अदिति

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अदिति
देवमाता
Lord Brahma and Adhiti - 19th Century Illustration.jpg
ब्रह्मा के साथ अदिति (दक्षिणतः) १९ शताब्दी का चित्र
संबंध सरस्वती का अवतार[कृपया उद्धरण जोड़ें]
अस्त्र असि, त्रिशूल
जीवनसाथी कश्यप
बच्चे आदित्य, वामन
सवारी कुक्कुट
शास्त्र ऋग्वेद

अदिति कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी थीं।[1][2] इनके बारह पुत्र हुए जो आदित्य कहलाए (अदितेः अपत्यं पुमान् आदित्यः)। उन्हें देवता भी कहा जाता है। अतः अदिति को देवमाता कहा जाता है। संस्कृत शब्द अदिति का अर्थ होता है 'असीम'।

परिवार[संपादित करें]

अदिति दक्ष प्रजापति की पुत्री थी। इनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ था। अदिति की सपत्नी का नाम दिति था। दिति के पुत्र दैत्य कहलाते हैं ( दितेः पुत्राः दैत्याः)। अदिति के बारह पुत्र हुए जिनमें से मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, भग, विवस्वान्, आदित्य, रुद्र, इन्द्र इत्यादि प्रमुख हैं। खगोलीय दृष्टि से अन्तरिक्ष में द्वादश आदित्य भ्रमण करते हैं, वे आदित्य अदिति के पुत्र हैं। अदिति के पुण्यबल से ही उनके पुत्रों को देवत्व प्राप्त हुआ।

अदिति का एक पुत्र गर्भ में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया था। परन्तु अदिति ने अपने तपोबल से उसे पुनरुज्जीवित किया था। उस पुत्र का नाम मार्तण्ड था। वह मार्तण्ड विश्वकल्याण के लिये अन्तरिक्ष में गतमान् है।

परिचय[संपादित करें]

ऋग्वेद में अदिति को माता के रूप में स्वीकारा गया है। उस मातृदेवी की स्तुति में उस वेद में बीस मंत्र कहे गए हैं। उन मन्त्रों में अदितिर्द्यौः ये मन्त्र अदिति को माता के रूप में प्रदर्शित करता है -

 

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स-पिता स-पुत्रः ।

विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् [3]

यह मित्रावरुण, अर्यमन्, रुद्रों, आदित्यों इंद्र आदि की माता हैं। इंद्र और आदित्यों को शक्ति अदिति से ही प्राप्त होती है। उसके मातृत्व की ओर संकेत अथर्ववेद (7.6.2) और वाजसनेयिसंहिता (21,5) में भी हुआ है। इस प्रकार उसका स्वाभाविक स्वत्व शिशुओं पर है और ऋग्वैदिक ऋषि अपने देवताओं सहित बार बार उसकी शरण जाता है एवं कठिनाइयों में उससे रक्षा की अपेक्षा करता है।

अदिति अपने शाब्दिक अर्थ में बंधनहीनता और स्वतंत्रता की द्योतक है। 'दिति' का अर्थ बँधकर और 'दा' का बाँधना होता है। इसी से पाप के बंधन से रहित होना भी अदिति के संपर्क से ही संभव माना गया है। ऋग्वेद (1,162,22) में उससे पापों से मुक्त करने की प्रार्थना की गई है। कुछ अर्थों में उसे गो का भी पर्याय माना गया है। ऋग्वेद का वह प्रसिद्ध मंत्र (8,101,15)- मा गां अनागां अदिति वधिष्ट- गाय रूपी अदिति को न मारो। -जिसमें गोहत्या का निषेध माना जाता है - इसी अदिति से संबंध रखता है। इसी मातृदेवी की उपासना के लिए किसी न किसी रूप में बनाई मृण्मूर्तियां प्राचीन काल में सिंधुनद से भूमध्यसागर तक बनी थीं।

सूर्यजन्म[संपादित करें]

स्वर्गलोक की सत्ता के लोभ में दैत्यों और देवों में शत्रुता हो गई। दैत्यों और देवों के परस्पर युद्ध आरम्भ हो गये। एक समय दोनों पक्षों में भयङ्कर युद्ध हुआ। अनेक वर्षों तक वो युद्ध चला। उस युद्ध में देवों का दैत्यों स पराजय हो गया। सभी देव वनो में विचरण करने लगे। उनकी दुर्दशा को देखकर अदिति और कश्यप भी दुःखी हुए। पश्चात् नारद मुनि के द्वारा सूर्योपासना का उपाय बताया गया। अदिति ने अनेक वर्षों पर्यन्त सूर्य की घोर तपस्या की। सूर्य देव अदिति के तप से प्रसन्न हुए। उन्होंने साक्षात् दर्शन दिये और वरदान माँगने को कहा।

अदिति ने सूर्य की स्तुति की। तत्पश्चात् अदिति द्वारा वरदान माँगा गया कि – “आप मेरे पुत्र रूप में जन्म लेवें”। कालान्तर में सूर्य का तेज अदिति के गर्भ में प्रतिष्ठित हुआ । किन्तु एक बार अदिति और कश्यप के मध्य कलह उत्पन्न हो गया। क्रोध में कश्यप अदिति के गर्भस्थ शिशु को “मृत” शब्द से सम्बोधित कर बैठे। उसी समय अदिति के गर्भ से एक प्रकाशपुञ्ज बाहर आया। उस प्रकाशपुञ्ज को देखकर कश्यप भयभीत हो गये। कश्यप ने सूर्य से क्षमा याचना की। तब ही आकाशवाणी हुई कि – “आप दोनों इस पुञ्ज का प्रतिदिन पूजन करें। उचित समय होते ही उस पुञ्ज से एक पुत्ररत्न जन्म लेगा। वो आप दोनों की इच्छा को पूर्ण करके ब्रह्माण्ड में स्थित होगा।

समयान्तर में उस पुञ्ज से तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। वही “आदित्य” या “मार्तण्ड” नाम से विख्यात है। आदित्य का तेज असहनीय था। अतः युद्ध में दैत्य आदित्य के तेज को देखकर ही पलायन कर गये। सर्वे दैत्य पाताललोक में चले गये। अन्त में आदित्य सूर्यदेव स्वरूप में ब्रह्माण्ड के मध्यभाग में स्थित हुए और ब्रह्माण्ड का सञ्चालन करते हैं[4]

दिति का शाप[संपादित करें]

दक्षप्रजापत की दिति और अदिति दो पुत्रीयाँ थीं। कश्यप ऋषि के साथ उन दोनों का विवाह हुआ था। अदिति ने इन्द्र को जन्म दिया। वह तेजस्वी था। अतः दिति ने भी कश्यप ऋषि से एक तेजस्वी पुत्र की याचना की। तब महर्षि ने पयोव्रत नामक उत्तम व्रत करने का उपाय प्रदान किया। महर्षि की आज्ञानुसार दिति ने उस व्रत को किया। समयान्तर में दिति का शरीर दुर्बल हो गया।

एक बार अदिति की आज्ञानुसार इन्द्र दिति की सेवा करने के लिये गया। इन्द्र ने छलपूर्वक दिति के गर्भ के सात भाग कर दिये। जब वें शिशु रुदन कर रहे थे, तब इन्द्र ने कहा – “मा रुदन्तु” । तत् पश्चात् पुनः प्रत्येक गर्भ के सात विभाग किये। इस प्रकार उनचास (४९) पुत्रों का जन्म हुआ। वें पुत्र मरुद्गण कहे जाते हैं, जो कि उनचास हैं। इन्द्र के अभद्र कार्य से क्रुद्ध दिति अदिति को शाप देती है कि – “इन्द्र का राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। जैसा अदिति ने मेरे गर्भ को गिराया, वैसे ही उसका भी पुत्र जन्म समय में ही नष्ट हो जाएगा”।

शाप के प्रभाव से हि द्वापरयुग में कश्यप ऋषि का वसुदेव के स्वरूप में, अदिति का देवकी के रूप में और दिति का रोहिणी के रूप में जन्म हुआ। देवकी के सात पुत्रों की कारागार में कंस ने हत्या कर दी। तत् पश्चात् अष्टम पुत्र विष्णु के अवतार भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। अन्त में कृष्ण ने अपने मातुल (मामा) कंस का वध किया था [5]

वामन अवतार[संपादित करें]

राजा बलि दैत्यराज थे। देवों और राजा बलि के मध्य युद्ध होते ही रहते थे। अन्त में देव पराजित हुए । देवों की स्थिति दयनीय हो चुकी थी। उनकी माता अदिति भी अपने पुत्रों के दुःख से दुःखी थीं। उस समय कश्यप ऋषि वन में तपस्या कर रहे थे। जब उनका तप पूर्ण हुआ, तो अदिति ने देवों की स्थिति सुनाई। देवों के कल्याण के लिये उपाय भी उन्ह से पूछा। पयोव्रत पूर्वक विष्णु की भक्ति का उपाय कश्यप ऋषि ने बताया।

अदिति द्वारा पयोव्रत पूर्वक भगवान् विष्णु की उपासना की गई। कुछ दिनो के अनन्तर भगवान् विष्णु प्रसन्न हुए। भगवान् विष्णु प्रकट हो कर बोले कि – “हे देवि ! आपने श्रद्धा पूर्वक मेरी उपासना की है। अतः “मैं आपके गर्भ से अवतार धारण करूंगा। वह मेरा वामन अवतार होगा। मैं दैत्यों का संहार और देवों का रक्षण करूंगा” ये आपको वर देता हूँ।

कश्यप ऋषि भविष्यदर्शी थे। अतः वह पूर्व ही अगवत थे कि – “विष्णु अदिति के गर्भ से वामन अवतार धारण करेंगे” । तत्पश्चात् वें अपने तेज से अदिति के गर्भ में प्रवेश कर गये। समयान्तर में भगवान् विष्णु का वामन अवतार हुआ।

गाय के रूप में[संपादित करें]

गाय भी अदिति का स्वरूप है ऐसा ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में प्राप्त होता है –

 

माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः ।

प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥१५॥

अर्थात् – “गो स्वरूपा अदिति का वध न करें” । गाय को अदिति का स्वरूप माना जाता है।[6]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Hindu Mythology, Vedic and Puranic: Part I. The Vedic Deities: Chapter IV. Aditi, and the Ādityas". Sacred-texts.com. http://www.sacred-texts.com/hin/hmvp/hmvp08.htm. अभिगमन तिथि: 2017-05-07. 
  2. Editors, The (1995-09-02). "Aditi | Hindu deity" ((अंग्रेजी) में). Britannica.com. https://www.britannica.com/topic/Aditi. अभिगमन तिथि: 2017-05-07. 
  3. ऋग्वेदः १/८९/१०
  4. पुराणों की कथाएँ, पृ. – ७६-७७
  5. http://www.sansthanam.com/blog.php?id=7
  6. https://sa.wikisource.org/wiki/ऋग्वेद:_सूक्तं_८.१०१

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]