वीर रस

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वीर रस हिन्दी भाषा में रस का एक प्रकार है। जब किसी रचना या वाक्य आदि से वीरता जैसे स्थायी भाव की उत्पत्ति होती है, तो उसे वीर रस कहा जाता है।[1][2]

उदाहरण[संपादित करें]

साजि चतुरंग सैन अंग मैं उमंग धारि, सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है । भूषन भनत नाद बिहद नगारन के, नदी नद मद गैबरन के रलत हैं ।।

बुंदेले हर बोलो के मुख हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी |

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ओझा, दसरथ (1995). हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8170284023. अभिगमन तिथि 8 फरवरी 2016.
  2. गणेश, कुमार. UGC-NET/JRF/SLET ‘Hindi’ (Paper III): - पृष्ठ 22. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8174823662. अभिगमन तिथि 8 फरवरी 2016.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]