झाँसी

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झाँसी / झांशी
बलवंत नगर
झाँसी का दृश्य
झाँसी का दृश्य
उपनाम: रानी लक्ष्मीबाई की‌ वीरभूमि, बुन्देलखण्ड का ह्रदय, बुन्देलखण्ड का प्रवेशद्वार, बुन्देली का केंद्र
झाँसी is located in उत्तर प्रदेश
झाँसी
झाँसी
उत्तर प्रदेश में स्थिति
निर्देशांक: 25°26′N 78°34′E / 25.44°N 78.56°E / 25.44; 78.56निर्देशांक: 25°26′N 78°34′E / 25.44°N 78.56°E / 25.44; 78.56
देश  भारत
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला झाँसी ज़िला
शासन
 • महापौर बिहारीलाल आर्य (भाजपा)
ऊँचाई 285 मी (935 फीट)
जनसंख्या (2011)
 • शहर 5,05,693
महारानी लक्ष्मीबाई का झाँसी का किला

झाँसी (झांशी‌) (Jhansi) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के झाँसी जनपद में स्थित एक नगर है। यह जनपद का मुख्यालय भी है। यह नगर भारतभर में झाँसी की रानी की 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका के कारण प्रसिद्ध है। शहर से तीन प्रमुख राजमार्ग गुजरते हैं - राष्ट्रीय राजमार्ग 27, राष्ट्रीय राजमार्ग 39 और राष्ट्रीय राजमार्ग 44[1][2]

विवरण[संपादित करें]

यह शहर उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है और बुन्देलखण्ड क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। झाँसी एक प्रमुख रेल एवं सड़क केन्द्र है और झाँसी जिले का प्रशासनिक केन्द्र भी है। झाँसी शहर पत्थर निर्मित किले के चारो तरफ फैला हुआ है, यह किला शहर के मध्य स्थित बँगरा नामक पहाड़ी पर निर्मित है। उत्तर प्रदेश में 20.7 वर्ग कि॰ मी॰ के क्षेत्र में फैला झाँसी पर प्रारम्भ में चन्देल राजाओं का नियंत्रण था। उस समय इसे बलवन्त नगर के नाम से जाना जाता था। झाँसी का महत्व सत्रहवीं शताब्दी में ओरछा के राजा बीर सिंह देव के शासनकाल में बढ़ा। इस दौरान राजा बीर सिंह और उनके उत्तराधिकारियों ने झाँसी में अनेक ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण करवाया।

बुन्देलखंड का गढ़ माने जाने वाले झाँसी का इतिहास संघर्षशील है। 1857 में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के स्थान पर उनके विरूद्ध संघर्ष करना उचित समझा। वे अंग्रेजों से वीरतापूर्वक लड़ी और अन्त में वीरगति को प्राप्त हुईं। झाँसी नगर के घर-घर में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के किस्से सुनाए जाते हैं। हिन्दी कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने इसे अपनी कविता, झाँसी की रानी, में वर्णित करा है:

बुन्देलों हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी

इतिहास[संपादित करें]

यह नगर ओरछा का प्रतापी वीर सिंह जू देव बुन्देला ने बसाया था उन्होंने 1608 ई में बलवंत नगर गाँव के पास की पहाड़ी पर एक विशाल किले का निर्माण कराया व नगर बसाया। झाँसी का नाम झाँसी कैसे पड़ा इसके बारे में कहा जाता है जब वीर सिंह जू देव बुन्देला ओरछा अपने इस नगर को देख रहे थे तो उनको झाइसी (धुँधला) दिखाई दे रही थी तब उन्होंने अपने मंत्री से कहा कि झाइसी क्यों दिख रही है तो उनके मंत्री ने कहा झाइसी नही महाराज ये आपका नया शहर है तब से इसका नाम झाइसी हो गया जो आज झाँसी के नाम से जाना जाता है।

17वीं शताब्दी बुन्देला राजा छ्त्रसाल ने सन् 1732 में मराठा साम्राज्य से मदद माँगी। मराठा मदद के लिए आगे आए। सन् 1734 में राजा छ्त्रसाल की मौत के बाद बुन्देला क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा मराठो को दे दिया गया। मराठो ने शहर का विकास किया और इसके लिए ओरछा से लोगो को ला कर बसाया गया।

सन् 1806 मे मराठा शक्ति कमजोर पडने के बाद ब्रितानी राज और मराठा के बीच् समझौता हुआ जिसमे मराठो ने ब्रितानी साम्राज्य का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। सन् 1817 में मराठो ने पूने में बुन्देल्खन्ड क्षेत्र के सारे अधिकार ब्रितानी ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिये। सन् 1853 में झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। तत्कालीन गवर्नल जनरल ने झाँसी को पूरी तरह से अपने अधिकार में ले लिया। राजा गंगाधर राव की विधवा रानी लक्ष्मीबाई ने इसका विरोध किया और कहा कि राजा गंगाधर राव के दत्तक पुत्र को राज्य का उत्त्तराधिकारी माना जाए, परन्तु ब्रितानी राज ने मानने से इन्कार कर दिया। इन्ही परिस्थितियों के चलते झाँसी में सन् 1857 का संग्राम हुआ। जो कि भारतीय स्वतन्त्र्ता संग्राम के लिये नीव का पत्थर साबित हुआ। जून 1857 में 12वीं पैदल सेना के सैनिको ने झाँसी के किले पर कब्जा कर लिया और किले में मौजूद ब्रितानी अफसरो को मार दिया गया। ब्रितानी राज से लडाई के दोरान रानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं सेना का सन्चालन किया। नवम्बर 1858 में झाँसी को फिर से ब्रितानी राज में मिला लिया गया और झाँसी के अधिकार ग्वालियर के राजा को दे दिये गये। सन् 1886 में झाँसी को यूनाइटिड प्रोविन्स में जोडा गया जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद 1956 में उत्तर प्रदेश बना।

नेवाळकर राजवंश[संपादित करें]

नेवालकर घराणा एवं झाँसी राजवंश

  • नाम : नेवालकर घराणा
  • साम्राज्य : मराठा साम्राज्य
  • कुळ : मराठी कऱ्हाडे ब्राम्हण
  • कुलदेवी : श्री महालक्ष्मी अंबाबाई कोल्हापूर
  • कुलदेवता : श्री लक्ष्मी पल्लीनाथ रत्नागिरी
  • ग्राम देवता : श्री नवलाई माऊली, कोट
  • उपासक : महादेव, श्री गणेश
  • मुळनिवासी : पावस, राजापूर, रत्नागिरी, महाराष्ट्र
  • रहिवासी : कोट रत्नागिरी, पारोला जलगांव, झांसी
  • जहागीरदार : पारोला, जलगांव, महाराष्ट्र
  • राजगद्दी :- झाँसी, बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश
  • शासन काल : १७६९-१८५८
  • मुळपुरुष : रघुनाथ हरी नेवालकर प्रथम
  • प्रथम सुभेदार : रघुनाथराव हरी हरीपंत नेवालकर द्वि.
  • अंतिम सुभेदार : शिवराव हरीपंत नेवालकर
  • प्रथम राजा : राजा शिवराव हरीपंत नेवालकर
  • अंतिम राजा : राजा रामचंद्रराव नेवालकर
  • प्रथम महाराज : महाराज रामचंद्रराव नेवालकर
  • अंतिम महाराज : महाराज गंगाधरराव नेवालकर
  • प्रसिध्द व्यक्ती :- झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

"झांसी की रानी" महाश्वेता देवी के उपन्यास पर आधारित नेवालकर वंश

1. प्रथम रघुनाथ हरी नेवालकर (मुलपुरुष घराणे)

नेवालकर परिवार के मुलपुरूष थे। इनके दो पुत्र थे। एक "खंडेराव" दुसरा "दामोदरपंत"

( रघुनाथ हरी नेवालकर के पुत्र खंडेराव का वंश - पारोला, जलगांव के जहागीरदार के रूप में थे। )

खंडेराव का वंश (पारोला, जलगांव)

2. खंडेराव रघुनाथ हरी नेवालकर

यह रघुनाथ हरी के पुत्र थे। इनका पुत्र था रामचंद्र राव।

3. रामचंद्र राव खंडेराव नेवालकर

यह खंडेराव के पुत्र थे। इनका पुत्र था आनंदराव।

4. आनंदराव रामचंद्र राव नेवालकर

यह खंडेराव रामचंद्र राव के पुत्र थे। आनंदराव को दो पुत्र थे। एक हरी भाऊ काशीनाथ, और दुसरे वासुदेव राव।

5. हरी भाऊ काशीनाथ नेवालकर ( लालभाऊ )

१८५२ में इन्हे झांसी अंतर्गत मऊ रानीपूर का तहसीलदार नियुक्त किया था। इनकी पत्नी १८७१ में झांसी से इंदौर रहने गयी थी. इंदौर में स्थित इनकी पत्नी ने बाद में रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव की देखरेख की थी।

6. वासुदेव आनंदराव नेवालकर

यह पारोला, जलगांव के जहागिरदार थे। १५ नवम्बर १८४९ आनंदराव नामक पुत्र हुआ। जो बाद में दामोदर राव नाम से रानी लक्ष्मीबाई का दत्तक पुत्र बना।

रघुनाथ हरी नेवालकर के दूसरे पुत्र दामोदरपंत का वंश

दामोदरपंत का वंश (झांसी राजघराना आरंभ)

7. दामोदरपंत रघुनाथ हरी नेवालकर

यह प्रथम रघुनाथ हरी नेवालकर के दुसरे पुत्र थे। इन्हे दो पुत्र थे। "राघोपंत", "सदाशिवपंत" और "हरीपंत"

8. राघोपंत दामोदरपंत नेवालकर

राघोपंत की एक युध्द में मृत्यु हुई थी।

सदाशिवपंत का वंश ( पारोला, जलगांव)

9. सदाशिवपंत दामोदरपंत नेवालकर

यह प्रथम रघुनाथ हरी नेवालकर के दुसरे बेटे दामोदरपंत के पुत्र थे। यह भी पारोला की जाहगीरदार संभालते थे। इनके पुत्र थे त्र्यंबकराव। इन्होनें १७२६ में पारोला का किला का निर्माण किया था।

10. त्र्यंबकराव सदाशिवपंत नेवालकर

यह सदाशिवपंत के पुत्र थे। इनके पुत्र का नाम था नारायणराव।

11. नारायणराव त्र्यंबकराव नेवालकर

यह त्र्यंबकराव के पुत्र थे। इनके पुत्र का नाम था सदाशिवराव।

12. सदाशिवराव नारायणराव नेवालकर

१८४४-५७ तक यह पारोला, जलगांव के जहागिरदार थे। १८३५, १८३८ तथा १८५३ में झाँसी नरेश राजा गंगाधर राव के पुत्र कि निधन होने के पश्चात इन्होंने ने झाँसी सिंहासन की दावेदारी की। १३ जून १८५७ को झाँसी के समीप करेरा किले पर आक्रमण करके राजशाही की घोषणा कर दी। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने सदाशिव नारायण का विद्रोह मिटाकर उसे बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया था। १८५८ मे रानी की शहादत के पश्चात अंग्रेज़ों ने इसे झांसी किले की जेल से निकालकर कमिश्नरी में रखा था। १८६० में अंग्रेजों ने उसे अंदमान भेज दिया था। जहां उसकी मृत्यु हुई थी।

हरीपंत का वंश (झांसी का राजघराना) '

13. हरीपंत दामोदरपंत नेवालकर

यह दामोदरपंत के पुत्र थे। इन्हे तीन पुत्र थे। रघुनाथराव द्वितीय, शिवराव, लक्ष्मणराव (लालाभाऊ)

14. सुभेदार रघुनाथराव हरीपंत नेवालकर द्वि.(१७७०-९६)

(नेवालकर परिवार के पहले सुभेदार थे)

यह हरीपंत के पुत्र थे। यह झांसी के नेवालकर परीवार के पहले सुभेदार थे। पेशवा ने इन्हे झांसी राज्य की सुभेदारी दी थी। झांसी मे गोसावी का विद्रोह इन्होने समाप्त किया था। और झांसी में मराठा शाही की स्थापना की। यह निपुत्रिक थे। इसलिए झांसी का कारभार पेशवा ने इनके भाई शिवराव को दिया था।

15. राजा शिवराव हरीपंत नेवालकर (१७९६-१४)

(नेवालकर परिवार से झाँसी के पहले राजा)

यह हरीपंत के दुसरे पुत्र थे। यह द्वितीय रघुनाथराव नेवालकर द्वितीय के भाई थे। झांसी के यह अंतिम सुभेदार थे। पेशवा से मतभेद की वजह से इन्होंने ६ फरवरी १८०४ को अंग्रेजों की मदत से झांसी राज्य की गद्दी वंशानुगत करा ली थी। और यह झांसी राज्य के पहले राजा बने। इनके दो विवाह हुए थे। पहली पत्नी रखमाबाई से कृष्णराव और द्वितीय पत्नी पद्माबाई से रघुनाथराव तृतीय, गंगाधर राव हुए।

16. लक्ष्मणराव हरीपंत नेवालकर ( लालाभाऊ )

यह हरीपंत के पुत्र थे। पारोला के जहागीरदार थे। अंग्रेजों ने लालाभाऊ रानी लक्ष्मीबाई के परिवार सदस्य होने के कारण १८५९ पारोला की जहागीरदारी समाप्त कर दी गयी थी।

रघुनाथराव द्वितीय एवं शिवराव भाऊ नेवालकर का झाँसी का राजवंश

17. राजा कृष्णराव शिवराव नेवालकर

यह शिवराव भाऊ और उनकी पहली पत्नी रखमाबाई के पुत्र थे। यह झांसी के दुसरे राजा थे। इनकी पत्नी थी महारानी सखुबाई। काहां जाता हैं की सखुबाई बहुत षड्यंत्री थी। झांसी गद्दी के लिए सखुबाई ने अपने पती और पुत्र की हत्या करवाई थी और स्वयं झांसी की रानी बनकर राजपाल देख रही थी। किंतू अंग्रेजों की वजह से सखुबाई ने अपनी बेटी के पुत्र यानी पौत्र को झांसी का वारिस बनाया। कृष्णराव और सखुबाई के पुत्र थे रामचंद्र राव और कन्या गंगाबाई थी। गंगाबाई का सागर के सुभेदार मोरेश्वर विनायक राव चांदोरकर से विवाह हुआ था।

18. महाराज रामचंद्रराव कृष्णराव नेवालकर (१८११-३५) (नेवालकर परिवार से प्रथम झाँसी महाराजाधिराज)

इनका जन्म १८०६ में हुआ था। माता सखुबाई द्वारा पिता कृष्णराव की हत्या के पश्चात झांसी गद्दी पर यही बैठे थे। १८ नवम्बर १८१७ इन्होंने अंग्रेजों से संधी करके इन्होंने झांसी राज्य में राजशाही स्थापित की थी। १८३२ में अंग्रेज़ों ने इन्हें "महाराजाधिराज" पदवी देकर झांसी राज्य का महाराज घोषित कर दिया था। रामचंद्रराव को यह झांसी के पहले महाराजा थे। कृष्णराव की पत्नी का नाम था रानी लक्ष्मीबाई जो निपुत्रिक थी। १८३५ में रानी सखुबाई द्वारा इनकी हत्या करवाई गयी थी। परीवार क्लेश की वजह से रानी लक्ष्मीबाई झांसी राज्य छोडकर चली गयी थी। सखुबाई ने रामचंद्र के नाम से अपने पौत्र को गद्दी पर बिठाया था।

19. चंद्रकृष्णराव रामचंद्रराव नेवालकर

यह रानी सखुबाई की पुत्री सागर सुभेदार मोरेश्वर विनायक राव चांदोरकर की पत्नी गंगाबाई के पुत्र थे। रानी सखुबाई ने रामचंद्रराव के नाम से चंद्रकृष्णराव को दत्तक पुत्र बनाकर झांसी गद्दी पर बिठाया। अंग्रेजों ने इसे झांसी का वारिस नामुंजरी दी थी। और कृष्णराव के भाई रघुनाथराव तृतीय को राजगद्दी पर बिठाया।

20. महाराज रघुनाथराव शिवराव नेवालकर तृतीय.(१८३५-३८)

यह शिवराम भाऊ नेवालकर की दुसरी पत्नी पद्माबाई के पुत्र थे। इनका जन्म १८०३ में हुआ था। अंग्रेजों ने राजगद्दी पर बिठाया था। अंग्रेजों ने इन्हे "फिदवी बादशहा जमजाह इंग्लिशस्तान" यह खिताब दिया था। इनकी पत्नी थी महारानी जानकीबाई। यह निपुत्रिक थी। और झांसी राज्य की दावेदार थी। इसी कारण रघुनाथराव का संबंध झांसी की प्रसिध्द वेश्या गजराबाई उर्फ लछ्छोबाई से था। रघुनाथराव को लछ्छोबाई से अली बहादुर, नुसरत और मेहरूनिस्सा नामक एक बेटी थी। लछ्छोबाई अपने पुत्र अली बहादूर को झांसी राज्य का राजा बनाना चाहती थी। लेकिन उसे अंग्रेज़ों ने नाजायज संतान घोषित किया। महाराज रघुनाथराव कुष्ठरोगी थे। १८३८ में इनकी मृत्यु हुई।

21. महाराज गंगाधरराव शिवराव नेवालकर (१८३८-५३)

इनका जनम १८१३ में हुआ था। यह शिवरावभाऊ की दुसरी पत्नी पद्माबाई के पुत्र थे। रघुनाथराव तृतीय के मृत्यु के पश्चात अंग्रेज़ों ने १८३८ को गंगाधर राव को राजगद्दी पर बिठाया। और झांसी राज्य के सारे अधिकार कंपनी सरकार के हाथ गये। इनकी पहली पत्नी महारानी रमाबाई निपुत्रिक थी। उनके निधन के बाद महाराज ने १८४२ में मनिकर्णिका नामक कन्या से विवाह किया। जो बाद में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बनी। महाराज और रानी लक्ष्मीबाई को पुत्र हुआ जिसका तीन माह की आयु में निधन हुआ। महाराज ने वासुदेव के पुत्र आनंदराव को लिया था। २१ नवम्बर १८५३ को महाराज गंगाधरराव का निधन हुआ था।

22. महारानी लक्ष्मीबाई गंगाधरराव नेवालकर (१८५३-५८)

खुब लडी मर्दानी झाँसी वाली रानी.... नाम से प्रसिद्ध मनिकर्णिका का जन्म मोरोपंत तांबे और भागिरथीबाई के घर १९ नवम्बर १८३५ को हुआ था। १८४२ में झांसी नरेश से विवाह के पश्चात इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। यह महाराज गंगाधरराव की द्वितीय पत्नी थी। इनका पुत्र दामोदर राव की तीन माह की आयु में मृत्यु हुई। वासुदेव के पुत्र आनंदराव को गोद लेकर उसका नाम दामोदर रखा। महाराज गंगाधर राव की मृत्यू के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई ने एक साल (२१ नवम्बर १८५३-१० मार्च १८५४) तक झांसी का राज पाठ संभाला। बाद में अंग्रेज़ों ने दामोदर राव को उत्तराधिकारी न मानते हुए रानी को निष्कासित कर के रानी महल भेज दिया। और झांसी का अधिकार कंपनी के हाथ गया। १८५७ के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महारानी ने अहम भूमिका निभाई थी। इस के पश्चात (४ जून १८५७-४ अप्रैल १८५८) तक रानी का झांसी पर शासन था। १८५८ में अंग्रेजों ने झांसी पर हमला किया। रानी ने झांसी से क्रमशः कोंच, कालपी और ग्वालियर युध्द किया। १७ जून १८५८ को ग्वालियर के कोटा की सराय में अंग्रेज़ों से लडते हुए रानी लक्ष्मीबाई शहीद हुई। यह झाँसी की अंतिम शासक थी।

23. दामोदर राव गंगाधरराव नेवालकर ( १८५१ )

इनका जन्म १८५१ में हुआ था। यह रानी लक्ष्मीबाई और गंगाधरराव के पुत्र थे। तीन माह की आयु में इनका निधन हुआ।

24. आनंदराव गंगाधरराव नेवालकर (१८४९-१९०६)

१५ नवम्बर १८४९ को वासुदेव नेवालकर के घर इनका जन्म हुआ था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और महाराज गंगाधरराव ने २० नवम्बर १८५३ इन्हे गोद लेकर अपने मृत शिशु के नाम पर दामोदर राव नाम रखकर झांसी राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया। १८५७-५८ के संग्राम में दामोदर राव को महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने पीठ पर बांधकर अंग्रेज़ों से युध्द किया था। लंबे संघर्ष के बाद २८ मई १९०६ में इंदौर में इनका निधन हुआ। इनके पुत्र थे "लक्ष्मणराव झांसीवाले" आज भी इनका वंश इंदौर में है।

झाँसी की रानीयाँ[संपादित करें]

1. रानी रखमाबाई

यह सुभेदार शिवराव भाऊ नेवालकर की पहली पत्नी थी। इनका पुत्र था कृष्णराव। और रानी सखुबाई की सांस थी।

2. रानी पद्माबाई

यह सुभेदार शिवराव भाऊ नेवालकर की द्वितीय पत्नी थी। इनके पुत्र थे रघुनाथराव तृतीय और गंगाधरराव। यह रानी लक्ष्मीबाई तथा रानी जानकीबाई की सांस थी।

3. रानी सखुबाई

यह सुभेदार कृष्णराव की पत्नी और झांसी के पहले राजा रामचंद्र राव की मां थी। राजगद्दी के लालच में इसने अपने पती एवं पुत्र की हत्या करवाई थी। यह झांसी राजगद्दी की दावेदार थी।

4. महारानी लक्ष्मीबाई प्रथम

यह झांसी के प्रथम महाराज रामचंद्र राव की पत्नी थी। यह निपुत्रिक थी। रामचंद्र राव की मृत्यु के पश्चात यह १८३५ में झांसी छोडकर चली गई।

5. रानी जानकीबाई

यह महाराज रघुनाथराव तृतीय की पत्नी थी। यह निपुत्रिक थी। यह भी झांसी राजगद्दी की दावेदार थी।

6. आफताब बेगम उर्फ रानी लछछोबाई

यह एक वेश्या थी। और रघुनाथराव तृतीय के समय मोतीबाई और गजराबाई के साथ झांसी दरबार में नृत्य करती थी। महाराज रघुनाथराव तृतीय इससे बहुत प्यार करते थे। वह लछ्छोबाई को प्यार से आफताब बेगम के नाम से बुलाते थे। रघुनाथराव ने इसके लिए झांसी में एक महल बनवाया। आज वो महल रघुनाथराव महल के नाम से जाना जाता है। उस महल के दरवाजेरपर आफताब बेगम ईद के दिन चांद का दिदार करती थी। इसलिए उस दरवाजे का नाम चांद दरवाजा रखा गया। इन्हे अली बहादूर, नुसरत नामक पुत्र और मेहरूनिस्सा नामक कन्या थी। यह अपने पुत्र अली बहादुर को राजा बनाने के अग्रणी थी। यह भी झांसी राजगद्दी की दावेदार थी।

7. महारानी रमाबाई

यह महाराज गंगाधर राव की पहली पत्नी थी। इनकी निसंतान मृत्यु हुई थी। इसलिए महाराज ने दुसरा विवाह किया था।

8. वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाईसाहेब (रानी लक्ष्मीबाई)

यह महाराज गंगाधरराव की दुसरी पत्नी एवं विधवा थी। साधारण ब्राम्हण की पुत्री, पत्नी, माँ, महारानी, प्रजा की राजमाता और कुशल, कर्तबगार, कर्तुत्ववान प्रशासक के साथ वह एक महान क्रांतीकारी थी। वह एक देशभक्त थी। अंग्रेज सरकार इस वीरांगना से डरते थे। महारानी लक्ष्मीबाई ने अनेक बडे बडे अंग्रेज़ों को दाँतों तले लोहे के चने चबवाये थे। भारत देश की आजादी की लडाई में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नेवालकर परिवार की यह प्रसिध्द व्यक्ती थी। झाँसी की यह आखरी शासक थी। झाँसी राज्य आज इन्हीं के नाम से जाना जाता है।

रानी झाँसी राज्याभिषेक[संपादित करें]

४ जून १८५७ को भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाडी युद्ध किया। ९ जून को रानी लक्ष्मीबाई को झांसी सौंपी। १० जून १८५७ को दत्तक पुत्र दामोदरराव नेवालकर के नाम पर महारानी लक्ष्मीबाई का राज्याभिषेक हुआ और वह समुचे बुन्देलखण्ड की साम्राज्ञी बनी। राजमाता बनते ही उन्होंने प्रजा के हीत के निर्णय तथा आदेश पारीत किये। बुन्देलखण्ड के किसानों का लगान माफ किया था। महारानी लक्ष्मीबाई का यह स्वर्ण राजकाल पहिला चरण (२१ नवम्बर १८५३ से १० मार्च १८५४) तथा द्वितीय चरण में (४ जून १८५७ से ४ अप्रैल १८५८) तक रहा.

रानी झाँसी का मन्त्रीमण्डल[संपादित करें]

राज्याभिषेक होने के बाद अधिकारीक रूप से महारानी लक्ष्मीबाई यह झाँसी के साथ पुरे बुंदेलखंड की साम्रज्ञी हो गयी. ११ जून १८५७ को रानी ने पहला राजदरबार लगाया. और अपना मन्त्रीमण्डल तयार किया. इस मन्त्रीमण्डल में २० सदस्य थे. ९ सदस्यों को पद दिया गया तो ११ सदस्यों को मन्त्रीमण्डल में शामिल किया गया.

मुख्य पदाधिकारी :-

महारानी लक्ष्मीबाई - प्रधान शासक लक्ष्मणराव - प्रधानमंत्री जवाहर सिंह - प्रधान सेनापती रघुनाथ सिंह - सरसेनापती मोरोपंत - प्रधान (कामठाने) नाना भोपटकर - न्यायाधीश मोतीबाई - जासूस विभाग प्रधान तात्या टोपे - गुप्तचर गुलाम गौस खान - मुख्य तोपची

मन्त्रीमण्डल सदस्य :

भाऊबख्शी, मोतीबाई, रघुनाथ सिंह, खुदाबख्श, मुहम्मद जमाँ खाँ, मुन्दर, सुन्दर, काशीबाई, राव दूल्हाजू, अली बहादुर और पीर अली.

ऐसे २० सदस्यों को मिलाकर झाँसी का मंत्री मंडल तयार किया गया.

दुर्गा दल[संपादित करें]

नारी सेना दुर्गा दल

१८५३ में महारानी लक्ष्मीबाई ने महाराज गंगाधरराव नेवाळकर की अनुमती सें झांसी महल के प्रांगण में महिला सेना का गठन किया था। १८५७ तथा १८५८ में अंग्रेजों के विरूद्ध इस नारी सेना ने अहम भुमिका निभाई थी।

नारी सेना के अधिकारी

  • वीरांगना झलकारीबाई कोळी - महिला सरसेनापती
  • वीरांगना काशीबाई कुनवीण - महिला तोफ संचालक व तलवारबाज
  • वीरांगना सुंदराबाई (सुंदर) - महिला तोफ संचालक व तलवारबाज
  • वीरांगना मालतीबाई लोधी - महिला सैनिक
  • वीरांगना ललिताबाई बक्षी - महिला सैनिक

शिक्षा[संपादित करें]

झाँसी शहर बुन्देलखन्ड क्षेत्र में अध्ययन का एक प्रमुख केन्द्र है। विद्यालय एवं अध्ययन केन्द्र सरकार तथा निजी क्षेत्र द्वारा चलाये जाते है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, जिसकी स्थापना सन् 1975 में की गयी थी, विज्ञान, कला एवं व्यवसायिक शिक्षा की उपाधि देता है। झाँसी शहर और आसपास के अधिकतर विद्यालय बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है। बुन्देलखण्ड अभियान्त्रिकी एवं तकनिकी संस्थान उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा स्थापित तकनिकी संस्थान है जो उत्तर प्रदेश तकनिकी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है। रानी लक्ष्मीबाई चिकित्सा संस्थान चिकित्सा विज्ञान में उपाधि प्रदान करता है। झॉसी में आयुर्वेदिक अध्ययन संस्थान भी है जो कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान "आयुर्वेद" की शिक्षा देता है। उच्च शिक्षा के अलावा झॉसी में अनेक प्राथमिक विद्यालय भी है। ये विद्यालय सरकार तथा निजी क्षेत्र द्वारा चलाये जाते है। विध्यालयो में शिक्षा का माध्यम हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा है। विद्यालय उत्तर प्रदेश् माध्यमिक शिक्षा परिषद, केन्द्रिय माध्यमिक शिक्षा परिषद से सम्बद्ध है। झॉसी का पुरुष् साक्षरता अनुपात 80% महिला साक्षरता अनुपात 51% है, तथा कुल् साक्षरता अनुपात 66% है।

प्रमुख शिक्षा संस्थान[संपादित करें]

  • BKD (बुन्देलखण्ड महाविद्यालय), झाँसी।
  • श्री गुरु नानक ख़ालसा इण्टर कॉलेज, झाँसी।
  • श्री गुरु हर किशन डिग्री कॉलेज, झाँसी।
  • श्री एम एल पाण्डे एग्लो विदिक जूनियर हाईस्कूल खाती बाबा झाँसी|
  • भानी देवी गोयल सरस्वती विद्यामन्दिर, झाँसी |
  • पं. दीनदयाल उपाध्याय विद्यापीठ बालाजी मार्ग, झाँसी।
  • रघुराज सिन्ह पब्लिक स्कूल, पठोरिया, दतिया गेट
  • मारग्रेट लीस्क मेमोरिअल इंग्लिश स्कूल एण्ड कॉलेज
  • राजकीय इण्टर कॉलेज
  • बिपिन बिहारी इण्टर कॉलेज
  • क्राइस्ट दि किंग कॉलेज
  • रानी लक्ष्मीबाई पब्लिक स्कूल
  • सैण्ट फ्रांसिस कान्वेंट इण्टर कॉलेज
  • लक्ष्मी व्यायाम मंदिर
  • आर्य कन्या इण्टर कॉलेज
  • कैथेड्रल स्कूल
  • ज्ञान स्थली पब्लिक स्कूल
  • हेलेन मेगडोनियल मेमोरियल कन्या इन्टर‍ कोलेज
  • लोक मान्य तिलक कन्या इन्टर कोलेज
  • राज्य विद्युत परिषद इण्टर कॉलेज
  • सरस्वती संस्कार केंद्र सीपरी बाजार

अभियान्त्रिकी संस्थान[संपादित करें]

पयर्टन[संपादित करें]

दर्शनिय स्थल[संपादित करें]

झाँसी किला[संपादित करें]

झाँसी का किला उत्तर प्रदेश ही नहीं भारत के सबसे बेहतरीन किलों में एक है। ओरछा के राजा बीर सिंह देव ने यह किला 1613 ई॰ में बनवाया था। किला बंगरा नामक पहाड़ी पर बना है। किले में प्रवेश के लिए दस दरवाजे हैं। इन दरवाजों को खन्देरो, दतिया, उन्नाव, झरना, लक्ष्मी, सागर, ओरछा, सैनवर और चाँद दरवाजों के नाम से जाना जाता है। किले में रानी झाँसी गार्डन, शिव मन्दिर और गुलाम गौस खान, मोती बाई व खुदा बक्श की मजार देखी जा सकती है। यह किला प्राचीन वैभव और पराक्रम का जीता जागता दस्तावेज है।

रानी महल[संपादित करें]

रानी लक्ष्मीबाई के इस महल की दीवारों और छतों को अनेक रंगों और चित्रकारियों से सजाया गया है। वर्तमान में किले को संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। यहाँ नौवीं से बारहवीं शताब्दी की प्राचीन मूर्तियों का विस्तृत संग्रह देखा जा सकता है। महल की देखरख भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की जाती है।

झाँसी संग्रहालय[संपादित करें]

झाँसी किले में स्थित यह संग्रहालय इतिहास में रूचि रखने वाले पर्यटकों का मनपसन्द स्थान है। यह संग्रहालय केवल झाँसी की ऐतिहासिक धरोहर को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड की झलक प्रस्तुत करता है। यहाँ चन्देल शासकों के जीवन से संबंधित अनेक जानकारियाँ हासिल की जा सकती हैं। चन्देल काल के अनेक हथियारों, मूर्तियों, वस्त्रों और तस्वीरों को यहाँ देखा जा सकता है।

महालक्ष्मी मन्दिर[संपादित करें]

झाँसी के राजपरिवार के सदस्य पहले श्री गणेश मंदिर जाते थे जहा पर रानी मणिकर्णिका और श्रीमन्त गंगाधर राव नेवालकर की शादी हुई फिर इस महालक्ष्मी मन्दिर जाते थे। 18वीं शताब्दी में बना यह भव्य मन्दिर कोल्हापूर की देवी महालक्ष्मी अंबाबाई को समर्पित है। यह मन्दिर लक्ष्मी दरवाजे के निकट स्थित है।यह देवी आज भी झाँसी के लोगो की कुलदेवी है क्योंकि आदी अनादि काल से यह प्रथा रही है कि जो राज परिवार के कुलदेवी और कुलदैवत होते है वही उस नगरवासियों के कुलदैवत होते है तो झाँसी वालो के मुख्य अराध्य देव गणेशजी और आराध्य देवी महालक्ष्मी देवी है। झाँसी के राजपरिवार के ये कुल देवता है।

महाराज गंगाधरराव समाधी स्थल[संपादित करें]

लक्ष्मी ताल में महाराजा गंगाधर राव की समाधि स्थित है। 21 नवम्बर 1853 में उनकी मृत्यु के बाद महारानी लक्ष्मीबाई ने यहाँ उनकी याद में यह स्मारक बनवाया था।

महाराष्ट्र गणेश मन्दिर[संपादित करें]

महाराष्ट्र गणपती मंदिर

भगवान गणेश को समर्पित इस मन्दिर में 19 मई 1842 को महाराज गंगाधरराव और रानी लक्ष्मीबाई का विवाह समारोह तथा सीमांत पूजन इसी मंदिर में सम्पन्न हुआ था। यह भगवान गणेश का प्राचीन मन्दिर है। जहा हर बुधवार को सैकड़ो भक्त दर्शन का लाभ लेते है। यहाँ पर प्रत्येक माह की गणेश चतुर्थी को प्रातः काल और सायं काल अभिषेक होता है। साधारणतः यहाँ सायं काल के अभिषेक में बहुत भीड़ होती है। ऐसी मान्यता है कि इस गणेश मूर्ति के इक्कीस दिन इक्कीस परिक्रमा लगाने से अप्रत्यक्ष लाभ होता है और मनोकामनाएँ पूर्ण होती है। यह मंदिर महाराष्ट्र समिती द्वारा संचालित है। यहां मराठी लोगों का उत्सव मनाया जाता है।

झाँसी के नजदीकी पर्यटन स्थलों में ओरछा, बरूआ सागर, शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, खजुराहो, महोबा, टोड़ी फतेहपुर, आदि भी दर्शनीय स्थल हैं।

निकटतम दर्शनीय स्थल[संपादित करें]

  • सुकमा-डुकमा बाँध : बेतवा नदी पर बना हुआ यह अत्यन्त सुन्दर बाँध है। इस बाँध कि झाँसी शहर से दूरी करीब 45 कि॰मी॰ है तथा यह बबीना शहर के पास है।
  • देवगढ् : झाँसी शहर से 123 कि॰मी॰ दूर यह शहर ललितपुर के पास है। यहाँ गुप्ता वंश के समय् के विश्नु एवं जैन मन्दिर देखे जा सकते हैं।
  • ओरछा : झॉसी शहर से 18 कि॰मी॰ दूर यह स्थान अत्यन्त सुन्दर मन्दिरो, महलों एवं किलो के लिये जाना जाता है।
  • खजुराहो : झाँसी शहर से 178 कि॰मी॰ दूर यह स्थान 10 वी एवं 12 वी शताब्दी में चन्देला वंश के राजाओं द्वारा बनवाए गए अपने शृंगारात्मक मन्दिरो के लिए प्रसिद्ध है।
  • दतिया : झाँसी शहर से 28 कि॰मी॰ दूर यह राजा बीर सिह द्वारा बनवाये गये सात मन्जिला महल एवं श्री पीतम्बरा देवी के मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है।
  • शिवपुरी : झाँसी से 101 कि॰मी॰ दूर यह शहर ग्वालियर के सिन्धिया राजाओं की ग्रीष्म्कालीन राजधानी हुआ करता था। यह शहर सिन्धिया द्वारा बनवाए गए संगमरमर के स्मारक के लिये भी प्रसिद्ध है। यहाँ का माधव राष्ट्रिय उद्यान वन्य जीवन से परिपूर्ण है।

आवागमन[संपादित करें]

वायु मार्ग

झाँसी से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्वालियर निकटतम एयरपोर्ट है। यह एयरपोर्ट दिल्ली, मुम्बई, वाराणसी, बैंगलोर आदि शहरों से नियमित फ्लाइटों के माध्यम से जुड़ा हुआ है।

रेल मार्ग

झाँसी का रलवे स्टेशन वीरांगना लक्ष्मीबाई झाँसी जंक्शन भारत के तमाम प्रमुख शहरों अनेकों रेलगाड़ियों से जुड़ा है।

सड़क मार्ग

झाँसी में राष्ट्रीय राजमार्ग 25 और 26 से अनेक शहरों से पहुँचा जा सकता है। उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बसें झाँसी पहुँचने के लिए अपनी सुविधा मुहैया कराती हैं।

झाँसी से संबद्ध कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तित्व[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Uttar Pradesh in Statistics," Kripa Shankar, APH Publishing, 1987, ISBN 9788170240716
  2. "Political Process in Uttar Pradesh: Identity, Economic Reforms, and Governance Archived 2017-04-23 at the वेबैक मशीन," Sudha Pai (editor), Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, Pearson Education India, 2007, ISBN 9788131707975