पुलस्त्य

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पुलस्त्य
हिंदू पौराणिक कथाओं के पात्र
नाम: पुलस्त्य
अन्य नाम: {{{अन्य नाम}}}
संस्कृत वर्तनी: पुलस्त्य ऋषि
संदर्भ ग्रंथ: विष्णु पुराण
उत्त्पति स्थल: {{{उत्त्पति स्थल}}}
परिचय: सप्तर्षिगणों में से एक ऋषि
माता और पिता: ब्रह्मा के मानस पुत्र
पुत्र: महर्षि अगस्त्य, ऋषि विश्रवा

पुलस्त्य या पुलस्ति (सिंहली: පුලස්ති/पुलस्ति, थाई: ท้าวจตุรพักตร์) हिन्दू पौराणिक कथाओं के एक पात्र हैं। ये कथाएँ इन्हें ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक बताती हैं।[1] ये इन्हें प्रथम मन्वन्तर के सात सप्तर्षियों में से एक भी बताती हैं।[2] विष्णुपुराण के अनुसार ये ऋषि उन लोगों में से एक हैं जिनके माध्यम से कुछ पुराण आदि मानवजाति को प्राप्त हुए। इसके अनुसार इन्होंने ब्रह्मा से विष्णु पुराण सुना था और उसे पराशर ऋषि को सुनाया, और इस तरह ये पुराण मानव जाति को प्राप्त हुआ। ये आदिपुराण का मनुष्यों में प्रचार करने का श्रेय भी इन्हें देता है।

हिन्दू धर्म ग्रंथ पुलस्त्य के वंश के बारे में ये कहते हैं (यह सारांश है):

पुलस्त्य ऋषि के पुत्र हुए विश्रवा, कालान्तर में जिनके वंश में कुबेर एवं रावण आदि ने जन्म लिया तथा राक्षस जाति को आगे बढ़ाया। पुलस्त्य ऋषि का विवाह कर्दम ऋषि की नौ कन्याओं में से एक से हुआ जिनका नाम हविर्भू था। उनसे ऋषि के दो पुत्र उत्पन्न हुए -- महर्षि अगस्त्य एवं विश्रवा। विश्रवा की दो पत्नियाँ थीं - एक थी राक्षस सुमाली एवं राक्षसी ताड़का की पुत्री कैकसी, जिससे रावण, कुम्भकर्ण तथा विभीषण उत्पन्न हुए, तथा दूसरी थी इलाविडा- जिसके कुबेर उत्पन्न हुए। इलाविडा चक्रवर्ती सम्राट तृणबिन्दु की अलामबुशा नामक अपसरा से उत्पन्न पुत्री थी। ये वैवस्वत मनु श्राद्धदेव के वंशावली की कड़ी थे। इन्होंने अपने एक यज्ञ में केवल स्वर्ण पात्रों का ही उपयोग किया था एवं ब्रह्मा को इतना दान दिया कि वे उसे ले जा भी न पाये और काफ़ी कुछ वहीं छोड़ गये। उसी बचे हुए स्वर्ण से, जो कालान्तर में युधिष्ठिर को मिला, उन्होंने भी यज्ञ किया। तृणबिन्दु मारुत की वंशावली में आते थे।

तुलसीदास ने रावण के संबंध में उल्लेख करते हुए लिखा है- : उत्तम कुल पुलस्त्य कर गाती। विश्रवा के दो पत्नियाँ थीं, बड़ी से कुबेर हुए और छोटी से रावण तथा उसके दो भाई।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. [http://www.sacred-texts.com/hin/m02/m02011.htm Narada said..] [[Mahabharata|The Mahabharata]] translated by [[Kisari Mohan Ganguli]] (1883 -1896), Book 2: Sabha Parva: Lokapala Sabhakhayana Parva, section:XI. '''p. 25''' And Daksha, Prachetas, Pulaha, Marichi, the master Kasyapa, Bhrigu, Atri, and Vasistha and Gautama, and also Angiras, and Pulastya, Kraut, Prahlada, and Kardama, '''these Prajapatis''', and Angirasa of the Atharvan Veda, the Valikhilyas, the Marichipas; Intelligence, Space, Knowledge, Air, Heat, Water, Earth, Sound, Touch, Form, Taste, Scent; Nature, and the Modes (of Nature), and the elemental and prime causes of the world,--all stay in that mansion beside the lord Brahma. And Agastya of great energy, and Markandeya, of great ascetic power, and Jamadagni and Bharadwaja, and Samvarta, and Chyavana, and exalted Durvasa, and the virtuous Rishyasringa, the illustrious 'Sanatkumara' of great ascetic merit and the preceptor in all matters affecting Yoga..."
  2. [http://www.sacred-texts.com/tantra/maha/maha00.htm Inhabitants of the Worlds] Mahanirvana Tantra, translated by Arthur Avalon, ([[John Woodroffe|Sir John Woodroffe]]), 1913, Introduction and Preface. The Rishi are seers who know, and by their knowledge are the makers of shastra and "see" all mantras. The word comes from the root rish Rishati-prapnoti sarvvang mantrang jnanena pashyati sangsaraparangva, etc. The seven great Rishi or saptarshi of the first manvantara are '''Marichi, Atri, Angiras, Pulaha, Kratu, Pulastya, and Vashishtha'''. In other manvantara there are other ''sapta-rshi''. In the present manvantara the seven are '''Kashyapa''', ''Atri, Vashishtha, Vishvamitra, Gautama, Jamadagni, Bharadvaja''. To the Rishi the Vedas were revealed. Vyasa taught the Rigveda so revealed to Paila, the Yajurveda to Vaishampayana, the Samaveda to Jaimini, Atharvaveda to Samantu, and Itihasa and Purana to Suta. The three chief classes of rishi are the Brahmarshi, born of the mind of Brahma, the Devarshi of lower rank, and Rajarshi or Kings who became rishi through their knowledge and austerities, such as Janaka, Ritaparna, etc. Thc Shrutarshi are makers of Shastras, as Sushruta. The Kandarshi are of the Karmakanda, such as Jaimini.