प्रवचनसार

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प्रवचनसार आचार्य कुन्दकुन्द की एक [1]महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है यह समयसार के बाद की रचना है तथा सीमंधर स्वामी के समवसरण से लौटने के [2]पश्चात उनके प्रवचनों का सार के रूप में लिखी गई कृति है इसलिए इसका नाम भी प्रवचनसार रखा गया है यह तीन भागों में विभक्त है।

सन्दर्भ[संपादित करें]