नियम

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योग के सन्दर्भ में, स्वस्थ जीवन, आध्यात्मिक ज्ञान, तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिये आवश्यक आदतों एवं क्रियाकलापों नियम को कहते हैं। महर्षि पतंजलि की अष्टांग-योग व्यवस्था में नियम आठ में से दूसरा चरण है।

स्वामी विवेकानंद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक राजयोग में इस विषय पर विशेष प्रकाश डाला है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं, "तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच और ईश्वरप्रणिधान–इन्हें नियम कहते हैं। ‘नियम’ शब्द का अर्थ है नियमित अभ्यास और व्रत-परिपालन। व्रतोपवास या अन्य उपायों से देह-संयम करना शारीरिक तपस्या कहलाता है। वेद-पाठ या दूसरे किसी मंत्रोच्चारण को सत्त्वशुद्धिकर ‘स्वाध्याय’ कहते हैं। मंत्र जपने के लिए तीन प्रकार के नियम हैं–वाचिक, उपांशु और मानस। वाचिक से उपांशु जप श्रेष्ठ है और उपांशु से मानस-जप। जो जप इतने ऊँचे स्वर से किया जाता है कि सभी सुन सकते हैं, उसे वाचिक-जप कहते हैं। जिस जप में ओठों का स्पंदन मात्र होता है, पर पास रहने वाला कोई मनुष्य सुन नहीं सकता, उसे उपांशु कहते हैं। और जिसमें किसी शब्द का उच्चारण नहीं होता, केवल मन-ही-मन जप किया जाता है और उसके साथ उस मन्त्र का अर्थ स्मरण किया जाता है, उसे मानसिक-जप कहते हैं। यह मानसिकजप ही श्रेष्ठ है। ऋषियों ने कहा है–शौच दो प्रकार के हैं–बाह्य और आभ्यन्तर। मिट्टी, जल या दूसरी वस्तुओं से शरीर को शुद्ध करना बाह्यशौच कहलाता है, जैसे–स्नानादि। सत्य एवं अन्यान्य धर्मों के पालन से मन की शुद्धि को आभ्यन्तरशौच कहते हैं। बाह्य और आभ्यन्तर दोनों ही शुद्धि आवश्यक है। केवल भीतर में पवित्र रहकर बाहर में अशुचि रहने से शौच पूरा नहीं हुआ। जब कभी दोनों प्रकार के शौच का अनुष्ठान करना संभव न हो, तब अभ्यन्तरशौच का अवलम्बन ही श्रेयस्कर है। पर ये दोनों शौच हुए बिना कोई भी योगी नहीं बन सकता। ईश्वर की स्तुति, स्मरण और पूजार्चनारूप भक्ति का नाम ‘ईश्वरप्रणिधान’ है।"[1]

स्वामी विवेकानंद के मतानुसार "नियम" के ठीक-ठीक पालन के बिना योग साधना का सकारात्मक परिणाम मिलना सम्भव नहीं है। इस बारे में वे कहते हैं, "यम और नियम चरित्र-निर्माण के साधन हैं। इनको नींव बनाए बिना किसी तरह की योग-साधना सिद्ध न होगी। यम और नियम के दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरम्भ कर देते हैं। इनके न रहने पर साधना का कोई फल न होगा।"[2]

महर्षि पतंजलि द्वारा योगसूत्र में वर्णित पाँच नियम-
  1. शौच
  2. सन्तोष
  3. तपस
  4. स्वाध्याय
  5. ईश्वरप्रणिधान
हठयोगप्रदीपिका में वर्णित दस नियम-
  1. तपस
  2. सन्तोष
  3. आस्तिक्य
  4. दान
  5. ईश्वरपूजन
  6. सिद्धान्तवाक्यश्रवण
  7. हृ
  8. मति
  9. जाप
  10. हुत

यम की ही तरह नियम भी योग का एक आवश्यक अंग है। नियम पालन के अभाव में अन्य योगांगों में सफलता मिलना बहुत ही कठिन माना गया है।

  1. विवेकानंद, स्वामी. "अष्टम अध्याय – संक्षेप में राजयोग".
  2. विवेकानंद, स्वामी. "राजयोग द्वितीय अध्याय – साधना के प्राथमिक सोपान".