भद्रबाहु
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आचार्य भद्रबाहु स्वामी/सूरि | |
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चन्द्रगुप्त मौर्य (बाएँ) तथा भद्रबाहु (दायें) की मूर्ति (चन्द्रगुप्त बसदी में) | |
| व्यक्तिगत जीवन | |
| जन्म | 367 ईसापूर्व |
| मृत्यु | 298 ईसापूर्व |
| उल्लेखनीय रचना(एँ) | उवसग्गहरम् स्तोत्र, कल्पसूत्र |
| धार्मिक जीवन | |
| धर्म | जैन धर्म |
| लघुपंथ | दिगम्बर तथा श्वेताम्बर |
| दीक्षा | by गोवर्धन महामुनि (दिगम्बर) by आचार्य यशोभद्रसूरि (श्वेताम्बर) |
| धार्मिक पेशा | |
| उत्तराधिकारी | आचार्य विशाख (दिगम्बर) आचार्य स्थूलभद्रसूरि (श्वेताम्बर) |
| Ascetics initiated | चन्द्रगुप्त मौर्य (दिगम्बर) Sthavir Godas, Sthavir Agnidatt, Sthavir Yagnadatt, Sthavir Somdatt (Śvetāmbara) |
भद्रबाहु सुप्रसिद्ध जैन आचार्य थे। इतिहास में कई भद्रबाहु नाम से कई जैन आचार्य हुए है।
परिचय
[संपादित करें]जैन आगमों को व्यवस्थित करने के लिए जैन श्रमणों का एक सम्मेलन पाटलिपुत्र में बुलाया गया। जैन आगमों के ११ अंगों का तो संकलन कर लिया गया लेकिन १२वाँ अंग दृष्टवाद चौदह पूर्वो के ज्ञाता भद्रबाहु के सिवाय और किसी को स्मरण नहीं था। लेकिन भद्रबाहु उस समय नेपाल में थे। ऐसी परिस्थित में पूर्वो का ज्ञान संपादन करने के लिए जैन संघ की ओर से स्थूलभद्र आदि साधुओं को नेपाल भेजा गया और भद्रबाहु ने स्थूलभद्र को पूर्वो की शिक्षा दी।