माद्री

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माद्री राजा पाण्डु की दूसरी रानी थी। उसके बेटे नकुल और सहदेव थे। माद्री पारस में माद्रा राज्य की राजकुमारी राजा शल्य की बहिन थी। एक बार हस्तिनापुर के राजा पाण्डु ने मद्रराज को हरा दिया

उसके बाद मद्र नरेस ने अपनी पुत्तरी का विवाह पांडु से कर दिया जब पाण्डु विश्व विजयी होकर हस्तिनापुर लौटे तो अपना राज पाट अपने अंधे भाई को देकर , अपनी दोनों पत्नियों के संग तपस्या करने जंगल मे चले गए वहां कण्व ऋषि के आश्रम में मेहमान बन कर निवाश करने लगे एक दिन माद्री के हठ करने के बाद पाण्डु सिंह का शिकार करने गए सिंह की गर्जना सुनकर बिना देखै ही उन्होंने शब्दभेदी बाण छोड़ दिया जैसे ही सिंह को तीर लगा वैसे ही नर की आवाज आह के रूप मे निकली , इसके बाद उन्होंने देखा कि, कण्व ऋषि अपनी पत्नी के संग सहवास कर रहे थे और इसी क्रिया के अंतर्गत उनको बाण लगा था

इसलिए उन्होंने पाण्डु को शार्प दिया कि जब भी वे अपनी पत्नी संग सहवास करेंगे तभी वो मर जाएंगे


इस घटना के बीत जाने के बाद एक दिन माद्री एक झरने के किनारे नाहा रही थी , उनको इस रूप में देख कर पाण्डु विचलित हो गए और कण्व ऋषि के उस शार्प को भूल कर माद्री के साथ शम्भोग कर लिया और इसके साथ ही उनका देहवासन हो गया , उनकी चिता पर ही माद्री सती हो गयी . महाभारत में इस प्रथा का विस्तरत उलेख नही मिलता है,पाडु की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी माद्री सती हो गयी थी।जबकी अभिमन्यु,घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नीयाँ सती नहीं हुई थीं।

पाण्डव