हिन्दू वर्ण व्यवस्था

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भारतीय उपमहाद्वीप में वर्ण आश्रम को ही सबसे महत्वपूर्ण पहचान बताया गया है। यह प्रथम नागरिक पहचान थी।

एक कानून व्यवस्था का पालन करने वाले नागरिक एक वर्ण के लोग कहलाये  ।

वर्ण सिर्फ़ राष्ट्र व नागरिकता के माध्यम से ही एकजुट नहीं थे , वे विवाह व रिश्तेदारियों  के माध्यम से भी एकजुट थे। क्योंकि सामान्य तौर पर लोग समान राष्ट्र मे समान कानून व्यवस्था लागू लोगों के बीच ही विवाह करते है ।  

विवाह संबंधों के कारण पूर्वजों में आयी जेनेटिक हिस्ट्री, साथ ही स्थानीय वातावरण में हजारों सालों में आए समान परिवर्तन के कारण मानव शरीर में हुए जेनेटिक बदलाव ने शरीर की संरचना और रंगरूप मे आए समान स्थानीय बदलाव की वजह से जो एक जटिल जेनेटिक समूह वाले मानव समूहों का निर्माण करती है जो अपने रूप रंग व शारीरिक बनावट के तौर पर अलग से एक समूह के तौर पर पहचाने जाते है वर्ण कहलाते है ।  


अलग अलग सामाजिक विश्वासों (आस्था) में वर्ण की स्थिति उस के नागरिक अधिकार तय करती है।


गण व्यवस्था  (प्रकतिवादी ,शैविक ) गणतंत्र में सभी के सामान नागरिक अधिकार थे  सभी गण - कुल सामान वर्ण के थे इन्हे एक जनजातीय इकाई के तौर पर देखा जाता है जिन के शासक उन के बीच से थे । गणों पर कोई गण यानि परिवार से बाहर का राजा राज्य नही कर सकता था । इसी लिए हर गण निवासी राजा का रक्तसंबंधी था ।  

गण समानता पर आधारित सामाजिक आस्था थी जो विदथ-गण और सभा-समिति के माध्यम से लागु की जाती थी

प्राचीन हिन्दू व्यवस्थाओ मे एकीश्वरवादी दर्शन के आधार पर राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्थाये  विद्मान थी  इनमे एक ओर विदथ -गण-सभा-समिति जैसी व्ययस्थ मिलती है तो बाकी भारतीय उपमहाद्वीप मे पंचायत -महापंचायत , जनपथ-महाजनपथ जैसी अनेकों व्यवस्थाये पाई जाती है जो एक ईश्वरवाद, या शैविक व्यवस्थाये कहलाती है ।

इन सभी व्यवस्थाओ मे सबसे प्रससिद्ध व कल्याणकारी व्यवस्था वैदिक आर्य व्यवस्था कहलाई जो विदथ -गण -सभा -समिति जैसी कल्याणकारी व्यवस्थाओ के साथ आई ।  

विदथ शब्द मूल धातु ‘’विद’’ से निकला है जिस का अर्थ है “जानना”

 विदथ का अर्थ एक बड़े परिवार से है । बड़ा परिवार होने के कारण सभी वयस्क स्त्री पुरुष एक जगह इकट्ठा हो कर जब अपनी समस्याओं पर विचार करते थे।


जो सामान्यतः ग्राम के सभी बालिग पुरुष व महिला सदस्यों कि जनतांत्रिक सभा का काम करती थी जिस में सभी की बराबर भागीदारी थी। जमीन पूरे गण की संपत्ति थी जिस पुर पूरे गण निवासियों का समान अधिकार था ।


ये मूल कबीलाई व्यवस्था थी कबीले में स्त्री पुरुष समान अधिकार रखते व मिल जुल कर कबीले की सामूहिक जरूरतों को पूरा करते इस व्यवस्था में कबीला एक बड़े परिवार की तरह दिखता है, जो मिल जुल कर अपनी आवश्यकताओ को पूरा करता था।

शैविक व्यवस्था मे पूरा राष्ट्र ही एक वर्ण था उत्तर भारतीय एकीश्वरवादी शैविक अद्वैत दर्शन के मुख्य उद्धारण के तौर पर हम राजपूत (वैदिक आर्य गण ) जाट , गुज्जर व सिख समुदाय के तौर पर देखे जा सकते है जहा राष्ट्र मे सभी एक वर्ण के थे।


द्वैत दर्शन या तानाशाही व्यवस्था


राजा, सामन्त , व जमीदार मुद्दों का फैसला स्थिति और उद्देश्य के आधार पर करते थे ।

इस व्यवस्था मे कानून के आधार पर समाज दो हिस्सों मे बटा था । राजा व सत्ताधारियों के लिए अलग कानून था व आम नागरिकों के लिए अलग कानून था जिस की वजह से द्वैत दर्शन (वैष्णव दर्शन )मे समाज दो वर्णों मे बटा हुआ था ।

इस व्यवस्था मे राजा , जमीदार या सामन्त स्थिति और उद्देश्य के आधार पर मुद्दों का निपटारा करते थे व जमीन पर राजा का अधिकार था जो नागरिकों को जमीन खेती के लिए देता था और उस के बदले उपज का एक हिस्सा प्राप्त करता था ।


ब्रहमा दर्शन या व्यावसायिक परिषद

ब्रहमा दर्शन पूर्वलिखित कानून व्यवस्था के साथ आता है जिसे हम धर्म के नाम से भी जानते है ।

पूर्वलिखित कानून व्यवस्था व्यवसाय की बदोतरी के लिए सबसे लाभदायक व्यवस्था है इस कानून व्यवस्था मे सिर्फ लिखित कानून का उलंधन करना ही अपराध होता है ।

पूर्व लिखित कानून व्यवस्था(धर्म) मे न्याय को जटिल व कठिन बनाया जाता है ताकि उस को खास लोगों की जरूरत अनुसार प्रयोग मे लाया जा सके ।

पूर्वलिखित कानून व्यवस्था मे न्याय मुफ़्त नही होता, यहा न्याय के लिए पैसे देने पड़ते है इसी लिए ये सभी के लिए न्याय सामान नही होता ।

यानि वो सभी नागरिक जो न्याय की कीमत नही दे सकते उनके लिए कोई कानून नही होता ये नागरिक शूद्र कहलाते है ।

पूर्वलिखित कानून व्यवस्था ही वो व्यवस्था है जो मुद्रा के आधार पर समाज को चार हिस्सों मे बाटती है ।  


वर्ण व्यवस्था (संस्कृत: वर्ण), के कई अर्थ होते हैं, जैसे प्रकार, क्रम, रंग या वर्ग,[1][2] इसका उपयोग सामाजिक वर्गों को संदर्भित करने के लिए किया जाता था हिंदूो मे ब्राहमा के अवतारों द्वारा लिखे ग्रंथों में जैसे मनुस्मृति.[1][3][4] और अन्य ब्राहमा के अवतार द्वारा लिखित ग्रंथों ने सिद्धांत रूप में समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया:[1][5]

समुदाय जो चार वर्णों या वर्गों में से एक से संबंधित हैं, उन्हें सवर्ण कहा जाता है। जो लोग किसी वर्ण से संबंध नहीं रखते थे, उन्हें अवार्ण कहा जाता था।[7][8] आमतौर पर इस अवधारणा का पता ऋग्वेद के पुरुष सूक्त पद्य से लगाया जाता है।

मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था पर टिप्पणी अक्सर उद्धृत की जाती है.[9] वर्ण-व्यवस्था की चर्चा धर्मशास्त्रों में व्यापक रूप से की जाती है।[10] धर्म-शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था समाज को चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में विभाजित करती है। जो लोग अपने पापों के कारण इस व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं, उन्हें अवार्ण (अछूत) के रूप में निरूपित किया जाता है और वर्ण व्यवस्था के बाहर माना जाता है।[11][12] म्लेच्छ और जो लोग अधर्मी या अनैतिक हैं उन्हें भी अवार्ण माना जाता है।[13]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Doniger, Wendy (1999). Merriam-Webster's encyclopedia of world religions. Springfield, MA, USA: Merriam-Webster. पृ॰ 186. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-87779-044-0.
  2. Stanton, Andrea (2012). An Encyclopedia of Cultural Sociology of the Middle East, Asia, and Africa. USA: SAGE Publications. पपृ॰ 12–13. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-4129-8176-7.
  3. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Monier-Williams 2005 924 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  4. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Malik 2005 p.48 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  5. Ingold, Tim (1994). Companion Encyclopedia of Anthropology. London New York: Routledge. पृ॰ 1026. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-415-28604-6.
  6. Kumar, Arun (2002). Encyclopaedia of Teaching of Agriculture. Anmol Publications. पृ॰ 411. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-261-1316-3.
  7. DR Jatava (2011). The Hindu Sociology. Surabhi Publications. पृ॰ 92.
  8. Yājñika, Acyuta and Sheth, Suchitra (2005). The Shaping of Modern Gujarat: Plurality, Hindutva, and Beyond, p. 260. Penguin Books India
  9. David Lorenzen (2006). Who invented Hinduism: Essays on religion in history. Yoda Press. पपृ॰ 147–149. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-902272-6-1.
  10. (Olivelle, Caste and Purity 1998, पृ॰प॰ 189–216)
  11. (Olivelle, Caste and Purity 1998, पृ॰प॰ 199–216)
  12. Bayly, Susan (2001), Caste, Society and Politics in India from the Eighteenth Century to the Modern Age, Cambridge University Press, पपृ॰ 9–11, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-26434-1
  13. (Olivelle, Caste and Purity 1998, पृ॰प॰ 199–203)