कुण्डलिया

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कुंडलिया दो छंदों का एक युग्म छन्द है। इसके आरम्भ में एक दोहा होता है और अंत में एक रोला। कुंडलिया में छः पद व बारह चरण होते हैं और प्रत्येक पद में चौबीस मात्राएँ होती हैं। दोहे के पहले चरण में 13 मात्राएं तथा दूसरे चरण में 11 मात्राएं होती हैं। इसी तरह रोला में पहले चरण में 11 मात्राएं तथा दूसरे चरण में 13 मात्राएं होती हैं कुंडलिया का प्रारंभ आमतौर पर 4 मात्राओं के शब्द से किया जाता है अगर 4 मात्राओं के शब्द में अंतिम अक्षर 2 मात्राओं का है तो प्रभावकारी रहता है दोहे का अन्तिम चरण ही रोला का पहला चरण होता है। कुण्डलिया छन्द का पहला और अंतिम शब्द भी एक ही होता है।

उदाहरण –

दौलत पाय न कीजिये, सपनेहुँ अभिमान।
चंचल जल दिन चारिको, ठाँव न रहत निदान।।
ठाँव न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै।
मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही सौं कीजै।।
कह 'गिरिधर' कविराय अरे यह सब घट तौलत।
पाहुन निशि दिन चारि, रहत सबही के दौलत।।


बोता खुद ही आदमी, सुख या दुख के बीज।
मान और अपमान का, लटकाता ताबीज।।
लटकाता ताबीज, बहुत कुछ अपने कर में।
स्वर्ग नर्क निर्माण, स्वयं कर लेता घर में।
‘ठकुरेला' कविराय, न सब कुछ यूँ ही होता।
बोता स्वयं बबूल, आम भी खुद ही बोता।।


कुंडलिया लिख लें सभी, रख कुछ बातें ध्यान।

दोहा रोला जोड़ दें, इसका यही विधान।

इसका यही विधान,आदि ही अंतिम आये।

उत्तम रखें तुकांत, हृदय को अति हरषाये।

कहे अमित कवि आज, प्रथम दृष्टा यह हुलिया।

शब्द चयन है सार, शिल्प अनुपम कुंडलिया।


रोला दोहा मिल बनें, कुण्डलिया आनंद।

रखिये मात्राभार सम, ग्यारह तेरह बंद।

ग्यारह तेरह बंद, अंत में गुरु ही आये।

अति मनभावन शिल्प, शब्द संयोजन भाये।

कहे अमित कवि आज, छंद यह मनहर भोला।

कुण्डलियाँ का सार, एक दोहा अरु रोला।

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