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ओरछा

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ओरछा
Orchha
(ऊपर से दक्षिणावर्त) चतुर्भुज मंदिर, जहांगीर महल, राजा महल, लक्ष्मी मंदिर
ओरछा is located in मध्य प्रदेश
ओरछा
ओरछा
मध्य प्रदेश में स्थिति
निर्देशांक: 25°21′N 78°38′E / 25.35°N 78.64°E / 25.35; 78.64
देश भारत
प्रान्तमध्य प्रदेश
ज़िलानिवाड़ी ज़िला
ऊँचाई552 m (1,811 ft)
जनसंख्या (2011)
  कुल11,511
भाषाएँ
  प्रचलितहिन्दी, बुंदेली
समय मण्डलभारतीय मानक समय (यूटीसी+5:30)
पिनकोड472246
दूरभाष कोड07680
वाहन पंजीकरणMP-36

ओरछा (Orchha) भारत के मध्य प्रदेश राज्य के निवाड़ी ज़िले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है। इसकी स्थापना रुद्र प्रताप सिंह बुंदेला द्वारा इसी नाम के राज्य की राजधानी के रूप में सन् 1501 के बाद किसी समय हुई थी। ओरछा बुंदेलखण्ड क्षेत्र में बेतवा नदी के किनारे बसा हुआ है। यह टीकमगढ़ से 80 किमी और उत्तर प्रदेश राज्य में झांसी से 15 किमी दूर है।[1][2]

पुरातन समय से ही से बुंदेलखंड का महत्व धर्म संस्कृति से ओतप्रोत रहा है जिनमें चित्रकूट (राम वन गमन) एवं चंदेरी (श्री कृष्ण शिशुपाल विवाद) द्वापर और त्रेतायुग से ही प्रचलितहैं[3]

इसका इतिहास 15वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब इसकी स्थापना रुद्र प्रताप सिंह जूदेव बुन्देला ने की थी जो सिकन्दर लोदी से भी लड़े थे चूंकि जबतक बुंदेला रजवाड़ों का अधिपत्य इस भूमि पर रहा तबतक कोई अन्य शासक इस भूमि को गुलाम नहीं बना पाया फिर वह चाहे मुगल हों या अंग्रेज या मराठा इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि यह भारतीय सामरिक दृष्टि से भी बड़ा महत्वपूर्ण इलाका था चूंकि अगर किसी भी सेना या उत्तरी राजा को अगर युद्ध में दक्षिणी शासकों को युद्ध लड़ना पड़ता था तो बुंदेलखंड से ही होकर गुजरना पड़ता था और यही दक्षिण के शासकों के साथ भी था, जगह की पहली और सबसे रोचक कहानी एक मंदिर की है। दरअसल, यह मंदिर भगवान राम की मूर्ति के लिए बनवाया गया था, लेकिन मूर्ति स्थापना के वक्त यह अपने स्थान से हिली नहीं। ओरछा के राजा मधुकर शाह कृष्ण भक्त थे उनकी धर्म पत्नी रानी गणेश कुंअर राम भक्त थी किसी बात को लेकर राजा एवं रानी में विवाद हुआ और गुस्से में राजा ने अपनी रानी से कहा अगर इतनी ही बड़ी राम भक्त हो तो राम को ओरछा ले आओ रानी भी भी क्रोध में आकर महल त्याग श्री राम की तपस्या में सरयू किनारे चली गई तपस्या के समय आत्मबलिदान के लिए सरयू नदी में छलाग़ लगा दी उसी वक्त श्री राम ने रामस्वरूप में रानी को अपना विग्रह प्रदान किया जो जिसको मधुकर शाह बुन्देला के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी गनेश कुवर राजे अयोध्या से लाई थीं। रानी गनेश कुंवर राजे वर्तमान ग्वालियर जिले के करहिया गांव की परमार राजपूत थीं। चतुर्भुज मंदिर बनने से पहले रानी पुख्य नक्षत्र में अयोध्या से पैदल चल कर बाल स्वरूप भगवान राम(राम लला)को ओरछा लाईं परंतु रात्रि हो जाने के कारण भगवान राम को कुछ समय के लिए महल के भोजन कक्ष में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम रखा गया राम राजा मंदिर। आज इस महल के चारों ओर शहर बसा है और राम नवमी पर यहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। वैसे, भगवान राम को यहां भगवान मानने के साथ यहां का राजा भी माना जाता है, क्योंकि उस मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है।आज भी भगवान राम को राजा के रूप में(राम राजा सरकार) ओरछा के इस मंदिर में पूजा जाता है और उन्हें गार्डों की सलामी देते हैं।मंदिर में चमड़े से बनी वस्तुओं का प्रवेश निषिद्ध हैं।

आज भी इस राजवंश की कुछ शाखाएं आस पास के जिलों में निवासरत है जैसे टीकमगढ़ चंदेरी बानपुर कंजिया (पिपरासर) एवं अन्य निकटतम बुंदेलखंड के इलाके में अपनी संस्कृति एवं विरासत को संजोए हुए ।[4]

1857-58 में झांसी और ओरछा के बीच महायुद्ध हुआ था. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और रानी लडई सरकार के बीच युद्ध हुआ था.

मान्यताएँ

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कुछ लोग कहते हैं कि सबसे पहले लोगों ने बुंदेलखंड में रहना शुरू किया था। यही वजह है कि इस इलाके के हर गांव और शहर के पास सुनाने को कई कहानियां हैं। बुंदेलखंड की दो खूबसूरत और दिलचस्प जगहें हैं ओरछा और दातिया । भले ही दोनों जगहों में कुछ किलोमीटर का फासला हो, लेकिन इतिहास के धागों से ये दोनों जगहें बेहद मजबूती से जुड़ी हुई हैं। ओरछा झांसी से लगभग आधे घंटे की दूरी पर स्थित है। ओरछा निवाड़ी जिले का मुख्यालय है

मंदिर व आस पास

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बेतवा नदी के किनारे बना महल

मंदिर के पास एक बगान है जिसमें स्थित काफी ऊंचे दो मीनार (वायू यंत्र) लोगों के आकर्षण का केन्द्र हैं। जि्न्हें सावन भादों कहा जाता है कि इनके नीचे बनी सुरंगों को शाही परिवार अपने आने-जाने के रास्ते के तौर पर इस्तेमाल करता था। इन स्तंभों के बारे में एक किंवदंती प्रचलित है कि वर्षा ऋतु में हिंदु कलेंडर के अनुसार सावन के महीने के खत्म होने और भादों मास के शुभारंभ के समय ये दोनों स्तंभ आपस में जुड़ जाते थे। हालांकि इसके बारे में पुख्ता सबूत नहीं हैं। इन मीनारों के नीचे जाने के रास्ते बंद कर दिये गये हैं एवं अनुसंधान का कोई रास्ता नहीं है।

इन मंदिरों को दशकों पुराने पुल से पार कर शहर के बाहरी इलाके में 'रॉयल एंक्लेव' (राजनिवास्) है। यहां चार महल, जहांगीर महल, राज महल, शीश महल और इनसे कुछ दूरी पर बना राय परवीन महल हैं। इनमें से जहांगीर महल के किस्से सबसे ज्यादा मशहूर हैं, जब जहांगीर को दिल्ली से बेदखल कर दिया गया था तब जहांगीर शरण के लिए बुंदेलखंड का रुख किया क्योंकि बुंदेलखंड उस समय किसी के भी आधिपत्य में नहीं था और बुंदेलखंड एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापत्य था चूंकि क्षत्रिय परंपरा के अनुसार किसी भी शरणागत का वध या हत्या जघन्य अपराध माना जाता था इस बात को मानकर जहांगीर महाराजा वीर सिंह जूदेव की शरण में आ गया चूंकि वह भलीभांति जानता था कि अकबर वीरसिंह जूदेव का सामना नहीं कर सकता था इस वजह से काफी समय तक जहांगीर अपने प्राण बचाकर कर ओरछा के अधीन रहकर अपनी जिंदगी बसर करता रहा कहा जाता है कि बादशाह अकबर ने अबुल फज़ल को शहजादे सलीम (जहांगीर) को काबू करने के लिए भेजा था, लेकिन बीर सिंह बुंदेला ने शरणागत की रक्षा के उद्देश्य से युद्ध में मार गिराया ,वैसे, ये महल बुंदेला राजपूतों की वास्तुशिल्प के प्रमाण हैं। खुले गलियारे, पत्थरों वाली जाली का काम, जानवरों की मूर्तियां, बेलबूटे जैसी तमाम बुंदेला वास्तुशिल्प की विशेषताएं यहां साफ देखी जा सकती हैं।

अब बेहद शांत दिखने वाले ये महल अपने जमाने में ऐसे नहीं थे। यहां रोजाना होने वाली नई हलचल से उपजी कहानियां आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन्हीं में से एक है हरदौल बुंदेला की कहानी, जो जुझार सिंह बुंदेला (1627-34) के राज्य काल की है। दरअसल, मुगल जासूसों की साजिश भरी कथाओं के कारण् इस राजा का शक हो गया था कि उसकी रानी से उसके भाई हरदौल बुंदेला के साथ संबंध हैं। लिहाजा उसने रानी से हरदौल बुंदेला को ज़हर देने को कहा। रानी के ऐसा न कर पाने पर खुद को निर्दोष साबित करने के लिए हरदौल बुंदेला ने खुद ही जहर पी लिया और त्याग की नई मिसाल कायम की। जिसके बाद हरदौल बुंदेला स्वयं मरकर भी एक त्याग की मिशाल बन गए और मृत होकर भी अपनी बहन की बेटी का कन्यादान लिया एवं पूरे विश्व को यह संदेश दे दिया कि अगर आप सत्य की राह पर है तो काल भी उसको मार नहीं सकता इसी कारण लाला हरदौल को बुंदेलखंड में लौक देवता के रूप में पूजा जाता है

बुंदेला क्षत्रियों ने जब छत्रपति शिवाजी के साथ मेत्री का हाथ बढ़ाया जिस कारण मराठों का साथ बुंदेलखंड पर एक अमिट छाप छोड़ गया किंतु विपरीत समय में उनके ही राज सेवकों द्वारा ग्वालियर पर अग्रेजों से मिलकर उस पर अधिपत्य जमा लिया और उसी के साथ ही ओरछा भी गुमनामी के घने जंगलों में खो गया और फिर यह स्वतंत्रता संग्राम के समय सुर्खियों में आया। जब महाराजा मर्दन सिंह बुंदेला ने रानी लक्ष्मी बाई का साथ देकर अग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह फूंक दिया क्योंकि उन्हीं के कुनवे के सिंधिया परिवार ने उन्हें धोखा दे दिया था तभी से यह पंक्तियां मशहूर हुई , बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी , खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी , उसके बाद स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद यहां के एक गांव में आकर छिपे थे। आज उनके ठहरने की जगह पर एक स्मृति चिन्ह भी बना है।

बुंदेलखंड की एक मशहूर पंक्ति महाराजा क्षत्रशाल के संबद्ध में भी कही जाती है "इत चंबल उत नर्मदा इत सरयू उत टोंस , छत्रसाल सो लड़न कि रही न काहू होश " वीरों की धरती बुंदेलखंड , [5]

महाराज क्षत्रसाल सनातन के एक अजेय योद्धा रहे जिन्होंने शिवाजी महाराज की एवं महाराणा प्रताप कि कई महत्वपूर्ण युद्धों में मदद की ओर बुंदेलखंड को हमेशा अजय रखा।

ओरछा दुर्ग का विहंगम दृष्य
राय प्रवीण महल
चतुर्भुज मंदिर, ओरछा

जहांगीर महल जिसमें मुगल शासक जहांगीर दिल्ली से बेदखल होकर यहां परिवार सहित छुप कर वीर सिंह जूदेव की शरण में रहा जिसको बाद में जहांगीर महल के नाम से जोड़ा गया ओरछा का मुख्य आकर्षण है। महल के प्रवेश द्वार पर दो झुके हुए हाथी बने हुए हैं। तीन मंजिला है वास्तुकारी की दृष्टि से यह अपने जमाने का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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यह महल ओरछा के सबसे प्राचीन स्मारकों में एक है। इसका निर्माण मधुकर शाह बुंदेला ने 17 वीं शताब्दी में करवाया था। राजा विरसिंह‌ जुदेव बुंदेला उन्हीं के उत्तराधिकारी थे। यह महल छतरियों और बेहतरीन आंतरिक भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। महल में धर्म ग्रन्थों से जुड़ी तस्वीरें भी देखी जा सकती हैं।

रामराजा मन्दिर

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भगवान श्रीराम का ओरछा में ४०० वर्ष पूर्व राज्याभिषेक हुआ था और उसके बाद से आज तक यहां भगवान श्रीराम को राजा के रुप में पूजा जाता है। यह पूरी दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है। रामराजा के अ[6]योध्या से ओरछा आने की एक मनोहारी कथा है।

एक दिन ओरछा नरेश मधुकरशाह बुंदेला ने अपनी पत्नी गणेशकुंवर राजे से कृष्ण उपासना के इरादे से वृंदावन चलने को कहा। लेकिन रानी राम भक्त थीं। उन्होंने वृंदावन जाने से मना कर दिया। क्रोध में आकर राजा ने उनसे यह कहा कि तुम इतनी राम भक्त हो तो जाकर अपने राम को ओरछा ले आओ। रानी ने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के किनारे लक्ष्मण किले के पास अपनी कुटी बनाकर साधना आरंभ की। इन्हीं दिनों संत शिरोमणि तुलसीदास भी अयोध्या में साधना रत थे। संत से आशीर्वाद पाकर रानी की आराधना दृढ से दृढतर होती गई। लेकिन रानी को कई महीनों तक रामराजा के दर्शन नहीं हुए। अंतत: वह निराश होकर अपने प्राण त्यागने सरयू की मझधार में कूद पडी। यहीं जल की अतल गहराइयों में उन्हें रामराजा के दर्शन हुए। रानी ने उन्हें अपना मंतव्य बताया। रामराजा ने ओरछा चलना स्वीकार किया किन्तु उन्होंने तीन शतर्ें रखीं- पहली, यह यात्रा पैदल होगी, दूसरी- यात्रा केवल पुष्प नक्षत्र में होगी, तीसरी- रामराजा की मूर्ति जिस जगह रखी जाएगी वहां से पुन: नहीं उठेगी।

रानी ने राजा को संदेश भेजा कि वो रामराजा को लेकर ओरछा आ रहीं हैं। राजा मधुकरशाह बुंदेला ने रामराजा के विग्रह को स्थापित करने के लिए अरबों की लागत से चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया। जब रानी ओरछा पहुंची तो उन्होंने यह मूर्ति अपने महल में रख दी। यह निश्चित हुआ कि शुभ मुर्हूत में मूर्ति को चतुर्भुज मंदिर में रखकर इसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। लेकिन राम के इस विग्रह ने चतुर्भुज जाने से मना कर दिया। कहते हैं कि राम यहां बाल रूप में आए और अपनी मां का महल छोडकर वो मंदिर में कैसे जा सकते थे। राम आज भी इसी महल में विराजमान हैं और उनके लिए बना करोडों का चतुर्भुज मंदिर आज भी वीरान पडा है। यह मंदिर आज भी मूर्ति विहीन है।

यह भी एक संयोग है कि जिस संवत 1631 को रामराजा का ओरछा में आगमन हुआ, उसी दिन रामचरित मानस का लेखन भी पूर्ण हुआ। जो मूर्ति ओरछा में विद्यमान है उसके बारे में बताया जाता है कि जब राम वनवास जा रहे थे तो उन्होंने अपनी एक बाल मूर्ति मां कौशल्या को दी थी। मां कौशल्या उसी को बाल भोग लगाया करती थीं। जब राम अयोध्या लौटे तो कौशल्या ने यह मूर्ति सरयू नदी में विसर्जित कर दी। यही मूर्ति गणेशकुंवर राजे को सरयू की मझधार में मिली थी। यह विश्व का अकेला मंदिर है जहां राम की पूजा राजा के रूप में होती है और उन्हें सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात सलामी दी जाती है। यहां राम ओरछाधीश के रूप में मान्य हैं। रामराजा मंदिर के चारों तरफ हनुमान जी के मंदिर हैं। छडदारी हनुमान, बजरिया के हनुमान, लंका हनुमान के मंदिर एक सुरक्षा चक्र के रूप में चारों तरफ हैं। ओरछा की अन्य बहुमूल्य धरोहरों में लक्ष्मी मंदिर, पंचमुखी महादेव, राधिका बिहारी मंदिर , राजामहल, रायप्रवीण महल, हरदौल बुंदेला की बैठक, हरदौल बुंदेला की समाधि, जहांगीर महल और उसकी चित्रकारी प्रमुख है। ओरछा झांसी से मात्र 15 किमी. की दूरी पर है। झांसी देश की प्रमुख रेलवे लाइनों से जुडा है। पर्यटकों के लिए झांसी और ओरछा में शानदार आवासगृह बने हैं।

राय प्रवीन महल

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यह महल राजा इन्द्रमणि बुंदेला की खूबसूरत गणिका प्रवीणराय की याद में बनवाया गया था। वह एक कवयित्री और संगीतकारा थीं। मुगल सम्राट अकबर को जब उनकी सुंदरता के बारे में पता चला तो उन्हें दिल्ली लाने का आदेश दिया गया। इन्द्रमणि बुंदेला के प्रति प्रवीन के सच्चे प्रेम को देखकर अकबर ने उन्हें वापस ओरछा भेज दिया। यह दो मंजिला महल प्राकृतिक बगीचों और पेड़-पौधों से घिरा है। राय प्रवीन महल में एक लघु हाॅल और चेम्बर है।[7]

लक्ष्मीनारायण मंदिर

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यह मंदिर 1622 ई. में बीरसिंह जुदेव बुंदेला द्वारा बनवाया गया था। मंदिर ओरछा गांव के पश्चिम में एक पहाड़ी पर बना है। मंदिर में सत्रहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के चित्र बने हुए हैं। चित्रों के चटकीले रंग इतने जीवंत लगते हैं जसे वह हाल ही में बने हों। मंदिर में झांसी की लड़ाई के दृश्य और भगवान कृष्ण की आकृतियां बनी हुई हैं।

चतुर्भुज मंदिर

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राज महल के समीप स्थित चतुर्भुज मंदिर ओरछा का मुख्य आकर्षण है। यह मंदिर चार भुजाधारी भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण 1558 से 1573 के बीच राजा मधुकर शाह बुंदेला ने करवाया था। अपने समय की यह उत्कृष्ठ रचना यूरोपीय कैथोड्रल से समान है। मंदिर में प्रार्थना के लिए विस्तृत हॉल है जहां कृष्ण भक्त एकत्रित होते हैं। ओरछा में यह स्थान भ्रमण के लिए बहुत श्रेष्ठ है।

बुंदेला राजाओं द्वारा बनवाया गया यह फूलों का बगीचा चारों ओर से दीवारों से घिरा है। पालकी महल के निकट स्थित यह बाग बुंदेला राजाओं का आरामगाह था। वर्तमान में यह पिकनिक स्थल के रूप में जाना जाता है। फूलबाग में एक भूमिगत महल और आठ स्तम्भों वाला मंडप है। यहां के चंदन कटोर से गिरता पानी झरने के समान प्रतीत होता है।

सुन्दर महल

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इस महल को राजा जुझार सिंह बुंदेला के पुत्र धुरभजन बुंदेला ने बनवाया था। धुरभजन की मृत्यु के बाद उन्हें संत के रूप में जाना गया। वर्तमान में यह महल काफी क्षतिग्रस्त हो चुका है।

ओरछा झांसी से तकरीबन 18 किलोमीटर दूर है और दिल्ली से यहां भोपाल शताब्दी-एक्सप्रेस के जरिए आसानी से पहुंचा जा सकता है।

वायु मार्ग

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ओरछा का नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो है जो 163 किलोमीटर की दूरी पर है। यह एयरपोर्ट दिल्ली, वाराणसी और आगरा से नियमित फ्लाइटों से जुड़ा है।

रेल मार्ग

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झांसी ओरछा का नजदीकी रेल मुख्यालय है। दिल्ली, ललितपुर, आगरा, भोपाल, मुम्बई, ग्वालियर आदि प्रमुख शहरों से झांसी के लिए अनेक रेलगाड़ियां हैं। वैसे ओरछा तक भी रेलवे लाइन है जहां पैसेन्जर ट्रैन से पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग

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ओरछा झांसी-खजुराहो मार्ग पर स्थित है। नियमित बस सेवाएं ओरछा और झांसी को जोड़ती हैं। दिल्ली, ललितपुर ,आगरा, भोपाल, ग्वालियर और वाराणसी से यहां के लिए नियमित बसें चलती हैं।

चित्र दीर्घा

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इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. "Inde du Nord: Madhya Pradesh et Chhattisgarh Archived 2019-07-03 at the वेबैक मशीन," Lonely Planet, 2016, ISBN 9782816159172
  2. "Tourism in the Economy of Madhya Pradesh," Rajiv Dube, Daya Publishing House, 1987, ISBN 9788170350293
  3. रामायण और महाभारत के अनुसार
  4. इंग्लिश गजेटियर.
  5. इंग्लिश गजेटियर ओरछा.
  6. अयाची, पं राकेश (2014). सम्पूर्ण ओरछा दर्शन एवं ओरछा का इतिहास. ओरछा: अयाची पुस्तकालय. p. 330.
  7. WD. "वैभवपूर्ण ओरछा". hindi.webdunia.com. अभिगमन तिथि: 2022-03-29.