लक्ष्मणरेखा

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रावण लक्ष्मणरेखा पार करते हुए

रामायण के एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार वनवास के समय सीता के आग्रह के कारण राम मायावी स्वर्ण म्रग के आखेट हेतु उसके पीछे गये। थोड़ी देर में सहायता के लिए राम की पुकार सुनाई दी, तो सीता ने लक्ष्मण से जाने को कहा। लक्ष्मण ने बहुत समझाया कि यह सब किसी की माया है, पर सीता न मानी। तब विवश होकर जाते हुए लक्ष्मण ने कुटी के चारों ओर अपने धनुष से एक रेखा खींच दी कि किसी भी दशा में इस रेखा से बाहर न आना। तपस्वी के वेश में आए रावण के झाँसे में आकर सीता ने लक्ष्मण की खींची हुई रेखा से बाहर पैर रखा ही था कि रावण उसका अपहरण कर ले गया। उस रेखा से भीतर रावण सीता का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। तभी से आज तक लक्ष्मणरेखा नामक उक्ति इस आशय से प्रयुक्त होती है कि, किसी भी मामले में निश्चित हद को पार नही करना है, वरना बहुत हानि उठानी होगी। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस मे इसका कोई उल्लेख नही है।