वेदव्यास

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वेदव्यास
महर्षि वेदव्यास जी
महर्षि वेदव्यास जी
हिंदू पौराणिक कथाओं के पात्र
नाम: वेदव्यास
अन्य नाम: कृष्णद्वैपायन, बादनारायण
संस्कृत वर्तनी: {{{संस्कृत वर्तनी}}}
संदर्भ ग्रंथ: महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, पुराण
उत्त्पति स्थल: बांसथाना, बलिया उत्तर प्रदेश
माता और पिता: सत्यवती और पराशर
पुत्र: {{{पुत्र}}}

ऋषि कृष्ण द्वेपायन वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता थे। वेदव्यास महाभारत के रचयिता ही नहीं, बल्कि उन घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जो क्रमानुसार घटित हुई हैं। अपने आश्रम से हस्तिनापुर की समस्त गतिविधियों की सूचना उन तक तो पहुंचती थी। वे उन घटनाओं पर अपना परामर्श भी देते थे। जब-जब अंतर्द्वंद्व और संकट की स्थिति आती थी, माता सत्यवती उनसे विचार-विमर्श के लिए कभी आश्रम पहुंचती, तो कभी हस्तिनापुर के राजभवन में आमंत्रित करती थी। प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं। पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य, चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए। इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए। इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया। उन्होने ही अट्ठारह पुराणों की भी रचना की, ऐसा माना जाता है। वेदव्यास यह व्यास मुनि तथा पाराशर इत्यादि नामों से भी जाने जाते है। वह पराशर मुनि के पुत्र थे, अत: व्यास 'पाराशर' नाम से भि जाने जाते है।

महर्षि वेदव्यास को भगवान का ही रूप माना जाता है, इन श्लोकों से यह सिद्ध होता है।

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्ज्वालितो ज्ञानमयप्रदीपः।।

अर्थात् - जिन्होंने महाभारत रूपी ज्ञान के दीप को प्रज्वलित किया ऐसे विशाल बुद्धि वाले महर्षि वेदव्यास को मेरा नमस्कार है।

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।

नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नम:।।

अर्थात् - व्यास विष्णु के रूप है तथा विष्णु ही व्यास है ऐसे वसिष्ठ-मुनि के वंशज का मैं नमन करता हूँ। (वसिष्ठ के पुत्र थे 'शक्ति'; शक्ति के पुत्र पराशर, और पराशर के पुत्र पाराशर (तथा व्यास) )

वेदव्यास के जन्म की कथा[संपादित करें]

वैदिक साहित्यों में वर्णित आख्यानों के अनुसार महर्षि वेदव्यास निषादकन्या मत्स्यगंधा-सत्यवती और भार्गव पराशर ऋषि पुत्र हंै। महाभारत के अनुसार गंगा नदी के उत्तर तट पर स्थित धर्मारण्य के अपने आश्रम से ऋषि पराशर अपने भाई गौतम ऋषि से मिलने गंगा नदी के पार गये थे। गौतम आश्रम (वर्तमान अहिरौली, बक्सर-बिहार) से लौटते समय गंगानदी पार कराने के लिए उन्हे जो नौका मिली उसे नवयौवना निषाद युवती मत्स्यगंधा चला रही थी। नाव जब नदी की मध्यधारा में पहुॅची, तब युवा ज्योतिषि पराशर ने मत्स्यगंधा को बताया कि इस समय ज्योतिष की गणना के अनुसार गर्भाधान संस्कार का ऐसा विलक्षण मुहुर्त है कि उससे उत्पन्न हुआ पुत्र  विलक्षण प्रतिभा का धनी विद्वान होगा। इस मुहुर्त में गर्भाधान के लिए मत्स्यगंधा की सहमति के बाद नौका को गंगा की जलधारा के बीच रेत के एक द्वीप (टीले) पर टिकाकर पराशर ऋषि ने कुमारी निषादकन्या के साथ गर्भाधान संस्कार सम्पन्न किया।

कालान्तर में गर्भकाल पूर्ण होने पर मत्स्यगंधा ने इसी निर्जन द्वीप पर अपने पुत्र को जन्म दिया। जो जन्म के बाद जंगल में तपस्या करने चला गया। कृष्णवर्ण का होने और द्वीप पर जन्म होने के कारण इनका एक नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा। यही बालक आगे चलकर वेदव्यास के नाम से विख्यात हुआ।

वैदिक ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार इस घटना के बाद रुपवती निषादकन्या मत्स्यगंधा की सुन्दरता पर आखेट-विहार करने धर्मारण्य आये हस्तिनापुर के राजा शान्तनु मोहित हो गये । उन्होने उससे विवाह करने का प्रस्ताव रखा। जिस पर मत्स्यगंधा सत्यवती ने यह शर्त रखा कि आपके बाद हमसे पैदा हुए पुत्र ही हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठेगें।

सत्यवती की इस शर्त के कारण हस्तिनापुर नरेश शान्तनु के समक्ष धर्मसंकट उत्पन्न हो गया। क्योकिं उनकी पूर्व महारानी गंगा से उत्पन्न पुत्र भीष्म हस्तिनापुर के युवराज बन चुके थे। पिता के दूसरे विवाह में आ रही अड़चन को दूर करने के लिए युवराज भीष्म ने यह प्रतिज्ञा किया कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूॅगा और विवाह नहीं करुगां। गंगा पुत्र भीष्म की इस प्रतिज्ञा के बाद निषाद कन्या सत्यवती का विवाह हस्तिनापुर नरेश शान्तनु के साथ हो गया।

मत्स्यगंधा सत्यवती से राजा शान्तनु के दो पुत्र पैदा हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य जब ये दोनों युवा हुए तब तक राजा शान्तनु स्वर्ग सिधार चुके थे। हस्तिनापुर का शासन अपने इन सौतेले भाईयों के बड़े होने तक युवराज भीष्म सम्भाल रहे थे।

हस्तिनापुर के युवराज भीष्म ने अपने सौतेले भाईयों के विवाह के लिए काशीराज की तीन पुत्रियों अंबा, अम्बालिका और अम्बिका को  बलात् छीन लायें। किन्तु दैवयोग से शान्तनु-सत्यवती के ये दोनों पुत्र हस्तिनापुर राजवंश को बगैर कोई उत्तराधिकारी दिये, कालकवलित हो गये। इसके आगे की कथा इस पुस्तक में आगे देगें।

वेदव्यास जी के जन्म की इस कथा को जैन ग्रंथों में भी इसी से मिलता-जुलता लिखा गया है किन्तु उसमें मत्स्यगंधा को राजा शान्तनु के वीर्य से मछली के पेट से पैदा हुआ बताया गया है, और पुनः उसके साथ विवाह की बात लिखी है। जिसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता है। इस सन्दर्भ में महाभारत, पुराणों एवं वैदिक ऐतिहासिक ग्रंथों मे जो कथा मिलती है वही सत्य के सर्वथा निकट है।

महर्षि वेदव्यास अपनी माता के साथ

जन्मकाल और जन्मभूमि[संपादित करें]

महर्षि वेदव्यास जी का जन्म महाभारत के उस महायुद्ध के पूर्व हुआ था। यह बात तो पूर्णरुपेण प्रमाणित है , क्योंकि महाभारत की कथा के अनुसार पाण्डवों के पिता पाण्डु और कौरवों के पिता धृतराष्ट्र तथा इनके चाचा एवं हस्तिनापुर राज्य के मंत्री विदुर जी वेदव्यास जी के ही पुत्र है।

      महाभारत का कालखण्ड व्यतीत हुए पाॅच हजार दो सौ वर्ष हुए। अर्थात् लगभग 560 ईसा पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था। युग की कालगणना के हिसाब से भी कलयुग की बावनवी सदी चल रही है। आचार्य चतुरसेन, रांगेयराघव के ग्रंथों तथा जैन एवं बौद्ध ग्रंथो के अनुसार भी यह काल गणना सत्य ठहरती है।

माता मत्स्यगंधा द्वारा वेदव्यासजी को जन्म देने के तत्काल बाद पितृगृह विलासपुर (बाॅसथाना) से नौका द्वारा पराशर मुनि के आश्रम (परसिया) भेजवा दिया गया था। इसका उचित कारण भी था, क्योंकि उस समय मत्स्यगंधा-सत्यवती का विवाह नहीं हुआ था। उन्होने कुमारी अवस्था में पुत्र को जन्म दिया था और पराशर मुनि उस पुत्र के पिता थे। इन सारी बातों के परिशीलन से वेदव्यास जी का जन्मकाल 520 या 525 ईसा पूर्व होना उचित ठहरता है। पिता पराशर मुनि के आश्रम में बारह वर्षो तक पालन-पोषण होने के बाद व्यासजी का उपनयन संस्कार हुआ और वह शिक्षा-साधना के लिए हिमालय चले गये। आर्षग्रंथों के आख्यानों के अनुसार उनकी माता मत्स्यगंधा सत्यवती का राजा शान्तनु के साथ विवाह उनके जन्म के मात्र एक वर्ष बाद ही हो गया था।

इस सन्दर्भ में यह भी तथ्य उल्लेखनीय है कि जैन एवं बौद्ध धर्मो के आरम्भिक काल में महर्षि वेदव्यासजी के जीवित रहने के सुस्पष्ट प्रमाण मिलते है। वह काफी दीर्घ काल तक जीवित रहे।

व्यासजी का जन्म धर्मारण्य के गंगा नदी के उत्तर तट पर हुआ था। इसमें मैनें उ0प्र0 के बलिया जिले की बलिया तहसील के राजस्व गांवों बाॅसथाना, विलासपुर का उल्लेख किया है। ये गाॅव वर्तमान में गंगा नदी कटान में जनशून्य होकर दियारे के रुप में है। जिस कालखण्ड में व्यासजी का यहाॅ जन्म हुआ। उस समय विलासपुर एक वैभवशाली नाव पत्तन एवं नगर था। बाॅसथाना निषाद (नाविकों) की समृद्ध बस्ती थी।

कालान्तर में यहाॅ गर्ग ऋर्षि ने तपस्या किया जिससे इसका नाम गर्गाश्रम पड़ा।

पराशर आश्रम

मि0फिशर की पुस्तक स्टैटिकल्स एण्ड हिस्टोरिकल एकाउन्ट आॅफ द नार्थ-वेस्टर्न प्रोविन्स आॅफ इण्डिया वाल्यूम 8 पार्ट 3, बलिया, पेज 88-89 एवं बलिया गजेटियर के पृष्ट 15 के अनुसार पराशर मुनि का आश्रम बलिया शहर से 16 किमी पूर्व दिशा में धर्मारण्य पोखरे की सीध में हाॅसनगर गंगातट से 05 किमी पर स्थित था।

वर्तमान पराशर आश्रम (परसिया) राष्ट्रीय राजमार्ग 31(गाजीपुर-हाजीपुर मार्ग पर) बलिया नगर से पूर्व दिशा में राजमार्ग के उत्तर दिशा में स्थित है। यहाॅ वर्तमान में एक छोटे से मन्दिर में पराशर मुनि की प्रतिमा लगी है। पराशरमुनि ने पराशर स्मृति, पराशरी ग्रंथो की रचना किया तथा ज्योतिष के विद्वान थे स्वयं गुरुकुल चलाते थे। 

वैदिक ग्रंथों एवं भृगुक्षेत्र महात्म में पुरातन पद्पुराण के काशीखण्ड के दर्दरक्षेत्र महात्म अध्याय को उद्धृत किया गया है। जिसके अनुसार -

पराशरादक्षिणों तु गंगा पापप्रराशिनी।

यत्र काको जलाभ्यासमगमज्जकांक्षया ।।

पराशर आश्रम के दक्षिण दिशा में पाप विमोचनी गंगा का वह तट (हंस प्रपत्तन) स्थित है। जहाॅ स्नान करके एक कौवा हंस बन गया था। इसका उल्लेख बलिया गजेटियर में भी है।

हंस प्रपत्तनं क्षेत्रं गर्गं क्षेत्रं कुशेश्वरं।

पराशरस्य यत्क्षेत्रं विमुक्तस्यच वाहवः ।।

इस श्लोक के भावार्थ से गर्ग क्षेत्र (व्यास स्थान-बाॅसथाना) और हंस प्रपत्तन (हांसनगर) पराशर आश्रम (परसिया) को विमुक्त क्षेत्र का भू-भाग होना परिलक्षित होता है।

ज्ञातव्य है कि वर्तमान बलिया जनपद का प्राचीन नाम विमुक्त क्षेत्र था। जो महर्षि भृगु के यहा निवासकाल में भृगुक्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा उसके बाद उनके शिष्य दर्दर के नाम पर दर्दर क्षेत्र  कहा जाने लगा। इसमें जिस  गर्गक्षेत्र का उल्लेख है, वह गर्गक्षेत्र (वर्तमान सागरपाली-बलिया) का गंगा तटिय भू-भाग ही वेदव्यास जी की जन्मभूमि का भू-भाग है।

व्यासजी का जन्मस्थान-बाॅसथाना[संपादित करें]

बलिया गजेटियर एवं बाबू दुर्गाप्रसाद गुप्त की बलिया और उसके निवासी पुस्तक सहित अनेक इतिहास एवं पुरातत्व के विद्वानों के शोधग्रंथों में वेदव्यास जी की जन्मभूमि बलिया जिले के बाॅसथाना में होने का उल्लेख है। बाॅसथाना नाम व्यासस्थान का ही अपभ्रंश है। 

पुरातन पद्मपुराण में भगवान वेदव्यास की जन्मभूमि के इस भू-भाग का गर्गऋषि की तपोभूमि गर्गाश्रम के नाम से उल्लेख हैं। जो भृगक्षेत्र की पंचकोशी परिक्रमा में आता है।

हंसक्षेत्रात्पश्चिमतो गर्ग क्षेत्रं महत्परम् ।

हंसक्षेत्र (हंस प्रपत्तन-हाॅसनगर) के पश्चिम दिशा में महान गर्गक्षेत्र है।

गर्गाश्रमात्समारम्भं यावत्पराशराश्रमं।

तावत् क्षेत्रं विजयानीयत पंचकोशं महत फलं।।

गर्गाश्रम (व्यास स्थान-बाॅसथाना, विलासपुर सागरपाली) से प्रारम्भ होकर पराशर आश्रम (परसिया) तक होने वाली पंचकोशी परिक्रमा महति फल प्रदान करने वाली है।

गाजीपुर-हाजीपुर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 31 के उत्तर दिशा में स्थित सागरपाली गाॅव एवं वैना के दक्षिण दिशा में दियारा है, इसी दियारे में बाॅसथाना और विलासपुर गाॅव थे, जिसे पुराण में गर्गाश्रम भी कहा गया है। वर्तमान में ये सभी गंगा की कटान में नष्ट हो गये है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार पूर्वकाल में विलासपुर एक वैभवशाली नगर था। गंगा एवं सरयू नदियों के तट पर बसे निषाद बहुल इस नगर में मुगलकाल तक काफी वैभव रहा। यह एक प्रमुख नाव पत्तन था, और अवध एवं जौनपुर सरकारों के निवासियों को गंगा पार शाहाबाद (वर्तमान बक्सर, भोजपुर, बिहार का डुमराॅव आदि ) जिले में आने-जाने के लिए नौकाएॅ यही से मिलती थी। गंगा एवं छोटी सरयू नदी के रास्ते होने वाले व्यापार के नाविक भी यहाॅ पड़ाव डालते थे।

वैना के पुरातात्विक टीले से मिले प्रमाणों से भी इसकी पुष्टि होती है। मुझे (लेखक) इस पुरातन बाॅसथाना गाॅव से विस्थापित भैया बजरंगबली ने बताया की आप जिस व्यासस्थान को खोज रहे है, उस व्यास जन्मभूमि के बारे में आज से 30वर्ष पूर्व असम प्रान्त की एक गुफा में तपस्या कर रहे महात्मा ने सागरपाली गाॅव के दक्षिण छोटी सरयू के किनारे के सेमरा घाट पर होने की बात बतायी थी।

ऐसे ही सागरपाली गाॅव के मूल निवासी श्री रामधनी वर्मा जो जिलाधिकारी कार्यालय बलिया से ज्येष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के पद से 3 वर्षो पूर्व सेवानिवृत्त हुए है उन्होने बताया कि हमारे गाॅव के दक्षिण में स्थित बाॅसथाना बिलासपुर इलाके में काले रंग के मजबूत कदकाठी के लोगों की बस्तियां थी । ये लोग कभी-कभार ही सागरपाली आते थे। जिन्हे हमने बचपन में देखा है।

वेदव्यासजी की कदकाठी और रंग रुप का जो वर्णन महाभारत एवं अन्य आर्षग्रंथो में मिलता है। ठीक उसी प्रकार के मनुष्यों का वर्णन इन दोनों व्यक्तियों ने किया। 

बलिया गजेटियर के अभिलेखिय साक्ष्य एवं इस भू-भाग के वैना स्थित पुरातात्विक टीले के आंशिक उत्खनन में इस भू-भाग पर 1400ईसा पूर्व मानव बसति होने के प्रमाण प्राप्त हुए है। जिससे यह बात प्रमाणित होती है कि इस भू-भाग पर एक समृद्ध नगर था जिसमें वेदव्यासजी का जन्म हुआ।

वेद व्यास के विद्वान शिष्य[संपादित करें]

वेद व्यास का योगदान[संपादित करें]

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास त्रिकालज्ञ थे तथा उन्होंने दिव्य दृष्टि से देख कर जान लिया कि कलियुग में धर्म क्षीण हो जायेगा। धर्म के क्षीण होने के कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु हो जावेंगे। एक विशाल वेद का सांगोपांग अध्ययन उनके सामर्थ से बाहर हो जायेगा। इसीलिये महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें। व्यास जी ने उनका नाम रखा - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी वेद व्यास के नाम से विख्यात हुये। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को क्रमशः अपने शिष्य पैल, जैमिन, वैशम्पायन और सुमन्तुमुनि को पढ़ाया। वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ तथा शुष्क होने के कारण वेद व्यास ने पाँचवे वेद के रूप में पुराणों की रचना की जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक कथाओं के रूप में बताया गया है। पुराणों को उन्होंने अपने शिष्य रोम हर्षण को पढ़ाया। व्यास जी के शिष्योंने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उन वेदों की अनेक शाखाएँ और उप शाखाएँ बना दीं। व्यास जी ने महाभारत की रचना की।

गणेश महाभारत लिखते हुए।
व्यास जी गणेश सें महाभारत लिखवाते हुए, अंकोरवाट मंदिर

पौराणिक-महाकाव्य युग की महान विभूति, महाभारत, अट्ठारह पुराण, श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय साहित्य-दर्शन के प्रणेता वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग ३००० ई. पूर्व में हुआ था। वेदांत दर्शन, अद्वैतवाद के संस्थापक वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। पत्नी आरुणी से उत्पन्न इनके पुत्र थे महान बाल योगी शुकदेव। श्रीमद्भागवत गीता विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य 'महाभारत' का ही अंश है। रामनगर के किले में और व्यास नगर में वेदव्यास का मंदिर है जहॉ माघ में प्रत्येक सोमवार मेला लगता है। गुरु पूर्णिमा का प्रसिद्ध पर्व व्यास जी की जयन्ती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

पुराणों तथा महाभारत के रचयिता महर्षि का मन्दिर व्यासपुरी में विद्यमान है जो काशी से पाँच मील की दूरी पर स्थित है। महाराज काशी नरेश के रामनगर दुर्ग में भी पश्चिम भाग में व्यासेश्वर की मूर्ति विराजमान् है जिसे साधारण जनता छोटा वेदव्यास के नाम से जानती है। वास्तव में वेदव्यास की यह सब से प्राचीन मूर्ति है। व्यासजी द्वारा काशी को शाप देने के कारण विश्वेश्वर ने व्यासजी को काशी से निष्कासित कर दिया था। तब व्यासजी लोलार्क मंदिर के आग्नेय कोण में गंगाजी के पूर्वी तट पर स्थित हुए।

इस घटना का उल्लेख काशी खंड में इस प्रकार है-

लोलार्कादं अग्निदिग्भागे, स्वर्घुनी पूर्वरोधसि। स्थितो ह्यद्य्यापि पश्चेत्स: काशीप्रासाद राजिकाम्।। स्कंद पुराण, काशी खंड ९६/२०१

व्यासजी ने पुराणों तथा महाभारत की रचना करने के पश्चात् ब्रह्मसूत्रों की रचना भी यहाँ की थी। वाल्मीकि की ही तरह व्यास भी संस्कृत कवियों के लिये उपजीव्य हैं। महाभारत में उपाख्यानों का अनुसरण कर अनेक संस्कृत कवियों ने काव्य, नाटक आदि की सृष्टि की है। महाभारत के संबंध में स्वयं व्यासजी की ही उक्ति अधिक सटीक है- इस ग्रंथ में जो कुछ है, वह अन्यत्र है, पंरतु जो इसमें नहीं है, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है।

यमुना के किसी द्वीप में इनका जन्म हुआ था। व्यासजी कृष्ण द्वैपायन कहलाये क्योंकि उनका रंग श्याम था। वे पैदा होते ही माँ की आज्ञा से तपस्या करने चले गये थे और कह गये थे कि जब भी तुम स्मरण करोगी, मैं आ जाऊंगा। वे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर के जन्मदाता ही नहीं, अपितु विपत्ति के समय वे छाया की तरह पाण्डवों का साथ भी देते थे। उन्होंने तीन वर्षों के अथक परिश्रम से महाभारत ग्रंथ की रचना की थी-

त्रिभिर्वर्षे: सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनोमुनि:। महाभारतमाख्यानं कृतवादि मुदतमम्।। आदिपर्व - (५६/५२)

जब इन्होंने धर्म का ह्रास होते देखा तो इन्होंने वेद का व्यास अर्थात विभाग कर दिया और वेदव्यास कहलाये। वेदों का विभाग कर उन्होंने अपने शिष्य सुमन्तु, जैमिनी, पैल और वैशम्पायन तथा पुत्र शुकदेव को उनका अध्ययन कराया तथा महाभारत का उपदेश दिया। आपकी इस अलौकिक प्रतिभा के कारण आपको भगवान का अवतार माना जाता है।

संस्कृत साहित्य में वाल्मीकि के बाद व्यास ही सर्वश्रेष्ठ कवि हुए हैं। इनके लिखे काव्य 'आर्ष काव्य' के नाम से विख्यात हैं। व्यास जी का उद्देश्य महाभारत लिख कर युद्ध का वर्णन करना नहीं, बल्कि इस भौतिक जीवन की नि:सारता को दिखाना है। उनका कथन है कि भले ही कोई पुरुष वेदांग तथा उपनिषदों को जान ले, लेकिन वह कभी विचक्षण नहीं हो सकता क्योंकि यह महाभारत एक ही साथ अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा कामशास्त्र है।

१. यो विध्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विज:। न चाख्यातमिदं विद्य्यानैव स स्यादिचक्षण:।। २. अर्थशास्त्रमिदं प्रोक्तं धर्मशास्त्रमिदं महत्। कामाशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेना मितु बुद्धिना।। महा. आदि अ. २: २८-८३

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