वामनावतार

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भगवान वामन
Dasavatara5.png
भगवान वामन राजा बलि से जल स्वीकार करते हुये।
अन्य नाम आदित्य, उपेन्द्र, विक्रम, त्रिविक्रम, काश्यप, अदितिनन्दन आदि।
संबंध [स्वयं भगवान]
निवासस्थान वैकुण्ठ
मंत्र ॐ वामनाय नम:
अस्त्र कमण्डल , छत्र (छतरी) , जपमाला और पुस्तक
जीवनसाथी ब्रह्मचारी
माता-पिता
भाई-बहन इन्द्र , विवस्वान् और वरुण सहित अन्य आदित्य
शास्त्र भागवत पुराण, विष्णु पुराण, वामन पुराण
त्यौहार श्रवण द्वादशी (वामन द्वादशी) अथवा श्रोणम् (ओणम)
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वामन कुएँ से पानी निकालने जाते हुए

श्री वामन भगवान विष्णु के अवतार है। त्रेतायुग के प्रारम्भ होने में भगवान विष्णु ने वामन रूप में देवी अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए। इसके साथ ही यह भगवान विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए — बालक रूपी ब्राह्मण अवतार । दक्षिण भारत में इनके मूल नाम उपेन्द्र से जाना जाता है। इनके पिता प्रजापति कश्यप थे तथा माता अदिति थीं। इनके बड़े भाई विवस्वान् , इन्द्र, वरुण , पूषा , अर्यमा , भग , धाता , पर्जन्य , अंशुमान , त्वष्टा और मित्र थे।

उत्पत्ति[संपादित करें]

भगवान वामन नारायण

भगवान वामन ऋषि कश्यप तथा उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे।[1] वह आदित्यों में बारहवें थे। ऐसी मान्यता है कि वह इन्द्र के छोटे भाई थे।

कथा[संपादित करें]

भगवान वामन को तीन पैरों वाला दर्शाया गया है। त्रिविक्रम रूप में एक पैर धरती पर, दूसरा आकाश अर्थात् देवलोक पर तथा तीसरा बलि के सिर पर।

भागवत कथा के अनुसार विष्णु ने इन्द्र का देवलोक में अधिकार पुनः स्थापित करने के लिए यह अवतार लिया। देवलोक असुर राजा बलि ने हड़प लिया था। बलि विरोचन के पुत्र तथा विष्णु भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे और एक दयालु असुर राजा के रूप में जाने जाते थे। यह भी कहा जाता है कि अपनी तपस्या तथा शक्ति के माध्यम से बलि ने त्रिलोक पर आधिपत्य पा लिया था।[2] वामन, एक बौने ब्राह्मण के वेष में बलि के पास गये और उनसे अपने रहने के लिए तीन पग भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छत्र (छाता) था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने पर भी बलि ने वामन को वचन दे डाला।

राजा बलि से जल स्वीकारते भगवान वामनदेव

भगवान वामन ने अपना आकार इतना बढ़ा लिया कि पहले ही पग में पूरा भूलोक (पृथ्वी) नाप लिया। दूसरे पग में देवलोक नाप लिया। इसके पश्चात् ब्रह्मा ने अपने कमण्डल के जल से वामन के पाँव धोये। इसी जल से गंगा उत्पन्न हुयीं।[3] तीसरे पग के लिए कोई भूमि बची ही नहीं। वचन के पक्के बली ने तब वामन को तीसरा पग रखने के लिए अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। वामन बलि की वचनबद्धता से अति प्रसन्न हुये। यतः राजा बलि के दादा प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम् भक्त थे, भगवान वामन (विष्णु) ने बलि को सुुताल लोक देने का निश्चय किया और अपना तीसरा पग बलि के सिर में रखा जिसके फलस्वरूप बलि सुताल में पहुँच गये।
एक और कथा के अनुसार वामन ने बलि के सिर पर अपना पैर रखकर उनको अमरत्व प्रदान कर दिया।[4] विष्णु अपने विराट रूप में प्रकट हुये और राजा को महाबलि की उपाधि प्रदान की क्योंकि बलि ने अपनी धर्मपरायणता तथा वचनबद्धता के कारण अपने आप को महात्मा सिद्ध कर दिया था। विष्णु ने महाबलि को आध्यात्मिक आकाश जाने की अनुमति दे दी जहाँ उनका अपने सद्गुणी दादा प्रहलाद तथा अन्य दैवीय आत्माओं से मिलना हुआ।[4]

भगवान वामन जी का शिलाचित्र, पाटण गुजरात

बलि का विवरन[संपादित करें]

बलि के १०० पुत्र थे. ज्येष्ठ पुत्र का नाम था बाणासुर .

प्रतीकात्मकता[संपादित करें]

भगवान त्रिविक्रम (वामन) का भित्ति शिलाचित्र।

वामनावतार के रूप में विष्णु ने बलि को यह पाठ दिया कि दम्भ तथा अहंकार से जीवन में कुछ नहीं मिलता है और यह भी कि धन-सम्पदा क्षणभंगुर होती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु के दिये वरदान के कारण प्रति वर्ष बलि प्रतिपदा पर राजा बलि धरती पर आगमन करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी प्रजा सुखी रहे। [4]

रामायण में[संपादित करें]

अध्यात्म रामायण के अनुसार राजा बलि भगवान वामन के सुतल लोक में द्वारपाल बन गये[5][6] और सदैव बने रहेंगे।[7] तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस में भी इसका ऐसा ही उल्लेख है।[8]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. मनुस्मृति Archived 2008-07-06 at the Wayback Machine सन् १८४० ई. में होरेस हेमैन विल्सन द्वारा अनुवादित विष्णु पुराण की पुस्तक संख्या ३ अध्याय १ में श्लोक २६५:२२
  2. "वामनावतार". मूल से 5 अप्रैल 2011 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2012-04-11.
  3. "देवगण". सनातन सोसाइटी. मूल से 3 मई 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2012-04-11.
  4. "त्रिविक्रम". वैखरी. मूल से 12 मार्च 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2012-04-11.
  5. P. 281 The Adhyatma Ramayana: Concise English Version By Chandan Lal Dhody
  6. P. 134 Srī Rūpa Gosvāmī's Bhakti-rasāmṛta-Sindhuh By Rūpagosvāmī, Bhakti Hridaya Bon
  7. P. 134 Sri Rūpa Gosvāmīs Bhakti-rasāmrta-sindhuh By Rūpagosvāmī
  8. P. 246 Complete Works of Gosvami Tulsidas By Satya Prakash Bahadur, Tulasīdāsa