हठयोग प्रदीपिका

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हठयोगप्रदीपिका हठयोग से सम्बन्धित प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके रचयिता गुरु गोरखनाथ के शिष्य स्वामी स्वात्माराम थे। यह हठयोग के प्राप्त ग्रन्थों में सर्वाधिक प्रभावशाली ग्रन्थ है। हठयोग के दो अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं - घेरण्ड संहिता तथा शिव संहिता। इस ग्रन्थ की रचना १५वीं शताब्दी में हुई।

इस ग्रन्थ की कई पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हैं जिनमें इस ग्रन्थ के कई अलग-अलग नाम मिलते हैं। वियना विश्वविद्यालय के ए सी वुलनर पाण्डुलिपि परियोजना के डेटाबेस के अनुसार इस ग्रंथ के निम्नलिखित नाम प्राप्त होते हैं-

हठयोगप्रदीपिका, हठप्रदीपिका, हठप्रदी, हठ-प्रदीपिका [1]

इसमें चार अध्याय हैं जिनमें आसन, प्राणायाम, चक्र, कुण्डलिनी, बन्ध, क्रिया, शक्ति, नाड़ी, मुद्रा आदि विषयों का वर्णन है। यह सनातन हिन्दू योगपद्धति का अनुसरण करती है और श्री आदिनाथ (भगवान शंकर) के मंगलाचरण से आरम्भ होती है। इसके चार उपदेशों ९अध्यायों) के नाम ये हैं-

प्रथमोपदेशः

यह प्रथम लेखक अपनी परंपरा के संतों का स्मरण करते हैं

जो नाथ योगी थे जिनकी संख्या ८४ है

इसके बाद योग के अभ्यास के लिए शान्त हरे भरे वातावरण

जो एकांतिक हो को इंगित करते हैं।

सुराज्ये धार्मिके देशे सुभिक्षे निरुपद्रवे । धनुः प्रमाण-पर्यन्तं शिलाग्नि-जल-वर्जिते । एकान्ते मठिका-मध्ये स्थातव्यं हठ-योगिना ॥ १२॥ अल्प-द्वारमरन्ध्र-गर्त-विवरं नात्युच्च-नीचायतं सम्यग्-गोमय-सान्द्र-लिप्तममलं निःशेस


क्रमश बाधक तत्व बताते हैं


अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः । जन-सङ्गश्च लौल्यं च षड्भिर्योगो विनश्यति ॥ १५॥

साधक तत्व जो छह है



उत्साहात्साहसाद्धैर्यात्तत्त्व-ज्ञानाश्च निश्चयात् । जन-सङ्ग-परित्यागात्षड्भिर्योगः प्रसिद्ध्यति ॥ १६॥


यम-नियमाः

यम जो दश है

अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं क्षमा धृतिः । दयार्जवं मिताहारः शौचं चैव यमा दश ॥ १७॥

नियम जो दस है

तपः सन्तोष आस्तिक्यं दानमीश्वर-पूजनम् । सिद्धान्त-वाक्य-श्रवणं ह्रीमती च तपो हुतम् । नियमा दश सम्प्रोक्ता योग-शास्त्र-विशारदैः ॥ १८॥

अथ आसनम्

आसन ने स्थिरता व लाघव लाभ होता है व

क्रमशः

स्वस्तिक

गोमुख

वीरासन

कुर्मासन

कुकूटासन

उत्ता नकुर्म

धनुरासन

मत्स्येंद्र

पश्चिोत्तानासन

मयूरासन बताए गए

८४ आसन में ४ मुख्य है

सिद्धासनं

पदमासन

सिंह आसन

भद्र आसन मुख्य है

सिद्धासनं में थोड़े परिवर्तन से वज्र मुक्त व गुप्त आसन

भी बताए इस प्रकार 18 हो गए।

आहार

मुख्यता से शाकहार है दूध मीठे रसमय पदार्थ निर्दिष्ट हैं

गोधूम-शालि-यव-षाष्टिक-शोभनान्नं क्षीराज्य-खण्ड-नवनीत-सिद्धा-मधूनि । शुण्ठी-पटोल-कफलादिक-पञ्च-शाकं मुद्गादि-दिव्यमुदकं च यमीन्द्र-पथ्यम् ।

द्वितीय उपदेश

इसमें

प्राणों पर नियंत्रण से मन वश होता है इस हेतु

नाड़ी शुद्धि हेतु अनुलोम विलोम प्राणयाम को 3 मास तक रोज़ कई घंटे अभ्यास को कहा गया।

षट्-कर्माणि

कफ से होने वाले रोग व घट निर्मलता के लिए

षट्-कर्म बताए जो हैं

धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा ।

कपाल-भातिश्चैतानि षट्-कर्माणि प्रचक्षते ॥ 2.22

फिर आठ कुंभक बताए जो है

अथ कुम्भक-भेदाः

सूर्य-भेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतली तथा ।

भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्ट-कुम्भकाः ॥ ४४

तृतीय उपदेश

इसमें मुद्राएं वर्णित है जो है

महामुद्रा महाबंधो महावेधश्च, खेचरी।

उड्यान मूलबन्धश्च बंधो जालन्धरमिघ:।।

करणी विपरीताख्या बज्रोली शक्ति चालनम्।

इंदहि मुद्रादशंक जरामरण नाशनम्।।3.

व विस्तार से वर्णन है

चतुर्थ उपदेश

इसमें शांभवी खेचरी मुद्रा वर्णन कर

चार अवस्था व ग्रन्थि वर्णन है

आरम्भश्च घटश्चैव तथा परिचयोऽपि च । निष्पत्तिः सर्व-योगेषु स्यादवस्था-चतुष्टयम् ॥४. ६९

चार ग्रंथि

ब्रह्मा विष्णु हृदय व रुद्र बताई गई


सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. University of Vienna. "Svātmārāma - Collected Information". A Study of the Manuscripts of the Woolner Collection, Lahore. University of Vienna. Retrieved 24 March 2014. See, e.g., the work of the members of the Modern Yoga Research cooperative

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]