लंगोट

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

लंगोट पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला एक अन्त:वस्त्र है। यह पुरुष जननांग को ढककर एवं दबाकर रखने में सहायता करता है। भारत में इसका उपयोग पहले बहुत होता था। आजकल भी ब्रह्मचारी, साधु-सन्त, अखाड़ा लड़ने वाले पहलवान आदि इसका उपयोग करते हैं।

लंगोट किसी भी रंग का हो सकता है किन्तु लाल लंगोट विशेष रूप से लोकप्रिय है। यह पूरी तरह से खुला हुआ त्रिकोणाकार कपड़े का बना होता है।


हरीयाना में कबुली झाड़ीया १९९५ के दशक में बाड़ के समय आई और अचानक इतनी ज्यादा फैल गई जिस प्रकार जम्मु कश्मीर में कबुली लोग व सेना आगई किसी व्यक्ति ने कहा दिया कि जिस प्रकार काबुली लोगों कि संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी इसी प्रकार यहां भी पहाड़ी किकर (किकर हरीयाना में झाड़ीयों को कहते हैं।) संख्या बढ़ती जा रही थी इस लिए इन्हें कबुली किकर बोलने लगे‌‌....

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

गांव में परंपरागत भैंरों भव्य मन्दीर है। जो लालित खेड़ा (गोहाना रोड़) से जुलाना जानें वाला नन्दगढ़ रोड़ है बिच में ही है । जो कि डिगाना से अलग हुआ १९५७ में बना था। जो निज़ाम पुर कि बाऀर्डर के साथ लगता है। यहां इक तरफ सुंन्दर ब्रान्च व दुसरी और मयन्रर (रजभाया) है २५०० ऐकड़ जमिन को सिंचाई की जाती है। गांव का पहला सरपंच प्रभू उज्जाला २ बदलू राम दिया ३ वेद सिंह बेदू वीर सिंह ४दयान्दन पुर्ण ५ हरि सिंह ६ कृष्णा देवी गोर्धन दो बार व उप-सरपंच प्रकाश ७बलवान ८ रनवीर धानक ९ सुमन देवी महिला १० रवीन्द्र गांव का साधारण तय विकास हुआ। पहले नन्दगढ़ कि पंचायत कार्य करती थी। २५० वर्ष पहले बसा व अस्तित्व में १९५६ में आया