अत्रि
| अत्रि | |
|---|---|
|
अत्रि के के आश्रम में राम | |
| जीवनसाथी | अनुसूया |
| बच्चे | महर्षि दतात्रेय ( विष्णु के अवतार) , महर्षि दुर्वासा ( शिव के अवतार) और चंद्रदेव ( ब्रह्मा के अवतार ) |
अत्रि एक वैदिक ऋषि हैं जिन्होंने इंद्र, अग्नि, वरुण और अन्य वैदिक देवताओं के लिए ऋचाओं की रचना की थी। वे सप्तर्षियों (सात ऋषियों) में से एक ऋषि हैं। अत्रि (= अ + त्रि) का अर्थ है जो तीनों गुणों - सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से परे हो। अत्रि मुनि अन्य सप्तर्षियों की भाँति ब्रह्मा के मानस पुत्र थे और उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के नेत्र से हुई बताई जाती है। इन्होंने ने ही इंद्र, अग्नि, वरुण और अन्य वैदिक देवताओं के लिए ऋचाओं की रचना की थी। महर्षि अत्रि के विषय में सर्वाधिक वर्णन ऋग्वेद में किया गया है। ऋग्वेद का पंचम मंडल 'अत्रि मंडल', कल्याण सूक्त, स्वस्ति सुक्त अत्रि द्वारा रचित है। यह सूक्त मांगलिक कार्य, शुभ संस्कारों तथा पूजा अनुष्ठान में पाठ किया जाता है। महर्षि अत्रि का उल्लेख पुराणों तथा रामायण और महाभारत में भी किया गया है। श्रीराम अपने वनवास काल में भार्या सीता तथा बन्धु लक्ष्मण के संग अत्रि ऋषि के चित्रकूट आश्रम में आए थे। अत्रि ऋषि सती अनुसूया के पति थे। अत्रि गोत्र भार्गव ब्राह्मणों की शाखा है।
महर्षि अत्रि को त्याग, तपस्या और संतोष से युक्त ऋषि कहा जाता है। अत्रि ने चिकित्सा ज्योतिष पर कार्य किया। इसके साथ ही अत्रिसंहिता की रचना की। महर्षि अत्रि को मंत्र की रचना करने वाले और उसके भेद को जानने वाला भी कहा गया है। अपनी त्रिकाल दृष्टा शक्ति से इन्होंने धार्मिक ग्रंथों की रचना भी की और साथ ही इनकी कथाओं द्वारा चरित्र का सुन्दर वर्णन किया गया है। महर्षि अत्रि का बौद्धिक, मानसिक ज्ञान, कठोर तप, उचित धर्म आचरण युक्त व्यवहार एवं मन्त्रशक्ति के जानकार के रुप में सदैव स्मरण किया जाता है।
महर्षि अत्रि ग्रहण के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सबसे पहले ग्रहण सम्बन्धी ज्ञान हुआ। फिर इसका ज्ञान इन्होंने अन्य लोगों को दिया। ऋग्वेद के अनुसार ऋषि अत्रि को ग्रहण का श्रेष्ठ ज्ञान था। धरती पर कृषि की उन्नति के लिए अत्रि ऋषि को जाना जाता है। अत्रि ऋषि ने कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। आयुर्वेद के क्षेत्र में भी अत्रि महर्षि का योगदान है। इन्होंने आयुर्वेद में अनेक योगों का निर्माण किया। देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमारों ने ऋषि अत्रि को वरदान दिया था। ऋग्वेद में भी इस विषय में विस्तारपूर्वक एक कथा भी मिलती है। अश्विनी कुमारों ने ऋषि अत्रि को यौवन प्राप्ति का वरदान दिया था और उन्हें नव यौवन प्राप्त कैसे किया जाए इस विधि का ज्ञान भी दिया था।
महर्षि अत्रि कृत दो ग्रंथों का उल्लेख मिलता है- अत्रि संहिता और अत्रि स्मृति। अत्रि संहिता में नौ अध्याय तथा चार सौ श्लोक हैं। साथ ही लध्वगि स्मृति, बहदागेय स्मृति ग्रंथों की जानकारी भी मिलती है। वास्तुशास्त्र पर एक ग्रंथ की रचना भी महर्षि अत्रि ने की थी। अत्रि संहिता एक विख्यात ग्रंथ है। महर्षि अत्रि ने 'अत्रि संहिता' में बहुत से ऎसे विषयों पर विचार किया है जो मनुष्य के सामाजिक एवं आत्मिक उत्थान से संबंध रखती है।[1]