परशुराम

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
परशुराम
भगवान परशुराम।
भगवान परशुराम।
देवनागरी परशुराम Paraśurāma
कन्नड़ ರಾಮ್ಕೊಡಲಿ
सहबद्धता स्वयं भगवान
आवास महेन्द्रगिरि
शस्त्र फरसा
पत्नी धारिणी
पाठ्य भागवत पुराण, विष्णु पुराण, रामायण, रामचरितमानस

परशुराम महर्षि जमदग्नि और रेणुका के सबसे छोटे पुत्र हैं इस समय वो महेंद्रगिरि नामक पर्वत पर आज भी अपने सुक्ष्म शरीर से तपस्या में लीन हैं. पूर्व काल में क्षत्रिय राजा बहुत अत्याचारी और तामसी प्रवर्ती के हो गये थे तब नारायण ने अपने अंश से परशुराम रुप में अवतार लिया और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओं से रहित कर दिया. जब क्षत्रिय राजाओं की शक्ति बढ गई और उन्हें किसी बात का डर नहीं रहा, क्युँकि यदा कदा मानवों और पृथ्वी पर अत्याचार करने वाले दानव, देवताओं से डरे हुए थे और वो छुप कर रहते थे. क्षत्रिय समाज को पहले तो दानवों और देवताओं का डर था, लेकिन जब दानव शांत थे तो देवता भी शांत बैठ गये, तब पृथ्वी में क्षत्रिय समाज के राजा धीरे-धीरे निर्कुंश होते गये, प्रजा को भी तंग करने लगे. इसके अतिरिक्त कई दानव भी क्षत्रिय कुल में जन्म लिये, जो ब्राह्मण नीति की बातों से उनका विरोध करता था उनको भी अपमानित करने लगे. ऐसे ही क्षत्रियों में एक राजा था सहस्त्रबाहु अर्जुन, जिसका उल्लेख पहले हो चुका है जिसने रावण को कैद कर लिया था. वो इतना निर्कुंश हो गया था कि एक बार वो अपनी सैनिकों के साथ कहीं जा रहा था रास्ते में आश्रम देखा और उसने घमण्ड और अहंकार में बिना कारण न जाने क्युँ आश्रम को पानी से भर दिया. उसी समय एक बाहर से एक मुनि आये और उन्होने देखा सहस्त्रबाहू अपनी शक्ति का प्रयोग करके आश्रम में पानी भर दिया तो उन्होंने पूछा ये क्या कर रहे हो और क्युं कर रहे हो देखते नहीं ये मेरा आश्रम है. सहस्त्रबाहू बडी धृष्ठता के साथ ठहाके लगा कर हँसने लगा उसे पता भी नहीं था कि ये महर्षि वशिष्ठ हैं. महर्षि वशिष्ठ ने सहस्त्रबाहु अर्जुन को उसकी हरकत पर डपट दिया, तो वो अभिमान मे बोला आप दुबले पतले ब्राह्मण हो, नहीं तो मैं इस वक्त आपको दंड देता कि मुझसे इस तरह बात करने का नतीजा क्या हो सकता है. इस अर्जुन को दत्तात्रेय भगवान से वरदान प्राप्त था कि युद्द करते समय उसके एक हजार हाथ हो जाएंगे इसलिये उसका नाम सहस्त्रबाहु भी हो गया, उसकी इस मूर्खता पर महर्षी ने उसे कहा चिंता मत कर तुम और तुम्हारे जैसे घमण्डी लोग जो ब्राह्मणों को बाहुबल में कमजोर मानते हैं और उपहास या अपमान करते हैं उन सबको शीघ्र ऐसा ब्राह्मण मिलेगा जो अपने बाहुबल से ही तुम सब का अंत करेगा.  परशुराम वही बाहुबली ब्राह्मण थे. अपने पिता के सबसे बडे आज्ञाँकारी बालक, एक दिन उनके पिता जमदग्नि यज्ञ के लिये परशुराम की माता रेणुका से कहा, वो समिधा ले आए पास के वन से. लेकिन वो समय पर नहीं आई और यज्ञ का समय निकल गया. इस पर जमदग्नि ने रेणुका से कारण पूछा कि वो देर से क्युँ आई इस पर रेणुका ने झूठ बोल दिया कि उसे समिधा नहीं मिल पाई और वो काफी आगे निकल गई थी जबकि रेणुका समिधा एकत्र करने के बाद वन में एक नदी के किनारे गंधर्वों को उनकी पत्नीयों के साथ तैराकी करते देखने में ही समय बीत गया था उसे समय का पता ही नहीं चला. महर्षि जमदग्नि ने ध्यान से सब कुछ जान लिया तब उन्हें रेणुका के झूठ बोलने पर क्रोध आया उन्होंने अपने पुत्रों को बुलाया और एक-एक कर सबको कहा कि तुम्हारी माता ने झूठ बोला है अत: अपनी माता का सर काट डालो. बांकी पुत्रों में किसी ने आज्ञाँ नहीं मानी लेकिन जब परशुराम से कहा कि अपनी माता के साथ इन भाइयों का सर भी काट डालो तो उन्होंने बिना विलम्ब के अपनी माँ का और सभी भाइयों का सर काट दिया. महर्षि प्रसन्न हो गये उन्होंने कहा पुत्र तुमने मेरी आज्ञाँ का पालन किया मैं इस बात से बहुत प्रसन्न हूँ तुम मुझसे वरदान माँगो. तब परशुराम जी ने कहा कि मेरी माँ और भाई पुन: जिवित हो जाए लेकिन उनको इस बात की याद न रहे कि उनका सर मैंने काटा था. महर्षी ने वैसा ही किया उनकी माता और भाई को पुन: जिवित कर दिया और उन्हें इस बात का पता भी नहीं चला. तब परशुराम अपने माता पिता से आज्ञाँ ले कर तीर्थ की ओर चल पडे, उन्होंने तपस्या के बल पर मन की गति से किसी भी लोक में जाने की शक्ति प्राप्त की और तपस्या के बल पर कई पुण्य अर्जित कर लिये. एक दिन उनके पिता जमदग्नि ध्यान मे बैठे थे, सहस्त्रबाहु अर्जुन ऊधर से अपनी सेना लेकर जा रहा था और फिर महर्षि के आश्रम में आया, महर्षि ने अर्जुन का सम्मान किया. अर्जुन ने महर्षि के आश्रम में दिव्य गौ कामधेनु को देखा तो उसने मुनि से कहा आप इस कामधेनु को मुझे दे दिजिये. इस पर मुनि ने असहमति जताई और कहा कि उन्हें कुछ काल तक ही इस गौ की सेवा का अवसर दिया गया है और यह गौ सप्तऋषियों की है, लेकिन अर्जुन बल पूर्वक कामधेनु को ले गया. ईधर परशुराम आये और उन्हें बात पता चली तो वो अर्जुन के राजमहल की ओर दौडे और सहस्त्रबाहू अर्जुन को गाय वापस  करने के लिये कहा, लेकिन अभिमान में भरा राजा ने कहा गौ वापस नहीं दुंगा,और तुम कौन हो वापस जाओ. मैं राजा हूँ और राजा का प्रजा की प्रत्येक वस्तु पर अधिकार है इसलिये वापस जाओ नहीं तो बंदी बना कर कारागार में बंद कर दुंगा और सैनिकों से कहा बाहर का रास्ता दिखाओ इसे. इस बात पर परशुराम जी ने क्रोध ने क्षण भर में ही उसके सैनिकों को काट-काट कर समाप्त कर डाला. सहस्त्रबाहु क्रोध से अपने एक हजार हाथ के साथ खडा हुआ और भीषण युद्ध छिड गया महल के बाहर एक तरफ परशुराम अकेले और दुसरी तरफ सहस्त्रबाहु उसके दस हजार पुत्र और हजारों की संख्या में सैनिक थे. जिसे भगवान दत्तात्रेय का आशिर्वाद प्राप्त था कि कोई क्षत्रिय राजा पृथ्वी में उसे ना हरा सकता है और ना उसे प्राक्रम में पीछे छोड सकता है आज वो अपने कई अस्त्र-शस्त्रों के होते अपने अभिमान और अहंकार के चलते परशुराम जी के सामने टिक न सका और परशुराम जी ने उसके महल के बाहर ही उसके एक हजार हाथ काट डाले और उसका अंत कर दिया. उसके दस हजार पुत्रों में से कुछ ही बचे अन्य सब मारे गये. परशुराम अपनी गाय कामधेनु को वापस ले आये और पिताजी को दे दी. सब समाचार सुनाया. महर्षि जमदग्नि ने कहा कि पुत्र तुमने एक राजा की हत्या करके ठीक नहीं किया, इस पर परशुराम जी ने कहा  कि पिताजी उसे मारना मैं भी नहीं चाहता था किंतु शुरुवाद उसकी ओर से हुई और मुझे बंदी बनाने का आदेश उसने ही दिया था और एक मुनि की गाय को जबरन छिन लेना एक राजा का अधर्म है. सहस्त्रबाहु धर्म पारायण भी नहीं रहा था, वो अभिमानी और अहंकारी हो चुका था.

एक दिन अर्जुन के आठ या दस पुत्र जो जिवित बचे थे, उन्हें पता चला  परशुराम तीर्थ यात्रा पर गये हैं अत: उन्होंने अपने पिता सहस्त्रबाहु की मृत्यु का बदला लेने के लिये इसे उपयुक्त अवसर समझा. आश्रम में मुनि और उनकि पत्नी रेणुका के अलावा कोई नहीं था, मुनि ध्यान में बैठे थे तब सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने मुनि का सर काट दिया और रेणुका को भी पीट गये. रेणुका ने अपने पुत्र परशुराम को पुकारा जो उस वक्त तपस्या में लीन थे. लेकिन माँ की आवाज उनके कानों तक पहुंच गई और मन की शक्ति से चलने वाले महर्षि क्षण भर में अपने घर पहुंचे और सब कुछ माँ के मुँह से सुना, तब क्रोध में अपने पिता की देह को अपने भाइयों को सौंप कर वे सहस्त्रबाहु के पुत्रों की ओर बडे वेग से आकाश मार्ग से उनके महल में पहुँच गये, उनको आया देख सब भय ग्रस्त हो गये और फिर परशुराम जी पर आक्रमण कर दिया. लेकिन कुछ ही समय में समूची सेना को परशुरामजी ने समाप्त कर दिया अंत में सहस्त्रबाहु के सभी पुत्रों को समाप्त कर डाला. वापस आकर अपने पिता के मस्तक को जोडने के लिये अपने पिता के शरीर और मस्तक को लेकर कुरुक्षेत्र गये वहाँ यज्ञ किया, यज्ञ के लिये चार दिशाओं को क्रमश: ब्रह्मा और आचार्य नियुक्त किया. यज्ञ के अंत में महर्षी जमदग्नि के सर को पुन: जोड्कर मृतसंजीवनी विद्या के द्वारा जिवित कर दिया और अपने पिता जमदग्नि को सप्तऋषी  मंडल में सातवें सप्त ऋषि के रुप में प्रतिष्ठित कर दिया तथा सहस्त्रबाहु के राज्य को ब्राह्मणों को दान में दे दिया. सहस्त्रबाहु उस वक्त का सबसे शक्तिशालि क्षत्रिय राजा था अन्य क्षत्रिय राजाओं को परशुराम का प्राक्रम सहन नहीं हुआ, उन्हें एक ब्राह्मण के द्वारा एक सबसे शक्तिशाली क्षत्रिय राजा का युँ पराजित होना, सम्पूर्ण क्षत्रिय समाज का अपमान लगने लगा. अत: एक दिन योजनाबद्ध तरीके से सभी क्षत्रिय राजाओं ने मिलकर परशुराम पर आक्रमण कर दिया, लेकिन परशुराम के आगे सम्पूर्ण क्षत्रिय समाज के जितने भी घमण्डी वीर थे वो नहीं टिक सके और भाग खडे हुए. तब उनकी इस हरकत पर परशुराम को इतना क्रोध आया कि उन्होंने निश्चय किया और संकल्प लिया कि अब वो पृथ्वी पर एक भी क्षत्रिय राजा को जिवित नहीं छोडेंगे और उन्होंने सभी क्षत्रिय राजाओं का नामो निशान पृथ्वी से मिटा दिया और सम्पूर्ण पृथ्वी ब्राह्मणों को दान मे दे दी. स्वयं तप करने चले गये और हजारों वर्ष तक तप में लीन रहे, इतने समय में ब्रह्मा जी की प्रेरणा से ब्राह्मणों ने पुन: क्षत्रियों को क्षिक्षित दीक्षित करके राजा बनाया, उनको जो भूमि परशुराम जी ने दान में मिली थी उसे क्षत्रिय राजाओं को दिया ताकि पृथ्वी पर सही ढंग से व्यवस्था चलती रहे. हजारों साल के बाद जब तपस्या से परशुराम ऊठे और देखा कि फिर से क्षत्रिय राजा बने हैं, बस इस बात पर उन्होंने फिर से एक बार और पृथ्वी को क्षत्रिय राजाओं से रहित कर दिया और फिर से  तप करने चले गये. फिर से वही कहाँनी हुई और परशुराम जी ने इस तरह ईक्कीस बार समूची पृथ्वी को क्षत्रिय राजाओं से विहिन कर दिया. और इस बार ब्रह्मा जी ने महर्षि कश्यप को बुलाया और कहा कि परशुराम को सम्भालो, ईक्कीसवीं बार वो क्षत्रिय राजाओं का संहार कर चुके हैं अब बहुत हुआ. राजा के बिना राज्य नहीं छोडा जा सकता हैं प्रजा में समाज में धर्म का पालन राजा को ही करवाना होता है इसलिये राजा का होना आवश्यक है. आप उनके गुरु हैं और आपकी बात वो मानेगें. तब ब्रह्मदेव की आज्ञाँ मानकर महर्षि कश्यप आये और परशुराम जी ने उनकी चरण वंदना की और समूची पृथ्वी महर्षी कश्यप को दान में दे दी. महर्षि कश्यप ने कहा मैं दान स्वीकार करता हूँ अब यह मेरे अधिकार में है अत: आज के बाद तुम मेरी इस धरती पर पैर भी नहीं रखोगे और ना ही कभी रात्रि में भी यहाँ विश्राम करोगे. परशुराम जी ने आज्ञाँ स्वीकार कर ली और आकाश मार्ग से समुद्र के निकट गये और अपने रहने के लिये स्थान देने को कहा. तब समुद्र ने भयग्रस्त हो कर बिना देरी किये कहा महर्षि आप आप को जितनी भूमि चाहिये उसके लिये आप अपना फरसा मेरी तरफ समुद्र में फेंक दें  मैं आपको अपने गर्भगृह से उतनी धरती दे सकुंगा महर्षि ने कहा ठीक है परंतु जब मैं मांगू तो मेरा फरसा मुझे वापस भी दे देना और अपना फरसा समुद्र में फेंक दिया तब समुद्र ने अपने गर्भगृह से महेंद्रगिरि पर्वत को पृकट किया और महर्षि परशुराम उस पर्वत पर पुन: तपस्या में लीन हो गये और आज भी वो वहाँ अपने सूक्ष्म रुप में रहते हैं. जब श्री राम ने शिव धनुष तोडा तो उसकी भयंकर ध्वनी से उनका ध्यान टुटा और वे क्षण भर में ही जनक के दरबार में पहुँचे. जनक जी उनकी पत्नी और सीता सबने प्रणाम किया और सीता जी को उनकी सखियां ले गई. इसके बाद विश्वामित्र जी ने अभिनंदन किया राम लक्ष्मण ने प्रणाम किया, जो राजा बचे थे वो भय से ग्रस्त हो पिता सहित नाम बता कर प्रणाम कर खिसक लिये. इसी बीच परशुराम जी ने भीड-भाड का कारण पूछा जनक जी ने सब बताया तो गुस्सा कर गये कि धनुष तोड डाला. बोले जल्दी बताओ किसने तोडा नहीं तो मैं यहाँ जितनी भी राजा हैं सबको मार डालूंगा, बचे हुए दानव और देवता भेष बदल कर क्षत्रिय बनकर आये थे और जिन्हें जाने का मौका नहीं मिल पा रहा था उनकी हालत सबसे पतली थी क्युँकि प्रकट भी नहीं कर सकते थे कि वो कौन हैं. और अब भागने का मौका भी नहीं था. कोई कुछ नहीं बोला तब श्री राम ने कहा मुनिवर जिसने धनुष तोडा वो आपका ही सेवक है आप बतलाइये क्या आज्ञाँ है. मुनि ने कहा धनुष तोड दिया और तुम कहते हो हमारा सेवक है अरे वो सेवक नहीं सहस्त्रबाहु जैसा मेरा घोर शत्रु है. तब लक्ष्मण ने कहा मुनिवर धनुष तोड दिया तो कौन सी बडी बात हो गयी, मेरे भ्राता ने इसे उठा के प्रत्यंचा चढाई ही थी कि यह पुराना धनुष टुट गया और इस बात पर मुनि क्रोधित हो गये और संवाद चलता रहा फिर संवाद बढते-बढते परशुराम जी ने युद्ध की चुनौती दे डाली, तब श्री राम ने कहा कि हे मुनि आपसे हम युद्ध कैसे कर सकते हैं आप ब्राह्मण है आपकी प्रभुता ऐसी है कि आप स्वयं अपने भक्तों को अभय देने वाले हैं और हमारा वंश तो ब्राह्मणों की सेवा में ही रहा है आपने ही हमें अभय किया है अर्थात युद्ध का हमें कोई भय ही नहीं है पर जिससे युद्द करगें वो ही जब हमें अभय भी देने वाला है फिर युद्द किससे और कैसे हो सकता है. मीठे और अत्यंत गूढ वचनों को सुन मुनि को समझ आ गया ये साधारण राजकुमार नहीं हो सकते और अपना धनुष आगे करके बोले राम आप इस धनुष पर बाण चढा कर मेरे संदेह दूर किजिये, श्री राम ने धनुष हाथ ले बाण चढाया तो समझ गये और परशुराम साक्षात भगवान के दर्शन पा कर धन्य हो ऊठे और तब श्री राम ने परशुराम जी से पूछा कि हे विप्रवर आप जानते हैं, ये अमोघ बाण है इसलिये आप ही बतलाए मैं इसे किस पर छोडुं किसे नष्ट करूँ. मुनि ने हाथ जोड्कर कहा राघव मैंने कई पुण्य लोक अर्जित किये हैं तपस्या के बल पर, और उसकी वजह से मुझे अहंकार और घमंड हो गया है इसी कारण से मैं आप को न पहचान सका, अत: आप मेरे सभी पुण्य नष्ट कर दिजिए इस बाण से. परशुराम ने क्षमा याचना करते हुए भगवान की सुंदर स्तुती की. राजा जनक ने महर्षि परशुराम को सीताजी के विवाह में सम्मिलित होने के लिये प्रार्थना की तब उन्होंने महर्षि कश्यप को दिये गये वचन की बात कही और पुन: तप को चले गये.

[महर्षि परशुराम की यह कथा “प्रबोध शक्ति” चंद्रशेखर पंत रचित ग्रंथ से ली गई है जो की अंग्रेजी भाषा मे अमेजन डाट काम पर आन लाइन ई बुक उपलब्ध है और हिंदी भाषा में एन एम ठक्कर एंड कम्पनी 140 प्रिंसेस स्ट्रीट मरीन लाइंस मुम्बई द्वारा प्रकाशित है ] 

राजा रवि वर्मा द्वारा परशुराम जी का चित्र।

पौरोणिक परिचय[संपादित करें]

परसुराम की प्रतिमा

परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण

उनके जाने-माने शिष्य थे -

  1. भीष्म
  2. द्रोण, कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं
  3. कर्ण।

कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को क्षूद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका। जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।

इतिहास[संपादित करें]

जन्म[संपादित करें]

प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्‍चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्‍वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना। इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्‍ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी। इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम।

माता पिता भक्त परशुराम[संपादित करें]

श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।

अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद एवं उन्हें बचाने हेतु आगे आये अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला। उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर माँगने का आग्रह किया तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर माँगा।

पिता जमदग्नि की हत्या और परशुराम का प्रतिशोध[संपादित करें]

Parasurama killing Sahasrarjuna.jpg सहस्त्रार्जुन से युद्धरत परशुराम का एक चित्र

कथानक है कि हैहय वंशाधिपति का‌र्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया।

कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से पृथक कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया। यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका।

इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।

हैहयवंशी क्षत्रियों का विनाश[संपादित करें]

माना जाता है कि परशुराम ने 21 बार हैहयवंशी क्षत्रियों को समूल नष्ट किया था। क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है। इसी समाज में एक राजा हुए थे सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इसी राजा और इनके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था।

कौन था सहस्त्रार्जुन ?: सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त। महिष्मन्त ने ही नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था। इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला। भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे। भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे। कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था। कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है। कार्त्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था। भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्रबाहु कहा जाने लगा। सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था।

युद्ध का कारण: ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-"मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा"। उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध किया। क्रोधाग्नि में जलते हुए परशुराम ने सर्वप्रथम हैहयवंशियों की महिष्मती नगरी पर अधिकार किया तदुपरान्त कार्त्तवीर्यार्जुन का वध। कार्त्तवीर्यार्जुन के दिवंगत होने के बाद उनके पाँच पुत्र जयध्वज, शूरसेन, शूर, वृष और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे।

दन्तकथाएँ[संपादित करें]

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथानक मिलता है कि कैलाश स्थित भगवान शंकर के अन्त:पुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर परशुराम ने बलपूर्वक अन्दर जाने की चेष्ठा की। तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित परशुरामजी द्वारा किए गए फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया, जिससे वे एकदन्त कहलाये।

रामायण काल[संपादित करें]

एक पौरोणिक चित्र: श्रीराम (दायें) और परशुराम (बाएँ)

उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही" बताते हुए "बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये" और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए "अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता" तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- "कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू"। वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

जाते जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।

महाभारत काल[संपादित करें]

भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।

परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे। तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके। परशुरामजी ने कहा-"एवमस्तु!" अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।

परशुराम कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था। लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से विधा लेने का प्रयास किया। परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा, अपने गुरुजी की नींद मे कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण भौंरे को सेहता रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा। वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा। परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा। इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे। तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा। किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो, इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा। अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर की एक ब्राम्हण पुत्र में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती कि वो बिच्छू के दंश को सहन कर ले। कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं आयेगी।

विष्णु अवतार[संपादित करें]

भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववन्द्य महाबाहु परशुराम का जन्म हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे।

कल्कि पुराण[संपादित करें]

कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। वे ही कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके उनके दिव्यास्त्र को प्राप्त करने के लिये कहेंगे।

मार्शल आर्ट में योगदान[संपादित करें]

भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे। परशुराम केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं।[1] वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है।

बाहरी स्रोत[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

साँचा:PRABODH SHAKTI by Chandra Shekhar Pant availabe at Amazon dot com and in Hindi available with M/s N M Thakkar & Co, 140 Prinsess Street Marine Line Mumbai

  1. Zarrilli, Phillip B. (1998). When the Body Becomes All Eyes: Paradigms, Discourses and Practices of Power in Kalarippayattu, a South Indian Martial Art. Oxford: Oxford University Press.