यम

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"यम" महर्षि पतञ्जलि कृत योग-सूत्र के आठ अंङ्गों में पहला है। संस्कृत भाषा में यम का शाब्दिक अर्थ नियन्त्रित या अनुशासित करना है। योगसूत्र में साधनपाद के तीसवें सूत्र में महर्षि पतंजलि कहते हैं, "अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः" अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का समुच्चय यम कहलाता है। स्वामी विवेकानंद की पुस्तक राजयोग में वे कहते हैं, "राजयोग आठ अंगों में विभक्त है। पहला है यम–अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। ... यम और नियम के दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरम्भ कर देते हैं। इनके न रहने पर साधना का कोई फल न होगा।"[1]

कूर्म पुराण के एकादश अध्याय के अनुसार, "यम का अर्थ है–अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इस यम से चित्तशुद्धि होती है। शरीर, मन और वचन के द्वारा कभी किसी प्राणी की हिंसा न करना या उन्हें क्लेश न देना–यह अहिंसा कहलाता है। अहिंसा से बढ़कर और धर्म नहीं। मनुष्य के लिए जीव के प्रति यह अहिंसा-भाव रखने से अधिक और कोई उच्चतर सुख नहीं है। सत्य से सब कुछ मिलता है, सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है। यथार्थ कथन को ही सत्य कहते हैं। चोरी से या बलपूर्वक दूसरे की चीज को न लेने का नाम है–अस्तेय। तन-मन-वचन से सर्वदा सब अवस्थाओं में मैथुन का त्याग ही ‘ब्रह्मचर्य’ है। अत्यंत कष्ट के समय में भी किसी मनुष्य से कोई उपहार ग्रहण न करने को ‘अपरिग्रह’ कहते हैं। अपरिग्रह-साधना का उद्देश्य यह है कि किसी से कुछ लेने से हृदय अपवित्र हो जाता है, लेने वाला हीन हो जाता है, वह अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है और बद्ध एवं आसक्त हो जाता है।"[2]

महर्षि पतंजलि द्वारा योगसूत्र में वर्णित पाँच यम
  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. अस्तेय
  4. ब्रह्मचर्य
  5. अपरिग्रह
शान्डिल्य उपनिषद तथा स्वात्माराम द्वारा वर्णित दस यम
  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. अस्तेय
  4. ब्रह्मचर्य
  5. क्षमा
  6. धृति
  7. दया
  8. आर्जव
  9. मितहार
  10. शौच
  1. विवेकानंद, स्वामी. "राजयोग द्वितीय अध्याय – साधना के प्राथमिक सोपान".
  2. विवेकानंद, स्वामी. "संक्षेप में राजयोग".