त्यागी

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त्यागी अर्थात ब्राह्मण आदि वंशज यानि अयाचक ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों जैसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल, नेपाल में भूमिहार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, पूर्वी उत्तर प्रदेश, व बंगाल में ब्राह्मण, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में गालव, गुजरात में अनाविल, महाराष्ट्र में चितपावन एवं कार्वे, कर्नाटक में अयंगर एवं हेगडे, केरल में नम्बूदरीपाद, तमिलनाडु में अयंगर एवं अय्यर, आंध्र प्रदेश में नियोगी एवं राव आदि उपनामों से जाना जाता है। अयाचक ब्राह्मण अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। अयाचक ब्राह्मणों की उत्पत्ति:- हमारे देश आर्यावर्त में 7200 विक्रमसम्वत् पूर्व देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु एक विराट युद्ध सहस्रबाहु सहित समस्त आर्यावर्त के 21 राज्यों के क्षत्रिय राजाओ के विरूद्ध हुआ, जिसका नेतृत्व ऋषि जमदग्नि के पुत्र ब्रह्म भगवान परशुराम ने किया, इस युद्ध में आर्यावर्त के अधिकतर ब्राह्मणों ने भाग लिया और इस युद्ध में भगवान परशुराम की विजय हुई तथा इस युद्ध के उपरान्त अधिकतर ब्राह्मण अपना धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषादि का कार्य त्यागकर समय-समय पर कृषि क्षेत्र में संलग्न होते गये, जिन्हे अयाचक ब्राह्मण व खांडवायन कहा जाने लगा जोकि कालान्तर में त्यागी, महियाल, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल, कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे। त्यागी ब्राह्मणों को महाभारत काल से ही जाना जाता है क्योकि महाभारत काल में इनका एक नगर था जो कांपिल्य नगर के नाम से जाना जाता था.


चितपावन

चितपावन अयाचक एवम उत्तर भारत के भूमिहार/त्यागी ब्राह्मणों की दक्कनी शाखा है। इनका निवास स्थान मुख्यतः महाराष्ट्र एवम कोंकण क्षेत्र है। मराठा पेशवा एवं बाल गंगाधर तिलक, सावरकर आदि राजनेता इसी समुदाय से थे। श्रेणी:महाराष्ट्र की जातियाँ श्रेणी:ब्राह्मण श्रेणी:कोंकणी जातियाँ.

त्यागी

त्यागी अर्थात ब्राह्मण आदि वंशज यानि अयाचक ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, पूर्वी उत्तर प्रदेश, व बंगाल में ब्राह्मण, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में गालव, गुजरात में अनाविल, महाराष्ट्र में चितपावन एवं कार्वे, कर्नाटक में अयंगर एवं हेगडे, केरल में नम्बूदरीपाद, तमिलनाडु में अयंगर एवं अय्यर, आंध्र प्रदेश में नियोगी एवं राव आदि उपनामों से जाना जाता है। अयाचक ब्राह्मण अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। अयाचक ब्राह्मणों की उत्पत्ति:- हमारे देश आर्यावर्त में 7200 विक्रमसम्वत् पूर्व देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु एक विराट युद्ध सहस्रबाहु सहित समस्त आर्यावर्त के 21 राज्यों के क्षत्रिय राजाओ के विरूद्ध हुआ, जिसका नेतृत्व ऋषि जमदग्नि के पुत्र ब्रह्म भगवान परशुराम ने किया, इस युद्ध में आर्यावर्त के अधिकतर ब्राह्मणों ने भाग लिया और इस युद्ध में भगवान परशुराम की विजय हुई तथा इस युद्ध के उपरान्त अधिकतर ब्राह्मण अपना धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषादि का कार्य त्यागकर समय-समय पर कृषि क्षेत्र में संलग्न होते गये, जिन्हे अयाचक ब्राह्मण व खांडवायन कहा जाने लगा जोकि कालान्तर में त्यागी, महियाल, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल, कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे। त्यागी ब्राह्मणों को महाभारत काल से ही जाना जाता है क्योकि महाभारत काल में इनका एक नगर था जो कांपिल्य नगर के नाम से जाना जाता था.

धर्मशास्त्र

धर्मशास्त्र संस्कृत ग्रन्थों का एक वर्ग है, जो कि शास्त्र का ही एक प्रकार है। इसमें सभी स्मृतियाँ सम्मिलित हैं। यह वह शास्त्र है जो हिन्दुओं के धर्म का ज्ञान सम्मिलित किये हुए हैं, धर्म शब्द में यहाँ पारंपरिक अर्थ में धर्म तथा साथ ही कानूनी कर्तव्य भी सम्मिलित हैं। धर्मशास्त्रों का बृहद् पाठ भारत की ब्राह्मण परंपरा का अंग है, तथा यह विद्वत्परंपरा की देन एवं एक विशद तंत्र है। इसके गहन न्यायशास्त्रीय विवेचन के कारण प्रारंभिक ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासकों द्वारा यह हिंदुओं के लिए कानून के रूप में माना गया था तब से लेकर आज भी धर्मशास्त्र को हिन्दू विधिसंहिता के रूप में देखा जाता है। धर्मशास्त्र में उपस्थित रिलीजन व कानून के बीच जो अंतर किया जाता है, दरअसल वह कृत्रिम है और बार-बार उसपर प्रश्न उठाये गये हैं। जबकि कुछ लोग, धर्मशास्त्र में धार्मिक व धर्मनिरपेक्ष कानूनों के बीच अंतर रखा गया है ऐसा पक्ष लेते हैं। धर्मशास्त्र हिन्दू परंपरा में महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि- एक, यह एक आदर्श गृहस्थ के लिए धार्मिक नियमों का स्रोत है, तथा दूसरे, यह धर्म, विधि, आचारशास्त्र आदि से संबंधित हिंदू ज्ञान का सुसंहत रूप है। "पांडुरंग वामन काणे, सामाजिक सुधार को समर्पित एक महान विद्वान्, ने इस पुरानी परंपरा को जारी रखा है। उनका धर्मशास्त्र का इतिहास, पाँच भागों में प्रकाशित है, प्राचीन भारत के सामाजिक विधियों तथा प्रथाओं का विश्वकोश है। इससे हमें प्राचीन भारत में सामाजिक प्रक्रिया को समझने में मदद मिलती है।" .

नियोगी

नियोगी आन्ध्र प्रदेश के अयाचक एवं भूमिहार/त्यागी ब्राह्मणों की द्रविड़ - दक्कनी शाखा है। श्रेणी:आंध्र प्रदेश की जातियाँ श्रेणी:ब्राह्मण.


परशुराम

परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) के एक ब्राह्मण थे। उन्हें विष्णु का छठा अवतार भी कहा जाता है। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। वे भगवान विष्णु के छठे अवतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।" वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है।

ब्राह्मण-

ब्राह्मण का शब्द दो शब्दों से बना है। ब्रह्म+रमण। इसके दो अर्थ होते हैं, ब्रह्मा देश अर्थात वर्तमान वर्मा देशवासी,द्वितीय ब्रह्म में रमण करने वाला।यदि ऋग्वेद के अनुसार ब्रह्म अर्थात ईश्वर को रमण करने वाला ब्राहमण होता है। । स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद को द्विज की उत्त्पत्ति बताई गई है जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते। शापानुग्रहसामर्थ्यं तथा क्रोधः प्रसन्नता। ब्राह्मण (आचार्य, विप्र, द्विज, द्विजोत्तम) यह वर्ण व्‍यवस्‍था का वर्ण है। एेतिहासिक रूप हिन्दु वर्ण व्‍यवस्‍था में चार वर्ण होते हैं। ब्राह्मण (ज्ञानी ओर आध्यात्मिकता के लिए उत्तरदायी), क्षत्रिय (धर्म रक्षक), वैश्य (व्यापारी) तथा शूद्र (सेवक, श्रमिक समाज)। यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: -- ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर का ज्ञाता"। सन:' शब्द के भी तप, वेद विद्या अदि अर्थ है | निरंतारार्थक अनन्य में भी 'सना' शब्द का पाठ है | 'आढ्य' का अर्थ होता है धनी | फलतः जो तप, वेद, और विद्या के द्वारा निरंतर पूर्ण है, उसे ही "सनाढ्य" कहते है - 'सनेन तपसा वेदेन च सना निरंतरमाढ्य: पूर्ण सनाढ्य:' उपर्युक्त रीति से 'सनाढ्य' शब्द में ब्राह्मणत्व के सभी प्रकार अनुगत होने पर जो सनाढ्य है वे ब्राह्मण है और जो ब्राह्मण है वे सनाढ्य है | यह निर्विवाद सिद्ध है | अर्थात ऐसा कौन ब्राह्मण होगा, जो 'सनाढ्य' नहीं होना चाहेगा | भारतीय संस्कृति की महान धाराओं के निर्माण में सनाढ्यो का अप्रतिभ योगदान रहा है | वे अपने सुखो की उपेक्षा कर दीपबत्ती की तरह तिलतिल कर जल कर समाज के लिए मिटते रहे है |

भूमिहार

भूमिहार, भूमिहार ब्राह्मण या बाभन एक भारतीय जाति है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड तथा थोड़ी संख्या में अन्य प्रदेशों में निवास करती है। भूमिहार का अर्थ होता है "भूमिपति", "भूमिवाला" या भूमि से आहार अर्जित करने वाला (कृषक) । भूमिहार अपने आप को भगवान परशुराम का शिष्य मानते हैं, भूमिहार उत्तरप्रदेश के गाजीपुर व आजमगढ़़ जिले में सबसे ज्यादा हैं | बिहार में इनकी सबसे बड़ी आबादी है। तिवारी, त्रिपाठी, मिश्र, शुक्ल, उपाध्यय, शर्मा, पाठक दूबे, द्विवेदी आदि भूमिहर समाज की उपाधियाँ है। इसके अलावा राजपाठ और जमींदारी के कारण एक बड़ा भाग का राय, साही, सिन्हा, सिंह और ठाकुर उपनाम भी हैं। ये खेतिहर ब्राह्मण है हालांकि ब्राह्मणों का एक समुदाय भूमिहरों को अयाचक ब्राह्मण मानता है क्योंकि ये पूजा-पाठ का परम्परागत पेशा छोड़कर खेती करते हैं। कई विद्वानों का मानना है चूँकि दिल्ली के आसपास रहने वाली त्यागी जाति भी अपने आप को परशुराम का शिष्य मानती है इसी से भूमिहार भी त्यागियों को अपनी ही जाति का मानते हैं। इस जाति के ज्यादातर लोग कृषक है और बाकी ब्राह्मणों की तरह दान नहीं लेते। इसलिए ये "अयाचक ब्राह्मण " कहे गए हैं। सन १८८५ में अयाचक ब्राह्मणों की महासभा की स्थापना काशी-नरेश के प्रयास से वाराणसी में हुई.

महियाल

महियाल अयाचक एवं भूमिहार/त्यागी ब्राह्मणों की पश्चिमोत्तर भारतीय शाखा है। इनका निवास स्थान मुख्यतः पंजाब है। श्रेणी:पंजाब की जातियाँ श्रेणी:ब्राह्मण.

जमदग्नि ऋषि

जमदग्नि ऋषि जमदग्नि ऋषि एक ऋषि थे, जो भृगुवंशी ऋचीक के पुत्र थे तथा जिनकी गणना सप्तऋषियों में होती है। पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी रेणुका थीं, व इनका आश्रम सरस्वती नदी के तट पर था। वैशाख शुक्ल तृतीया इनके पांचवें प्रसिद्ध पुत्र प्रदोषकाल में जन्मे थे जिन्हें परशुराम के नाम से जाना जाता है। .

गालव

गालव जिसे त्यागी भी कहते हैं, पश्चिमी भारत के भूमिहार ब्रह्मणों की एक शाखा है। श्रेणी:भारत की मानव जातियाँ.

आर्यावर्त

आर्यावर्त प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में 'उत्तरी भारत' को आर्यावर्त (शाब्दिक अर्थ: आर्यों का निवासस्थान) कहा गया है। .

अयाचक

यह अयाचक ब्राह्मणों (भूमिहार त्यागी इत्यादि ब्राह्मण) के संदर्भ में सम्पूर्ण उपलब्ध स्रोतों से प्राप्त जानकारी हैं कभी कभी भूमिहार भाइयों के प्रश्न आते हैं कि हमारा मूल उत्त्पति कहाँ से हुयी है, और दूसरे जाति के लोग भी प्रश्न करते हैं। उन सभी सवालों के जवाब के रूप में विभिन्न स्रोत से ये लेख प्रस्तुत है। वैसे तो भूमिहार वंश की उत्पत्ति के सबन्ध के इतिहास को प्राचीन किंवदन्तियों के आधार पर अनेक विद्वानों ने लिपिबद्ध करने का प्रयास किया है। ऎसा माना जाता है कि भगवान परशुराम जी ने क्षत्रियों को पराजित कर जो ज़मीन थी, उसे ब्राह्मणों को दे दिया, जिसके बाद ब्राह्मणों ने पूजा-पाठ का परम्परागत पेशा छोड़ जमींदारी शुरू कर दी और बाद में युद्ध में प्रवीनता भी हासिल कर ली थी। ये ब्राह्मण ही भूमिहार ब्राह्मण कहलाये। और तभी से परशुराम जी को भूमिहारो का जनक और भूमिहार-ब्राह्मण वंश का प्रथम सदस्य माना जाता है। भूमिहार या बाभन (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्रहामणों को से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है भूमिहार ब्राह्मण समाज में उपाधिय है भूमिहार, पाण्डेय, तिवारी/त्रिपाठी, मिश्र,शुक्ल,उपाध्यय,शर्मा, ओझा,दुबे\द्विवेदी इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारन एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय,शाही,सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही, सिंह (सिन्हा), चौधरी (मैथिल से),ठाकुर (मैथिल से) बिहार में लिखने लगा भूमिहार ब्राह्मण कुछ जगह प्राचीन समय से पुरोहिती करते चले आ रहे है अनुसंधान करने पर पता लगा कि प्रयाग की त्रिवेणी के सभी पंडे भूमिहार ही तो हैं।हजारीबाग के इटखोरी और चतरा थाने के 8-10 कोस में बहुत से भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत,बंदौत, कायस्थ और माहुरी आदि की पुरोहिती सैकड़ों वर्ष से करते चले आ रहे हैं और गजरौला, ताँसीपुर के त्यागी राजपूतों की यही इनका पेशा है। गया के देव के सूर्यमंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण ही मिले। हलाकि गया के देव के सूर्यमंदिर का बड़ा हिसा सकद्विपियो को बेचा जा चूका है बनारस राज्य भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में 1725-1947 तक रहा | इसके अलावा कुछ अन्य बड़े राज्य बेतिया,हथुवा,टिकारी,तमकुही,लालगोला इत्यादि भी भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में रहे | बनारस के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेज वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना की ईट से ईट बजा दी थी | 1857 में हथुवा के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेजो के खिलाफ सर्वप्रथम बगावत की | अनापुर राज अमावा राज.

अय्यर

अय्यर, तमिल तथा तेलुगु भाषा बोलने वाले ब्राह्मण समुदाय द्वारा उपयोग किया गया उपनाम है। श्रेणी:भारतीय उपनाम श्रेणी:चित्र जोड़ें.

अय्यंगार

अय्यंगार (IPA) एक भारतीय उपनाम है। यह तमिल ब्राह्मणों का उपनाम होता है। श्रेणी:भारतीय उपनाम श्रेणी:चित्र जोड़ें.