हनुमान

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हनुमान
शक्ति, ज्ञान, भक्ति एवं विजय के भगवान, बुराई के सर्वोच्च विध्वंसक, भक्तों के रक्षक
Mehandipur Balaji todabhim.jpg
हनुमान जी के बाल रुप की प्रतिमा
अन्य नाम महाबली , महावीर , पवनपुत्र , अंजनीसुत , केसरीनंदन , रामेष्ट , दशग्रीव दर्प: आदि
संबंध वानर, रुद्र अवतार, राम के भक्त
ग्रह पृथ्वी
मंत्र ॐ हं हनुमनते नमः
अस्त्र गदा , वज्र और ध्वजा
प्रतीक वानर
दिवस मंगलवार और शनिवार
वर्ण लाल और केसरिया
माता-पिता
भाई-बहन गतिमान , श्रुतिमान , धृतिमान , केतुमान और मतिमान[1]
संतान मकरध्वज
सवारी अज्ञात
शास्त्र रामायण महाभारत आदि
त्यौहार हनुमान जन्मोत्सव
अशोक वाटिका में हनुमान जी।

हनुमान (संस्कृत: हनुमान्, आंजनेय और मारुति भी) परमेश्वर की भक्ति (हिन्दू धर्म में भगवान की भक्ति) की सबसे लोकप्रिय अवधारणाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण में सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में एक हैं। वह भगवान शिवजी के सभी अवतारों में सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं।[2] रामायण के अनुसार वे श्रीराम के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएँ प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से असुरों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है।

इन्हें बजरंगबली के रूप में जाना जाता है क्योंकि इनका शरीर एक वज्र की तरह है। वे पवन-पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। वायु अथवा पवन (हवा के देवता) ने हनुमान जी को पालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मारुत (संस्कृत: मरुत्) का अर्थ हवा है। नन्दन का अर्थ बेटा है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान "मारुति" अर्थात "मारुत-नन्दन" (हवा का बेटा) हैं।

हनुमानजी का आदि राम की शरण ग्रहण करना[संपादित करें]

हनुमान जी राम जी को सुप्रीम मानकर भक्ति करते थे , जीवन के अंतिम क्षणों में उन्हें आदिराम के बारे में पता चला तब गुरू शरण में जाकर भक्ति की और कल्याण कराया।

पूरी कथा इस प्रकार है[संपादित करें]

त्रेता युग में जब रावण ने सीता जी  का हरण कर लिया तो उनकी खोज शुरू हुई। हनुमान जी ने सीताजी का पता लगाया कि वह रावण की कैद में है।  सीताजी ने हनुमान को एक कंगन दिया था कि यह श्री राम को दिखा देना। जब वे सीता जी की खोज कर के लंका से वापिस आ रहे थे तो समुद्र को आकाश मार्ग से पार करके एक पर्वत के ऊपर उतरे। वहाँ पास ही एक बहुत सुंदर निर्मल जल का सरोवर था। सुबह-सुबह की बात है। जो कंगन सीता जी ने हनुमानजी को दिया था, हनुमान जी उसको एक पत्थर पर रख कर स्नान करने लगे।  उसी समय एक बंदर आया और कंगन उठा कर भाग लिया। हनुमान जी की नज़र जैसे सर्प की मणि पर होती है ऐसे कंगन पर थी।  हनुमान जी पीछे दौड़े। बंदर भाग कर एक आश्रम में प्रवेश कर गया और उस कंगन को एक मटके में दाल दिया। वह बहुत बड़ा घड़ा था। जब उस कुम्भ में हनुमान जी ने देखा तो ऐसे-ऐसे कंगनों से वह घड़ा लगभग भरा हुआ था। हनुमान जी ने कंगन उठा कर देखा तो सारे ही कंगन एक जैसे थे। भेद नहीं लग रहा था।असमंजस में पड़ गये।

सामने एक महापुरुष (ऋषि) आश्रम में बैठे हुए दिखाई दिए। उनके पास जाकर प्रार्थना की कि हे ऋषिवर! मैं सीता माता की खोज करने गया था और सीता जी का पता लग गया है। एक कंगन माता ने मुझे दिया था। उसको रखकर स्नान करने लग गया। बंदर ने शरारत की और कंगन उठाकर इस मटके में डाल दिया। वह ऋषि उस समय मुनिन्द्र नाम से आये कबीर साहिब थे। मुनिन्द्र साहिब ने कहा कि आओ भक्त जी, दूध पीयो, बैठो विश्राम करो। हनुमान जी बोले कि काहे का दूध, मेरी तो सारी मेहनत विफल हो गयी। इस कुम्भ के अंदर एक ही जैसे सभी कंगन नज़र आ रहे हैं। मुझे पहचान नहीं हो रही, वह कंगन कौन सा है? मुनिन्द्र जी बोले कि आपको हो भी नहीं सकती। यदि पहचान हो जाय तो आप इस काल के लोक में दुखी नहीं होते, यह कठिनाइयाँ नहीं आती।

मुनिन्द्र (कबीर साहिब) जी बोले की हनुमान जी आप कौन से राम की बात कर रहे हो? कौन सीता? मुझे यह तो बता। हनुमान जी बोले कि आप अजीब बात कर रहे हो। सारे के सारे वन तथा संसार में एक चर्चा हो रही है। आप को मालुम ही नहीं? भगवान रामचन्द्र जी ने राजा दशरथ के घर पर जन्म लिया है। उनकी पत्नी का रावण ने अपहरण कर रखा है, आपको नहीं मालूम? मुनिन्द्र जी कहते हैं कि कौन-कौन से नंबर के राम की मालूम करूँ? हनुमान जी कहते हैं की राम का भी कोई नंबर होता है? मुनिन्द्र साहिब ने कहा की ऐसे-ऐसे यह दशरथ के पुत्र रामचन्द्र 30 करोड़ हो चुके हैं और यह सभी जन्म और मृत्यु के अंदर हैं। यह पूर्ण परमेश्वर नहीं है। यह केवल तीन लोक के प्रभु हैं। इनके उपासक भी मुक्त नहीं हैं।

हनुमान जी महसूस करते है कि यह महात्मा बहुत अजीबो गरीब बात कर रहे है। हनुमान जी बोले कि क्या श्री रामचन्द्र जी तीस करोड़ बार आ चुके हैं? मुनिन्द्र (कबीर) जी ने कहा - हाँ पुत्र, श्री राम अपना जीवन पूरा करके जब समाप्त हो जायेगा उसके बाद फिर नई आत्मा ऐसे ही जन्म लेती रहती हैं और आती रहती हैं। ऐसे ही तेरे जैसे हनुमान न जाने कितने हो लिए। यह तो इस ब्रह्म (काल भगवान) ने एक फिल्म बना रखी है। उसमें पात्र आते रहते हैं और इसी का प्रमाण यह कुम्भ दे रहा है। इसमें जितने भी कंगन हैं यह आप ही जैसे हनुमान आते हैं और वह बंदर इसमें कंगन डालता है। इस कुम्भ के अंदर मेरी कृपा से एक शक्ति है कि जो भी वस्तु इसमें डाली जाती है यह वैसी ही एक और बना देता है। ऐसे ही इस रूप का दूसरा कंगन तैयार कर देता है। आप इस में से कंगन ले जाइए और दिखाईये अपने राम जी को, ज्यों का त्यों मिलेगा। फिर कहा कि हनुमान जी सतभक्ति करो। यह भक्ति तुम्हारी परिपूर्ण नहीं है। यह काल जाल से आपको मुक्त नहीं होने देगी। हनुमान जी बोले कि अब मेरे पास इतना समय नहीं है कि आपके साथ वार्ता करूँ, परन्तु मुझे आपकी बातें अच्छी नहीं लग रही हैं। कंगन उठा कर चले गए।

कुछ दिनों के बाद हनुमान जी अयोध्या त्यागकर एक पहाड़ पर भजन कर रहे थे। यही दयालु परमेश्वर अपनी हंस आत्मा के पास गए तथा कहा की राम-राम भक्त जी। हनुमान जी ने ऋषि की तरफ देखा। फिर हनुमान जी बोले कि मुझे ऐसा लग रहा है कि आपको कहीं पर देखा हो। तब मुनिन्द्र साहिब बोले कि - हाँ, हनुमान। पहली बार तो तूने मुझे वहां पर देखा जब आप सीता की खोज करके वापिस आ रहे थे और कंगन को किसी बंदर ने मटके में दाल दिया था। दूसरी बार वहाँ पर देखा था जब श्री रामचन्द्र जी का समुद्र पर पुल नहीं बन रहा था। उस समय मैंने अपनी कृपा से पुल बनवाया था। मैं वही मुनिन्द्र ऋषि हूँ।

हनुमान जी को याद आया। कहा की - आओ ऋषि जी, बैठो। क्योंकि हनुमान जी बहुत प्रभु प्रेमी और अतिथि सत्कार करने वाले महापुरुष थे। कहा की अब पहचान लिया। मुनिन्द्र जी फिर प्रार्थना करते हैं कि हनुमान जी जो आप साधना कर रहे हो, यह पूर्ण नहीं है। यह तुम्हें पार नहीं होने देगी। यह सर्व काल जाल है। सारी "सृष्टि रचना" सुनाई। हनुमान जी बहुत प्रभावित होते हैं। फिर भी कहा कि मैं तो इन प्रभु से आगे किसी को नहीं मान सकता। हमने तो आज तक यही सुना है कि यह तीन लोक के नाथ विष्णु हैं और उन्हीं का स्वरुप रामचन्द्र जी आये हैं। अगर मैं आपके सतलोक को अपनी आँखों देखूं तो मान सकता हूँ।

कबीर साहिब ने हनुमान जी को दिव्य दृष्टि दी और स्वयं आकाश में उड़कर सतलोक पहुँच गए। पृथ्वी पर बैठे हनुमान जी को सब वहाँ सतलोक का दृश्य दिखाया। साथ में यह तीन लोक के भगवानों के स्थान दिखाए और वह काल दिखाया जहाँ पर एक लाख जीवों का प्रतिदिन आहार करता है। उसी को ब्रह्म, क्षर पुरुष तथा ज्योति स्वरूपी निरंजन कहते हैं। तब हनुमान जी ने कहा कि - प्रभु, नीचे आओ। क्षमा करना दास ने आपके साथ अभद्र व्यवहार भी किया होगा। दास को शरण में लो। हनुमान जी को प्रथम नाम दिया, फिर सत्यनाम दिया और मुक्ति का अधिकारी बनाया।

प्रमाण के लिए देखें - कबीर सागर, हनुमान बोध ।[3]

ठाकुरद्वारा श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर, यमुनानगर में स्थित शिव जी के रुद्रावतार हनुमान जी की प्रतिमा

हनुमान के द्वारा सूर्य को फल समझना[संपादित करें]

हनुमान सूरज को फल मानते हुए पकड़ने के लिए आगे बढ़ते हैं।

इनके जन्म के पश्चात् एक दिन इनकी माता फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने आकाश में उड़ने लगे। उनकी सहायता के लिये पवन भी बहुत तेजी से चला। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की "देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज अमावस्या के दिन जब मैं सूर्य को ग्रस्त करने गया तब देखा कि दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।"

राहु की यह बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और उसे साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमानजी सूर्य को छोड़ राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमानजी पर वज्रायुध से प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक दिया। इससे संसार की कोई भी प्राणी साँस न ले सकी और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मूर्छत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्माजी ने उन्हें जीवित किया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सभी प्राणियों की पीड़ा दूर की। फिर ब्रह्माजी ने कहा कि कोई भी शस्त्र इसके अंग को हानि नहीं कर सकता। इन्द्र ने कहा कि इसका शरीर वज्र से भी कठोर होगा। सूर्यदेव ने कहा कि वे उसे अपने तेज का शतांश प्रदान करेंगे तथा शास्त्र मर्मज्ञ होने का भी आशीर्वाद दिया। वरुण ने कहा मेरे पाश और जल से यह बालक सदा सुरक्षित रहेगा। यमदेव ने अवध्य और नीरोग रहने का आशीर्वाद दिया। यक्षराज कुबेर, विश्वकर्मा आदि देवों ने भी अमोघ वरदान दिये।

हनुमान त्रिशिरा का वध करते हुए।

हनुमान का नामकरण[संपादित करें]

इन्द्र के वज्र से हनुमानजी की ठुड्डी (संस्कृत: में हनु ) टूट गई थी। इसलिये उनको हनुमान का नाम दिया गया। इसके अलावा ये अनेक नामों से प्रसिद्ध है जैसे बजरंग बली, मारुति, अंजनि सुत, पवनपुत्र, संकटमोचन, केसरीनन्दन, महावीर, कपीश, शंकर सुवन आदि।[4]

हनुमान जी का रुप[संपादित करें]

हिँदू महाकाव्य रामायण के अनुसार, हनुमान जी को वानर के मुख वाले अत्यंत बलिष्ठ पुरुष के रूप में दिखाया जाता है। इनका शरीर अत्यंत मांसल एवं बलशाली है। उनके कंधे पर जनेऊ लटका रहता है। हनुमान जी को मात्र एक लंगोट पहने अनावृत शरीर के साथ दिखाया जाता है। वह मस्तक पर स्वर्ण मुकुट एवं शरीर पर स्वर्ण आभुषण पहने दिखाए जाते है। उनकी वानर के समान लंबी पूँछ है। उनका मुख्य अस्त्र गदा माना जाता है।

ग्रंथों[संपादित करें]

हिन्दू धर्म[संपादित करें]

रामायण[संपादित करें]

रामायण की पांचवीं पुस्तक, सुंदरकांड, हनुमान पर केंद्रित है। असुरराज रावण ने सीता का अपहरण कर लिया था, जिसके बाद 14 साल के वनवास के आखिरी साल में हनुमान राम से मिलते हैं। अपने भाई लक्ष्मण के साथ, राम अपनी पत्नी सीता को खोज रहे हैं। यह और संबंधित राम कथाएं हनुमान के बारे में सबसे व्यापक कहानियां हैं।

रामायण के कई संस्करण भारत के भीतर मौजूद हैं। ये हनुमान, राम, सीता, लक्ष्मण और रावण के रूपांतर प्रस्तुत करते हैं। वर्ण और उनके विवरण अलग-अलग हैं, कुछ मामलों में काफी महत्वपूर्ण हैं।

महाभारत[संपादित करें]

महाभारत एक और प्रमुख महाकाव्य है जिसमें हनुमान का संक्षिप्त उल्लेख है। पुस्तक 3 में, महाभारत के वाना पर्व, उन्हें भीमसेन के सौतेले बड़े भाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो उनसे कैलाश पर्वत पर जाने के दौरान गलती से मिलते हैं। असाधारण ताकत का आदमी भीम, हनुमान की पूंछ को हिलाने में असमर्थ है, जिससे उसे एहसास होता है और हनुमान की ताकत को स्वीकार करता है। यह कहानी हनुमान चरित्र के प्राचीन कालक्रम से जुड़ी है। यह कलाकृति और राहत का एक हिस्सा भी है जैसे विजयनगर खंडहर।

अन्य साहित्य[संपादित करें]

रामायण और महाभारत के अलावा, हनुमान का उल्लेख कई अन्य ग्रंथों में किया गया है। इनमें से कुछ कहानियाँ पहले के महाकाव्यों में उल्लिखित उनके कारनामों से जुड़ती हैं, जबकि अन्य उनके जीवन की वैकल्पिक कहानियाँ बताती हैं। स्कंद पुराण में रामेश्वरम में हनुमान का उल्लेख है।

शिव पुराण के एक दक्षिण भारतीय संस्करण में, हनुमान को शिव और मोहिनी (विष्णु का महिला अवतार) के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है, या वैकल्पिक रूप से उनकी पौराणिक कथाओं को स्वामी अय्यप्पा के मूल के साथ जोड़ा या विलय कर दिया गया है, जो दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में लोकप्रिय हैं ।

हनुमान चालीसा[संपादित करें]

16 वीं शताब्दी के भारतीय कवि तुलसीदास ने हनुमान को समर्पित एक भक्ति गीत हनुमान चालीसा लिखा था। उन्होंने हनुमान के साथ आमने-सामने मुलाकात करने का दावा किया। इन बैठकों के आधार पर, उन्होंने रामचरितमानस, रामायण का एक अवधी भाषा संस्करण लिखा।

देवी अथवा शक्ति के साथ संबंध[संपादित करें]

हनुमान और देवी काली के बीच संबंध का उल्लेख कृतिवसी रामायण में मिलता है। उनकी बैठक रामायण के युधिष्ठिर में माहिरावन की कथा में होती है। माहिरावन रावण का विश्वसनीय मित्र / भाई था। अपने बेटे, मेघनाद के मारे जाने के बाद, रावण ने राम और लक्ष्मण को मारने के लिए पाताललोक के राजा अहिरावण और महिरावण की मदद ली। एक रात, अहिरावण और महिरावण ने अपनी माया का उपयोग करते हुए, विभीषण का रूप धारण किया और राम के शिविर में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने वानर सेना पर निंद्रा मंत्र डाला, राम और लक्ष्मण का अपहरण किया और उन्हें पाताल लोक ले गए। वह देवी के एक अनुगामी भक्त थे और रावण ने उन्हें अयोध्या के बहादुर सेनानियों को देवी को बलिदान करने के लिए मना लिया, जिसके लिए माहिरावन सहमत हुए। हनुमान ने विभीषण से पाताल का रास्ता समझने के बाद अपने प्रभु को बचाने के लिए जल्दबाजी की। अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने मकरध्वज से मुलाकात की, जिन्होंने हनुमान के पुत्र होने का दावा किया, उनके पसीने से पैदा हुआ था जो एक मत्स्य (मछली) द्वारा खाया गया था। हनुमान ने उसे हरा दिया और उसे बांध दिया और महल के अंदर चले गए। वहाँ उसकी मुलाकात चंद्रसेन से हुई जिसने अहिरावण और महिरावण को मारने के तरीके के बारे में बताया। तब हनुमान ने मधुमक्खी के आकार को छोटा किया और महा-काली की विशाल मूर्ति की ओर बढ़ गए। उसने उसे राम को बचाने के लिए कहा, और भयंकर माता देवी ने हनुमान की जगह ले ली, जबकि वह नीचे फिसल गया था। जब महावीर ने राजकुमार-ऋषियों को झुकने के लिए कहा, तो उन्होंने इनकार कर दिया क्योंकि वे शाही वंश के थे और झुकना नहीं जानते थे। इसलिए जैसे ही अहिरावण माहिरावण उन्हें झुकाने का तरीका दिखाने वाले थे, हनुमान ने अपना पंच-मुख रूप (गरुड़, नरसिंह, वराह, हयग्रीव और स्वयं के सिर के साथ) लिया: प्रत्येक सिर एक विशेष प्रतीक को दर्शाता है। हनुमान साहस और शक्ति, नरसिंह निडरता, गरुड़। जादुई कौशल और नाग के काटने, वराह स्वास्थ्य और भूत भगाने और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति), 5 दिशाओं में 5 तेल के दीपक फूँक दिए और अहिरावण तथा माहिरावण का सिर काट दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। बाद में उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण को अपने कंधों पर लिया और जब उन्होंने श्री राम के बाहर उड़ान भरी तो उन्होंने मकरध्वज को अपनी पूंछ से बंधा देखा। उन्होंने तुरंत हनुमान को उन्हें पाताल का राजा बनाने का आदेश दिया। अहिरावण की कहानी पूरब के रामायणों में अपना स्थान पाती है। यह कृतिबश द्वारा लिखित रामायण के बंगाली संस्करण में पाया जा सकता है। इस घटना के बारे में बात करने वाले मार्ग को 'महिराबोनरपाला' के नाम से जाना जाता है। यह भी माना जाता है कि हनुमान से प्रसन्न होने के बाद, देवी काली ने उन्हें अपने द्वार-पाल या द्वारपाल होने का आशीर्वाद दिया और इसलिए देवी के मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर भैरव और हनुमान पाए जाते हैं।

बुद्ध धर्म[संपादित करें]

हनुमान तिब्बती (दक्षिण-पश्चिम चीन) और खोतानी (पश्चिम चीन, मध्य एशिया और उत्तरी ईरान) रामायण के संस्करणों में एक बौद्ध चमक के साथ दिखाई देते हैं। खोतानी संस्करणों में जातक कथाएँ जैसे विषय होते हैं, लेकिन आमतौर पर हनुमान की कहानी और चरित्र में हिंदू ग्रंथों के समान होते हैं। तिब्बती संस्करण अधिक सुशोभित है, और जाटका चमक को शामिल करने के प्रयासों के बिना। इसके अलावा, तिब्बती संस्करण में, हनुमान जैसे राम और सीता के बीच प्रेम पत्र रखने वाले उपन्यास तत्व दिखाई देते हैं, हिंदू संस्करण के अलावा जिसमें राम सीता को एक संदेश के रूप में उनके साथ शादी की अंगूठी भेजते हैं। इसके अलावा, तिब्बती संस्करण में, राम ने हनुमान को चिट्ठियों के माध्यम से उनके साथ अधिक बार नहीं होने के लिए कहा, जिसका अर्थ है कि बंदर-दूत और योद्धा एक सीखा जा रहा है जो पढ़ और लिख सकता है।

जैन धर्म[संपादित करें]

विमलसूरि द्वारा लिखे गए रामायण के जैन संस्करण पौमचार्य (जिसे पौमा चारु या पद्मचरित के नाम से भी जाना जाता है) में हनुमान का उल्लेख एक दिव्य वानर के रूप में नहीं, बल्कि एक विद्याधरा (एक अलौकिक प्राणी, जैन ब्रह्माण्ड विज्ञान में मृगमरीचिका) के रूप में किया गया है। वह पवनगति (पवन देवता) और अंजना सुंदरी के पुत्र हैं। अंजना अपने ससुराल वालों द्वारा निर्वासित होने के बाद, एक जंगल की गुफा में हनुमान को जन्म देती है। उसके मामा ने उसे जंगल से बचाया; अपने विमना पर सवार होते हुए, अंजना गलती से अपने बच्चे को एक चट्टान पर गिरा देती है। हालांकि, चट्टान नदारद होने के बावजूद बच्चा अधूरा रह गया। बच्चे की परवरिश हनुरहा में हुई है।

हिंदू ग्रंथ में प्रमुख अंतर हैं: हनुमान जैन ग्रंथों में एक अलौकिक व्यक्ति हैं, (राम एक पवित्र जैन हैं, जो कभी किसी को नहीं मारते हैं, और यह लक्ष्मण हैं जो रावण को मारते हैं।) हनुमान उनसे मिलने और उनके बारे में जानने के बाद राम के समर्थक बन जाते हैं। रावण द्वारा सीता का अपहरण। वह राम की ओर से लंका जाता है, लेकिन रावण को सीता को छोड़ने के लिए मना नहीं पाता है। अंततः, वह रावण के खिलाफ युद्ध में राम के साथ जुड़ जाता है और कई वीर कर्म करता है। बाद में जैन ग्रंथ, जैसे कि उत्तरपुराण (9 वीं शताब्दी सीई) गुनभद्र और अंजना-पवनंजय (12 वीं शताब्दी सीई), एक ही कहानी बताते हैं।

(जैन रामायण कथा के कई संस्करणों में, हनुमान को समझाने वाले मार्ग हैं, और राम (जैन धर्म में पौमा कहलाते हैं), (इन संस्करणों में हनुमान अंततः सभी सामाजिक जीवन को त्याग कर जैन सन्यासी बन जाते हैं)।

सिख धर्म[संपादित करें]

सिख धर्म में, हिंदू भगवान राम को श्री राम चंदर के रूप में संदर्भित किया गया है, और एक सिद्ध के रूप में हनुमान की कहानी प्रभावशाली रही है। 1699 में मार्शल सिख खालसा आंदोलन के जन्म के बाद, 18 वीं और 19 वीं शताब्दी के दौरान, हनुमान खालसा द्वारा श्रद्धा की प्रेरणा और उद्देश्य थे।कुछ खालसा रेजीमेंट हनुमान छवि के साथ युद्ध के मैदान में लाई गईं। हिरदा राम भल्ला द्वारा रचित हनुमान नाटक, और कविकान द्वारा दास गुर कथा जैसे सिख ग्रंथ हनुमान के वीर कर्मों का वर्णन करते हैं।लुई फेनच के अनुसार, सिख परंपरा में कहा गया है कि गुरु गोविंद सिंह हनुमान नाटक के प्रिय पाठक थे।

दक्षिण पूर्व एशियाई ग्रंथ[संपादित करें]

रामायण के गैर-भारतीय संस्करण मौजूद हैं, जैसे थाई रामाकियन। रामायण के इन संस्करणों के अनुसार, मैकचनु सुवर्णमचा द्वारा जन्मे हनुमान के पुत्र हैं, जब "रावण के महल में आग लगाने के बाद हनुमान उड़ते हैं, अत्यधिक गर्मी से उनका शरीर और समुद्र में गिरने पर उनके पसीने की एक बूंद जो एक शक्तिशाली मछली द्वारा खाई जाती है" उसने स्नान किया और उसने रावण की बेटी मच्चनू को जन्म दिया।

एक अन्य किंवदंती में कहा गया है कि मत्स्यराज (जिसे मकरध्वज या मत्स्यगर्भा के नाम से भी जाना जाता है) नामक एक राक्षसी उनके पुत्र होने का दावा करती है। मत्स्यराज का जन्म इस प्रकार बताया गया है: एक मछली (मत्स्य) को हनुमान के पसीने की बूंदों से लगाया गया था, जब वह समुद्र में स्नान कर रही थी। दक्षिण-पूर्व एशियाई ग्रंथों में हनुमान बर्मीज़ रामायण में विभिन्न तरीकों से उत्तर भारतीय हिंदू संस्करण से भिन्न होते हैं, जैसे कि राम यगन, अलौंग राम थायगिन (अराकानी बोली में), राम वटु और राम थायीन, मलय रामायण, जैसे हिकायत श्री राम। और हिकायत महाराजा रावण, और रामायण जैसे थाई रामायण। हालाँकि, कुछ मामलों में, कहानी के पहलू हिंदू संस्करणों और रामायण के बौद्ध संस्करणों के समान हैं जो भारतीय उपमहाद्वीप में कहीं और पाए जाते हैं। वाल्मीकि रामायण मूल पवित्र ग्रन्थ है; अन्य लोगों को लोक नृत्य की तरह कला प्रदर्शन के लिए कवियों द्वारा संस्करण संपादित किए जाते हैं, रामायण की सच्ची कहानी वाल्मीकि है, ऋषि वाल्मीकि को आदिकवि "पहला कवि" के रूप में जाना जाता है।

चित्र:DakhshinMukhi.jpg
श्री बालाजी महाराज सन्जीवनी बूटी का पर्वत उठाए हुए।

बारह नाम , उनके अर्थ और उनका महत्व[संपादित करें]

  • हनुमान - जिनकी ठोड़ी टूटी हो
  • रामेष्ट - श्री राम भगवान के भक्त
  • उधिकर्मण - उद्धार करने वाले
  • अंजनीसुत - अंजनी के पुत्र
  • फाल्गुनसखा - फाल्गुन अर्थात् अर्जुन के सखा
  • सीतासोकविनाशक - देवी सीता के शोक का विनाश करने वाले
  • वायुपुत्र - हवा के पुत्र
  • पिंगाक्ष - भूरी आँखों वाले
  • लक्ष्मण प्राणदाता - लक्ष्मण के प्राण बचाने वाले
  • महाबली - बहुत शक्तिशाली वानर
  • अमित विक्रम - अत्यन्त वीरपुरुष
  • दशग्रीव दर्प: - रावण के गर्व को दूर करने वाले

हनुमान जी के बारह नामों का नित्य नियम से पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती हैं।

प्रातः काल उठते ही हनुमान जी के बारह नामों का 11 बार पाठ करने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है।

दोपहर के समय हनुमान जी के बारह नामों के पाठ करने से लक्ष्मी जी की प्राप्ति होती हैं। धन-धान्य की वृद्धि होती है और घर में संपन्नता रहती हैं।

संध्याकाल हनुमान जी के बारह नामों का पाठ करने से पारिवारिक सुखों की प्राप्ति होती है।

रात को सोते समय हनुमान जी के बारह नामों का जाप करने से शत्रु का नाश होता है।

मंगलवार को ये बारह नाम लाल स्याही से भोजपत्र पर लिखकर तावीज बनाकर बाजु पर बंधने से कभी सिर दर्द नहीं होता तथा शनिदेव की साढ़े साती और अढईया से मुक्ति मिलती है

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Corona Se Karunanidhi Ki Or". Rajmangal Publishers. अभिगमन तिथि 2 जुलाई 2020.
  2. तनूरुहपदान्ते तु रुद्रावतार संवदेत्। । लङ्कापुरी ततः पश्चाद्दहनोदधिलङ्घन। । ७४-७४। । नारदपुराणम्- पूर्वार्धः/अध्यायः ७४
  3. "कबीर साहिब का श्री हनुमान जी को शरण में लेना | Kabir". kabirsahib.jagatgururampalji.org. अभिगमन तिथि 2022-04-16.
  4. "हनुमान जी के 12 नाम". आज तक. मूल से 6 अक्तूबर 2017 को पुरालेखित.