गाय

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अभारतीय गाय
जर्सीगाय

गाय एक महत्त्वपूर्ण पालतू जानवर है जो संसार में प्राय: सर्वत्र पाई जाती है। इससे उत्तम किस्म का दूध प्राप्त होता है। हिन्दू, गाय को 'माता' (गौमाता) कहते हैं। इसके बछड़े बड़े होकर गाड़ी खींचते हैं एवं खेतों की जुताई करते हैं।

भारत में वैदिक काल से ही गाय का विशेष महत्त्व रहा है। आरंभ में आदान प्रदान एवं विनिमय आदि के माध्यम के रूप में गाय उपयोग होता था और मनुष्य की समृद्धि की गणना उसकी गोसंख्या से की जाती थी। हिन्दू धार्मिक दृष्टि से भी गाय पवित्र मानी जाती रही है तथा उसकी हत्या महापातक पापों में की जाती है।[1] [2]

गाय व भैंस में गर्भ से संबन्धित जानकारी
  • सम्भोग काल - वर्ष भर, तथा गर्मिओं में अधिक
  • वर्ष में गर्मी के आने का समय - हर 18 से 21 दिन (गर्भ न ठहरने पर) ; 30 से 60 दिन में (व्याने के बाद)
  • गर्मी की अवधि - 20 से 36 घंटे तक
  • कृत्रिम गर्भधान व वीर्य डालने का समय - मदकाल आरम्भ होने के 12 से 18 घंटे बाद
  • गर्भ जांच करवाने का समय - कृत्रिम गर्भधान का टीका कराने के 60 से 90 दिनों में
  • गर्भकाल - गाय 275 से 280 दिन ; भैंस 308 दिन

भारतीय गाय[संपादित करें]

भारत में गाय की ३० नस्लें पाई जाती हैं।[3] रेड सिन्धी, साहिवाल, गिर, देवनी, थारपारकर आदि नस्लें भारत में दुधारू गायों की प्रमुख नस्लें हैं।

लोकोपयोगी दृष्टि में भारतीय गाय को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। पहले वर्ग में वे गाएँ आती हैं जो दूध तो खूब देती हैं, लेकिन उनकी पुंसंतान अकर्मण्य अत: कृषि में अनुपयोगी होती है। इस प्रकार की गाएँ दुग्धप्रधान एकांगी नस्ल की हैं। दूसरी गाएँ वे हैं जो दूध कम देती हैं किंतु उनके बछड़े कृषि और गाड़ी खींचने के काम आते हैं। इन्हें वत्सप्रधान एकांगी नस्ल कहते हैं। कुछ गाएँ दूध भी प्रचुर देती हैं और उनके बछड़े भी कर्मठ होते हैं। ऐसी गायों को सर्वांगी नस्ल की गाय कहते हैं। भारत की गोजातियाँ निम्नलिखित हैं:

सायवाल जाति[संपादित करें]

सायवाल गायों में अफगानिस्तानी तथा गीर जाति का रक्त पाया जाता है। इन गायों का सिर चौड़ा, सींग छोटी और मोटी, तथा माथा मझोला होता है। ये पंजाब में मांटगुमरी जिला और रावी नदी के आसपास लायलपुर, लोधरान, गंजीवार आदि स्थानों में पाई जाती है। ये भारत में कहीं भी रह सकती हैं। एक बार ब्याने पर ये १० महीने तक दूध देती रहती हैं। दूध का परिमाण प्रति दिन १०-१६ लीटर होता है। इनके दूध में मक्खन का अंश पर्याप्त होता है।

सिंधी[संपादित करें]

इनका मुख्य स्थान सिंध का कोहिस्तान क्षेत्र है। बिलोचिस्तान का केलसबेला इलाका भी इनके लिए प्रसिद्ध है। इन गायों का वर्ण बादामी या गेहुँआ, शरीर लंबा और चमड़ा मोटा होता है। ये दूसरी जलवायु में भी रह सकती हैं तथा इनमें रोगों से लड़ने की अद्भुत शक्ति होती है। संतानोत्पत्ति के बाद ये ३०० दिन के भीतर कम से कम २००० लीटर दूध देती हैं।

काँकरेज[संपादित करें]

कच्छ की छोटी खाड़ी से दक्षिण-पूर्व का भूभाग, अर्थात् सिंध के दक्षिण-पश्चिम से अहमदाबाद और रधनपुरा तक का प्रदेश, काँकरेज गायों का मूलस्थान है। वैसे ये काठियावाड़, बड़ोदा और सूरत में भी मिलती हैं। ये सर्वांगी जाति की गाए हैं और इनकी माँग विदेशों में भी है। इनका रंग रुपहला भूरा, लोहिया भूरा या काला होता है। टाँगों में काले चिह्न तथा खुरों के ऊपरी भाग काले होते हैं। ये सिर उठाकर लंबे और सम कदम रखती हैं। चलते समय टाँगों को छोड़कर शेष शरीर निष्क्रिय प्रतीत होता है जिससे इनकी चाल अटपटी मालूम पड़ती है।

मालवी[संपादित करें]

ये गायें दुधारू नहीं होतीं। इनका रंग खाकी होता है तथा गर्दन कुछ काली होती है। अवस्था बढ़ने पर रंग सफेद हो जाता है। ये ग्वालियर के आस-पास पाई जाती हैं।

नागौरी[संपादित करें]

इनका प्राप्तिस्थान जोधपुर के आस-पास का प्रदेश है। ये गायें भी विशेष दुधारू नहीं होतीं, किंतु ब्याने के बाद बहुत दिनों तक थोड़ा-थोड़ा दूध देती रहती हैं।

थरपारकर[संपादित करें]

ये गायें दुधारू होती हैं। इनका रंग खाकी, भूरा, या सफेद होता है। कच्छ, जैसलमेर, जोधपुर और सिंध का दक्षिणपश्चिमी रेगिस्तान इनका प्राप्तिस्थान है। इनकी खुराक कम होती है।

पवाँर[संपादित करें]

पीलीभीत, पूरनपुर तहसील और खीरी इनका प्राप्तिस्थान है। इनका मुँह सँकरा और सींग सीधी तथा लंबी होती है। सींगों की लबाई १२-१८ इंच होती है। इनकी पूँछ लंबी होती है। ये स्वभाव से क्रोधी होती है और दूध कम देती हैं।

भगनाड़ी[संपादित करें]

नाड़ी नदी का तटवर्ती प्रदेश इनका प्राप्तिस्थान है। ज्वार इनका प्रिय भोजन है। नाड़ी घास और उसकी रोटी बनाकर भी इन्हें खिलाई जाती है। ये गायें दूध खूब देती हैं।

दज्जल[संपादित करें]

पंजाब के डेरागाजीखाँ जिले में पाई जाती हैं। ये दूध कम देती हैं।

गावलाव[संपादित करें]

दूध साधारण मात्रा में देती है। प्राप्तिस्थान सतपुड़ा की तराई, वर्धा, छिंदवाड़ा, नागपुर, सिवनी तथा बहियर है। इनका रंग सफेद और कद मझोला होता है। ये कान उठाकर चलती हैं।

हरियाना[संपादित करें]

ये ८-१२ लीटर दूध प्रतिदिन देती हैं। गायों का रंग सफेद, मोतिया या हल्का भूरा होता हैं। ये ऊँचे कद और गठीले बदन की होती हैं तथा सिर उठाकर चलती हैं। इनका प्राप्तिस्थान रोहतक, हिसार, सिरसा, करनाल, गुडगाँव और जिंद है। हिसार मे पहला गौ अभयारण्य

अंगोल या नीलोर[संपादित करें]

ये गाएँ दुधारू, सुंदर और मंथरगामिनी होती हैं। प्राप्तिस्थान तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुंटूर, नीलोर, बपटतला तथा सदनपल्ली है। ये चारा कम खाती हैं।

अन्य[संपादित करें]

राठ अलवर की गाएँ हैं। खाती कम और दूध खूब देती हैं।

गीर- ये प्रतिदिन ५०-८० लीटर दूध देती हैं। इनका मूलस्थान काठियावाड़ का गीर जंगल है।

देवनी - दक्षिण आंध्र प्रदेश और हिंसोल में पाई जाती हैं। ये दूध खूब देती है।

नीमाड़ी - नर्मदा नदी की घाटी इनका प्राप्तिस्थान है। ये गाएँ दुधारू होती हैं।

अमृतमहल, हल्लीकर, बरगूर, बालमबादी नस्लें मैसूर की वत्सप्रधान, एकांगी गाएँ हैं। कंगायम और कृष्णवल्ली दूध देनेवाली हैं।

प्रमुख देशों में गायों की संख्या[संपादित करें]

विश्व में गायों की कुल संख्या १३ खरब (1.3 बिलियन) होने का अनुमान है।[4] नीचे दी गई सारणी में विभिन्न देशों में सन् 2009 में गायों की संख्या दी गई है।[5]

गायों की संख्या
क्षेत्र/देश गायों की संख्या
भारत 281,700,000
ब्राजील 187,087,000
चीन 139,721,000
यूएसए 96,669,000
यूरोपीय संघ 87,650,000
अर्जेण्टीना 51,062,000
आस्ट्रेलिया 29,202,000
मैक्सिको 26,489,000
रूस 18,370,000
दक्षिण अफ्रीका 14,187,000
कनाडा 13,945,000
अन्य 49,756,000

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. गोहत्यां ब्रह्महत्यां च करोति ह्यतिदेशिकीम् ।
    यो हि गच्छत्यगम्यां च यः स्त्रीहत्यां करोति च ॥ २३ ॥

    भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते ।
    कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ २४ ॥ देवीभागवतपुराणम्

  2. http://shiva.iiit.ac.in/SabdaSaarasvataSarvasvam/index.php/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%95%E0%A4%AE%E0%A5%8D
  3. http://pib.nic.in/feature/feyr2000/fmay2000/f040520001.html
  4. Muruvimi, F. and J. Ellis-Jones. 1999. A farming systems approach to improving draft animal power in Sub-Saharan Africa. In: Starkey, P. and P. Kaumbutho. 1999. Meeting the challenges of animal traction. Intermediate Technology Publications, London. pp. 10-19.
  5. [1][मृत कड़ियाँ]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]