश्न का एक अध्याय बन गया। इस प्रकार उत्तर का अध्ययन करने को उत्तराध्ययन कहा गया।
इस सूत्र का प्रारम्भ "नमन" अर्थात् विनय से होता है। वैसे जैन धर्म का आधार स्तंभ भी नमन है। जैन धर्म का महामंत्र "नमोकार मंत्र" भी नमन से प्रारम्भ होता है। नमन अर्थात् विनय साधारण भाषा में नम्रता या आज्ञापालन से लिया जाता है लेकिन इस सूत्र विनय का अर्थ व्यक्ति अहंकार रहित, उसके आचार व शील से है। यह धर्म व जीवन का मूल गुण है। जहां विनय नहीं है वहां धर्म नहीं है और जहां धर्म नहीं है वहां जीवन नहीं। इसी प्रकार महावीर ने परिग्रह, श्रद्धा, सत्य, अहिंसा आदि विषयों पर प्रकाश डाला और उसके अनुसरण करने पर मनुष्य स्व-कल्याण की ओर आगे बढ़ सकता है। इस सूत्र में जाति विहीन समाज की बात कही गई है।
उत्तराध्ययनसूत्र में ३६ अध्याय हैं, जिनके नाम क्रमशः ये हैं-
- विनयश्रुत
- परिषह प्रविभक्ति
- चतुरंगीय अध्ययन
- असंस्कृत अध्ययन
- अकाम मरणीय अध्ययन
- क्षुल्लक निर्ग्रन्थीय अध्ययन
- उरभ्रीय अध्ययन
- कापिलीय अध्ययन
- नमि प्रव्रज्या अध्ययन
- द्रुम पत्रक अध्ययन
- बहुश्रुत पूजा अध्ययन
- हरिकेशीय अध्ययन
- चित्र संभूतीय अध्ययन
- इषुकारीय अध्ययन
- सभिक्षु अध्ययन
- ब्रह्मचर्य समाधि स्थान अध्ययन
- पाप श्रमणीय अध्ययन
- संयतीय अध्ययन
- मृगापुत्रीय अध्ययन
- महानिर्ग्रंथीय अध्ययन
- समुद्र पालीय अध्ययन
- रथनेमीय अध्ययन
- केशी गौतमीय अध्ययन
- प्रवचनमाता अध्ययन
- यज्ञीय अध्ययन
- सामाचारी अध्ययन
- खलुंकीय अध्ययन
- मोक्ष मार्ग गति अध्ययन
- सम्यक्त्व पराक्रम अध्ययन
- तपो मार्ग गति अध्ययन
- चरण विधि अध्ययन
- प्रमाद स्थान अध्ययन
- कर्म प्रकृति अध्ययन
- लेश्या अध्ययन
- अणगार मार्ग गति अध्ययन
- जीवाजीव विभाग अध्ययन