मारवाड़ी भाषा

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मारवाड़ी राजस्थान में बोली जाने वाली एक क्षेत्रीय भाषा है। यह राजस्थान की एक मुख्य भाषा है। इसकी लिपि देवनागरी है। इसकी कई उप बोलियां भी है।

  • राजस्थानी - राजस्थान की मुख्य भाषा राजस्थानी है इसकि खुद की लिपि जिसे मोड़िया लिपि भी हैं। परन्तु इस लिपि के विकास में राजपुताने राजरस्थान के राजा-महाराजा (वर्तमान में राजस्थान राज्य) व राजस्थान सरकार ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। पिछले ४०-५० सालों से इस भाषा के विकास पर बातें तो बहुत होती रही है पर कार्य के मामले में कोई विशेष प्रगति नहीं दिखी। इन दिनों सन् 2011 से कोलकाता के श्री शम्भु चौधरी इस दिशा में काफी कार्य किया है। राजस्थानी भाषा कि लिपि के संदर्भ में यह गलत प्रचार किया जाता रहा कि इसकी लिपि देवनागरी है जबकि राजस्थान के पुराने दस्तावेजों से पता चलता है कि इसकी लिपि मोड़िया है। उस लिपि को महाजनी भी कहा जाता है। हांलाकि मोड़िया लिपि को भी महाजनी लिपि कहा जाता हैं। कुछ लोग मोड़ी लिपि को ही मोड़िया लिपि मानते रहे। जब इसके विस्तार में देखा गया तो दोनों लिपि में काफी अन्तर है। आगे विस्तार से इस बात पर चर्चा करेगें।

जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने राजस्थानी बोलियों के पारस्परिक संयोग एवं सम्बन्धों के विषय में लिखा तथा वर्गीकरण किया है। ग्रियर्सन का वर्गीकरण इस प्रकार है :- १. पश्चिमी राजस्थान में बोली जाने वाली बोलियाँ - मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढारकी, बीकानेरी, बाँगड़ी, शेखावटी, खेराड़ी, मोड़वाडी, देवड़ावाटी आदि। २. उत्तर-पूर्वी राजस्थानी बोलियाँ - अहीरवाटी और मेवाती। ३. मध्य-पूर्वी राजस्थानी बोलियाँ - ढूँढाड़ी, तोरावाटी, जैपुरी, काटेड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किशनगढ़, नागर चोल, हड़ौती। ४. दक्षिण-पूर्वी राजस्थान - रांगड़ी और सोंधवाड़ी ५. दक्षिण राजस्थानी बोलियाँ - निमाड़ी आदि।

यह राजस्थान की मुख्य भाषा है।


मारवाड़ी भाषा की पारंपरिक लिपि[संपादित करें]

इसकी लिपि मोड़िया है। इन दिनों इसका प्रचलन प्रायः सामाप्त हो चुका है। सन् 2011 से कोलकाता के श्री शम्भु चौधरी ने पुनः इस लिपि पर नए सिरे से कार्य करना शुरु कर दिया है।

प्रस्तावित संशोधन , द्वारा- मंगलाराम बिश्नोई , Sankad, Sanchore, Jalore, रajasthan 11 अक्तूबर, 2016 राजस्थानी- मारवाडी भाषा में ' है ' वर्ण की लिपि नहीं। जिसके कारण यह भाषा देवनागरी लिपि की मोहताज है। ' है ' वर्ण फारसी मूल का होना बताया जाता है। इसी ने ' सिंधु' को " हिन्दु" बना दिया। जबकि मूलतः ' है ' वर्ण से पहले 'इ' की मात्रा लगने से ही " इहैन्दु " शब्द बनना चाहिये।

राजस्थानी- मारवाडी भाषा में 'सडक' को 'हैडक' बोला जाता है और कई शब्द ऐसे हैं, जो 'है' की जगह 'स' के प्रयोग से अभिव्यक्त नहीं होते। वैसे हिन्दी में भी 'है' का उच्चारण लिपि के अनुसार तो "हई " होना चाहिये, हम केवल सुविधा के लिये इसे 'है' बोलते हैं।

विमर्श के लिये फोन -9610005326 पर और ईमेल - Email : (1) manglaram744@gmail.com

   (2)  manglaram961@gmail.com

Facebook- ManglaRam Bishnoie Whatsapp - Global Symposium