हिन्दू वर्ण व्यवस्था

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वर्ण-व्‍यवस्‍था हिन्दू धर्म में सामाजिक कार्योन्नती (ऊन्नती) का एक आधार है। हिंदू धर्म-ग्रंथों के अनुसार समाज को चार वर्णों के कार्यो से समाज का स्थाईत्व दिया गया हैै - ब्राह्मण (शिक्षाविद), क्षत्रिय (सुरक्षाकर्मी), वैश्य (वाणिज्य) और शूद्र (उद्योग व कला) ।इसमे सभी वर्ण को उनके कर्म मे श्रेष्ठ माना गया है।शिक्षा के लिए ब्राह्मण श्रेष्ठ, सुरक्षा करने मे क्षत्रिय श्रेेष्ठ, वैश्य व शूद्र उद्योग करने मे श्रेेष्ठ । वैश्य व शूद्र वर्ण को बाकी सब वर्ण को पालन करने के लिए राष्ट्र का आधारभूत संरचना उद्योग व कला (कारीगर) करने का प्रावधान इन धर्म ग्रंथो मे किया गया है।सेवा राष्ट्र का कारक है , उदाहरण केे लिए सभी देश का आधार सेवा कर है।

सुत्तनिपात वे सभी जो सुरत है, विनम्र हो सत्कर्मों में लगे है, सुदंत है, आत्मसंयम का जीवन जीते है, वे सभी परिनिवृत है, चाहे वे क्षत्रिय हो , ब्राह्मण हो, वैश्य हो, शूद्र हो।

वर्ण व्यवस्था का पक्ष[संपादित करें]

भारत मे वर्ण व्यवस्था की जड़े बहुत गहरी है!वर्ण व्यवस्था का सर्वप्रथम वर्णन ऋग्वेद के दशम मंडल के पुरुषसूक्त मे है,ऋग्वेद के अनुसार वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित है न कि जन्म आधारित हिन्दू संस्कृति मे कर्म का बहुत ही अधिक महत्व है इसलिए व्यक्ति के कर्म सर्वोपरि है यदि व्यक्ति पढ़ा लिखा यानी ज्ञानी है तो वह बह्मन कह लाएगा यदि व्यक्ति शक्तिशाली या समर्थ शाली है तो वह क्षत्रीय बनेगा इसी तरीके वैश्य व शूद्र निर्मित होंगे!

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]