भील

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भील
Young Indian girl, Raisen district, Madhya Pradesh.jpg
कुल जनसंख्या
ख़ास आवास क्षेत्र
Flag of India.svg भारत
              गुजरात 3,441,945[1]
              मध्य प्रदेश 4,619,068[2]
              महाराष्ट्र 1,818,792[3]
              राजस्थान 2,805,948[4]
भाषाएँ
भील भाषा
अन्य सम्बंधित समूह

भील मध्य भारत की एक जनजाति है। भील जनजाति के लोग भील भाषा बोलते है। भारत के प्रसिद्ध चार धाम में से एक जगन्नाथ मन्दिर, पुरी ,वह मंदिर नील माधव जी के नाम से जाना जाता था , वे नील माधव जी राजा विश्वासु भील जी के आराध्य देव रहे[5] ।। महावीर स्वामी का पहला अवतार पुरूरवा भील के अवतार मे थे और उन्होंने शराब, माँस और मधु के सेवन नहीं करने की शिक्षा दी। हर व्यक्ति को शिक्षा का महत्त्व समझना चाहिए और अपने बच्चों को शिक्षा का अनमोल खजाना देना चाहिए। भील जाति मे कई वीर योद्धाओं का जन्म हुआ।। एक कहावत प्रचलित है , "" बंदूक से चली गोली का निशाना चूक सकता है ,लेकिन भील के तीर का निशाना कभी नहीं चूकता "" । एक भील राजा की प्रसिद्ध कहावत है कि दुनिया में केवल साढ़े तीन राजा ही प्रसिद्ध है ,इन्द्र राजा, राजा और भील राजा तथा आधे में बींद (दूल्हे-राजा)। एक बुलंद हौसला पूरी दुनिया बदल सकता है। भील, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान में एक अनुसूचित जनजाति है, अजमेर में ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के खादिम भी भील पूर्वजों के वंशज हैं। भील त्रिपुरा और पाकिस्तान के सिन्ध के थारपरकअर जिले में भी बसे हुये हैं।भील जनजाति भारत समेत पाकिस्तान तक विस्तृत रूप से फैली हुई है। राजस्थान में राणा पूंजा भील जी को याद किया जाता है जिन्होंने महाराणा प्रताप के साथ मिलकर मुगलों के छक्के छुड़ा दिए ।

Tantiya Bhil
Tantia bhil dacoit.jpg
Illustration from The Tribes and Castes of the Central Provinces of India (1916)
जन्म 1840/1842

भील अब शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहे हैं । भील बहुत शक्तिशाली,बहादुर,साहसिक व्यक्तित्व के होते है और यह जंगल में कंद मूल खा कर रहने वाले लोग होते हैं। इनके अपने रीति रिवाज परंपराएं संस्कृति होती है यह प्रकृति पूजक होते हैं प्रकृति की पूजा करते हैं। भील लोगो की मित्रता ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य से रहे, लगभग भील लोगो की मित्रता सभी लोगो से सामान रही। एक शोध के मुताबिक भील कभी भीख नहीं मांगते है।

भील इतिहास[संपादित करें]

भीलों का अपना एक लंबा इतिहास रहा है, कुछ इतिहासकारो ने भीलों को द्रविड़ो से पहले का भारतीय निवासी माना तो कुछ ने भीलों को द्रविड़ ही माना है। मध्यकाल में भील राजाओं की स्वतंत्र सत्ता थी । करीब 11 वी सदी तक भील राजाओं का शासन विस्तृत क्षेत्र में फैला था । छठी शताब्दी में एक शक्तिशाली भील राजा का पराक्रम देखने को मिलता है जहां मालवा के भील राजा हाथी पर सवार होकर विंध्य क्षेत्र से होकर युद्ध करने जाते है । इडर में एक शक्तिशाली भील राजा हुए जिनका नाम राजा मांडलिक रहा । राजा मांडलिक ने ही गुहिल वंश अथवा मेवाड़ के प्रथम संस्थापक गुहादित्य को अपने इडर राज्य मे रखकर संरक्षण किया । गुहादित्य राजा मांडलिक के राजमहल मे रहता और भील बालको के साथ घुड़सवारी करता , राजा मांडलिक ने गुहादित्य को कुछ जमीन और जंगल दिए , आगे चलकर वही बालक गुहादित्य इडर साम्राज्य का राजा बना । गुहिलवंश की चौथी पीढ़ी के शासक नागादित्य का व्यवहार भील समुदाय के साथ अच्छा नहीं था इसी कारण भीलों और नागादित्य के बीच युद्ध हुआ और भीलों ने इडर पर पुनः अपना अधिकार कर लिया । बप्पा रावल का लालन - पालन भील समुदाय ने किया और बप्पा को रावल की उपाधि भील समुदाय ने ही दी थी । बप्पारावल ने भीलों से सहयोग पाकर अरबों से युद्ध किया । खानवा के युद्ध में भील अपनी आखरी सांस तक युद्ध करते रहे ।

मेवाड़ चिन्ह महाराणा प्रताप और राणा पूंजा भील

बाबर और अकबर के खिलाफ मेवाड़ राजपूतो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध करने वाले भील ही थे । मेवाड़ और मुगल समय में भील समुदाय को उच्च ओहदे प्राप्त थे,तत्कालीन समय में भील समुदाय को रावत,भोमिया और जागीरदार कहा जाता था। राणा पूंजा भील और महाराणा प्रताप की आपसी युद्ध नीती से ही मेवाड़, मुगलो से सुरक्षित रहा। हल्दीघाटी का युद्ध मे राणापूंजा जी और उनकी भील सेना का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी कारण मेवाड चिन्ह मे एक तरफ महाराणा प्रताप जी और एक तरफ राणापूंजा भील जी अर्थात राजपूत और भील का प्रतिकचिन्ह अस्तित्व मे आया। मुगलों के बाद जब मराठो ने मेवाड़ पर आक्रमण किया तब भी भील मेवाड़ के साथ खड़े रहे । भील , मराठा शासक वीर शिवाजी के साथ खड़े रहें। भील और राजपूतो मे खान-पान होता रहा ।

गुजरात के डांग जिले के पांच भील राजाओं ने मिलकर अंग्रेज़ो को युद्ध में हरा दिया,लश्करिया अंबा में सबसे बड़ा युद्ध हुए, इस युद्ध को डांग का सबसे बड़ा युद्ध कहा जाता है । डांग के यह पांच भील राजा भारत के एकमात्र वंशानुगत राजा है और इन्हें भारत सरकार की तरफ से पेंशन मिलती हैं , आजादी के पहले ब्रिटिश सरकार इन राजाओं को धन देती थी ।

गुजरात में 1400 ईसा पूर्व के दौरान भील राजा का शासन । गुजरात केइडर ,डांग, अहमदाबाद और चांपानेर पावागढ़ में लंबे समय तक भील राजाओं का शासन रहा था।

राजस्थान में कोटा,बांसवाड़ा,डूंगरपुर,मनोहरथाना, कुशलगढ़,भीनमाल, प्रतापगढ़,भोमटक्षेत्र और जगरगढ़ में भील राजाओं का शासन लंबे समय तक रहा था। राजस्थान में मेवाड़ भील कॉर्प है। भील लोग आम जनता की सुरक्षा करते थे और यह भोलाई नामक कर वसूलते थे । शिसोदा के भील राजा रोहितास्व भील रहे थे । [6] अध्याय प्रथम वागड़ के आदिवासी: ऩररचय एवंअवधारणा - Shodhganga

मध्यप्रदेश में मालवा पर भील राजाओं ने लंबे समय तक शासन किया , झाबुआ,ओम्कारेश्वर,अलीराजपुर पर भील राजाओं ने शासन किया । इंदौर स्थित भील पल्टन का नाम बदलकर पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय रखा , मध्यप्रदेश राज्य गठन के पूर्व यहां भील सैना प्रशिक्षण केंद्र था। मालवा कीमालवा भील कॉर्प्स थी ।


छत्तीसगढ़ का प्रमुख शहर भिलाई का नामकरण भील समुदाय के आधार पर ही हुआ है।

महाराष्ट्र में कई भील विद्रोह हुए जिनमें खानदेश का भील विद्रोह प्रमुख रहा ।

भील आंदोलन[संपादित करें]

भील एक स्वतंत्रताप्रिय जाति है ।

प्रमुख भील आंदोलन

आंदोलन। नेता। समय

भील विद्रोह सेवाराम 1825-1831


मेवाड़भीलआंदोलनमोतीलाल तेजावत1922

भील विद्रोह

महाराष्ट्र के वन प्रदेशों, गुजरात, मध्यप्रदेश एवं दक्षिणी राजस्थान में भील जनजाति बड़ी संख्या में निवास करती है। 1857 के पूर्व भीलों के दो अलग-अलग विद्रोह हुए। महाराष्ट्र के खानदेश में भील काफी संख्या में निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर में विंध्य से लेकर दक्षिण पश्चिम में सहाद्रि एवं पश्चिमी घाट क्षेत्र में भीलों की बस्तियाँ देखी जाती हैं। 1816 में पिंडारियों के दबाव से ये लोग पहाड़ियों पर विस्थापित होने को बाध्य हुए। पिंडारियों ने उनके साथ मुसलमान भीलों के सहयोग से क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। इसके अतिरिक्त सामंती अत्याचारों ने भी भीलों को विद्रोही बना दिया। 1818 में खानदेश पर अंग्रेजी आधिपत्य की स्थापना के साथ ही भीलों का अंग्रेजों से संघर्ष शुरू हो गया। कैप्टेन बिग्स ने उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और भीलों के पहाड़ी गाँवों की ओर जाने वाले मार्गों को अंग्रेजी सेना ने सील कर दिया, जिससे उन्हें रसद मिलना कठिन हो गया। दूसरी ओर एलफिंस्टन ने भील नेताओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया और उन्हें अनेक प्रकार की रियायतों का आश्वासन दिया। पुलिस में भर्ती होने पर अच्छे वेतन दिये जाने की घोषणा की। किंतु अधिकांश लोग अंग्रेजों के विरुद्ध बने रहे। 1819 में पुन: विद्रोह कर भीलों ने पहाड़ी चौकियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। अंग्रेजों ने भील विद्रोह को कुचलने के लिए सतमाला पहाड़ी क्षेत्र के कुछ नेताओं को पकड़ कर फाँसी दे दी। किंतु जन सामान्य की भीलों के प्रति सहानुभूति थी। इस तरह उनका दमन नहीं किया जा सका। 1820 में भील सरदार दशरथ ने कम्पनी के विरुद्ध उपद्रव शुरू कर दिया। पिण्डारी सरदार शेख दुल्ला ने इस विद्रोह में भीलों का साथ दिया। मेजर मोटिन को इस उपद्रव को दबाने के लिए नियुक्त किया गया, उसकी कठोर कार्रवाई से कुछ भील सरदारों ने आत्मसमर्पण कर दिया। 1822 में भील नेता हिरिया भील ने लूट-पाट द्वारा आतंक मचाना शुरू किया, अत: 1823 में कर्नल राबिन्सन को विद्रोह का दमन करने के लिए नियुक्त किया। उसने बस्तियों में आग लगवा दी और लोगों को पकड़-पकड़ कर क्रूरता से मारा। 1824 में मराठा सरदार त्रियंबक के भतीजे गोड़ा जी दंगलिया ने सतारा के राजा को बगलाना के भीलों के सहयोग से मराठा राज्य की पुनर्स्थापना के लिए आह्वान किया। भीलों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया एवं अंग्रेज सेना से भिड़ गये तथा कम्पनी सेना को हराकर मुरलीहर के पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया। परंतु कम्पनी की बड़ी बटालियन आने पर भीलों को पहाड़ी इलाकों में जाकर शरण लेनी पड़ी। तथापि भीलों ने हार नहीं मानी और पेडिया, बून्दी, सुतवा आदि भील सरदार अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते रहे। कहा गया है कि लेफ्टिनेंट आउट्रम, कैप्टेन रिगबी एवं ओवान्स ने समझा बुझा कर तथा भेद नीति द्वारा विद्रोह को दबाने का प्रयास किया। आउट्रम के प्रयासों से अनेक भील अंग्रेज सेना में भर्ती हो गये और कुछ शांतिपूर्वक ढंग से खेती करने लगे। उन्हें तकाबी ऋण दिलवाने का आश्वासन दिया।

निवास क्षेत्र[संपादित करें]

भील शब्द की उत्पत्ति "वील" से हुई है जिसका द्रविड़ भाषा में अर्थ होता हैं "धनुष"। भील जाति दो प्रकार से विभाजित है- 1.उजलिया/क्षत्रिय भील- उजलिया भील मूल रूप से वे क्षत्रिय है जो सामाजिक/मुगल आक्रमण के समय जंगलो में चले गए एवं मूल भीलों से वैवाहिक संबंध स्थापित कर लेने से स्वयं को उजलिया भील कहने लगे मालवा में रहने वाले भील वही है। इनके रिति रिवाज राजपूतों की तरह ही है। इनमें वधूमूल्य नहीं पाया जाता और ना ही ये भीली भाषा बोलते है। इनके चेहरे और शरीर की बनाबट, कद काठी प्राचीन राजपूतों से मिलती है। 2.लंगोट भील-ये वनों में रहने वाले मूल भील है इनके रीति रिवाज आज भी पुराने है। इनमें वधूमूल्य का प्रचलन पाया जाता है। म.प्र. के निमाड में रहने वाले अधिकांश जनजाति यही है स्वभाव से भोले होते हैं, बदले की भावना में आक्रामक भी होते हैं यह मध्यप्रदेश के झाबुआ,अलिराजपुर, धार,पेटलावाद, छेत्रो में निवास करतें है भील अपने पूर्वजों को पूजते है और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के राणापुर के पास बाबा देव को पूजते है!

उप-विभाग[संपादित करें]

भील कई प्रकार के कुख्यात क्षेत्रीय विभाजनों में विभाजित हैं, जिनमें कई कुलों और वंशों की संख्या है। गुजरात में मुख्य विभाग बरदा , भील गरासिया , ढोली भील , डुंगरी भील , डुंगरी गरासिया , भील ​​पटेलिया, रावल भील , तड़वी भील , भागलिया , भिलाला , पावरा, वासरी या वासेव , डूंगरी गरासिया , और वसावा , महाराष्ट्र में हैं । भील मावची और कोतवाल उनके मुख्य उप-समूह हैं। राजस्थान में , वे भील गरासिया , धोली भील , डुंगरी भील , डुंगरी गरासिया , मेवासी भील , रावल भील , तडवी भील , भागलिया , भिलाला , पावरा, वासव और वासेव के रूप में मौजूद हैं ।[7]

उल्लेखनीय लोग[संपादित करें]

भील राजा[संपादित करें]

राजा मांडलिक

राणा पूंजा

राजा बांसिया भील

राजा आशा भील

राजा डुंगरिया भील

राजा धन्ना भील

राजा विंध्यकेतु

राजा कोटिया भील

वेगडाजी भील

राजा जैतसी परमार भील

राजा विश्वासु भील

राजा चक्रसेन भील

राजा सोनारा भील

मंदिर[संपादित करें]

संस्कृति[संपादित करें]

भीलों के पास समृद्ध और अनोखी संस्कृति है। भिलाला उप-मंडल अपनी पिथौरा पेंटिंग के लिए जाना जाता है।[8] घूमर भील जनजाति का पारंपरिक लोक नृत्य है।[9][10] घूमर नारीत्व का प्रतीक है। युवा लड़कियां इस नृत्य में भाग लेती हैं और घोषणा करती हैं कि वे महिलाओं के जूते में कदम रख रही हैं।

कला[संपादित करें]

भील पेंटिंग को भरने के रूप में बहु-रंगीन डॉट्स के उपयोग की विशेषता है। भूरी बाई पहली भील कलाकार थीं, जिन्होंने रेडीमेड रंगों और कागजों का उपयोग किया था।Pithora Painting at Crafts Museum.jpg अन्य ज्ञात भील कलाकारों में लाडो बाई , शेर सिंह, राम सिंह और डब्बू बारिया शामिल हैं।[11]

भोजन[संपादित करें]

भीलों के मुख्य खाद्य पदार्थ मक्का , प्याज , लहसुन और मिर्च हैं जो वे अपने छोटे खेतों में खेती करते हैं। वे स्थानीय जंगलों से फल और सब्जियां एकत्र करते हैं। त्योहारों और अन्य विशेष अवसरों पर ही गेहूं और चावल का उपयोग किया जाता है। वे स्व-निर्मित धनुष और तीर, तलवार, चाकू, कुल्हाड़ी इत्यादि अपने साथ आत्मरक्षा के लिए हथियार के रूप में रखते हैं और जंगली जीवों का शिकार करते हैं जो उनके आहार का प्रमुख हिस्सा है। वे महुआ ( मधुका लोंगिफोलिया ) के फूल से उनके द्वारा आसुत शराब का उपयोग करते हैं। त्यौहारों के अवसर पर पकवानों से भरपूर विभिन्न प्रकार की चीजें तैयार की जाती हैं, यानी मक्का, गेहूं, जौ, माल्ट और चावल। भील पारंपरिक रूप से मांसाहारी हैं।[12]

आस्था और उपासना[संपादित करें]

प्रत्येक गाँव का अपना स्थानीय देवता ( ग्रामदेव ) होता है और परिवारों के पास भी उनके जतीदेव, कुलदेव और कुलदेवी (घर में रहने वाले देवता) होते हैं जो कि पत्थरों के प्रतीक हैं। 'भाटी देव' और 'भीलट देव' उनके नाग-देवता हैं। 'बाबा देव' उनके ग्राम देवता हैं। बाबा देव का प्रमुख स्थान झाबुआ जिले के ग्राम समोई में एक पहाड़ी पर है। करकुलिया देव उनके फसल देवता हैं, गोपाल देव उनके देहाती देवता हैं, बाग देव उनके शेर भगवान हैं, भैरव देव उनके कुत्ते भगवान हैं। उनके कुछ अन्य देवता हैं इंद्र देव, बड़ा देव, महादेव, तेजाजी, लोथा माई, टेकमा, ओर्का चिचमा और काजल देव।

उन्हें अपने शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक उपचारों के लिए अंधविश्वासों और भोपों पर अत्यधिक विश्वास है।[12]

त्यौहार[संपादित करें]

कई त्यौहार हैं, अर्थात। भीलों द्वारा मनाई जाने वाली राखी , नवरात्रि , दशहरा , दिवाली , होली । वे कुछ पारंपरिक त्योहार भी मनाते हैं। अखातीज, नवमी, हवन माता की चालवानी, सावन माता का जतरा, दीवासा, नवाई, भगोरिया, गल, गर, धोबी, संजा, इंदल, दोहा आदि जोशीले उत्साह और नैतिकता के साथ।

कुछ त्योहारों के दौरान जिलों के विभिन्न स्थानों पर कई आदिवासी मेले लगते हैं। नवरात्रि मेला, भगोरिया मेला (होली के त्योहार के दौरान) आदि।[12]

नृत्य और उत्सव[संपादित करें]

उनके मनोरंजन का मुख्य साधन लोक गीत और नृत्य हैं। महिलाएं जन्म उत्सव पर नृत्य करती हैं, पारंपरिक भोली शैली में कुछ उत्सवों पर ढोल की थाप के साथ विवाह समारोह करती हैं। उनके नृत्यों में लाठी (कर्मचारी) नृत्य, गवरी/राई, गैर, द्विचकी, हाथीमना, घुमरा, ढोल नृत्य, विवाह नृत्य, होली नृत्य, युद्ध नृत्य, भगोरिया नृत्य, दीपावली नृत्य और शिकार नृत्य शामिल हैं। वाद्ययंत्रों में हारमोनियम , सारंगी , कुंडी, बाँसुरी , अपांग, खजरिया, तबला , जे हंझ , मंडल और थाली शामिल हैं। वे आम तौर पर स्थानीय उत्पादों से बने होते हैं।[12]

भील लोकगीत[संपादित करें]

1.सुवंटिया - (भील स्त्री द्वारा)

2.हमसीढ़ो- भील स्त्री व पुरूष द्वारा युगल रूप में

किले[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Gujarat: Data Highlights the Scheduled Tribes" (PDF). Census of India 2001. Census Commission of India. अभिगमन तिथि 2008-03-31.
  2. "Madhya Pradesh: Data Highlights the Scheduled Tribes" (PDF). Census of India 2001. Census Commission of India. अभिगमन तिथि 2008-03-06.
  3. "Maharashtra: Data Highlights the Scheduled Tribes" (PDF). Census of India 2001. Census Commission of India. अभिगमन तिथि 2008-03-31.
  4. "Rajasthan: Data Highlights the Scheduled Tribes" (PDF). Census of India 2001. Census Commission of India. अभिगमन तिथि 2008-03-31.
  5. {{https://hi.m.wikipedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:Http://www.templeyatra.in/history-of-jagannathpuri-rath-yatra/&action=edit&redlink=1}}
  6. साँचा:Cite shodhganga.inflibnet.ac.inPDF
  7. "List of Scheduled Tribes". Census of India: Government of India. 7 March 2007. मूल से 5 June 2010 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 27 November 2012.
  8. Pachauri, Swasti (26 June 2014). "Pithora art depicts different hues of tribal life". Indian Express. अभिगमन तिथि 13 February 2015.
  9. Kumar, Ashok Kiran (2014). Inquisitive Social Sciences. Republic of India: S. Chand Publishing. पृ॰ 93. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9789352831098.
  10. Danver, Steven L. (June 28, 2014). Native People of The World. United States of America: Routledge. पृ॰ 522. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 076568294X.
  11. "Bhil Art - How A Tribe Uses Dots To Make Their Story Come Alive". Artisera. अभिगमन तिथि 2019-03-18.
  12. https://books.google.co.in/books?id=UjhLDwAAQBAJ&pg=PA4&lpg=PA4&dq=Bhil+people+history&source=bl&ots=NtaP_L1LtV&sig=msu_cEDmYMf0dgeC7_pHzLNgxkg&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjN6uvl94LeAhVWWX0KHWMgCRA4RhDoATACegQIChAB#v=onepage&q=Bhil%20people%20history&f=false