अवतार

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अवतार का अर्थ अवतरित होना या उतरना है।[1] हिंदू मान्यता के अनुसार जब-जब दुष्टों का भार पृथ्वी पर बढ़ता है और धर्म की हानि होती है तब-तब पापियों का संहार करके भक्तों की रक्षा करने के लिये भगवान अपने अंश अथवा पूर्णांश से पृथ्वी पर शरीर धारण करते हैं।

सुखसागर के अनुसार भगवान विष्णु के चौबीस अवतार[संपादित करें]

  1. सनकादि ऋषि
  2. वराहावतार
  3. नारद मुनि
  4. हंसावतार
  5. नर-नारायण
  6. कपिल
  7. दत्तात्रेय
  8. यज्ञ
  9. ऋषभदेव
  10. पृथु
  11. मत्स्यावतार
  12. कूर्म अवतार
  13. धन्वन्तरि
  14. मोहिनी
  15. हयग्रीव
  16. नृसिंह
  17. वामन
  18. गजेन्द्रोधारावतार
  19. परशुराम
  20. वेदव्यास
  21. राम
  22. कृष्ण
  23. बुद्ध
  24. कल्कि


  1. भगवान ने कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार नामक ब्रह्मऋषियों के रूप में अवतार लिया। यह उनका पहला अवतार था।
  2. पृथ्वी को रसातल से लाने के लिये भगवान ने वराह के रूप में अवतार लिया तथा हिरण्याक्ष का वध किया।
  3. ऋषियों को सात्वततंत्र, जिसे कि नारद पंचरात्र भी कहते हैं और जिसमें कर्म बन्धनों से मुक्त होने का निरूपण है, का उपदेश देने के लिये नारद जी के रूप में अवतार लिया।
  4. हंस के रूप में अवतार लेकर भगवान् ने नारद जी को उपदेश दिया।
  5. धर्म की पत्नी मूर्ति देवी के गर्भ से नर-नारायण, जिन्होंने बदरीवन में जाकर घोर तपस्या की, का अवतरण हुआ।
  6. माता देवहूति के गर्भ से कपिल मुनि के रूप में भगवान् का अवतार हुआ जिन्होंने अपनी माता को सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया।
  7. अनसूया के गर्भ से दत्तात्रेय प्रकट हुए जिन्होंने प्रह्लाद, अलर्क आदि को ब्रह्मज्ञान दिया।
  8. आकूति के गर्भ से यज्ञ नाम से अवतार धारण किया।
  9. नाभिराजा की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के नाम से भगवान का अवतार हुआ। उन्होंने परमहंस के उत्तम मार्ग का निरूपण किया।
  10. राजा पृथु के रूप में भगवान ने अवतार लिया और गौ-रूपिणी पृथ्वी से अनेक औषधियों, रत्नों तथा अन्नों का दोहन किया।
  11. चाक्षुषमन्वन्तर में सम्पूर्ण पृथ्वी के जलमग्न हो जाने पर पृथ्वी को नौका बना कर भावी वैवश्वत मनु की रक्षा करने हेतु भगवान ने मत्स्यावतार लिया।
  12. समुद्र मंथन के समय देवता तथा असुरों की सहायता करने के लिये भगवान ने कच्छप के रूप में अवतार लिया।
  13. भगवान ने धन्वन्तरि के नाम से लिया जिन्होंने समुद्र से अमृत का घट निकाल कर देवताओं को दिया।
  14. मोहिनी का रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाने के लिये भगवान ने अवतार लिया।
  15. ग्राह से गज को बचाने के लिए भगवान् आये। यद्यपि यह अवतार नहीं था क्योंकि अवतार में नया जन्म लिया जाता है या कम से कम अन्य रूप धारण किया जाता है; फिर भी कई जगह इसे भी अवतार मान लिया गया है।
  16. भगवान का नृसिंह के रूप में अवतार हुआ जिन्होंने हिरण्यकशिपु दैत्य को मार कर प्रह्लाद की रक्षा की।
  17. दैत्य बलि को पाताल भेज कर देवराज इन्द्र को स्वर्ग का राज्य प्रदान करने हेतु भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया।
  18. अभिमानी क्षत्रिय राजाओं का इक्कीस बार विनाश करने के लिये परशुराम के रूप में अवतार लिया।
  19. पराशर जी के द्वारा सत्यवती के गर्भ से भगवान ने वेदव्यास के रूप में अवतार धारण किया जिन्होंने वेदों का विभाजन कर के अनेक उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया।
  20. प्रत्येक कल्प में भगवान् व्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाजन कर मानव-कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं।
  21. राम के रूप में भगवान ने अवतार ले कर रावण के अत्याचार से विप्रों, धेनुओं, देवताओं और संतों की रक्षा की।
  22. भगवान ने सम्पूर्ण कलाओं से युक्त कृष्ण के रूप में अवतार लिया।
  23. बुद्ध के रूप में भी भगवान का अवतार हुआ।
  24. कलियुग के अन्त में विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान् का कल्कि अवतार होगा।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • विष्णु (सप्रमाण विवेचन तथा सूची के लिए)

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Monier Monier-Williams (1923). [A Sanskrit-English Dictionary]. Oxford University Press. p. 90.