शूद्र

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आधुनिक और सामानय अर्थ में, लोकविधान के अनुसार, सनातन धर्म के चार वर्णों में से चौथा और अंतिम वर्ण शूद्र कहलाता है। इनका कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा करना और शिल्प-कला के काम करना माना गया है। यजुर्वेद में शूद्रों की उपमा समाजरूपी शरीर के पैरों से दी गई है; इसीलिये कुछ लोग इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से मानते हैं।

विविध युगों और परंपराओं में शूद्रों की स्थिति विभिन्न थी। वैसे शूद्र (और वर्ण-व्यवास्था पर भी) शास्त्रों में अलग-अलग बातें कहीं गयीं हैं। आधुनिक विद्वान भी इस पर एकमत नहीं हैं। उदाहरण के लिए डॉ भीमराव आम्बेडकर का मत है कि शूद्र मूलतः क्षत्रिय थे। इसी प्रकार वेबर, ज़िमर और रामशरण शर्मा क्रमश: शूद्रों को मूलत: भारतवर्ष में प्रथमागत आर्यस्कंध, ब्राहुई-भाषी और आभीर-संबद्ध मानते हैं। कुछ शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति शूद्र पैदा होता है (जन्मना जायते शूद्रः) और प्रयत्न और विकास से अन्य वर्ण अवस्थाओं में पहुँचता है। वास्तव में प्रत्येक में चारों वर्ण स्थापित हैं।

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