हैदर अली

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
हैदर अली
ಹೈದರ್ ಅಲಿ
मैसूर के सुल्तान (वास्तविक शासक)
"Hyder Ali," a steel engraving from the 1790's (with modern hand coloring).jpg
आधुनिक रंगों से रंगी हुई 1790 के दशक का इस्पात से बनी मूर्ति।
शासन १७६१–१७८२
पूरा नाम शम्स उल-मुल्क, आमिर उद-दौला, नवाब हैदर अली खान बहादुर
पूर्वाधिकारी कृष्णराज वाडियार द्वितीय
उत्तराधिकारी टीपू सुल्तान
राज घराना मैसूर राज्य
पिता फतह मौहम्मद
धर्म इस्लाम

हैदर अली के चरित्र और उपलब्धियाँ

18 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अंग्रेजों की बढ़ती हुई। शक्ति के सबसे जबरदस्त दुश्मन मैसूर के हैदर अली थे जिस समय कर्नाटक में राजनीति षडयंत्र और कुचक्र चल रहे थे और बंगाल के राजनीतिक रंग मंच पर एक विनाशकारी नाटक खेला जा रहा था उसी समय हैदर अली के नेतृत्व में मैसूर में एक नयी शक्ति का निर्माण हो रहा था मैसूर विजय नगर साम्राज्य का एक हिस्सा था बाद में उसने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। हैदर अली के पदार्पन ने मैसूर में एक नयी जान फूँक दी उनका जन्म 1721 ई. में हुआ था। यद्धपि वह निरक्षर था फिर भी उसने वीरोचित सैनिक प्रतिभा और कुटनीज्ञता कुट- 2 कर भारी थी प्रारम्भ में वह मैसूर का एक साधारण सैनिक था लेकिन अपनी प्रतिभा के बल पर प्रधान सेनापति का पद प्राप्त किया एक साधारण व्यक्ति और साधारण पद पर रहते हुए भी अपनी योग्यता प्रतिभा और सैनिक क्षमता के कारण उसने मैसूर के राजा को इतना प्रभावित कर लिया कि अन्त में यह उसका उत्तराधिकारी बन बैठा 1761 में वह मैसूर की गद्दी पर बैठा। राजसत्ता पर अधिकार होते ही उसने मैसूर का विस्तार करना प्रारम्भ किया शीघ्र ही वे बेदनूर, सुँन्दा, सेरा कनारा और गुटी आदि स्थानों पर उसने अपना अधिपत्य कायम कर लिया इतना ही नहीं लोचीन बाल घाट, कालिकट और कन्नड़ पर भी उसने विजय प्राप्त किया। उस तरह उसने मैसूर की सीमा का अत्यधिक विस्तार किया उसकी बढ़ती हुई शक्ती के कारण मराठे निजाम और अंग्रेज उससे जलने लगे माधवराव पेशवा के साथ उसे 3 बार युद्ध करना पड़ा फलत: उसकी शक्ति को भीषण आघात पहुँचा हैदर के भाग्य से 1772 में माधवराव की मृत्यू हो गयी फलत: हैदर की महत्वकाक्षा पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं रहा।

1. प्रथम अंग्रेज मैसूर युद्ध-

नवजात ब्रिटिश साम्राज्य के लिए हैदर की बढ़ती हुई शक्ति खतरे से खाली नहीं थी अर्काट के नवाब मुहम्मद अली से हैदर की वैमनस्यता थी उसने मालावार के सामंतों को भी पराजित किया था ये सब अंग्रेजों के मित्र थे अत: अंग्रेज और हैदर के बीच अच्छा सम्बन्ध नहीं था दूसरी ओर उससे मराठे और नीजाम भी जलते थे फलत: 1766 अंग्रेज मराठे और नीजाम ने मिलकर हैदर के विरुद्ध एक संयुक्त मंच कायम किया किन्तु हैदर एक कुशल सेनानायक ही नहीं बल्कि चतुर कुटनीतिक भी था उसने इस गिगुट को तोड़ना आवश्यक समझा उसने अपनी कुटनीति से मराठों के साथ संधि कर ली और इससे गिगुट से अलग कर दिया। 1767 ई. में अंग्रेज और निजाम ने मिलकर मैसूर पर आक्रमण किया हैदर ने निजाम को भी अपनी ओर मिला लाय अंग्रेज अकेले रह गये लेकिन फिर भी कई स्थानों पर हैदर को पराजित होना पड़ा 1768 में निजाम पुन: अंग्रेज के गुट से जा मिला किन्तु हैदर घबराने वाले व्यक्ति नहीं थे उसने मरतैदी के साथ युद्ध जारी रखा नवम्बर 1768 में उसने कावेरी और पटनम आदि दुर्ग पर अधिकार कर लिया तंजौर पर आक्रमण कर वहाँ के राजा से 4 लाख रुपया वसूल लिया मंगोल पर भी उसका अधिकार हो गया। उसने मद्रास पर जबरदस्त आक्रमण किया हैदर के इस विजय अभियान से घबराकर अंग्रेजों ने हैदर के साथ 4 मई 1769 को एक रक्षात्मक संधि कर ली इस संधि के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए इलाके लौटा दिए यह निश्चय किया गया कि यदि किसी पर कोई बाहरी शक्ति आक्रमण करेगा तो वे एक- दूसरे की सहायता करेंगे युद्ध के हरजाने के रुपये हैदर को भारी रकम मिली इस संधि से अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को भीषण आघात पहुँचा मैसूर पर अधिकार करने का अंग्रेजों का सपना अधूरा रह गया हैदर की शक्ति और प्रतिष्ठा काफी बढ़ गयी इस प्रकार इस संधि के द्वारा प्रथम अंग्रेज मैसूर युद्ध समाप्त हुआ।

2. द्वितीय अंग्रेज मैसूर युद्ध-

उपर्युक्त संधि के द्वारा यह कहना गलत है कि हमेशा के लिए युद्ध समाप्त हो गया। इस संधि में सत्य और सदभावना का अभाव था अंग्रेजों के लिए यह संधि अपमानजन्क थी अत: मद्रास सरकार ने इस संधि की अवहेलना करनी शुरु की। 1771 में जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया तो संधि के अनुसार हैदर ने अंग्रेजों से सहायता मांगी लेकिन अंग्रेजों ने सहायता करने से इन्कार कर दिया हैदर क्रोधित हो उठा और अंग्रेजों से बदला लेने की प्रतिक्षा करने लगा निजाम भी अंग्रेजों से कुछ असंतुष्ट थे अत: 1774 में मराठा और निजाम से मिलकर हैदर ने अंग्रेजों के विरुद्ध एक वृहत संघ कायम किया इस समय भारत में अंग्रेजों की स्थिति काफी गम्भीर थी स्वंय हेस्टिंस के शब्दों में भारत के प्राय: सभी हिस्सों में अंग्रेज या तो युद्ध लड़ रहे थे या युद्ध की आशंका से घिरे हुए थे भारत के वाल्ट अमेरिकन आजादी की लड़ाई चल रही थी जिसमें फ्रांस, स्पेन और हौलेण्ड अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे सका प्रभाव भारत पर भी पड़ा और यहाँ भी अंग्रेज और फ्रासीसी अपस में उलझ गए फ्रांसीसी भारत में अपनी खोयी हुई शक्ति वापस पाना चाहता था इसी समय अंग्रेजों ने फ्रांसिसियों पर आक्रमण कर दिया और माटी नामक कोठी पर अधिकार कर लिया माटी हैदर के राज्य के अंतर्गत था चुकि अंग्रेजों ने हैदर के राज्य की निष्पक्षता भंग कर दी इसलिए हैदर क्रोधित हो उठा और अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार द्वितीय अंग्रेज मैसुर युद्ध प्रारम्भ हुआ। 1780 में निजाम की सेना के साथ हैदर अली कर्नाटक पर वर्फ के गिरते हुए ढेर के समान अपना सत्यानाश लेते हुए टुट पड़ा और ब्रिटिश फौज को परास्त कर आर्कट पर अधिगकार कर लिया इससे अंग्रेजों की स्थिति काफी गम्भीर हो गई इस सत्यानास की खबर पाते ही हेंस्टिग्स ने 60 वर्ष के बुढ़े सर आया कुट को विशाल सेना के साथ हैदर पर आक्रमण करने लिए भेजा। उसने अपनी कूटनीति से निजाम और मराठों को हैदर के गुट से अलग कर दिया। लेकिन हैदर घबराने वाला व्यक्ति नहीं था उसने बहादूरी के साथ युद्ध जारी रखा। 1781 में पोर्टो नोवा में युद्ध में उसकी जबरदस्त पराजय हो गई और उसे महान क्षति उठानी पड़ी इसी बीच दुर्भाग्यवश 7 दिसम्बर 1782 को हैदर का देहान्त हो गया। किन्तु उसके मरने के बाद भी युद्ध समाप्त नहीं हो पाया टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा वह अपने पिता के समान ही महत्वाकाक्षी एवं सहासी था। वह अपने पिता की पराजय का बदला लेना चाहता था इसी बीच जब युरोप में अंग्रेज तथा फ्रांसीसियों के बीच समझौता हो गया तो उसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा और यहाँ भी मार्च 1784 में अंग्रेज तथा टीपू सुल्तान के बीच मंगलोर की संधि हुई और इसी संधि के साथ द्वितीय अंग्रेज मैसूर युद्ध समाप्त हो गया। इस संधि के द्वारा दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए इलाके लौटा दिए युद्ध बन्दीयों को भी लौटा दिया गया हलांकि यह संधि सिर्फ युद्ध विरान था फिर भी कुछ दिनों के लिए इससे अंग्रेजों को राहत मिली।

3. हैदर अली का चरित्र –

18 वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास में हैदर का एक महत्वपूर्ण स्थान है। अपनी प्रतिभा तथा योग्यता से वह विशाल साम्राज्य का मालिक बन बैठा। वह एक कुशल योद्ध सफल सेनानायक एवं चतुरशासक था। उसके व्यक्तिव्त में नेतृत्व की अदभुद क्षमता थी। वह विकट परिस्थितियों में भी घबरानेवाला व्यक्ति नहीं था। अपनी प्रतिभा के बल पर वह क साधारण सैनिक से मैसूर का सेनापति एवं अंत में सम्राट बन बैठा। वह 18वीं शताब्दी में भारत का एक सर्वाधिक सुयोग्य नेता था। कुछ यूरोपीय इतिहासकारों ने उसकी काफी निन्दा की है किन्तु निरक्षर होते हुए भी हैदर की बुद्धिमत्ता दुरदर्शिता और प्रशासनिक कुशलता अद्वितीय थी। धार्मिक सहिष्णुता एवं निर्भकता उसका सबसे बड़ा गुण था। उसने उसने अपनी प्रजा को पूर्ण रुप से वार्षिक स्वतंत्रता की घोषणा की अनेक ब्राहमणों को भी उन्होंने मंगोल पद पर नियुक्त किया। वह अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध था। उसने प्रजा की भालाई के लिए कल्याणकारी कार्य किये। इसी कारण आज भी उसे मैसूर में अक आदर्श शासक के रुप में याद किया जाता है। वस्तुत: 18 वीं शताब्दी में वही पहला राजनीतिज्ञ था जिसने अंग्रेजों को देश से निष्काषित करने का संकल्प किया उसकी मृत्यु से कम्पनी राज्य का बहुत बड़ा खतरा टल गया। उसमे अनेक गुण विद्धमान थे। इतिहासकार वावरिंग के शब्दों में हैदर में क ही समय कई विषयों पर एक साथ ध्यान देने का अदभूत गुण था और उसका ध्यानाकर्षण भंग नहीं होता था निविर्वाद रुप से भारत के योग्य शासकों में उनका स्थान प्रमुख था। डॉ. स्मिथ ने हैदर की खाफी आलोचना की है उनका यह कहना था कि हैर का न कोई धर्म था न आचरण और न तो उनमें दया थी जो सवर्था गलत है वास्तविकता यह थी कि मुस्लिम शासकों में वह सबसे अधिक सहिष्णु था बावरिंग ने ठीक ही कहा है वह मौलिक तथा दिलेर सेना था जो रणकौशल में चतुर सुझ का तेज इल्स से भरपूर और पराजय में कभी घबराने वाली व्यक्ति नहीं था। वास्तव में हैदर एक महान व्यक्ति था उसने अपनी योग्यता के बल पर मैसूर को क शक्तिशाली राज्य के रुप परिणत कर दिया उसने अंग्रेजों को भारत से निकालने का संकल्प किया। अगर अन्य भारतीय नरेशों ने उनका साथ दिया होता तो भारतीय इतिहास की धारा ही दूसरी होती।

By- Mohammad Shahid (https://www.facebook.com/shahid.sta)

हैदर अली (कन्नड़: ಹೈದರ್ ಅಲಿ; १७२१ – ७ दिसम्बर १७८२) दक्षिण भारतीय मैसूर राज्य के सुल्तान और वस्तुतः शासक थे। उनका जन्म का नाम हैदर नाइक था। वो अपने सैन्य कौशल के कारण काफी प्रतिष्ठित हुये और इसी कारण मैसूर के शासकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके परिणामस्वरूप वो दलवई (कमांडर इन चीफ अर्थात सेनाप्रमुख) पद पदोन्नत हुये। इसके बाद वो कार्यकारी राजा कृष्णराज वाडियार द्वितीय और मैसूर सरकार पर हावी हो गये। वो मैसूर राज्य के सर्वाधिकारी (मुख्यमंत्री) के रूप में १७६१ में वास्तविक राजा बने।[1]

टिप्पणी[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

अन्य सामग्री[संपादित करें]

गिडवानी, भगवान एस॰ (१९७६) (अंग्रेज़ी में). The Sword of Tipu Sultan: a historical novel about the life and legend of Tipu Sultan of India [टीपू सुल्तान की तलवार: भारत के टिपू सुल्तान के जीवन और कथा के बारे में एक ऐतिहासिक उपन्यास]. अलाइड पब्लिशर्स. OCLC 173807200.