यज्ञोपवीत

उपनयन या यज्ञोपवीत संस्कार हिन्दुओं का एक प्रमुख संस्कार है जो (प्राचीन काल में) बालक के गुरु या आचार्य के पास जाने का सूचक था। 'उपनयन' का शाब्दिक अर्थ है- 'निकट लाना' या 'पास ले जाना'। मानवग्रह्यसूत्र एवं काठक गृह्यसूत्र ने ‘उपनयन’ के स्थान पर ‘उपायन’ शब्द का प्रयोग किया है। काठक के टीकाकार आदित्यदर्शन ने कहा है कि उपानय, उपनयन, मौञ्चीबन्धन, बटुकरण, व्रतबन्ध समानार्थक हैं। परम्परानुसार, चार वर्णों में से तीन वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का उपनयन होता था। प्राचीन काल में कन्याओं का भी उपनयन करने की प्रथा थी। कूर्मपुराण में इसका उल्लेख है । [1]
यह संस्कार प्राचीन काल में उस समय होता था, जब विद्या पढ़ने के लिये बालक को गुरु के पास ले जाते थे । इस संस्कार के उपरान्त बालक को स्नातक होने तक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना पड़ता था और भिक्षावृत्ति से अपना तथा अपने गुरु का निर्वाह करना पड़ता था । इसमें कुछ विशिष्ट धार्मिक कृत्य करके बालक के गले में यज्ञोपवीत (जनेऊ) पहना दिया जाता है । ब्राह्मण बालक के लिये ८वें वर्ष, क्षत्रिय बालक के लिये ११वें वर्ष और वैश्य बालक के लिये १२वें वर्ष यह संस्कार करने का विधान है। अन्यान्य संस्कारों की भांति यह संस्कार भी आजकल नाममात्र के लिये रह गया है।

उपनयन संस्कार में यज्ञोपवीत पहना जाता है और विद्यारम्भ होता है। मुण्डन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अङ्ग होते हैं। उपनयन संस्कार के विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम प्रचलित हैं-
- संस्कृत -- उपनयनम्
- कश्मीरी -- मेखल
- पंजाबी -- जनेऊ (ਜਨੇਓ)
- राजस्थानी -- उपनेन/उपवीत
- गुजराती -- जानोइ (જાનોઇ)
- सिन्धी -- जन्या
- मराठी -- मुंज
- कोंकणी -- मुंजी
- बांग्ला -- पोईते (পৈতে) या उपोनॉयोन (উপনয়ন)
- ओडिया -- ब्रतघर/बड़ुघर (ବ୍ରତଘର/ବଡ଼ୁଘର)
- असमिया -- लगुण दिओनी (লগুণ দিওনী)
- नेपाली -- ब्रतबन्ध
- नेवाड़ी -- छेवार
- कन्नड -- उपनयन (ಉಪನಯನ)
- तेलुगु -- उपनयनमु (ఉపనయనము)
- मलयालम -- उपनयनम् (ഉപനയനം)
- तमिल -- उपनयनम् या पुणूल् (உபநயனம் or பூணூல்)
विधि
[संपादित करें]उपनयन के लिए जो शुभमुहूर्त निश्चित हुआ हो, उसके एक दिन पूर्व से (या तीन दिन पहले से) कुमार को केवल दूध पीना चाहिए । बटु संकल्प लेता है कि इच्छानुसार आचरण करने, इच्छानुसार भाषण करने एवं मनोवांछित खान-पान इत्यादि करने के कारण उत्पन्न दोषों का निरसन मैं तीन कृच्छ्र प्रायश्चित कर अथवा धनदान से करूंगा । पुत्र का उपनयन करने का प्रथम अधिकार उसके पिता का होता है। उपनयनकर्त्ता (पिता) यह व्रत लेता है कि इस कुमार को उपनयन का अधिकार प्राप्त होने के लिए गायत्री मंत्र का १२ सहस्र बार जाप करूंगा । कुमार के उपनयन में ग्रहानुकूलता की सिद्धि होने एवं श्री परमेश्वर की प्रीति प्राप्त करने के लिए गृहयज्ञ करूंगा । बृहस्पति उपनयनके प्रमुख देवता हैं । यह संस्कार निर्विघ्न रूप से पूर्ण हो, इस उद्देश्य से मंडपदेवता (बृहस्पति) एवं आवघ्नगणपति की प्रतिष्ठा करने की प्रथा है। कुमार का मुण्डन किया जाता है। बालक माता के साथ भोजन करता है (मातृकाभोजन)। माता के साथ उसकी थाली से कुमार का यह भोजन अंतिम भोजन होता है। उपनयन करने वाले पिता एवं पुत्र के बीच अंतःपट पकड़ कर मंगलाष्टक बोले जाते हैं। पिता को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने वाला पहला गुरु (आचार्य) मानते हैं । पिता एवं कुमार के बीच का अंतःपट हटाकर उनके बीच के अंतर को मिटा दिया जाता है। त्रिगुणित किए सूत कुमार की कमर में बांधकर उसे कौपीन (लंगोटी) पहनाई जाती है। मंत्रोच्चारण के साथ कुमार को अजिन (चर्म) धारण करवाया जाता है। साधारणतः मृगाजिन (हिरण के चमड़े का टुकडा) देते हैं, क्योंकि आगे चलकर साधना के लिए अजिन पर ही बैठना होता है। इसके पश्चात यज्ञोपवीत हाथ में लेकर, दस बार गायत्री मंत्र का उच्चारण कर, अभिमंत्रित जल से उस पर प्रोक्षण कराकर वह यज्ञोपवीत कुमार को धारण करने के लिए दिया जाता है। तत्पश्चात गायत्री मंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।) सिखाते हैं। अनुप्रवचनीय होम और पुरोहित के भोजन के लिए आवश्यकता अनुसार बटु चावल की भिक्षा मांगता है। सर्वप्रथम माता के पास जाकर "ॐ भवति भिक्षां देहि" (‘आप भिक्षा दीजिए’) ऐसा कहता है । पश्चात पिता से भी वही कहता है। इसी प्रकार अन्य आप्त जनों से भिक्षा मांगकर वह भिक्षान्न आचार्यों को देता है।
- आचारबोध एवं बटुव्रत
आचार्य बटु को उपदेश देते हैं कि तुम ब्रह्मचारी हो इसलिए,
१. मूत्र, पुरीषोत्सर्ग (शौच के लिए जाना), भोजन, मार्ग पर चलना, निद्रा जैसे कृत्य करने पर शुद्धि हेतु आचमन करते जाओ ।
२. संध्या, औपासन, होम इत्यादि नित्यकर्म प्रतिदिन करते जाओ ।
३. दिन में निद्रा नहीं लेना ।
४. आचार्यों के आधीन रहकर वेदपाठ करना ।
५. प्रातःकाल तथा संध्याकाल भिक्षा मांगने जाना।
६. संध्याकाल तथा प्रातःकाल अग्नि में समिधा देना।
७. बारह वर्ष अथवा वेदाध्ययन पूर्ण हो जाने तक ब्रह्मचर्य का पालन करना ।
८. जो पुरुष अथवा स्त्री तुम्हें कुछ न कुछ भिक्षा दिए बिना नहीं लौटने देते, उनसे भिक्षा मांगने जाते रहना।
बटु यह व्रत लेता है कि मैं आचारबोध का पालन करूँगा, लवण (नमक) एवं क्षार वर्जित करूँगा, भूमि पर (पलंग पर नहीं) सोउँगा।
विभिन्न ग्रन्थों में उपनयन का सन्दर्भ
[संपादित करें]