कनिष्क

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कनिष्क प्रथम
कुषाण वंश सम्राट
कनिष्क कालीन एक स्वर्ण मुद्रा, ब्रिटिश संग्रहालय
शासनावधिद्वि्तीय शताब्दी
पूर्ववर्तीविम कडफिसेस
उत्तरवर्तीहुविष्क
जन्मपुरुषपुर (वर्तमान पेशावर)
निधनपेशावर
समाधि
घरानाकुषाण शाह
राजवंशकुषाण
धर्मयहूदी, कालांतर में बौद्ध धर्म

कनिष्क प्रथम (बाख़्त्री : Κανηϸκι, Kaneshki; मध्य चीनी भाषा: 迦腻色伽 (Ka-ni-sak-ka > नवीन चीनी भाषा: Jianisejia)), या कनिष्क महान, द्वितीय शताब्दी (१२७ – १५० ई.) में कुषाण राजवंश का भारत का एक महान् सम्राट था। वह अपने सैन्य, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों तथा कौशल हेतु प्रख्यात था। इस सम्राट को भारतीय इतिहास एवं मध्य एशिया के इतिहास में अपनी विजय, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी होने के नाते विशेष स्थान मिलता है।

अनुक्रम

कुषाण वंश के संस्थापक कुजुल कडफिसेस का ही एक वंशज, कनिष्क बख्त्रिया से इस साम्राज्य पर सत्तारूढ हुआ, जिसकी गणना एशिया के महानतम शासकों में की जाती है, क्योंकि इसका साम्राज्य तरीम बेसिन में तुर्फन से लेकर गांगेय मैदान में पाटलिपुत्र तक रहा था जिसमें मध्य एशिया के आधुनिक उजबेकिस्तान तजाकिस्तान, चीन के आधुनिक सिक्यांग एवं कांसू प्रान्त से लेकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और समस्त उत्तर भारत में बिहार एवं उड़ीसा तक आते हैं।[1] इस साम्राज्य की मुख्य राजधानी पेशावर (वर्तमान में पाकिस्तान, तत्कालीन भारत के) गाँधार प्रान्त के नगर पुरुषपुर में थी। इसके अलावा दो अन्य बड़ी राजधानियां प्राचीन कपिशा में भी थीं।

कनिष्क महान एक बहुत विशाल साम्राज्य का स्वामी था। उसका साम्राज्य मध्य एशिया स्थित काला सागर से लेकर पूर्व में उडीसा तक तथा उत्तर में चीनी तुर्केस्तान से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला हुआ था। उसके साम्राज्य में वर्तमान उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान का हिस्सा, तजाकिस्तान का हिस्सा और चीन के यारकंद, काशगर और खोतान के इलाके थे। कनिष्क भारतीय इतिहास का एक मात्र सम्राट हैं जिसका राज्य दक्षिणी एशिया के बाहर मध्य एशिया और चीन के हिस्सों को समाये था। वह इस साम्राज्य पर चार राजधानियो से शासन करता था। पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) उसकी मुख्य राजधानी थी। मथुरा , तक्षशिला और कपिशा (बेग्राम) उसकी अन्य राजधानिया थी| कनिष्क कोशानो का साम्राज्य (78-101 ई.) समकालीन विश्व के चार महानतम एवं विशालतम साम्राज्यों में से एक था। यूरोप का रोमन साम्राज्य, ईरान का सासानी साम्राज्य तथा चीन का साम्राज्य अन्य तीन साम्राज्य थे।

कोशानो साम्राज्य का उद्गम स्थल बैक्ट्रिया (वाहलिक, बल्ख) माना जाता हैं। प्रो. बैल्ली के अनुसार प्राचीन खोटानी ग्रन्थ में बाह्लक राज्य के शासक चन्द्र कनिष्क का उल्लेख किया गया हैं| खोटानी ग्रन्थ में लिखा हैं कि बाह्लक राज्य स्थित तोखारिस्तान के राजसी परिवार में एक बहादुर, प्रतिभाशाली और बुद्धिमान ‘चन्द्र कनिष्क’ नामक जम्बूदीप का सम्राट हुआ। फाहियान (399-412 ई.) के अनुसार कनिष्क द्वारा निर्मित स्तूप जम्बूदीप का सबसे बड़ा स्तूप था। चीनी तीर्थ यात्री हेन सांग (629-645 ई.) ने भी कनिष्क का जंबूदीप का सम्राट कहा गया हैं।

वस्तुतः जम्बूदीप प्राचीन ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथो में वर्णित एक वृहत्तर भोगोलिक- सांस्कृतिक इकाई हैं तथा भारत जम्बूदीप में समाहित माना जाता रहा हैं| प्राचीन भारतीय समस्त जम्बूदीप के साथ एक भोगोलिक एवं सांस्कृतिक एकता मानते थे। आज भी हवन यज्ञ से पहले ब्राह्मण पुरोहित यजमान से संकल्प कराते समय ‘जम्बूद्वीपे भरत खण्डे भारत वर्षे’ का उच्चारण करते हैं। अतः स्पष्ट हैं कि जम्बूदीप भारतीयों के लिए उनकी पहचान का मसला हैं तथा भारतीय जम्बूदीप से अपने को पहचानते रहे है। प्राचीन ग्रंथो के अनुसार जम्बूदीप के मध्य में सुमेरु पर्वत हैं जोकि इलावृत वर्ष के मध्य में स्थित हैं। इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारत वर्ष, उत्तर में रम्यक वर्ष, हिरण्यमय वर्ष तथा उत्तर कुरु वर्ष, पश्चिम में केतुमाल तथा पूर्व में हरि वर्ष हैं। भद्राश्व वर्ष और किम्पुरुष वर्ष अन्य वर्ष हैं। यह स्पष्ट हैं कि कनिष्क के साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले मध्य एशिया के तत्कालीन बैक्ट्रिया (वाहलिक, बल्ख) क्षेत्र, यारकंद, खोटन एवं कश्गर क्षेत्र, आधुनिक अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के क्षेत्र जम्बूदीप को समाये थे। कुषाणों के इतिहास के लिहाज़ से यह बात अति महतवपूर्ण हैं कि इतिहासकार जम्बूदीप स्थित ‘उत्तर कुरु वर्ष’ की पहचान तारीम घाटी क्षेत्र से करते हैं, जहाँ से यूची कुषाणों की आरंभिक उपस्थिति और इतिहास की जानकारी हमें प्राप्त होती हैं। अतः कुषाण आरम्भ से ही जम्बूदीप के निवासी थे। इसी कारण से कुषाणों को हमेशा भारतीय समाज का हिस्सा माना गया तथा प्राचीन भारतीय ग्रंथो में कुषाण और हूणों को व्रात्य (धर्म योध्दा) कहा गया हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथो के अनुसार उत्तर कुरु वर्ष (यूची कुषाणों के आदि क्षेत्र) में वराह की पूजा होती थी| यह उल्लेखनीय हैं कि गुर्जर प्रतिहार शासक (725-1018 ई.) भी वराह के उपासक थे [2] तथा कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की गई हैं। [3] [4][5]

उसकी विजय यात्राओं तथा बौद्ध धर्म के प्रति आस्था ने रेशम मार्ग के विकास तथा उस रास्ते गांधार से काराकोरम पर्वतमाला के पार होते हुए चीन तक महायान बौद्ध धर्म के विस्तार में विशेष भूमिका निभायी।

पहले के इतिहासवेत्ताओं के अनुसार कनिष्क ने राजगद्दी ७८ ई० में प्राप्त की, एवं तभी इस वर्ष को शक संवत् के आरम्भ की तिथि माना जाता है। हालांकि बाद के इतिहासकारों के मतानुसार अब इस तिथि को कनिष्क के सत्तारूढ़ होने की तिथि नहीं माना जाता है। इनके अनुमानानुसार कनिष्क ने सत्ता १२७ ई० में प्राप्त की थी।[6]

वंशावली[संपादित करें]

अलेक्जेंडर कनिंघम ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, खंड IV, 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है। अपनी धारणा के पक्ष में कहते हैं कि आधुनिक गुर्जरों का कषाणा/कसाना गोत्र कुषाणों का प्रतिनिधि हैं|अलेक्जेंडर कनिंघम बात का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि गुर्जरों का कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से सबसे बड़ा है। कसाना गौत्र अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैला हुआ है और भारत में केवल गुर्जर जाति में मिलता है। [7] [8] इतिहासकारों के अनुसार कुषाण यू ची कबीलो में से एक थे जिनकी भाषा तोखारी थी| तोखारी भारोपीय समूह की केंटूम वर्ग की भाषा थी| किन्तु बक्ट्रिया में बसने के बाद इन्होने मध्य इरानी समूह की एक भाषा को अपना लिया| इतिहासकारों ने इस भाषा को बाख्त्री भाषा कहा हैं| कुषाण सम्राटों के सिक्को पर इसी बाख्त्री भाषा और यूनानी लिपि में कोशानो लिखा हैं| गुर्जरो के कषाणा गोत्र को उनकी अपनी गुजरी भाषा में कोसानो ही बोला जाता हैं। अतः यह पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता हैं कि आधुनिक कसाणा ही कुषाणों के प्रतिनिधि हैं। [9] [10] कुषाण के लिए कोशानो ही नहीं कसाना शब्द का प्रयोग भी ऐतिहासिक काल से होता रहा हैं। यह सर्विदित हैं कि कसाना गुर्जरों का प्रमुख गोत्र हैं| एनसाईंकिलोपिडिया ब्रिटानिका के अनुसार भारत में कुषाण वंश के संस्थापक कुजुल कड़फिसेस को उसके सिक्को पर कशाना यावुगो (कसाना राजा) लिखा गया हैं। [11] किदार कुषाण वंश के संस्थापक किदार के सिक्को पर भी ‘कसाना’ शब्द का प्रयोग किया गया हैं| स्टडीज़ इन इंडो-एशियन कल्चर , खंड 1 , के अनुसार ईरानियो ने कुषाण शासक षोक, परिओक के लिए कसाना शासक लिखा। [12] कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने कुषाण वंश के लिया कसाना वंश शब्द का प्रयोग भी अपने लेखन में किया हैं, जैसे हाजिमे नकमुरा ने अपनी पुस्तक में कनिष्क को कसाना वंश का शासक लिखा हैं।[13] अतः इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि आधुनिक गुर्जरों का कसाना गोत्र ही इतिहास प्रसिद्ध कुषाणों के वंशज और वारिस हैं|

कुषाणों की बाख्त्री भाषा और गूजरों की गूजरी भाषा में अद्भुत समानता[संपादित करें]

गुर्जरों की हमेशा ही अपनी विशिष्ट भाषा रही हैं| गूजरी भाषा के अस्तित्व के प्रमाण सातवी शताब्दी से प्राप्त होने लगते हैं| सातवी शताब्दी में राजस्थान को गुर्जर देश कहते थे, जहाँ गुर्जर अपनी राजधानी भीनमाल से यहाँ शासन करते थे| गुर्जर देश के लोगो की अपनी गुर्जरी भाषा और विशिष्ट संस्कृति थी| इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आधुनिक गुजराती और राजस्थानी का विकास इसी गुर्जरी अपभ्रंश से हुआ हैं| वर्तमान में जम्मू और काश्मीर के गुर्जरों में यह भाषा शुद्ध रूप में बोली जाती हैं। [14] इतिहासकारों के अनुसार कुषाण यू ची कबीलो में से एक थे, जिनकी भाषा तोखारी थी| तोखारी भारोपीय समूह की केंटूम वर्ग की भाषा थी| किन्तु बक्ट्रिया में बसने के बाद इन्होने मध्य इरानी समूह की एक भाषा को अपना लिया| इतिहासकारों ने इस भाषा को बाख्त्री भाषा कहा हैं। कुषाणों द्वारा बोले जाने वाली बाख्त्री भाषा और गुर्जरों की गूजरी बोली में खास समानता हैं। [15] कुषाणों द्वारा बाख्त्री भाषा का प्रयोग कनिष्क के रबाटक और अन्य अभिलेखों में किया गया हैं| कुषाणों के सिक्को पर केवल बाख्त्री भाषा का यूनानी लिपि में प्रयोग किया गया हैं| कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा में गूजरी बोली की तरह अधिकांश शब्दों में विशेषकर उनके अंत में ओ का उच्चारण होता हैं| जैसे बाख्त्री में उमा को ओमो, कुमार को कोमारो ओर मिहिर को मीरो लिखा गया हैं, वैसे ही गूजरी बोली में राम को रोम, पानी को पोनी, गाम को गोम, गया को गयो आदि बोला जाता हैं| इसीलिए कुषाणों के सिक्को पर उन्हें बाख्त्री में कोशानो लिखा हैं और वर्तमान में गूजरी में कोसानो बोला जाता हौं। अतः कुषाणों द्वारा प्रयुक्त बाख्त्री भाषा और आधुनिक गूजरी भाषा की समानता भी कुषाणों और गूजरों की एकता को प्रमाणित करती हैं| हालाकि बाख्त्री और गूजरी की समानता पर और अधिक शोध कार्य किये जाने की आवशकता हैं, जो कुषाण-गूजर संबंधो पर और अधिक प्रकाश डाल सकता हैं। [16]

कनिष्क विम कडफिसेस का उत्तराधिकारी था, जैसा रबातक शिलालेखों में कुषाण राजाओं की प्रभावशाली वंशावली द्वारा दृश्य है।[17][18] कनिष्क का अन्य कुषाण राजाओं से संबन्ध राबातक शिलालेखों में बताया गया है, इसी से कनिष्क के समय तक की वंशावली ज्ञात होती है। उसके प्रपितामह कुजुल कडफिसेस थे, विमा ताक्तु उसके पितामह थे। कनिष्क के पिता विम कडफिसेस थे, तत्पश्चात स्वयं कनिष्क आया।[19]

गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल और सम्राट कनिष्क का ऐतिहासिक जुड़ाव[संपादित करें]

गुर्जरों का इतिहास आरम्भ से ही कुषाणों से जुडा रहा हैं। इतिहासकारों के अनुसार गुर्जरों का शरुआती इतिहास सातवी शताब्दी से राजस्थान के मारवाड और आबू पर्वत क्षेत्र से मिलता हैं जोकि गुर्जरों के राजनैतिक वर्चस्व कारण गुर्जर देश कहलाता था। गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल थी| इतिहासकार ए. एम. टी. जैक्सन ने ‘बॉम्बे गजेटियर’ में भीनमाल का इतिहास विस्तार से लिखा हैं| जिसमे उन्होंने भीनमाल में प्रचलित ऐसी अनेक लोक परम्पराओ और मिथको का वर्णन किया है जिनसे गुर्जरों की राजधानी भीनमाल को आबाद करने में, कुषाण सम्राट कनिष्क की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता हैं। [20] ऐसे ही एक मिथक के अनुसार भीनमाल में सूर्य देवता के प्रसिद्ध जगस्वामी मन्दिर का निर्माण काश्मीर के राजा कनक (सम्राट कनिष्क) ने कराया था। भीनमाल में प्रचलित मौखिक परम्परा के अनुसार कनिष्क ने वहाँ करडा नामक झील का निर्माण भी कराया था। भीनमाल से सात कोस पूर्व में कनकावती नामक नगर बसाने का श्रेय भी कनिष्क को दिया जाता है। ऐसी मान्यता हैं कि भीनमाल के देवड़ा गोत्र के लोग, श्रीमाली ब्राहमण तथा भीनमाल से जाकर गुजरात में बसे, ओसवाल बनिए राजा कनक (सम्राट कनिष्क) के साथ ही काश्मीर से भीनमाल आए थे। ए. एम. टी. जैक्सन श्रीमाली ब्राह्मण और ओसवाल बनियों की उत्पत्ति गुर्जरों से मानते हैं। [21]

राजस्थान में गुर्जर लौर और खारी नामक दो अंतर्विवाही समूहों में विभाजित हैं| केम्पबेल के अनुसार मारवाड के लौर गुर्जरों में मान्यता हैं कि वो राजा कनक (कनिष्क कुषाण) के साथ लोह्कोट से आये थे तथा लोह्कोट से आने के कारण लौर कहलाये। लौर गुर्जरों की यह मान्यता स्पष्ट रूप से गुर्जरों की कुषाण उत्पत्ति का प्रमाण हैं। [22] अतः यह स्पष्ट हैं कि गुर्जर, गुर्जर मूल के श्रीमाली ब्राह्मण तथा ओसवाल बनिए सभी कनिष्क कुषाण के साथ गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल में आबाद हुए। आरभिक काल से गुर्जरों का कुषाण सम्राट कनिष्क के साथ यह ऐतिहासिक जुडाव इस बात को प्रमाणित करते हैं कि गुर्जर मूलतः कुषाण हैं। भीनमाल के गुर्जरों के उत्कर्ष काल में कुषाण परिसंघ की सभी खाप और कबीले गुर्जर के नाम से पहचाने जाते थे। [23]

गुशुर-गुजुर-गुज्जर-गुर्ज्जर-गुर्जर[संपादित करें]

कुछ इतिहासकार के अनुसार गुर्जर शब्द की उत्पत्ति गुशुर शब्द से हुई हैं। [24] सन्दर्भ त्रुटि: <ref> टैग के लिए समाप्ति </ref> टैग नहीं मिला गुशुर शब्द का आशय राजपरिवार अथवा राजसी परिवार के सदस्य से हैं। बी. एन. मुख़र्जी के अनुसार कुषाण साम्राज्य के राजसी वर्ग के एक हिस्से को ‘गुशुर’ कहते थे। [25] [26] उनके अनुसार ‘गुशुर’ सभवतः सेना के अधिकारि होते थे| कुषाण सम्राट कुजुल कड़फिसिस के समकालीन उसके अधीन शासक सेनवर्मन का स्वात से एक अभिलेख प्राप्त हुआ हैं, जिसमे ‘गुशुर’शब्द सेना के अधिकारीयों के लिया प्रयुक्त हुआ हैं। [27] उत्तरी अफगानिस्तान स्थित एक स्तूप से प्राप्त अभिलेख में विहार स्वामी की उपाधि के रूप में ‘गुशुर’ का उल्लेख किया गया हैं।

पश्चिमिओत्तर पाकिस्तान के हजारा क्षेत्र स्थित अब्बोटाबाद से प्राप्त कुषाण कालीन अभिलेख में शाफर नामक व्यक्ति का उल्लेख हैं, जोकि मक का पुत्र तथा ‘गशूर’ नामक वर्ग का सदस्य हैं। इस अभिलेख के काल निश्चित नहीं किया जा सका हैं किन्तु इसकी भाषा और लिपि कुषाण काल की हैं।अभिलेख में इसका काल अज्ञात संवत के पच्चीसवे वर्ष का हैं। अफगानिस्तान स्थित रबाटक नामक स्थान से प्राप्त कनिष्क के अभिलेख में भी शाफर नामक एक कुषाण अधिकारी के नाम का उल्लेख हैं। अब्बोटाबाद अभिलेख का गशूर शाफ़र और कनिष्क के रबाटक अभिलेख में उल्लेखित शाफर एक ही व्यक्ति हो सकते हैं। इस पहचान को स्थापित करने के लिए और अधिक शोध की आवश्कता हैं। कुषाणों के साँची अभिलेख में भी गौशुर सिम्ह् बल नामक व्यक्ति का उल्लेख आया हैं।

अतः उपरोक्त साक्ष्यों से स्पष्ट हैं कि कुषाणों के राजसी परिवार के सदस्यों, सामंतो एवं उच्च सैनिक अधिकारियो के वर्ग को गुशुर कहते थे, जिसका ‘गशूर’, ‘गौशुर’ के रूप में भी कुषाणों के अभिलेखों में उल्लेख हुआ हैं। कुषाणों के राजसी परिवार के सदस्य और उच्च सैनिक अधिकारी गुशुर को उपाधि के तरह धारण करते थे। वस्तुतः गुशुर एक कुषाणों का राजसी वर्ग जिसके सदस्य राजा और सैनिक अधिकारी बनते थे। एफ. डब्ल्यू थोमस के अनुसार कुषाण वंश के संस्थापक कुजुल कड़फिसिस के नाम में कुजुल वास्तव में ‘गुशुर’ हैं [28] बी. एन. मुखर्जी ने इस बात का समर्थन किया हैं कि कुजुल को गुशुर पढ़ा जाना चाहिए। बी. एन. मुखर्जी ने इस तरफ ध्यान आकर्षित किया हैं कि कुषाणों की बाख्त्री भाषा में श/स को बोला लिखा जाता था। जैसे कुषाण सम्राट वासुदेव को बाजोदेओ लिखा गया हैं। इसी प्रकार कनिष्क के रबाटक अभिलेख में साकेत को जागेदो लिखा गया हैं। अतः कुषाणों की अपनी बाख्त्री भाषा में गुशुर को गुजुर बोला जाता था तथा कुषाण वंश का संस्थापक कड़फिसिस I ‘गुजुर’ उपाधि धारण करता था| गुजुर को ही पश्चिमिओत्तर भारतीय लिपि में कुजुल लिखा गया हैं, क्योकि पश्चिमिओत्तर की भारतीय लिपि में ईरानी शब्दों के लिखते समय को तथा को कहा जाता था। अतः कुषाण सम्राट खुद को अपनी बाख्त्री में भाषा गुजुर कहते थे। इस बात से बढ़कर गुर्जरो की कुषाण उत्पत्ति का क्या प्रमाण हो सकता हैं कि बाख्त्री के मूल क्षेत्र उत्तरी अफगानिस्तान (बैक्ट्रिया) में गुर्जर आज भी अपने को गुजुर कहते हैं। ‘गुशुर’ के उपरोक्त वर्णित एक अन्य रूप ‘गोशुर को बाख्त्री में ‘गोजुर’ बोला जाता था। कश्मीर में गुर्जर खुद को गोजर अथवा गुज्जर कहते हैं तथा उनकी भाषा भी गोजरी कहलाती हैं।

यह शीशे की तरह साफ़ हैं कि गुर्जर शब्द की उत्पत्ति‘गुशुर’ से हुई हैं, जिसका अर्थ हैं राजपरिवार अथवा राजसी परिवार का सदस्य। जब कुषाण उत्तरी अफगानिस्तान (बैक्ट्रिया) में बसे और उन्होंने ‘गुशुर’ उपाधि को वहाँ की बाख्त्री भाषा में ‘गुजुर’ के रूप में अपनाया, जैसा उनके वंशज आज भी वहाँ अपने को कहते हैं। पंजाब में बसने पर, वहाँ की भाषा के प्रभाव में गुजुर से गुज्जर कहलाये तथा गंगा-जमना के इलाके में गूजर। प्राचीन जैन प्राकृत साहित्य में गुज्जर तथा गूज्जर शब्द का प्रयोग हुआ हैं। उसी काल में संस्कृत भाषा में गुर्ज्जर तथा गूर्ज्जर शब्द का प्रयोग हुआ हैं। सातवी शताब्द्दी में भडोच के ताम्रपत्रों में दद्दा को गूर्ज्जर वंश का राजा लिखा हैं। कालांतर में गुर्ज्जर से परिष्कृत होकर गुर्जर शब्द बना।


दक्षिण एवं मध्य एशिया में विजय यात्राएं[संपादित करें]

कुशान साम्राज्य (पूरी रेखाएं) तथा कनिष्क के समय में राबातक शिलालेखों के अनुसार अधीन राज्यों की अधिकतम सीमा। [29]

कनिष्क का साम्राज्य निस्सन्देह विशाल था। यह पाकिस्तान व भारत से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर स्थित अमु दरया के उत्तर में दक्षिणी उज़्बेकिस्तान एवं ताजिकिस्तान से लेकर दक्षिण-पूर्व में मथुरा तक फैला था। राबातक शिलालेखों के अनुसार यह पाटलिपुत्र एवं श्रीचम्पा तक विस्तृत था। उत्तरतम भारत में स्थित कश्मीर भी कनिष्क के अधीन ही था, जहां पर बारामुला दर्रे के निकट ही कनिष्कपुर नामक नगर बसाया गया था। यहाँ से एक बहुत बड़े स्तूप का आधार प्राप्त हुआ है।

आधुनिक चीन के खोतान प्रान्त में मिले कनिष्क के सिक्के।

कनिष्क के मध्य एशिया पर आधिपत्य का ज्ञान अभी सीमित ही है। बुक ऑफ़ द लेटर हान, हौ हान्शु, से ज्ञात होता है कि, चीनी जनरल बान चाओ ने ९० ई में खोतान के निकट कनिष्क की ७०,००० सैनिकों की सेना से युद्ध किया, जिसका नेतृत्त्व कुशाण सेनाधिपति ज़ाई (Xie (चीनी: 謝) ने किया था।हालांकि बान चाओ ने विजयी होने का दावा किया है व साथ ही कुशानों की सेना को स्कॉर्च्ड अर्थ नीति के अन्तर्गत्त पीछे हटाया, किन्तु यह क्षेत्र द्वितीय शताब्दी के आरम्भ तक कुशानों के अधीन ही हो गया।[30] परिणामस्वरूप, यह क्षेत्र (जब तक की चीनियों ने १२७ ई० में पुनः अधिकार प्राप्त नहीम कर लिया)[31] कुशानों का साम्राज्य कुछ समय के लिये कश्गार, खोतान एवं यारकंद तक भी विस्तृत हुआ, जो कि पहले तरीम बेसिन के चीनी क्षेत्र (आधुनिक ज़िनजियांग) रहे थे। कनिष्क के समय के कई सिक्के तरीम बेसिन में पाये गए हैं।

दक्षिण एशिया एवं रोम के बीच भूमि पथ (रेशम मार्ग) तथा समुद्री मार्ग, दोनों पर ही अधिकार बनाये रखना, कनिष्क का मुख्य लक्ष्य रहा था।


कनिष्क के सिक्के[संपादित करें]

कनिष्क की स्वर्ण मुद्राएं, जिनमें यूनानी सूर्य देवता हेलिओज़ का चित्र अंकित है। (ई. १२०).
अग्र: कनिष्क भारी कुशाण अंगरखे व जूतों में सज्ज खड़े हुए, जिनके कंधों से ज्वाला निकल रही है, बाएं हाथ में मानक धारण किये हुए और वेदी पर आहूति देते हुए। यूनानी कथा ΒΑΣΙΛΕΥΣ ΒΑΣΙΛΕΩΝ ΚΑΝΗϷΚΟΥ " कनिष्क का सिक्का, राजाओं के राजा "।
पृष्ठ: हेलियोज़ यूनानी तरीके से खड़े हुए, बाएं हाथ से बैनेडिक्शन मुद्रा बनाए हुए। यूनानी लिपि में अंकित: ΗΛΙΟΣ हेलिओज़। कनिष्क का राजचिह्न (तमगा) बायीं ओर।

कनिष्क की मुद्राओं में भारतीय हिन्दू, यूनानी, ईरानी और सुमेरियाई देवी देवताओं के अंकन मिले हैं, जिनसे उसकी धार्मिक सहिष्णुता का पता चलता है। उसके द्वारा शासन के आरम्भिक वर्षों में चलाये गए सिक्कों में यूनानी लिपि व भाषा का प्रयोग हुआ है तथा यूनानी दैवी चित्र अंकित मिले। बाद के काल के सिक्कों में बैक्ट्रियाई , ईरानि लिपि व भाषाओं में, जिन्हें वह बोलने में प्रयोग किया करता था, तथा यूनानी देवताओं के स्थान पर ईरानी देवता दिखाई देते हैं। सभी कनिष्क के सिक्कों में, यहाम तक कि उन सिक्कों में भी जो बैक्ट्रियाई में लिखे हैं, एक संशोधित यूनानी लिपि में लिखे गये थे, जिनमें एक अतिरिक्त उत्कीर्ण अक्षर (Ϸ) है, जो 'कुआण' एवं 'कनिक' में प्रयुक्त /š/ () दर्शाता है।

सम्राट कनिष्क के सिक्के में सूर्यदेव बायीं और खड़े हैं। बांए हाथ में दण्ड है जो रश्ना सें बंधा है। कमर के चारों ओर तलवार लटकी है। सूर्य ईरानी राजसी वेशभूषा में एक लम्बे कोट पहने दाड़ी वाले दिखाये गए हैं, जिसके कन्धों से ज्वालाएं निकलती हैं। वह बड़े गोलाकार जूते पहनते है। उसे प्रायः वेदी पर आहूति या बलि देते हुए दिखाया जाता है। इसी विवरण से मिलती हुई कनिष्क की एक मूर्ति काबुल संग्रहालय में संरक्षित थी, किन्तु कालांतर में उसे तालिबान ने नष्ट कर दिया।[32]

भारतीय राष्ट्रीय संवत - शक संवत[संपादित करें]

शक संवत भारत का राष्ट्रीय संवत हैं| इस संवत को कुषाण/कसाना सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में 78 इस्वी में चलाया था| इस संवत कि पहली तिथि चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होती हैं जोकि भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान के राज्य रोहण की वर्ष गाठ हैं| शक संवत में कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो भारत में प्रचलित किसी भी अन्य संवत में नहीं हैं जिनके कारण भारत सरकार ने इसे “भारतीय राष्ट्रीय संवत” का दर्ज़ा प्रदान किया हैं। [33]


भारत भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता वाला विशाल देश हैं, जिस कारण आज़ादी के समय यहाँ अलग-अलग प्रान्तों में विभिन्न  संवत चल रहे थे| भारत सरकार के सामने यह समस्या थी कि किस संवत को  भारत का अधिकारिक संवत का दर्जा दिया जाए| वस्तुत भारत सरकार ने सन 1954 में संवत सुधार समिति(Calendar Reform Committee) का गठन किया जिसने देश प्रचलित 55 संवतो की पहचान की| कई बैठकों में हुई बहुत विस्तृत चर्चा के बाद संवत सुधार समिति ने स्वदेशी संवतो में से शक संवत को अधिकारिक राष्ट्रीय संवत का दर्जा प्रदान करने कि अनुशंषा की, क्योकि  प्राचीन काल में यह संवत भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता था| शक संवत भारतीय संवतो में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, सही तथा त्रुटिहीन हैं, शक संवत प्रत्येक साल 22 मार्च को शुरू होता हैं, इस दिन सूर्य विश्वत रेखा पर होता हैं तथा दिन और रात बराबर होते हैं| शक संवत में साल 365 दिन होते हैं और इसका ‘लीप इयर’ ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के साथ-साथ ही पड़ता हैं| ‘लीप इयर’ में यह 23 मार्च को शुरू होता हैं और इसमें ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ की तरह 366 दिन होते हैं। [34]


पश्चिमी ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के साथ-साथ, शक संवत भारत सरकार द्वारा कार्यलीय उपयोग लाया जाना वाला अधिकारिक संवत हैं| शक संवत का प्रयोग भारत के ‘गज़ट’ प्रकाशन और ‘आल इंडिया रेडियो’ के समाचार प्रसारण में किया जाता हैं| भारत सरकार द्वारा ज़ारी कैलेंडर, सूचनाओ और संचार हेतु भी शक संवत का ही प्रयोग किया जाता हैं। [35]

जहाँ तक शक संवत के ऐतिहासिक महत्त्व कि बात हैं, इसे भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में चलाया था| कनिष्क एक बहुत विशाल साम्राज्य का स्वामी था| उसका साम्राज्य मध्य एशिया स्थित काला सागर से लेकर पूर्व में उडीसा तक तथा उत्तर में चीनी तुर्केस्तान से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला हुआ था| उसके साम्राज्य में वर्तमान उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान के हिस्सा, तजाकिस्तान का हिस्सा और चीन के यारकंद, काशगर और खोतान के इलाके थे| कनिष्क भारतीय इतिहास का एक मात्र सम्राट हैं जिसका राज्य दक्षिणी एशिया के बाहर मध्य एशिया और चीन के हिस्सों को समाये था| वह इस साम्राज्य पर चार राजधानियो से शासन करता था| पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) उसकी मुख्य राजधानी थी| मथुरा, तक्षशिला और बेग्राम उसकी अन्य राजधानिया थी| कनिष्क इतना शक्तिशाली था कि उसने चीन के सामने चीनी राजकुमारी का विवाह अपने साथ करने का प्रस्ताव रखा, चीनी सम्राट द्वारा इस विवाह प्रस्ताव को ठुकराने पर कनिष्क ने चीन पर चढाई कर दी और यारकंद, काशगार और खोतान को जीत लिया [36]

कनिष्क के राज्य काल में भारत में व्यापार और उद्योगों में अभूतपूर्व तरक्की हुई क्योकि मध्य एशिया स्थित रेशम मार्ग जिससे यूरोप और चीन के बीच रेशम का व्यापार होता था उस पर कनिष्क का कब्ज़ा था| भारत के बढते व्यापार और आर्थिक उन्नति के इस काल में तेजी के साथ नगरीकरण हुआ| इस समय पश्चिमिओत्तर भारत में करीब 60 नए नगर बसे और पहली बार भारत में कनिष्क ने ही बड़े पैमाने सोने के सिक्के चलवाए। [37]

कुषाण समुदाय एवं उनका नेता कनिष्क मिहिर (सूर्य) और अतर (अग्नि) के उपासक थे| उसके विशाल साम्राज्य में विभिन्न धर्मो और रास्ट्रीयताओं के लोग रहते थे| किन्तु कनिष्क धार्मिक दृष्टीकोण से बेहद उदार था, उसके सिक्को पर हमें भारतीय, ईरानी-जुर्थुस्त और ग्रीको-रोमन देवी देवताओं के चित्र मिलते हैं| बाद के दिनों में कनिष्क बोद्ध मत के प्रभाव में आ गया| उसने कश्मीर में चौथी बोद्ध संगति का आयोज़न किया, जिसके फलस्वरूप बोद्ध मत कि महायान शाखा का उदय हुआ| कनिष्क के प्रयासों और प्रोत्साहन से बोद्ध मत मध्य एशिया और चीन में फ़ैल गया, जहाँ से इसका विस्तार जापान और कोरिया आदि देशो में हुआ| इस प्रकार गौतम बुद्ध, जिन्हें भगवान विष्णु का नवा अवतार माना जाता हैं, उनके मत का प्रभाव पूरे एशिया में व्याप्त हो गया और भारत के जगद गुरु होने का उद् घोष विश्व की हवाओ में गूजने लगा। [38]

कनिष्क के दरबार में अश्वघोष, वसुबंधु और नागार्जुन जैसे विद्वान थे| आयुर्विज्ञानी चरक और श्रुश्रत कनिष्क के दरबार में आश्रय पाते थे| कनिष्क के राज्यकाल में संस्कृत सहित्य का विशेष रूप से विकास हुआ| भारत में पहली बार बोद्ध साहित्य की रचना भी संस्कृत में हुई| गांधार एवं मथुरा मूर्तिकला का विकास कनिष्क महान के शासनकाल की ही देन हैं।

मौर्य एवं मुग़ल साम्राज्य की तरह कुषाण वंश ने लगभग दो शताब्दियों (५०-२५० इस्वी) तक उनके जितने ही बड़े साम्राज्य पर शान से शासन किया| कनिष्क का शासनकाल इसका चर्मोत्कर्ष था| कनिष्क भारतीय जनमानस के दिलो दिमाग में इस कदर बस गया की वह एक मिथक बन गया| तह्कीके - हिंद का लेखक अलबरूनी १००० इस्वी के लगभग भारत आया तो उसने देखा की भारत में यह मिथक प्रचलित था कि कनिष्क की ६० पीढियों ने काबुल पर राज किया हैं| कल्हण ने बारहवी शताब्दी में कश्मीर का इतिहास लिखा तो वह भी कनिष्क और उसके बेटे हुविष्क कि उपलब्धियों को बयां करता दिखलाई पड़ता हैं| कनिष्क के नाम की प्रतिष्ठा हजारो वर्ष तक कायम रही, यहाँ तक कि भारत के अनेक राजवंशो की वंशावली कुषाण काल तक ही जाती हैं [39]

शक संवत का भारत में सबसे व्यापक प्रयोग अपने प्रिय सम्राट के प्रति प्रेम और आदर का सूचक हैं, और उसकी कीर्ति को अमर करने वाला हैं| प्राचीन भारत के महानतम ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर (५०० इस्वी) और इतिहासकार कल्हण (१२०० इस्वी) अपने कार्यों में शक संवत का प्रयोग करते थे| उत्तर भारत में कुषाणों और शको के अलावा गुप्त सम्राट भी मथुरा के इलाके में शक संवत का प्रयोग करते थे| दक्षिण के चालुक्य और राष्ट्रकूट और राजा भी अपने अभिलेखों और राजकार्यो में शक संवत का प्रयोग करते थे [40]


मध्य एशिया कि तरफ से आने वाले कबीलो को भारतीय सामान्य तौर पर शक कहते थे, क्योकि कुषाण भी मध्य एशिया से आये थे इसलिए उन्हें भी शक समझा गया और कनिष्क कुषाण/कसाना द्वारा चलाया गया संवत शक संवत कहलाया| इतिहासकार फुर्गुसन के अनुसार अपने कुषाण अधिपतियो के पतन के बाद भी उज्जैन के शको द्वारा कनिष्क के संवत के लंबे प्रयोग के कारण इसका नाम शक संवत पड़ा|शक संवत की लोकप्रियता का एक कारण इसका उज्जैन के साथ जुड़ाव भी था, क्योकि यह नक्षत्र विज्ञानं और ज्योतिष का भारत में सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था।

[41]

मालवा और गुजरात के जैन जब दक्षिण के तरफ फैले तो वो शक संवत को अपने साथ ले गए, जहाँ यह आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं| दक्षिण भारत से यह दक्षिण पूर्वी एशिया के कम्बोडिया और जावा तक प्रचलित हो गया| जावा के राजदरबार में तो इसका प्रयोग १६३३ इस्वी तक होता था, जब वहा पहली बार इस्लामिक कैलेंडर को अपनाया गया| यहाँ तक कि फिलीपींस से प्राप्त प्राचीन ताम्रपत्रों में भी शक संवत का प्रयोग किया गया हैं [42]

शक संवत एवं विक्रमी संवत[संपादित करें]

शक संवत और विक्रमी संवत में महीनो के नाम और क्रम एक ही हैं- चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आसाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, पौष, अघन्य, माघ, फाल्गुन| दोनों ही संवतो में दो पक्ष होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष| दोनों संवतो में एक अंतर यह हैं कि जहाँ विक्रमी संवत में महीना पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से शुरू होता हैं, वंही शक संवत में महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होते हैं| उत्तर भारत में दोनों ही संवत चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को आरम्भ होते हैं, जोकि शक संवत के चैत्र माह की पहली तारीख होती हैं, किन्तु यह विक्रमी संवत के चैत्र की १६ वी तारीख होती हैं, क्योकि विक्रमी संवत के चैत्र माह के कृष्ण पक्ष के पन्द्रह दिन बीत चुके होते हैं| गुजरात में तो विक्रमी संवत कार्तिक की अमावस्या के अगले दिन से शुरू होता हैं [43] [44] [45] [46] [47] [48]

ईरानियाई/ इण्डिक काल[संपादित करें]

कनिष्क ने शक संवत चलाया।
कुशान कार्नेलियाई मुहर, जिसमें ईरानियाई देवता आड्शो (ΑΘϷΟ यूनानी लिपि में मुद्रा लेख लिखे हैं) जिसमें बायीं ओर त्रिरत्न चिह्न एवं दायीं ओर कनिष्क का कुलचिह्न है। ये देवता एक प्याला लिये हुए हैं।

कनिष्क ने देवपुत्र शाहने शाही की उपाधि धारण की थी। भारत आने से पहले कुषाण ‘बैक्ट्रिया’ में शासन करते थे, जो कि उत्तरी अफगानिस्तान एवं दक्षिणी उजबेगकिस्तान एवं दक्षिणी तजाकिस्तान में स्थित था और यूनानी एवं ईरानी संस्कृति का एक केन्द्र था। कुषाण हिन्द-ईरानी समूह की भाषा बोलते थे और वे मुख्य रूप से मिहिर (सूर्य) के उपासक थे। सूर्य का एक पर्यायवाची ‘मिहिर’ है, जिसका अर्थ है, वह जो धरती को जल से सींचता है, समुद्रों से आर्द्रता खींचकर बादल बनाता है। [49] कुषाण सम्राट कनिष्क ने अपने सिक्कों पर, यूनानी भाषा और  लिपि में मीरों (मिहिर) को उत्टंकित कराया था, जो इस बात का प्रतीक है कि ईरान के सौर सम्प्रदाय भारत में प्रवेश कर गया था।ईरान में मिथ्र या मिहिर पूजा अत्यन्त लोकप्रिय थी। भारत में सिक्कों पर सूर्य का अंकन किसी शासक द्वारा पहली बार हुआ था। सम्राट कनिष्क के सिक्के में सूर्यदेव बायीं और खड़े हैं। बांए हाथ में दण्ड है जो रश्ना सें बंधा है। कमर के चारों ओर तलवार लटकी है। सूर्य ईरानी राजसी वेशभूषा में है।  पेशावर के पास शाह जी की ढेरी नामक स्थान पर कनिष्क द्वारा निमित एक बौद्ध स्तूप के अवशेषों से एक बक्सा प्राप्त हुआ जिसे ‘कनिष्कास कास्केट’ कहते हैं, इस पर सम्राट कनिष्क के साथ सूर्य एवं चन्द्र के चित्र का अंकन हुआ है। इस ‘कास्केट’ पर कनिष्क के संवत का प्रथम वर्ष अंकित है। [50]

बहुत कम किन्तु कुछ बौद्ध देवताओं का अंकन किया गया:

इनके अलावा कुछ हिन्दू देवताओं के भी अंकन पाये जाते हैं:

  • ΟΗϷΟ (oesho, शिव)। हाल की शोध से अनुमान लगाया जा रहा है कि oesho संभवतः अवस्तन वायु होंगे, जिन्हें शिव से मिला लिया गया।[51][52]

कनिष्क एवं कश्मीर[संपादित करें]

हेन सांग के अनुसार कनिष्क गंधार का शासक था तथा उसकी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी। उसके अनुसार कश्मीर कनिष्क के साम्राज्य (78-101 ई.) का अंग था। कनिष्क ने कश्मीर स्थित कुंडलवन में एक बौद्ध संगति का आयोज़न किया, जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। इस संगति में बौद्ध धर्म हीनयान और महायान सम्रदाय में विभाजित हो गया। [53]

कल्हण कृत राज तरंगिणी के अनुसार कनिष्क ने कश्मीर पर शासन किया तथा वह कनिष्क पुर नामक नगर बसाया था। अब यह स्थान बारामुला जिले में स्थित कनिसपुर के नाम से जाना जाता हैं। [54]

कुछ इतिहासकारों के अनुसार कश्मीर के साथ कनिष्क का गहरा सम्बन्ध था। कोशानो (कुषाण) साम्राज्य की बागडोर अपने हाथो में लेने से पहले कनिष्क कश्मीर में शासन करता था। [55]

कैम्पबेल के अनुसार दक्षिण राजस्थान में यह परंपरा हैं कि लोह्कोट के राजा कनकसेन (कनिष्क) ने उस क्षेत्र को जीता था। उसके अनुसार यह लोह्कोट कश्मीर में स्थित एक प्रसिद्ध किला था। लोह्कोट अब लोहरिन के नाम से जाना जाता हैं तथा कश्मीर के पुंछ क्षेत्र में पड़ता हैं। ए. एम. टी. जैक्सन ने ‘बॉम्बे गजेटियर’ में भीनमाल का इतिहास विस्तार से लिखा हैं| जिसमे उन्होंने भीनमाल में प्रचलित ऐसी अनेक लोक परम्पराओ और मिथको का वर्णन किया है जिनसे भीनमाल को आबाद करने में, कुषाण सम्राट कनिष्क की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता हैं| उसके अनुसार भीनमाल में सूर्य देवता के प्रसिद्ध जगस्वामी मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा कनक (कनिष्क) ने कराया था। कनिष्क ने वहाँ ‘करडा’ नामक झील का निर्माण भी कराया था। भीनमाल से सात कोस पूर्व में कनकावती नामक नगर बसाने का श्रेय भी कनिष्क को दिया जाता है। ऐसी मान्यता हैं कि भीनमाल के देवड़ा गोत्र के लोग, श्रीमाली ब्राहमण तथा भीनमाल से जाकर गुजरात में बसे, ओसवाल बनिए राजा कनक (सम्राट कनिष्क) के साथ ही काश्मीर से भीनमाल आए थे। एम. टी. जैक्सन श्रीमाली ब्राह्मण और ओसवाल बनियों की उत्पत्ति गुर्जरों से मानते हैं। [56]केम्पबेल के अनुसार मारवाड के लौर गुर्जरों में मान्यता हैं कि वो राजा कनक (कनिष्क कुषाण) के साथ लोह्कोट से आये थे तथा लोह्कोट से आने के कारण लौर कहलाये। अतः काल क्रम में कनिष्क को कश्मीर के शासक के रूप में जाना-पहचाना गया हैं तथा इस बात के प्रमाणिक संकेत मिलते हैं कि राजस्थान और गुजरात के गुर्जर तथा गुर्जर मूल के कुछ समुदाय कोशानो (कुषाण) सम्राट कनिष्क के साथ इन क्षेत्रो में बसे थे। [57]

कनिष्क का शाही निशान[संपादित करें]

चतुर्शूल तमगे को दर्शाता कनिष्क कषाणा का सिक्का

सम्राट कनिष्क के सिक्को पर पाए जाने वाले शाही निशान को कनिष्क का तमगा भी कहते है। कनिष्क के तमगे में ऊपर की तरफ चार नुकीले काटे के आकार की रेखाए हैं तथा नीचे एक खुला हुआ गोला हैं इसलिए इसे चार शूल वाला चतुर्शूल तमगा भी कहते हैं। कनिष्क का चतुर्शूल तमगा सम्राट और उसके वंश/कबीले का प्रतीक हैं। इसे राजकार्य में शाही मोहर के रूप में भी प्रयोग किया जाता था। कनिष्क के पिता विम कडफिस ने सबसे पहले चतुर्शूल तमगा अपने सिक्को पर शाही निशान के रूप में प्रयोग किया था। विम कडफिस शिव का उपासक था तथा उसने माहेश्वर की उपाधि धारण की थी। माहेश्वर का अर्थ हैं शिव भक्त। [58] शैव चिन्ह पूर्व में भी तमगे के रूप में प्रयोग हो रहे थे| नंदी बैल के पैर का निशान वाला ‘नन्दीपद तमगा’ शासको द्वारापूर्व में भी सिक्को पर प्रयोग किया गया था। इसलिए कुछ इतिहासकारों का मानना हैं कि चतुर्शूल तमगा शिव की सवारी ‘नंदी बैल के पैर के निशान’ और शिव के हथियार त्रिशूल का ‘मिश्रण’ हैं। अतः विम कड्फिस और कनिष्क का तमगा एक शैव चिन्ह हैं। तमगे का नीचे वाला भाग नंदीपद जैसा हैं, परन्तु इसमें त्रिशूल के तीन शूलो के स्थान पर चार शूल हैं। कनिष्क को गुर्जर सम्राट माना जाता है अतः एशिया के विभिन्न देशों के गुर्जर इसी चिन्ह को अपना चिन्ह मानते हैं और हिन्दू मुश्लिम सिक्ख ओर जैन धर्म के गुर्जर एकरूप से इसे स्वीकारते हैं [59] कनिष्क के तमगे में चतुर्शूल पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर) का प्रतिनिधित्व करता हैं, क्योकि प्राचीन भारत में पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर) के अंकन का अन्य उदहारण भी हैं| राजघाट, वाराणसी से एक मोहर प्राप्त हुई हैं, जिस पर दो हाथ वाली एक देवी तथा गुप्त लिपि में दुर्ग्गाह उत्कीर्ण हैं, देवी के उलटे हाथ में माला तथा तथा सीधे हाथ में एक चार शूल वाली वस्तु हैं| चार शूल वाली यह वस्तु पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर अस्त्र) हैं, क्योकि पाशुपतास्त्र शिव की पत्नी दुर्गा का भी अस्त्र हैं| दुर्गा ‘नाना’ के रूप में कुषाणों की अधिष्ठात्री देवी हैं| रबाटक अभिलेख के अनुसार नाना (दुर्गा) कनिष्क की सबसे सम्मानीय देवी थी तथा नाना (दुर्गा) के आशीर्वाद से ही उसे राज्य की प्राप्ति हुई थी| अतः खास तौर से दुर्गा के हाथ में ‘पाशुपतास्त्र’ (ब्रह्मशिर) के अंकन से यह बात और भी अधिक प्रबल हो जाती हैं कि कनिष्क के तमगे में उत्कीर्ण चार शूल पाशुपतास्त्र का ही प्रतिनिधत्व करते हैं| नाना देवी का नाम आज भी नैना देवी (दुर्गा) के नाम में प्रतिष्ठित हैं| इनका मंदिर बिलासपुर, हिमांचल प्रदेश में स्थित हैं| यह मान्यता हैं कि नैना देवी की मूर्ती (पिंडी) की खोज एक गूजर ने की थी।[60] ए. कनिंघम ने गूजरों की पहचान ऐतिहासिक कोशानो (कुषाणों) के रूप में की हैं। अतः कुषाणों का नाम आज भी नाना (दुर्गा) से जुड़ा हुआ हैं। [61][62]

आंध्र प्रदेश के विजयवाडा स्थित कनक दुर्गा मंदिर का नाम और इसकी स्थपना की कथा भी कनिष्क का नाम दुर्गा पूजा मत तथा शिव-दुर्गा के पाशुपतास्त्र से जोड़ते हैं सातवी शताब्दी में हिंदुस्तान आने वाले चीनी तीर्थयात्री वांग हसूँ-त्से (Wang Hsuan-tse) के अनुसार कनिष्क ने महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के सातवाहन शासक पर आक्रमण भी किया था| अतः संभव हैं कनिष्क विजयवाडा आया हो तथा उसने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया हो| अतः यह तथ्य कि अर्जुन के द्वारा बनवाया गया दुर्गा मंदिर कनिष्क के नाम से जाना जाता हैं, कनिष्क के नाम को दुर्गा पूजा मत के विकास और पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर अस्त्र, चार शूल वाला तीर) के प्राप्तकर्ता अर्जुन के नाम से समीकृत एवं सम्बंधित करता हैं। [63] [64]

शिव और दुर्गा पति-पत्नी हैं, इसलिए उनसे सम्बंधित धार्मिक विश्वासों को कई बार संयुक्त रूप से देखा जाना अधिक उचित हैं। शैव मत की तरफ झुकाव रखने वाले कोशानो सम्राटो की दुर्गा पूजा मत के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका थी| अतः कोशानो सम्राटो के सिक्को पर शिव-दुर्गा के पाशुपतास्त्र का अंकन एक स्वाभविक प्रक्रिया हैं| निष्कर्षतः कनिष्क का शाही निशान ‘चतुर्शूल तमगा’ शिव-दुर्गा के पाशुपतास्त्र तथा नंदी के के पैर के निशान का मिश्रण हैं। [65][66]

भारत में कुषाण पहचान की निरंतरता- कसाना गुर्जरों के गांवों का सर्वेक्षण[संपादित करें]

अक्सर यह कहा जाता हैं कि कनिष्क महान से सम्बंधित ऐतिहासिक कुषाण वंश अपनी पहचान भूल कर भारतीय आबादी में विलीन हो गया| किन्तु यह सत्य नहीं हैं। अलेक्जेंडर ने ‘आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, खंड 2’, 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक हैं कि ऐतिहासिक कुषाणों से इतिहासकारों का मतलब केवल कुषाण वंश से नहीं बल्कि तमाम उन भाई-बंद कुल, वंश, नख और कबीलों के परिसंघ से हैं जिनका नेतृत्व कुषाण कर रहे थे| कनिंघम के अनुसार आधुनिक कसाना गुर्जर राजसी कुषाणों के प्रतिनिधि हैं तथा आज भी सिंध सागर दोआब और यमुना के किनारे पाये जाते हैं। [67] कुषाण सम्राट कनिष्क ने रबाटक अभिलेख में अपनी भाषा का नाम आर्य बताया हैं| सम्राट कनिष्क ने अपने अभिलेखों और सिक्को पर अपनी आर्य भाषा (बाख्त्री) में अपने वंश का नाम कोशानो लिखवाया हैं। गूजरों के कसाना गोत्र को उनके अपने गूजरी लहजे में आज भी कोसानो ही बोला जाता हैं। अतः गुर्जरों का कषाणा गोत्र कोशानो का ही हिंदी रूपांतरण हैं। कोशानो शब्द को ही गांधारी प्राकृत में कुषाण के रूप में अपनाया गया हैं। क्योकि कनिष्क के राजपरिवार के अधिकांश अभिलेख प्राकृत में थे अतः इतिहासकारों ने उनके वंश को कुषाण पुकारा हैं। [68]

लाहौर से 1911 में प्रकाशित एच. ए. रोज द्वारा लिखित पुस्तक ‘दी ग्लोसरी ऑफ़ ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ दी पंजाब एंड नार्थ वेस्टर्न फ्रंटियर प्रोविंस, में पंजाब के अनुसार गुर्जरों में यह सामाजिक मान्यता हैं कि उनके ढाई घर असली हैं- कसाना, गोरसी और आधा बरगट। इस प्रकार गुर्जरों की कसाना गोत्र इनकी उत्पत्ति के लिहाज़ से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से भी सबसे बडा है जोकि अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैली हुआ है। कोशानो (कसाना) गुर्जरों का एक प्रमुख गोत्र ‘क्लेन’ हैं जिसकी आबादी भारतीय उपमहादीप के अनेक क्षेत्रो में हैं। कसाना गुर्जरों के गाँवो के सर्वेक्षण के माध्यम से रखे गए तथ्यों पर आधारित मेरा मुख्य तर्क यह हैं कि भारतीय उपमहादीप में कुषाण वंश विलीन नहीं हुआ हैं बल्कि गुर्जरों के एक प्रमुख गोत्र/ क्लेन के रूप में कोशानो (कसाना) पहचान निरंतर बनी हुई हैं तथा ऐतिहासिक कोशानो का गुर्जरों साथ गहरा सम्बन्ध हैं। [69]

भारतीय महाद्वीप के पश्चिमी उत्तर में हिन्दू कुश पर्वतमाला से सटे दक्षिणी क्षेत्र में गुर्जर गुजुर कहलाते हैं। गुजुर (गुशुर) शब्द कोशानो के अभिलेखों में उनके राजसी वर्ग के लिए प्रयोग हुआ हैं। यहाँ गुर्जर मुख्य रूप से तखार, निमरोज़, कुन्डूज, कपिसा, बगलान, नूरिस्तान और कुनार क्षेत्र में निवास करते हैं। कसाना, खटाना, चेची, गोर्सी और बरगट गुर्जरों के प्रमुख गोत्र हैं तथा इनकी भाषा गूजरी हैं। यह क्षेत्र यूची-कुषाण शक्ति का आरंभिक केंद्र हैं। क्या ये महज़ एक इत्तेफाक हैं कि यह वही क्षेत्र हैं जहाँ कनिष्क कोशानो के पड़-दादा कुजुल कडफिस ने ऐतिहासिक यूची कबीलों का एक कर महान कोशानो साम्राज्य की नीव रखी थी।

1916 में लाहौर से प्रकाशित डेनजिल इबटसन की ‘पंजाब कास्ट्स’ पुस्तक के अनुसार हजारा, पेशावर, झेलम, गुजरात, रावलपिंडी, गुजरांवाला, लाहौर, सियालकोट, अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा, रोहतक, हिसार, अम्बाला, करनाल, दिल्ली और गुडगाँव में कसाना गुर्जर पाये जाते हैं| जिला गुजरात, गुरुदासपुर, होशियारपुर और अम्बाला में इनकी अच्छी संख्या हैं| इबटसन के विवरण से स्पष्ट हैं कि पंजाब, हिमांचल प्रदेश, हरयाणा, दिल्ली आदि प्रान्तों में कसाना गुर्जर आबाद हैं तथा प्राचीन ऐतिहासिक गांधार राज्य की सीमा के अंतर्गत आने वाली कुषाणों की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) और उसके उत्तरी तरफ मरदान, चित्राल और स्वात क्षेत्र में भी गुर्जरों की अच्छी खासी आबादी हैं| कनिष्क की गांधार कला के विकास में विशेष भूमिका थी। [70] होशियारपुर जिला गजेटियर, 1904 के अनुसार गूजरों के ढाई गोत्र कसाना, गोर्सी और बरगट के अतिरिक्त चेची, भूमला, चौहान और बजाड़ आदि जिले में प्रमुख गोत्र हैं। [71] जम्मू और कश्मीर राज्य में भी कसाना गुर्जरों का एक प्रमुख गोत्र हैं। कसाना, खटाना, चेची, पढाना/भडाना, लोढ़ा, पसवार/पोषवाल तथा बागड़ी जम्मू कश्मीर में गुर्जरों के प्रमुख गोत्र हैं| कश्मीर के मीरपुर क्षेत्र में कसाना गुर्जरों का प्रमुख गोत्र हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा और ऊना जिले के गूजरों में कसाना प्रमुख गोत्र हैं।

उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद जिले के लोनी क्षेत्र में कसाना गोत्र का बारहा यानि 12 गाँव की खाप हैं। इस कसाना के बारहा में रिस्तल, जावली, शकलपुरा, गढ़ी, सिरोरा, राजपुर, भूपखेडी, मह्मूंदपुर, धारीपुर, सीती, कोतवालपुर तथा मांडला गाँव आते हैं। इनके पड़ोस में ही रेवड़ी और भोपुरा भी कसाना गुर्जरों के गाँव हैं। जावली तथा शकलपुरा इनके केंद्र हैं। कसानो के इस बारहा का निकल दनकौर के निकट रीलखा गाँव से माना जाता हैं। रीलखा से पहले इनके पूर्वजों का राजस्थान के झुझुनू जिले की खेतड़ी तहसील स्थित तातीजा गाँव से आने का पता चलता हैं। इतिहासकार रामशरण शर्मा के अनुसार गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी विजेता सेना के सरदारों को 12 या उसके गुणांक 24, 60, 84, 360 की समूह में गाँव को प्रदान किये थे। इन विजेता सरदारों ने अपने गोत्र के भाई-बंद सैनिको को ये गाँव बाँट दिए। सभवतः ये 12 गाँव गुर्जर प्रतिहारो के काल में नवी शताब्दी में उनकी उत्तर भारत की विजय के समय यहाँ बसे हैं। मेरठ जिले के परतापुर क्षेत्र में ‘कुंडा’, मेरठ मवाना मार्ग पर ‘कुनकुरा’, मुज़फ्फरनगर जिले में शुक्रताल के पास ‘ईलाहबास’ तथा गंगा पार बिजनौर जिले में लदावली कसाना गोत्र के गाँव चौदहवी शताब्दी में जावली से निकले हैं| इसी प्रकार दादरी क्षेत्र के हाजीपुर, नंगला, रूपबास रामपुर और चिठेडा के कसाना गुर्जर लोनी क्षेत्र स्थित महमूदपुर गाँव से सम्बंधित, 1857 की जनक्रांति के मशहूर स्वतंत्रता सेनानी शहीद तोता सिंह कसाना के वंशज हैं। [72]

रूहेलखंड के गुर्जरों में कसाना गोत्र के अनेक गाँव हैं। मुरादाबाद के निकट मुरादाबाद हरिद्वार राजमार्ग पर लदावली कसाना को प्रसिद्ध गाँव हैं| अमरोहा जिले की हसनपुर तहसील में हीसपुर कसानो का प्रमुख गाँव हैं|[73]

चंबल नदी की घाटी में स्थित उत्तर प्रदेश के आगरा, मध्य प्रदेश के मुरैना, ग्वालियर , भिंड, शिवपुरी, दतिया तथा राजस्थान के समीपवर्ती धौलपुर जिले के उबड़-खाबड़ दुर्गम बीहड़ क्षेत्रो में गुर्जरों की घनी आबादी हैं| इस कारण से इस पूरे क्षेत्र को स्थानीय बोलचाल में गूजराघार भी कहते हैं| चंबल क्षेत्र स्थित इस गूजराघार में कसाना गोत्र के 100 गाँव हैं| गूजराघार में कसाना गोत्र के गांवों की शुरुआत आगरा की बाह तहसील के सैंय्या से हो जाती हैं। [74]

इनमे सबसे ज्यादा, कसाना नख के 28 गाँव राजस्थान के धौलपुर जिले में तथा 22 गाँव मुरेना जिले में हैं| 1857 की जनक्रांति के नायक सूबा देवहंस कसाना का गाँव कुदिन्ना भी धोलपुर जिले में हैं। मुरैना में नायकपुरा, दीखतपुरा, रिठोरा, गडौरा, हेतमपुर एवं जनकपुर कसाना गुर्जरों के प्रमुख गाँव हैं। नायकपुरा गाँव कसानो का केंद्र माना जाता हैं। गूजराघार का यह दुर्गम क्षेत्र कोशानो के उनकी राजधानी और अंतिम शक्ति केंद्र मथुरा के दक्षिण पश्चिम में सटा हुआ हैं| सभवतः मथुरा क्षेत्र में नाग वंश और गुप्तो के उत्कर्ष के फलस्वरूप कोशानो तथा अन्य गुर्जरों को इस निकटवर्ती दुर्गम क्षेत्र में प्रव्रजन करना पड़ा| राजपूताना गजेटियर के अनुसार राजस्थान के गुर्जरों का निकाल मथुरा से माना जाता हैं| संभवतः राजस्थान के गुर्जरों में यह मान्यता मथुरा क्षेत्र से इस प्रव्रजन का स्मृति अवशेष हैं। [75] [76] राजस्थान के गुर्जरों में गोत्र के लिए परम्परागत रूप से ‘नख’ शब्द प्रचलित हैं| राजस्थान में कसाना नख की सबसे बड़ी आबादी धौलपुर जिले में हैं जहाँ इनके 28 गाँव हैं| धोलपुर जिले की बाड़ी तहसील में कसानो का बारहा हैं| इनमे गजपुरा, कुआखेडा, रेहेन, बरैंड, लालौनी, सौहा, अतराजपुरा आदि गाँव हैं। भरतपुर जिले में में कसाना नख के 12 गाँव की खाप हैं| इनमे झोरोल, सालाबाद, नरहरपुर, दमदमा, लखनपुर, खैररा, खटोल, भोंडागाँव, गुठाकर, निसुरा आदि प्रमुख गाँव हैं। जयपुर जिले के कोटपुतली क्षेत्र में कसाना नख के 5 गाँव हैं, इनमे सुन्दरपुरा, पूतली, खुर्दी, अमाई, कल्याणपुरा खुर्द आदि मुख्य हैं। राजस्थान के दौसा जिले के सिकंदरा क्षेत्र में कसाना नख के 12 गाँव की खाप हैं। डिगारया पत्ता, बरखेडा, डुब्बी, कैलाई, भोजपुरा, बावनपाड़ा, सिकंदरा, रामगढ़, बुडली, टोरडा बगडेडा अलवर जिले में इन्द्रवली। झुंझुनू जिले की खेतड़ी तहसीलमें पांच गाँव हैं- ततिज़ा, कुठानिया, बनवास, गूजरवास और देवटा[77] [78]


कनिष्क एवं बौद्ध धर्म[संपादित करें]

कनिष्क प्रथम की स्वर्ण मुद्रा (१२०ई.), जिसमें गौतम बुद्ध को दर्शाया गया है।
आगे: कनिष्क खड़े हुए.., कुषाण कोट एवं लंबे जूते पहने, कंधे पर पंख जुड़े हुए हैं, अपने बाएं हाथ में मानक धारण करे हुए वेदी पर आहूति देते हुए। यूनानी लिपि में कुशाण भाषा का मुद्रालेखन (जिसमें कुशाण Ϸ "श" अक्षर प्रयुक्त है): ϷΑΟΝΑΝΟϷΑΟ ΚΑΝΗϷΚΙ ΚΟϷΑΝΟ ("शाओनानोशाओ कनिश्की कोशानो "): "राजाओं का राजा, कनिष्क कुशाण "।
पीछे: यूनानी शैली में खड़े हुए बुद्ध, दाएं हाथ में अभय मुद्रा एवं बाएं हाथ में अपनी भूषा का छोर पकड़े हुए। यूनानी लिपि में : ΒΟΔΔΟ "बोद्दो", बुद्ध के लिये लिखा है। दाईं ओर कनिष्क का चिह्न: तमघा

कनिष्क बौद्ध धर्म में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित है, क्योंकि वह न केवल बौद्ध धर्म में विश्वास रखता था वरन् उसकी शिक्षाओं के प्रचार एवं प्रसार को भी बहुत प्रोत्साहन दिया। इसका उदाहरण है कि उसने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध सन्गीति का आयोजन करवाया था, जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र एवं अश्वघोष द्वारा की गयी थी। इसी परिषद में बौद्ध धर्म दो मतों में विभाजित हो गये – हीनयान एवं महायान। इसी समय बुद्ध का २२ भौतिक चिह्नों वाला चित्र भी बनाया गया था।

कनिष्क के शासन का तृतीय वर्ष बाल बोधिसत्त्व को समर्पित रहा था।

उसने यूनानी-बौद्ध कला की प्रतिनिधित्व वाली गांधार कला को भी उतना ही प्रोत्साहन दिया जितना हिन्दू कला के प्रतिनिधित्व वाली मथुरा कला को दिया। कनिष्क ने निजी रूप से बौद्ध तथा फारसी दोनों की ही विशेषताओ अपना लिया था, किन्तु उसका कुछ झुकाव बौद्ध धर्म की ओर अधिक था। कुषाण साम्राज्य की विभिन्न पुस्तको मे वर्णित बौद्ध शिक्षाओं एवं प्रार्थना शैली के माध्यम से कनिष्क के बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव का पता चलता है।

कनिष्क का बौद्ध स्थापत्यकला को सबसे बड़ा योगदान पेशावर का बौद्ध स्तूप था। जिन पुरातत्त्ववेत्ताओं ने इसके आधार को १९०८-१९०९ में खोजा, उन्होंने बताया कि इस स्तूप का व्यास २८६ फ़ीट (८७ मी.) था। चीनी तीर्थयात्री ज़ुआनजांग ने लिखा है कि इस स्तूप की ऊंचाई ६०० से ७०० (चीनी) "फ़ीट" (= लगभग १८०-२१० मी या ५९१-६८९ फ़ीट) थी तथा ये बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ था।[79] निश्चित रूप से ये विशाल अत्यन्त सुन्दर इमारत प्राचीन काल के आश्चर्यों में रही होगी।

कनिष्क को बौद्ध शास्त्री अश्वघोष के काफ़ी निकट बताया जाता है। यही बाद के वर्षों में उनके धार्मिक परामर्शदाता रहे थे। कनिष्क के राजतिलक के समय एवं जब कुशाण वंश की प्रथम सुवर्ण मुद्रा ढाली गयी थी, तब राजा के आध्यात्मिक सहालकार युज़ असफ़ थे।

बौद्ध मुद्राएं[संपादित करें]

कनिष्क काल की बौद्ध मुद्राएं अन्य मुद्राओं की तुलना में काफ़ी कम थीं (लगभग सभी मुद्राओं का मात्र १प्रतिशत)। कई मुद्राओं में कनिष्क को आगे तथा बुद्ध को यूनानी शैली में पीछे खड़े हुए दिखाया गया था। कुछ मुद्राओं में शाक्यमुनि बुद्ध एवं मैत्रेय को भी दिखाया गया है। कनिष्क के सभी सिक्कों की तरह; इनके आकार व रूपांकन मोटे-मोटे, खुरदरे तथा अनुपात बिगड़े हुए थे। बुद्ध की आकृति हल्की सी बिगड़ी हुई, बड़े आकार के कानों वाली तथा दोनों पैर कनिष्क की भांति ही फ़ैलाये हुए, यूनानी शैली की नकल में दिखाये गए हैं।

कनिष्क के बौद्ध सिक्के तीन प्रकार के मिले हैं:

खड़े हुए बुद्ध[संपादित करें]

कनिष्क के सिक्कों वाली बुद्ध की आकृति जैसे बुद्ध की कांस्य प्रतिमा, गांधार, ३-४थी शताब्दी। बुद्ध ने यूनानी शैली में अपनी भूषा का बायां कोना हाथ में पकड़ा हुआ है, तथा अभय मुद्रा में हैं।
कनिष्क के सिक्कों में बुद्ध का चित्रण (जिसमें ΒΟΔΔΟ "बोद्दो" लिख है)

कुषाण के बुद्ध अंकन वाले मात्र छः स्वर्ण सिक्के हैं, इनमें से भी छठा एक प्राचीन आभूषण का मध्य भाग में जड़ा हुआ भाग था, जिसमें कनिष्क बुद्ध अंकित हैं, तथा हृदयाकार माणिक्यों के गोले से सुसज्जित है। कनिष्क प्रथम काल के सभी ऐसे सिक्के स्वर्ण में ढले हुए हैं; एवं दो भिन्न मूल्यवर्गों में मिले हैं: एक दीनार लगभग ८ ग्राम की, मोटे तौर पर रोमन ऑरस से मिलता हुआ, एवं एक चौथाई दीनार, लगभग २ ग्राम का, जो लगभग एक ओबोल के बराबर का है।)

बुद्ध को भिक्षुकों जैसे चोगे अन्तर्वसक, उत्तरसंग पहने, तथा ओवरकोट जैसी सन्घाटी पहने दिखाया गया है।

उनके कान अत्यधिक बड़े व लम्बे दिखाये गए है, जो किसी मुद्रा में प्रतीकात्मक रूप से अतिश्योक्त हैं, किन्तु बाद के कई गांधार की मूर्तियों (३-४थी शताब्दी ई.) में भी दिखाया गया है। उनके शिखास्थान पर एक बालों का जूड़ा भि बना हुआ है। ऐसा गांधार के बाद के बहुत से शिल्पों में देखने को मिलता है।

इस प्रकार कह सकते हैं कि, बुद्ध के सिक्कों में उनका रूप उच्च रूप से प्रतीकात्मक बनाया गया है, जो कि पहले के गांधार शिल्पाकृतियों से अलग है। ये गांधार शिल्प बुद्ध अपेक्षाकृत अधिक प्राकृतिक दिखाई देते थे। कई मुद्राओं में इनके मूंछ भी दिखाई गई है। इनके दाएं हाथ की हथेली पर चक्र का चिह्न है एवं भवों के बीच उर्ण(तिलक) चिह्न होता है। बुद्ध द्वारा धारण किया गया पूरा चोगा गांधार रूप से अधिक मिलता है, बजाय मथुरा रूप से।


अन्य धार्मिक संबंध[संपादित करें]

छठ, छाठ और कुषाण[संपादित करें]

सूर्य उपासना का महापर्व हैं- छठ पूजा। यह त्यौहार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश मनाया जाता हैं। सूर्य पूजा का यह त्यौहार क्योकि षष्ठी को मनाया जाता हैं इसलिए लोग इसे सूर्य षष्ठी भी कहते हैं| इस दिन लोग व्रत रखते हैं और संध्या के समय तालाब, नहर या नदी के किनारे, बॉस सूप घर के बने पकवान सजा कर डूबते सूर्य भगवान को अर्ध्य देते हैं| अगले दिन सुबह उगते हुए सूर्य को अर्ध्य दिया जाता हैं। सूर्य षष्ठी के दिन सूर्य पूजा के साथ-साथ कार्तिकेय की पत्नी षष्ठी की भी पूजा की जाती हैं| पुराणों में षष्ठी को बालको को अधिष्ठात्री देवी और बालदा कहा गया हैं लोक मान्यताओ के अनुसार सूर्य षष्ठी के व्रत को करने से समस्त रोग-शोक, संकट और शत्रुओ का नाश होता हैं। निः संतान को पुत्र प्राप्ति होती हैं तथा संतान की आयु बढती हैं। सूर्य षष्ठी के दिन दक्षिण भारत में कार्तिकेय जयंती भी मनाई जाती हैं और इसे वहाँ कार्तिकेय षष्ठी अथवा स्कन्द षष्ठी कहते हैं। [80]

सूर्य, कार्तिकेय और षष्ठी देवी की उपासनाओ की अलग-अलग परम्परों के परस्पर मिलन और सम्मिश्रण का दिन हैं कार्तिक के शुक्ल पक्ष की षष्ठी| इन परम्पराओं के मिलन और सम्मिश्रण सभवतः कुषाण काल में हुआ|

चूकि भारत मे सूर्य और कार्तिकेय की पूजा को कुषाणों ने लोकप्रिय बनाया था, इसलिए इस दिन का ऐतिहासिक सम्बन्ध कुषाणों और उनके वंशज गुर्जरों से हो सकता हैं| कुषाण और उनका नेता कनिष्क (78-101 ई.) सूर्य के उपासक थे| इतिहासकार डी. आर. भंडारकार के अनुसार कुषाणों ने ही मुल्तान स्थित पहले सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था| भारत मे सूर्य देव की पहली मूर्तिया कुषाण काल मे निर्मित हुई हैं| पहली बार कनिष्क ने ही सूर्यदेव का मीरो ‘मिहिर’ के नाम से सोने के सिक्को पर अंकन कराया था [81] अग्नि और सूर्य पूजा के विशेषज्ञ माने जाने वाले इरान के मग पुरोहित कुषाणों के समय भारत आये थे| बिहार मे मान्यता हैं कि जरासंध के एक पूर्वज को कोढ़ हो गया था, तब मगो को मगध बुलाया गया| मगो ने सूर्य उपासना कर जरासंध के पूर्वज को कोढ़ से मुक्ति दिलाई, तभी से बिहार मे सूर्य उपासना आरम्भ हुई। [82] भारत में कार्तिकेय की पूजा को भी कुषाणों ने ही शुरू किया था और उन्होंने भारत मे अनेक कुमारस्थानो (कार्तिकेय के मंदिरों) का निर्माण कराया था| कुषाण सम्राट हुविष्क को उसके कुछ सिक्को पर महासेन 'कार्तिकेय' के रूप में चित्रित किया गया हैं| संभवतः हुविष्क को महासेन के नाम से भी जाना जाता था| मान्यताओ के अनुसार कार्तिकेय भगवान शिव और पार्वती के छोटे पुत्र हैं| उनके छह मुख हैं| वे देवताओ के सेना ‘देवसेना’ के अधिपति हैं| इसी कारण उनकी पत्नी षष्ठी को देवसेना भी कहते हैं| षष्ठी देवी प्रकृति का छठा अंश मानी जाती हैं और वे सप्त मातृकाओ में प्रमुख हैं| यह देवी समस्त लोको के बच्चो की रक्षिका और आयु बढाने वाली हैं| इसलिए पुत्र प्राप्ति और उनकी लंबी आयु के लिए देवसेना की पूजा की जाती हैं [83] कुषाणों की उपाधि देवपुत्र थी और वो अपने पूर्वजो को देव कहते थे और उनकी मंदिर में मूर्ति रख कर पूजा करते थे, इन मंदिरों को वो देवकुल कहते थे| एक देवकुल के भग्नावेश कुषाणों की राजधानी रही मथुरा में भी मिले हैं| अतः कुषाण देव उपासक थे| यह भी संभव हैं कि कुषाणों की सेना को देवसेना कहा जाता हो|

देवसेना की पूजा और कुषाणों की देव पूजा का संगम हमें देव-उठान के त्यौहार वाले दिन गुर्जरों के घरों में देखने को मिलता हैं| कनिंघम ने आधुनिक गुर्जरों की पहचान कुषाणों के रूप में की हैं| देव उठान त्यौहार सूर्य षष्ठी के चंद दिन बाद कार्तिक की शुक्ल पक्ष कि एकादशी को होता हैं| पूजा के लिए बनाये गए देवताओं के चित्र के सामने पुरुष सदस्यों के पैरों के निशान बना कर उनके उपस्थिति चिन्हित की जाती हैं| गुर्जरों के लिए यह पूर्वजो को पूजने और जगाने का त्यौहार हैं| गीत के अंत में कुल-गोत्र के देवताओ के नाम का जयकारा लगाया जाता हैं, जैसे- जागो रे कसानो के देव या जागो रे बैंसलो के देव| देव उठान पूजन के अवसर पर गए जाने वाले मंगल गीत में घर की माताओं और उनके पुत्रो के नाम लिए जाते है और घर में अधिक से अधिक पुत्रो के जन्मने की कामना और प्रार्थना की जाती हैं। [84] देवसेना और देव उठान में देव शब्द की समानता के साथ पूजा का मकसद- अधिक से अधिक पुत्रो की प्राप्ति और उनकी लंबी आयु की कामना भी समान हैं| दोनों ही त्यौहार कार्तिक के शुक्ल पक्ष में पड़ते हैं|

गुर्जरों के साथ सूर्य षष्ठी का गहरा संबंध जान पड़ता हैं क्योकि सूर्य षष्ठी को गुर्जरप्रतिहार षष्ठी भी कहते हैं। प्रतिहार गुर्जरों का प्रसिद्ध ऐतिहासिक वंश रहा हैं। गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज (836-885 ई.) के नेतृत्व मे गुर्जरों ने उत्तर भारत में अंतिम हिंदू साम्राज्य का निर्माण किया था, जिसकी राजधानी कन्नौज थी| मिहिरभोज ने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश को जीत कर प्रतिहार साम्राज्य मे मिलाया था। [85] सभवतः इसी कारण पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग को आज तक भोजपुर कहते हैं| सूर्य उपासक गुर्जर और उनका प्रतिहार राज घराना सूर्य वंशी माने जाते हैं| गुर्जरों ने सातवी शताब्दी मे, वर्तमान राजस्थान मे स्थित, गुर्जर देश की राजधानी भिनमाल मे जगस्वामी सूर्य मंदिर का निर्माण किया गया था| इसी काल के, भडोच के गुर्जरों शासको के, ताम्रपत्रो से पता चलता हैं कि उनका शाही निशान सूर्य था| अतः यह भी संभव हैं कि प्रतिहारो के समय मे ही बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सूर्य उपासना के त्यौहार ‘सूर्य षष्ठी’ को मनाने की परम्परा पड़ी हो और प्रतिहारो से इसके ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण सूर्य षष्ठी को प्रतिहार षष्ठी कहते हो। [86]

गुर्जरो मे छठ पूजा का त्यौहार सामान्य तौर पर नहीं होता हैं, परतु राजस्थान के गुर्जरों मे छाठ नाम का एक त्यौहार कार्तिक माह कि अमावस्या को होता हैं| इस दिन गुर्जर गोत्रवार नदी या तालाब के किनारे इक्कट्ठे होते हैं और अपने पूर्वजो को याद करते हैं| पुर्वजो का तर्पण करने के लिए वो उन्हें धूप देते हैं, घर से बने पकवान जल मे प्रवाहित कर उनका भोग लगते हैं तथा सामूहिक रूप से हाथो मे ड़ाब की रस्सी पकड़ कर सूर्य को सात बार अर्ध्य देते हैं| इस समय उनके साथ उनके नवजात शिशु भी साथ होते हैं, जिनके दीर्घायु होने की कामना की जाती हैं| हम देखते हैं कि छाठ और छठ पूजा मे ना केवल नाम की समानता हैं बल्कि इनके रिवाज़ भी एक जैसे हैं| राजस्थान की छाठ परंपरा गुर्जरों के बीच से विलोप हो गयी छठ पूजा का अवशेष प्रतीत होती हैं। [87] [88]

गुर्जरों में देव उठान और देव उठान मंगल गीत[संपादित करें]

देव उठान का त्यौहार गुर्जर और जाटो में विशेष रूप से मनाया जाता हैं| यू तो हिंदू शास्त्रों के अनुसार हिन्दुओ द्वारा यह त्यौहार विष्णु भगवान के योग निद्रा से जागने के उपलक्ष्य में मनाया जाता हैं परन्तु इस अवसर पर गुर्जर परिवारों में गाये जाने वाला मंगल गीत अपने पूर्वजो को संबोधित जान पड़ता हैं| गुर्जर अपने पूर्वजों को देव कहते हैं और उनकी पूजा भी करते हैं| यह परम्परा इन्हें अपने पूर्वज सम्राट कनिष्क कुषाण/कसाना (78-101 ई.)से विरासत में मिली हैं| कुषाण अपने को देवपुत्र कहते थे| कनिष्क ने अपने पूर्वजो के मंदिर बनवाकर उसमे उनकी मूर्तिया भी लगवाई थी| इन मंदिरों को देवकुल कहा जाता था| एक देवकुल के भग्नावेश मथुरा में भी मिले हैं|गूजरों और जाटो के घरों और खेतों में आज भी छोटे-छोटे मंदिर होते हैं जिनमे पूर्वजो  का वास माना जाता हैं और इन्हें देवता कहा जाता हैं, अन्य हिंदू अपने पूर्वजों को पितृ कहते हैं|घर के वो पुरुष पूर्वज जो अविवाहित या बिना पुत्र के मर जाते हैं, उन देवो को अधिक पूजा जाता हैं| भारत  में मान्यता हैं कि यदि पितृ/देवता रूठ जाये तो पुत्र प्राप्ति नहीं होती| पुत्र प्राप्ति के लिए घर के देवताओ को मनाया जाता हैं| देव उठान पूजन के अवसर पर गए जाने वाली मंगल गीत में जाहर (भगवान जाहर वीर गोगा जी) और नारायण का भी जिक्र हैं, परन्तु यह स्पष्ट नहीं हैं कि गीत में वर्णित नारायण भगवान विष्णु हैं या फिर राजस्थान में गुर्जरों के लोक देवता भगवान देव नारायण या कोई अन्य| लेकिन इस मंगल गीत में परिवार में पुत्रो की महत्ता को दर्शाया गया हैं और देवताओ से उनकी प्राप्ति की कामना की गयी हैं| पूजा के लिए बनाये गए देवताओं के चित्र के सामने पुरुष सदस्यों के पैरों के निशान बना कर उनके उपस्थिति चिन्हित की जाती हैं| इस चित्र में एक नहीं कई देवता दिखलाई पड़ते हैं, अतः गुर्जरों के लिए यह सिर्फ किसी एक देवता को नहीं बल्कि अनेक पूर्वजो को पूजने और जगाने का त्यौहार हैं| गीत के अंत में जयकारा भी कुल-गोत्र के देवताओ के नाम का लगाया जाता हैं, जैसे- जागो रे भाटियो के देव या जागो रे बैंसलो के देव, किसी नाम विशेष के देवता का नहीं| यह भी संभव हैं की भारत में प्रचलित देव उठान का त्यौहार गुर्जरों की जनजातीय परंपरा के सार्वभौमिकरण का परिणाम हो| कम से कम गुर्जरों में यह शास्त्रीय हिंदू परंपरा और गुर्जरों की अपनी जनजातीय परंपरा का सम्मिश्रण तो हैं ही| आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं देव उठान मंगल गीत [89]

उपाधि[संपादित करें]

कनिष्क ने देवपुत्र शाहने शाही की उपाधि धारण की थी। भारत आने से पहले कुषाण ‘बैक्ट्रिया’ में शासन करते थे, जो कि उत्तरी अफगानिस्तान एवं दक्षिणी उजबेगकिस्तान एवं दक्षिणी तजाकिस्तान में स्थित था और यूनानी एवं ईरानी संस्कृति का एक केन्द्र था।[1] कुषाण हिन्द-ईरानी समूह की भाषा बोलते थे और वे मुख्य रूप से मिहिर (सूर्य) के उपासक थे। सूर्य का एक पर्यायवाची ‘मिहिर’ है, जिसका अर्थ है, वह जो धरती को जल से सींचता है, समुद्रों से आर्द्रता खींचकर बादल बनाता है।

मुद्राओं में अंकन[संपादित करें]

सम्राट कनिष्क के सिक्कों पर,यूनानी भाषा और लिपि में मीरों (मिहिर) को उत्कीर्ण कराया था, जिससे संकेत मिलता है कि ईरान का सौर-पूजक सम्प्रदाय भारत में प्रवेश आया था। ईरान में मिथ्र या मिहिर पूजा भी अत्यन्त लोकप्रिय थी। भारतीय मुद्रा पर सूर्य का अंकन किसी शासक द्वारा प्रथम दृष्टया कनिष्क द्वारा हुआ था।[90] पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) के पास शाह जी की ढेरी नामक स्थान है, जहां कनिष्क द्वारा निमित एक बौद्ध स्तूप के अवशेषों से एक सन्दूक मिला जिसे कनिष्कास कास्केट बताया गया है। इस पर सम्राट कनिष्क के साथ सूर्य एवं चन्द्र के चित्र का अंकन हुआ है। इस सन्दूक पर कनिष्क के द्वारा चलाये गए शक संवत्सर का संवत का प्रथम वर्ष अंकित है।

प्रतिमाएं[संपादित करें]

कनिष्क प्रथम, द्वितीय शताब्दी की मूर्ति, मथुरा संग्रहालय

मथुरा के सग्रहांलय में लाल बलुआपत्थर की अनेक सूर्य प्रतिमांए सहेजी हुई है, जो कुषाण काल (प्रथम शताब्दी से तीसरी शताब्दी ई) की है। इनमें भगवान सूर्य चार घोड़ों के रथ पर आरूढ़ हैं। वे सिंहासन पर बैठने की मुद्रा में पैर लटकाये हुये हैं। उनके दोनों हाथों में कमल पुष्प है और उनके दोनों कन्धों पर पक्षी गरूड़ जैसे दो पंख लगे हुए हैं। इन्हीं पंखों को कुछ इतिहासवेत्ताओं द्वारा ज्वाला भी बताया गया है। सूर्यदेव औदिच्यवेश अर्थात् ईरानी पगड़ी, कामदानी के चोगें और सलवार के नीचे ऊंचे ईरानी जूते पहने हैं। उनकी वेशभूषा बहुत कुछ, मथुरा से ही प्राप्त, सम्राट कनिष्क की बिना सिर की प्रतिमा जैसी है। भारत में ये सूर्य की सबसे प्राचीन मूर्तियां है। कुषाण काल से पूर्व की सूर्य की कोई प्रतिमा नहीं मिली है, अतः ये माना जाता है कि भारत में उन्होंने ही सूर्य प्रतिमा की उपासना आरम्भ की और उन्होंने ही सूर्य की वेशभूषा भी वैसी दी थी जैसी वो स्वयं धारण करते थे। [91] [92]

भारत में प्रथम सूर्य मन्दिर की स्थापना मूलस्थान (वर्तमान मुल्तान) में कुषाणों द्वारा की गयी थी।[93][94][95] पुरातत्वेत्ता ए. कनिंघम का मानना है कि मुल्तान का सबसे पहला नाम कश्यपपुर (कासाप्पुर) था और उसका यह नाम कुषाणों से सम्बन्धित होने के कारण पड़ा। भविष्य पुराण, साम्व एवं वराह पुराण के अनुसार भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब ने मुल्तान में पहले सूर्य मन्दिर की स्थापना की थी। किन्तु भारतीय ब्राह्मणों ने वहाँ पुरोहित का कार्य करने से मना कर दिया, तब नारद मुनि की सलाह पर साम्ब ने संकलदीप (सिन्ध) से मग ब्राह्मणों को बुलवाया, जिन्होंने वहाँ पुरोहित का कार्य किया।[90] भविष्य पुराण के अनुसार मग ब्राह्मण जरसस्त के वंशज है, जिसके पिता स्वयं सूर्य थे और माता नक्षुभा मिहिर गोत्र की थी। मग ब्राह्मणों के आदि पूर्वज जरसस्त का नाम, छठी शताब्दी ई.पू. में, ईरान में पारसी धर्म की स्थापना करने वाले जुरथुस्त से साम्य रखता है। प्रसिद्ध इतिहासकार डी.आर. भण्डारकर (1911 ई0) के अनुसार मग ब्राह्मणों ने सम्राट कनिष्क के समय में ही, सूर्य एवं अग्नि के उपासक पुरोहितों के रूप में, भारत में प्रवेश किया।[95] उसके बाद ही उन्होंने कासाप्पुर (मुल्तान) में पहली सूर्य प्रतिमा की स्थापना की। इतिहासकार वी. ए. स्मिथ के अनुसार कनिष्क ढीले-ढाले रूप के ज़र्थुस्थ धर्म को मानता था, वह मिहिर (सूर्य) और अतर (अग्नि) के अतरिक्त अन्य भारतीय एवं यूनानी देवताओ उपासक था। अपने जीवन काल के अंतिम दिनों में बौद्ध धर्म में कथित धर्मान्तरण के बाद भी वह अपने पुराने देवताओ का सम्मान करता रहा।[96] [90]

भारतीय क्षेत्र[संपादित करें]

दक्षिणी राजस्थान में स्थित प्राचीन भिनमाल नगर में सूर्य देवता के प्रसिद्ध जगस्वामी मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा कनक (सम्राट कनिष्क) ने कराया था। मारवाड़ एवं उत्तरी गुजरात कनिष्क के साम्राज्य का हिस्सा रहे थे। भिनमाल के जगस्वामी मन्दिर के अतिरिक्त कनिष्क ने वहाँ ‘करडा’ नामक झील का निर्माण भी कराया था। भिनमाल से सात कोस पूर्व ने कनकावती नामक नगर बसाने का श्रेय भी कनिष्क को दिया जाता है। कहते है कि भिनमाल के वर्तमान निवासी देवड़ा/देवरा लोग एवं श्रीमाली ब्राहमण कनक के साथ ही काश्मीर से आए थे। देवड़ा/देवरा, लोगों का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने जगस्वामी सूर्य मन्दिर बनाया था। राजा कनक से सम्बन्धित होने के कारण उन्हें सम्राट कनिष्क की देवपुत्र उपाधि से जोड़ना गलत नहीं होगा। सातवी शताब्दी में यही भिनमाल नगर गुर्जर देश (आधुनिक राजस्थान में विस्तृत) की राजधानी बना। यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि एक कनिघंम ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है और उसने माना है कि गुर्जरों के कसाना गौत्र के लोग कुषाणों के वर्तमान प्रतिनिधि है। उसकी बात का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि गुर्जरों का कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से सबसे बड़ा है। कसाना गौत्र अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैला है और भारत में केवल गुर्जर जाति में मिलता है।

कनिष्क ने भारत में कार्तिकेय की पूजा को आरम्भ किया और उसे विशेष बढ़ावा दिया। उसने कार्तिकेय और उसके अन्य नामों-विशाख, महासेना, और स्कन्द का अंकन भी अपने सिक्कों पर करवाया। कनिष्क के बेटे सम्राट हुविष्क का चित्रण उसके सिक्को पर महासेन 'कार्तिकेय' के रूप में किया गया हैं। आधुनिक पंचाग में सूर्य षष्ठी एवं कार्तिकेय जयन्ती एक ही दिन पड़ती है।

कुषाण खाप अध्यन[संपादित करें]

गुर्जरों का खाप अध्ययन (Clan Study) भी इनकी कुषाण उत्पत्ति की तरफ इशारा कर रहा हैं| एच. ए. रोज के अनुसार पंजाब के गुर्जरों में मान्यता हैं कि गुर्जरों के ढाई घर असली हैं -गोर्सी, कसाना और आधा बरगट| दिल्ली क्षेत्र में चेची, नेकाडी,गोर्सी और कसाना असली घर खाप  माने जाते हैं| करनाल क्षेत्र में गुर्जरों के गोर्सी,  चेची और कसाना असली घर माने जाते हैं| पंजाब के गुजरात जिले में चेची खटाना मूल के माने जाते हैं| एच. ए. रोज कहते हैं कि उपरोक्त विवरण के आधार पर कसाना, खटाना और गोरसी गुर्जरों के असली और मूल खाप मानी जा सकती हैं| कुल मिला कर चेची, कसाना, खटाना, गोर्सी, बरगट और नेकाड़ी आदि 6 खापो की गुर्जरों के असली घर या गोत्रो की मान्यता रही हैं। [97] कनिंघम आदि इतिहासकारों के अनुसार गुर्जरों का पूर्वज कुषाण और उनके भाई-बंद काबिले का परिसंघ हैं और भारत में उनका आगमन अफगानिस्तान स्थित हिन्दू- कुश पर्वत की तरफ से हुआ हैं जहाँ से ये उत्तर भारत्त में फैले गए| इस अवधारणा के अनुसार गुर्जरों का शुद्धतम या मूल स्वरुप आज भी अफगानिस्तान में होना चाहिए| अफगानिस्तान में गुर्जरों के 6 गोत्र ही मुख्य से पाए जाते हैं – चेची, कसाना, खटाना, बरगट, गोर्सी और नेकाड़ी | इन्ही गोत्रो की चर्चा बार-बार गुर्जरों के पूर्वज अपने असली घरो यानि गोत्रो के रूप में करते रहे हैं| वहां ये आज भी गुजुर (गुशुर) कहलाते हैं| गुशुर कुषाण साम्राज्य के राजसी वर्ग को कहा जाता था| गुशुर शब्द से ही गुर्जर शब्द की उत्पत्ति हुई हैं| अतः प्रजातीय नाम एवं लक्षणों की दृष्टी से, अफगानिस्तान में गुर्जर आज भी अपने शुद्धतम मूल स्वरुप में हैं। [98] [99] यूची-कुषाण का आरभिक इतिहास मध्य एशिया से जुड़ा रहा हैं, वहाँ यह परम्परा थी कि विजेता खाप और कबीले अपने जैसी भाई-बंद खापो को अपने साथ जोड़ कर अपनी सख्या बल का विस्तार कर शक्तिशाली  हो जाते थे| अतः भारत में भी यूची-कुषाणों ने ऐसा किया हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं। [100]

गुर्जरों के असली घर कही जाने वाली खापो की कुषाण उत्पत्ति पर अलग से चर्चा की आवशकता हैं|             चेची: प्राचीन चीनी इतिहासकारों के अनुसार बैक्ट्रिया आगमन से पहले कुषाण परिसंघ की भाई-बंद खापे  और कबीले यूची कहलाते थे| वास्तव में यूची भी भाई-बंद खापो और कबीलों का परिसंघ था, जोकि अपनी शासक परिवार अथवा खाप के नाम पर यूची कहलाता था| बैक्ट्रिया में शासक परिवार या खाप कुषाण हो जाने पर यूची परिसंघ कुषाण कहलाने लगा|चेची और यूची में स्वर (Phonetic) की समानता हैं| यह सम्भव हैं कि यूची चेची शब्द का चीनी रूपांतरण हो| अथवा यह भी हो सकता हैं कि चेची यूची का भारतीय रूपांतरण हो। [101]हालाकि चेची की यूची के रूप में पहचान के लिए अभी और अधिक शोध की आवशकता हैं|  हम देख चुके हैं कि चेची की गणना गुर्जरों के असली घर अथवा खाप के रूप में होती हैं|  चेची गोत्र संख्या बल और क्षेत्र विस्तार की दृष्टी से गुर्जरों का प्रमुख गोत्र है जोकि  हिंदू कुश की पहाडियों से से लेकर दक्षिण भारत तक पाया जाता हैं| अधिकांश स्थानों पर इनकी आबादी कसानो के साथ-साथ पाई जाती हैं| [102]

गोर्सी : एलेग्जेंडर कनिंघम के अनुसार कुषाणों के सिक्को पर कुषाण को कोर्स अथवा गोर्स भी पढ़ा जा सकता हैं| उनका कहना हैं गोर्स से ही गोर्सी बना हैं| गोर्सी गोत्र भी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत में मिलता हैं। [103]

खटाना: संख्या और क्षेत्र विस्तार की दृष्टी से खटाना गुर्जरों का एक राजसी गोत्र हैं| अफगानिस्तान में यह एक प्रमुख गुर्जर गोत्र हैं| पाकिस्तान स्थित झेलम गुजरात में खाटाना सामाजिक और और आर्थिक बहुत ही मज़बूत हैं| पाकिस्तान के गुर्जरों में यह परंपरा हैं कि हिन्द शाही वंश के राजा जयपाल और आनंदपाल खटाना थे| आज़ादी के समय भारत में झाँसी स्थित समथर राज्य के राजा खटाना गुर्जर थे, ये परिवार भी अपना सम्बंध पंजाब के शाही वंश के जयपाल एवं आनंदपाल से मानते हैं और अपना आदि पूर्वज कैद राय को मानते हैं| राजस्थान में पंजाब से आये खटाना को एक वर्ग को तुर्किया भी बोलते हैं| पाकिस्तान में हज़ारा रियासत भी खटाना गोत्र की थी। [104] [105]

खटाना गुर्जर संभवतः मूल रूप से चीन के तारिम घाटी स्थित खोटान के मूल निवासी हैं| खोटान का कुषाणों के इतिहास से गहरा सम्बन्ध हैं| यूची-कुषाण मूल रूप से चीन स्थित तारिम घाटी के निवासी थे| खोटान भी तारिम घाटी में ही स्थित हैं| हिंग-नु कबीले से पराजित होने के कारण यूची-कुषाणों को तारिम घाटी क्षेत्र छोड़ना पड़ा| किन्तु कुशाण सम्राट कनिष्क महान ने चीन को पराजित कर तारिम घाटी के खोटान, कशगर और यारकंद क्षेत्र को दोबारा जीत लिया था| यहाँ भारी मात्रा में कुषाणों के सिक्के प्राप्त हुए हैं| कनिष्क के सहयोगी खोटान नरेश विजय सिंह को तिब्बती ग्रन्थ में खोटाना राय लिखा गया हैं। [106]

सभवतः खटाना गोत्र का सम्बन्ध किदार कुषाणों से हैं| समथर रियासत के खटाना राजा अपना आदि पूर्वज पंजाब के राजा कैदराय को मानते हैं| कैदराय संभवतः किदार तथा राय शब्द से बना हैं| किदार कुषाणों का पहला राजा भी किदार था| [107] यह शोध का विषय हैं की किदार कुषाणों के पहले शासक किदार का कोई सम्बन्ध खोटान या खोटाना राय विजय सिंह था या नहीं?

नेकाडी: राजस्थान के गुर्जरों में नेकाड़ी धार्मिक दृष्टी से पवित्रतम गोत्र माना जाता हैं| अफगानिस्तान और भारत में नेकाड़ी गोत्र पाया जाता हैं| राजस्थान के गुर्जरों में इसे विशेष आदर की दृष्टी से देखा जाता हैं| नेकाड़ी मूलतः चेची माने जाते हैं|

बरगट : बरगट गोत्र अफगानिस्तान और भारत के राजस्थान इलाके में पाया जाता हैं|

कसाना/कषाणा अलेक्जेंडर कनिंघम ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, खंड IV, 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है| अपनी इस धारणा के पक्ष में कहते हैं कि आधुनिक गुर्जरों का कसाना गोत्र कुषाणों का प्रतिनिधि हैं| अलेक्जेंडर कनिंघम बात का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि गुर्जरों का कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से सबसे बड़ा है। कसाना गौत्र अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैला हुआ है| कसानो के सम्बंध में पूर्व में ही काफी कहा चुका है। [108]

देवड़ा/दीवड़ा गुर्जरों की इस खाप के गाँव गंगा जमुना के ऊपरी दोआब के मुज़फ्फरनगर क्षेत्र में हैं| कैम्पबेल ने भीनमाल नामक अपने लेख में देवड़ा को कुषाण सम्राट कनिष्क की देवपुत्र उपाधि से जोड़ा हैं। [109]

दीपे/दापा : गुर्जरों की इस खाप की आबादी कल्शान और देवड़ा खाप के साथ ही मिलती हैं तथा तीनो खाप अपने को एक ही मानती हैं| शादी-ब्याह में खाप के बाहर करने के नियम का पालन करते वक्त तीनो आपस में विवाह भी नहीं करते हैं और आपस में भाई माने जाते हैं| संभवतः अन्य दोनों की तरह इनका सम्बन्ध भी कुषाण परिसंघ से हैं|

कपासिया : गुर्जरों की कपासिया खाप का निकास कुषाणों की राजधानी कपिशा (बेग्राम) से प्रतीत होता हैं| कपसिया खाप के, गंगा जमुना के ऊपरी दोआब स्थित बुलंदशहर क्षेत्र में १२ गाँव हैं|

बैंसला : गुर्जरों की बैंसला खाप का नाम संभवतः कुषाण सम्राट की उपाधि से आया हैं| कुषाण सम्राट कुजुल कडफिस ने ‘बैंसिलिओ’ उपाधि धारण की थी| कनिष्क ने यूनानी उपाधि ‘बैसिलिअस बैंसिलोंन’ (Basilius Basileon) धारण की थी, जिसका अर्थ हैं राजाओ का राजा (King of King)| जैसा की सर्व विदित हैं की कुषाणों पर उनके बैक्ट्रिया प्रवास के समय यूनानी भाषा और संसकृति का अत्याधिक प्रभाव पड़ा | अतः बैंसला यूनानी मूल का शब्द हैं जिसका अर्थ हैं राजा| सम्भव हैं बैसला खाप का सम्बन्ध भी कुषाणों के राजसी वर्ग से रहा हैं| इस खाप के दिल्ली के समीप लोनी क्षेत्र १२ गाँव तथा पलवल क्षेत्र में २४ गाँव हैं। [110]

मुंडन : गुर्जरों के मुंडन गोत्र का सम्बन्ध संभवतः कुषाण सम्राटो को उपाधि मुरुंड (lMurunda) से हैं जिसका अर्थ हैं – स्वामी| गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के इलाहबाद अभिलेख में भी पश्चिमिओत्तर भारत में देवपुत्र शाह्नुशाही शक मुरुंड शासको का ज़िक्र हैं| प्राचीन काल में बिहार में भी मुरुंड वंश के शासन का पता चलता हैं| वर्तमान में गंगा जमुना का ऊपरी दोआब में मुंडन गुर्जर पाए जाते हैं| मंडार, मौडेल और मोतला खाप का सम्बंध मुंडन खाप से हैं|

मीलू : कुषाणों की एक उपाधि मेलूं (Melun) भी थी|गुर्जरोंके मीलू गोत्र का सम्बन्ध कुषाण सम्राट की उपाधि मेलूं से प्रतीत होता हैं| यह गोत्र प्रमुख रूप से पंजाब में पाया जाता हैं|

दोराता : गुर्जरों की दोरता खाप का सम्बंध कुषाण सम्राट कनिष्क की दोमराता (Domrata- Law of the living word) उपाधि से प्रतीत होता हों| वर्तमान में खाप राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पायी जाती हैं|

चांदना : चांदना कनिष्क की महत्वपूर्ण उपाधि थी | वर्तमान में गुर्जरों में चांदना गोत्र राजस्थान में पाया जाता हैं| गुर्जरों के असली घर माने जाने वाले कसाना और खटाना का उच्चारण का अंत ना से होता हैं तथा एक-आध अपवाद को छोड़कर ये गोत्र अन्य जातियों में भी नहीं पाए जाते हैं। [111] स्थान भेद के कारण अनेक बार ना को णा भी उच्चारित किया जाता हैं, यानि कसाना को कसाणा और खटाना को खटाणा|  इसी प्रकार के उच्चारण वाले गुर्जरों के अनेक गोत्र हैं, जैसे- अधाना, भडाना, हरषाना, सिरान्धना, करहाना, रजाना, फागना, महाना, अमाना, करहाना, अहमाना, चपराना/चापराना, रियाना, अवाना, चांदना आदि|  संख्या बल की दृष्टी से ये गुर्जरों के बड़े गोत्र हैं| सभवतः इन सभी खापो का सम्बन्ध कुषाण परिसंघ से रहा हैं| | स्वयं कनिष्क की एक महतवपूर्ण उपाधि चांदना थी| कुषाण कालीन अबोटाबाद अभिलेख में गशुराना उपाधि का प्रयोग हुआ हैं| स्पष्ट हैं कि गशुराना शब्द यहाँ गशुर और राना शब्द से मिलकर बना हैं| संभवतः राना अथवा राणा उपाधि के प्रयोग का यह प्रथम उल्लेख हैं| अतः संभव हैं कि गुर्जरों के ना अथवा णा से अंत होने वाले गोत्र नामो में राना/राणा शब्द समाविष्ट हैं| चपराना गोत्र में तो राना पूरी तरह स्पष्ट हैं| मेरठ क्षेत्र में करहाना और कुछ चपराना गुर्जर गोत्र नाम केवल राणा लिखते हैं| कुषाण कालीन अबोटाबाद अभिलेख में यदि शाफर के लिए गशुराना उपाधि का प्रयोग हुआ हैं तो दसवी शताब्दी के  खजराहो अभिलेख में कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार शासक के लिए गुर्जराणा उपाधि का प्रयोग किया गया हैं| अतः कुषाणों के गुशुर/गशुर/गौशुर वर्ग से गुर्जर उत्पत्ति हुई है। [112]

सन्दर्भ[संपादित करें]

पुस्तक[संपादित करें]

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अन्य सन्दर्भ[संपादित करें]

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संदर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

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