मानतुंग

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मानतुंग आचार्य सातवी शताब्दी के जैन मुनी थे। जो श्री भक्तामर स्तोत्र के निर्माता है। आचार्य मानतूंग मध्य प्रदेश के धारा नगरी से १०० किलो मीटर के अंतर पर एक शिखर कि चोटी पर जाकर सदा के लिये ध्यानस्त हो गए। और वही पर उनको मोक्ष कि प्राप्ती हुई। आज उस शिखर को मानतुंगगिरि के नाम से जाना जाता है।

जीवनी[संपादित करें]

मानतुंग आचार्य इसवी सन सातवी शताब्दी के जैन मुनी थे। जो भक्तामर स्तोत्रके निर्माता है। जिनके समय भोपाल नगरी पर राजा भोज राज्य करते थे। एक बार राजा भोज को मानतुंग आचार्य के अपने राज्य मे आने कि खबर मिली तो उन्होने आचार्यजी को भोजन(आहार) के लिये महल मे आने का निवेदन किया,वो अपना राजपाठ आचार्यजी को दिखाना चाहते थे। ये बात आचार्यजी के ध्यान मे आ गई। उन्होने आने से मना कर दिया। इस बात से राजा भोज क्रोधीत हो गए उन्होने आदेश दिया कि आचार्यजी को बंदी बना लिया जाए। सैनिको ने आचार्यजी को बंदी बना लिया। फिर राजा भोज उनसे मिलने गए। उन्होने आचार्यजी से कहा कि आपको किस बात का अहंकार है,मैं आपका अहंकार अभी तोडता हूं ऐसा कहकर उसने सैनिको को आदेश दिया कि, आचार्यजी को ४८(48) अंधेरे कमरो मे बंद किया जाये। आचार्यजी मुस्कुराये और राजा को कुछ नही कहा। उनको एक के अंदर एक ४८(48) कमरो मे बंद कीया गया। और हर कमरे को ताला लागाया गया। और सबसे अंदर के कमरे मे आचार्यजी को लोहे की जंजीर से बांधा गया।

आचार्यजी ने वहा पर भक्तामर स्तोत्र लिखना शुरु किया,तो एक के बाद एक ताले खुलने/(टूटने) लगे। आचार्यजी ने भक्तामर स्तोत्र मे पुरी ४८(48) कडीयां लिखी जिसमे उन्होने भगवान आदिनाथ कि स्तुती लिखी। इससे ना सिर्फ आचार्यजी को बंद किये हुए कमरो के ताले खुले बल्कि राजा भोज का सिंघासन भी हडकंप मचाने लगा। ये देख राजा डर गया उसकी समझ मे आ गया कि ये सब उसकी गलति का नतिजा है। उसने तुरंत ही आचार्यजी से माफी मांगी और सम्मान पूर्वक उनको भोजन कराया। कहते है कि जो भी भक्तामर स्तोत्र को भक्ती भावसे पढता है उसके सारे पापों का नाश होता है।

बादमे आचार्य मानतूंग महाराष्ट्रमे धुले शहर से १०० किलो मीटर के अंतर पर एक शिखर कि चोटी पर जाकर सदा के लिये ध्यानस्त हो गए। और वही पर उनको मोक्ष कि प्राप्ती हुई। आज उस शिखर को मांगीतुंगी के नाम से जाना जाता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

सूत्रों[संपादित करें]