सोमनाथ मन्दिर

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सोमनाथ मन्दिर
प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ मंदिर

नाम: श्री सोमनाथ
निर्माता: मैत्रक गुर्जर वंश, गुर्जर प्रतिहार वंश
निर्माण
काल :
देवता: शिव
वास्तु
कला:
हिन्दू वास्तुकला
स्थान: वेरावल, सौराष्ट्र गुजरात
सोमनाथ मन्दिर
સોમનાથ મંદિર
सोमनाथ मन्दिर સોમનાથ મંદિર की गुजरात के मानचित्र पर अवस्थिति
सोमनाथ मन्दिर સોમનાથ મંદિર
सोमनाथ मन्दिर
સોમનાથ મંદિર
Location within Gujarat
निर्देशांक: 20°53′16.9″N 70°24′5.0″E / 20.888028°N 70.401389°E / 20.888028; 70.401389निर्देशांक: 20°53′16.9″N 70°24′5.0″E / 20.888028°N 70.401389°E / 20.888028; 70.401389
नाम
मुख्य नाम: सोमनाथ मन्दिर
देवनागरी: सोमनाथ मन्दिर
स्थान
देश: भारत
राज्य: गुजरात
जिला: गीर सोमनाथ
अवस्थिति: वेरावल
वास्तुकला और संस्कृति
प्रमुख आराध्य: सोमनाथ (शिव)
महत्वपूर्ण उत्सव: महा शिवरात्रि
स्थापत्य शैली: गुर्जर स्थापत्य कला
इतिहास
निर्माण तिथि:
(वर्तमान संरचना)
1951 (वर्तमान भवन)
निर्माता: मैत्रक गुर्जर शासक, गुर्जर सम्राट नागभट व मिहिरभोज, गुर्जरेश्वर भीमदेव चालूक्या, सरदार वल्लभभाई पटेल (वर्तमान भवन)
मन्दिर बोर्ड: Shree Somnath Trust of Gujarat
वेबसाइट: somnath.org

सोमनाथ मन्दिर भूमंडल में दक्षिण एशिया स्थित भारतवर्ष के पश्चिमी छोर पर गुजरात नामक प्रदेश स्थित, अत्यन्त प्राचीन व ऐतिहासिक सूर्य मन्दिर का नाम है। यह भारतीय इतिहास तथा हिन्दुओं के चुनिन्दा और महत्वपूर्ण मन्दिरों में से एक है। इसे आज भी भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में माना व जाना जाता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मन्दिर का निर्माण वल्लभी के मैत्रक (बटार) गुर्जर राजाओं ने किया।[1][2] मैत्रक वंश गुर्जरो का प्राचीन वंश है, जिसकी स्थापना गुप्त वंश के एक गुर्जर सेनापति भट्टारक द्वारा 475 ई० में की गयी थी। वल्लभी इनके राज्य की राजधानी थी। इसके बाद गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के संस्थापक गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण किया।[3] इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। इसके बाद गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और गुजरात (समकालिन नाम गुर्जरदेश) के गुर्जर शासक गुर्जरेश भीमदेव चालूक्या ने इसका पुनर्निर्माण कराया।[4] आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२४ में कुछ ५,००० साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। हमेशा विदेशीयो के निशाने और कई बार के हमलो के बाद भी ऐसा ही खडा है।इसका श्रेय इन गुर्जर वीरो को ही जाता है। जिनके गुर्जर साम्राज्यो ने सैकडो वर्षो तक इसके साथ साथ पूरे देश व संस्कृति को बचाए रखा।[5] मैत्रक एक गुर्जर वंश का नाम है । मैत्रक का संस्कृत में अर्थ सूर्य होता है, इतिहासकारो के अनुसार मैत्रक मिहिर से बना शब्द है व जिनके पूर्वज कुषाण गुर्जर थे। व कुषाण गुर्जर साम्राज्य के पतन के बाद गुप्तो के अधीन राज्य किया। मैत्रको ने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद स्वतन्त्र सत्ता प्राप्त की। सम्राट हर्षवर्धन की पुत्री का विवाह गुर्जर नरेश धारासेन मैत्रक से हुआ था। गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक (तृतीय , काल लगभग 720 ई) इस वंश के सबसे प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए । शिलादित्य ने गुजरात से लेकर दक्षिण तक राज्य का विस्तार किया।इनके समय में बेहद प्रबल अरब आक्रमण हुए। मगर वीर गुर्जर सैना के संख्या में कम होने के बावजूद भी अरबो की विशाल व संसाधनो से परिपूर्ण सेना को पराजित कर जीत का डंका बजा देते थे। वर्तमान मे मैत्रक (बटार) गौत्र के गूर्जर भारत और पाकिस्तान दोने देशो मे मौजूद है। भारत मे "बटार गुर्जर" जम्मु-कश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश मे मिलते है। सहारनपुर, उत्तर प्रदेश मे बटारो (मैत्रको) के 52 गांव है।

यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान के इतिहास का प्रतीक रहा है। अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक व पर्यटन स्थल है। मंदिर प्रांगण में रात साढ़े सात से साढ़े आठ बजे तक एक घंटे का साउंड एंड लाइट शो चलता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के इतिहास का बड़ा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है। लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग कर वैकुनठ धाम गए थे। इस कारण इस क्षेत्र का और भी महत्व बढ़ गया।

सोमनाथजी के मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, कार्तिक माह में यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड़ लगती है। इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।

मैत्रक वंश[संपादित करें]

मैत्रक एक गुर्जर वंश का नाम है । मैत्रक का संस्कृत में अर्थ सूर्य होता है, इतिहासकारो के अनुसार मैत्रक मिहिर से बना शब्द है। गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक (तृतीय , काल लगभग 720 ई) इस वंश के सबसे प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए । शिलादित्य ने गुजरात से लेकर दक्षिण तक राज्य का विस्तार किया।इनके समय में बेहद प्रबल अरब आक्रमण हुए। मगर गुर्जर सैना के संख्या में कम होने के बावजूद भी अरबो की विशाल व संसाधनो से परिपूर्ण सेना को पराजित कर अपनी जीत का परचम लहरा देते थे।[6]

इतिहास[संपादित करें]

१८६९ में सोमनाथ मंदिर के अवशेष

सर्वप्रथम सोमनाथ मंदिर का निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक गुर्जर राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण किया। इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२५ में कुछ ५,००० साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। ५०,००० लोग मंदिर के अंदर हाथ जोडकर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिये गये।[7][8]

इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

१९४८ में प्रभासतीर्थ, 'प्रभास पाटण' के नाम से जाना जाता था। इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी। यह जूनागढ़ रियासत का मुख्य नगर था। लेकिन १९४८ के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया। मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा। लेकिन सन १०२६ में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खंडित किया, वह यही आदि शिवलिंग था। इसके बाद प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को १३०० में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया। इसके बाद कई बार मंदिर और शिवलिंग को खंडित किया गया। बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनी सन १०२६ में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था।

सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मंदिर स्थापित है। राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अन्तिम मंदिर बनवाया गया था। सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर ने १९ अप्रैल १९४० को यहां उत्खनन कराया था।

इसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है। सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने ८ मई १९५० को मंदिर की आधारशिला रखी तथा ११ मई १९५१ को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया।[9] नवीन सोमनाथ मंदिर १९६२ में पूर्ण निर्मित हो गया। १९७० में जामनगर की राजमाता ने अपने पति की स्मृति में उनके नाम से 'दिग्विजय द्वार' बनवाया। इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है। सोमनाथ मंदिर निर्माण में पटेल का बड़ा योगदान रहा।

बाणस्तम्भ (इसके शीर्ष में बाण देखिए)

मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है। उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है (आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधितs ज्योतिर्मार्ग)। इस स्तम्भ को 'बाणस्तम्भ' कहते हैं। [10] मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर है।

तीर्थ स्थान और मन्दिर[संपादित करें]

मन्दिर संख्या १ के प्रांगण में हनुमानजी का मंदिर, पर्दी विनायक, नवदुर्गा खोडीयार, महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा स्थापित सोमनाथ ज्योतिर्लिग, अहिल्येश्वर, अन्नपूर्णा, गणपति और काशी विश्वनाथ के मंदिर हैं। अघोरेश्वर मंदिर नं. ६ के समीप भैरवेश्वर मंदिर, महाकाली मंदिर, दुखहरण जी की जल समाधि स्थित है। पंचमुखी महादेव मंदिर कुमार वाडा में, विलेश्वर मंदिर नं. १२ के नजदीक और नं. १५ के समीप राममंदिर स्थित है। नागरों के इष्टदेव हाटकेश्वर मंदिर, देवी हिंगलाज का मंदिर, कालिका मंदिर, बालाजी मंदिर, नरसिंह मंदिर, नागनाथ मंदिर समेत कुल ४२ मंदिर नगर के लगभग दस किलो मीटर क्षेत्र में स्थापित हैं।

बाहरी क्षेत्र के प्रमुख मन्दिर[संपादित करें]

सोमनाथ के निकट त्रिवेणी घाट पर स्थित गीता मंदिर

वेरावल प्रभास क्षेत्र के मध्य में समुद्र के किनारे मंदिर बने हुए हैं

शशिभूषण मंदिर, भीड़भंजन गणपति, बाणेश्वर, चंद्रेश्वर-रत्नेश्वर, कपिलेश्वर, रोटलेश्वर, भालुका तीर्थ है। भालकेश्वर, प्रागटेश्वर, पद्म कुंड, पांडव कूप, द्वारिकानाथ मंदिर, बालाजी मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, रूदे्रश्वर मंदिर, सूर्य मंदिर, हिंगलाज गुफा, गीता मंदिर, बल्लभाचार्य महाप्रभु की ६५वीं बैठक के अलावा कई अन्य प्रमुख मंदिर है।

प्रभास खंड में विवरण है कि सोमनाथ मंदिर के समयकाल में अन्य देव मंदिर भी थे।

इनमें शिवजी के १३५, विष्णु भगवान के ५, देवी के २५, सूर्यदेव के १६, गणेशजी के ५, नाग मंदिर १, क्षेत्रपाल मंदिर १, कुंड १९ और नदियां ९ बताई जाती हैं। एक शिलालेख में विवरण है कि महमूद के हमले के बाद इक्कीस मंदिरोंo का निर्माण किया गया। संभवत: इसके पश्चात भी अनेक मंदिर बने होंगे।

सोमनाथ से करीब दो सौ किलोमीटर दूरी पर प्रमुख तीर्थ श्रीकृष्ण की द्वारिका है। यहां भी प्रतिदिन द्वारिकाधीश के दर्शन के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहां गोमती नदी है। इसके स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। इस नदी का जल सूर्योदय पर बढ़ता जाता है और सूर्यास्त पर घटता जाता है, जो सुबह सूरज निकलने से पहले मात्र एक डेढ फीट ही रह जाता है।

अन्य दर्शनीय स्थल व मंदिर[संपादित करें]

1.अहिल्या बाई का मंदिर

2.प्राची त्रिवेदी

3.वाड़ातीर्थ

4.यादवस्थली

आवागमन[संपादित करें]

  • निकटतम रेलवे स्टेशन - वेरावल
  • निकटतम हवाई अड्डा - दीव, राजकोट, अहमदाबाद, वड़ोदरा

चित्र वीथिका[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, चोथा संस्करण, दिल्ली.
  2. महमूद आफॅ गजनी.
  3. .बी. एन. पुरी. हिस्ट्री ऑफ गुर्जर-प्रतिहार, नई दिल्ली, 1986.
  4. आर. सी मजुमदार, प्राचीन भारत.
  5. बी. एन. पुरी. हिस्ट्री ऑफ गुर्जर-प्रतिहार, नई दिल्ली, 1986.
  6. Puri 1957, पृ॰ 2.
  7. "Mahmud of Ghazni - Military campaigns" (अंग्रेज़ी में). वननेस कमिटमेंट. अभिगमन तिथि 14 अप्रैल 2008. |access-date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  8. "Somnath Temple" (एचटीएम) (अंग्रेज़ी में). नन्नूपुगमार्क्स.कॉम. अभिगमन तिथि 14 अप्रैल 2008. |access-date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  9. "In Nehru vs Patel-Prasad on Somnath, a context of Partition, nation building".
  10. Maritime Heritage of India (By Indian Navy)