हिन्दू वर्ण व्यवस्था

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वर्ण-व्‍यवस्‍था हिन्दू धर्म में सामाजिक विभाजन का एक आधार है। हिंदू धर्म-ग्रंथों के अनुसार समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है- क्षत्रिय,ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र। और "बौद्ध" "धर्म" ग्रन्थों के अनुसार समाज को पाँच वर्णों में विभाजित किया गया है- क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र और चांडाल

सुत्तनिपात

"[खत्तिये ब्राह्मणे वेस्से, सुद्दे चण्डालपुक्कु से।]"

"[न कि ञ्चि परिवज्जेति, सब्बमेवाभिमद्दति।।]"

मृतुराज क्षत्रिय , ब्राह्मण, वैश्य,शूद्र और चंडाल - किसी को कोभी नहीं छोड़ता, सबको कुचल डालता है।

विद्वानों[कौन?] का मत है कि आरंभ में यह विभाजन कर्म आधारित था लेकिन बाद में यह जन्‍माधारित हो गया। वर्तमान में हिंदू समाज में इसी का विकसित रूप जाति-व्‍यवस्‍था के रूप में देखा जा सकता है। जाति एक अंतर्विवाही समूह है। 1901 की जाति आधारित जनगणना के अनुसार भारत में दो हजार से अधिक जातियां निवास करती हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]