कविराजा मुरारीदान

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महामहोपाध्याय
कविराजा मुरारीदान

शासक महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय
(1873–1895)

जोधपुर परगना के हाकिम
पचपदरा परगना के हाकिम
शासक महाराजा तख्त सिंह
(1843–1873)

एपिलेट कोर्ट के न्यायाधीश

दीवानी (सिविल) कोर्ट के न्यायाधीश

फौजदारी (आपराधिक) कोर्ट के न्यायाधीश
शासक महाराजा सरदार सिंह
(1895–1911)
उल्लेखनीय कृतियां यशवंतयशोभूषण

तवारीख़ मारवाड़
सरदारप्रकाशिका


जन्म 1830
भांडियावास, जोधपुर रियासत
मृत्यु 1914 (आयु 83–84), जोधपुर रियासत
संबंध कविराजा बाँकीदास (grandfather)
बच्चे कविराजा गणेश दान
निवास लूणी, राजस्थान
व्यवसाय
  • राजनीतिज्ञ
  • इतिहासविद
  • प्रशासक
  • कवि

महामहोपाध्याय कविराजा मुरारीदान आशिया (1830 - 1914) एक तेजस्वी राजनीतिज्ञ एंव दूरदर्शी प्रशासक के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने जसवंत सिंह द्वितीय (1873-1895) की राज्यावधि के दौरान मारवाड़ के दीवान (प्रधान मंत्री) के रूप में कार्य किया एंव मारवाड़ के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे मारवाड़ राज्य के ताज़िमी सरदार और प्रख्यात विद्वान थे, जिन्हें उनकी प्रमुख रचनाओं में 'यशवंत-यशो-भूषण' ग्रंथ और 'तवारीख मारवाड़' के लिए जाना जाता है। [1] [2]

प्रारंभिक जीवन और परिवार[संपादित करें]

कविराजा मुरारीदान का जन्म 1830 में भांडियावास के आशिया वंश के प्रमुख चारण परिवार में हुआ था। उनके पिता, कविराजा भारतदान, और दादा, कविराजा बाँकीदास, मारवाड़ राज्य के प्रसिद्ध विद्वान-इतिहासकार और प्रशासक थे। [3] [4]

बाल्यकाल के दौरान, मुरारीदन ने अपने पिता भारतदान से भाषा-साहित्य एंव डिंगल और यति ज्ञानचंद्र से संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। [4]

राज्य-प्रशासन[संपादित करें]

सोलह वर्ष की आयु में, मुरारीदान महाराजा तखत सिंह के दौरान राज्य-सेवा में शामिल हुए और उनके और बाद के शासकों, जसवंत सिंह द्वितीय और सरदार सिंह, के समय विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहे। 1870 में, उन्हें जोधपुर परगना के हाकिम के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने मुसाहिब और पचपदरा परगना के हाकिम के रूप में भी कार्य किया। [4]

कविराजा मुरारीदान मारवाड़ के प्रशासन में अपने योगदान के लिए विख्यात थे। वे कार्यकारी परिषद के सदस्य थे और दीवानी (सिविल) और फौजदारी (आपराधिक) न्यायालय के प्रमुख थे। इसके बाद, उन्हें अप्रैल 1882 में स्थापित अपीलीय न्यायालय (एपिलेट कोर्ट) के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया। इसके अतिरिक्त, वे मारवाड़ रियासत के मजिस्ट्रेट और जनरल सुपरइंटेंडेंट के पदों पर भी कार्यरत रहे। [2] [5]

उन्होंने मोरिशाला (मुरारीदान के नाम नामांकरण) नामक कानूनों को पारित करने में भी अहम भूमिका निभाई। इन कानूनों के अनुसार, कोई भी जागीर, गोद लेने या अन्यथा, मूल अनुदेयी की संतान के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं की जा सकती थी। हालाँकि उन्हें इस अधिनियम के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा, इसे जागीर व्यवस्था की स्थिरता को बनाए रखने के संदर्भ में एक प्रगतिशील कदम के रूप में देखा गया। [6]

अपने राजनीतिक करियर के अलावा, कविराजा मुरारीदान की शिक्षा में भी रुचि थी। वह जोधपुर के पहले स्कूल ज्ञानानंदी पाठशाह के अग्रदूतों में से एक थे, जो 1 अप्रैल, 1897 को पंद्रह विद्यार्थियों के साथ खोला गया था। स्कूल के अग्रदूतों ने मरुधरमिंट नाम से एक हिंदी साप्ताहिक भी शुरू किया, जो इससे जुड़े लिथोग्राफिक प्रेस में छपा था। [5]

1899 में, बारिश की कमी के कारण, मारवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा। सर प्रताप को चीन अभियान में भाग लेने के लिए जाना पड़ा, जिस कारण प्रशासन को कविराजा मुरारीदान और पंडित सुखदेव प्रसाद की एक विशेष समिति के हाथों में छोड़ दिया। समिति की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि आधुनिक सिद्धांतों के आधार पर अकाल राहत कार्यों का निष्पादन और राज्य में इंपीरियल मुद्रा (1900) की शुरूआत थी। [7] [5]

कविराजा मुरारीदान राजपूत चारण हितकारिणी सभा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और जोधपुर राज्य के चारणों के प्रतिनिधि के रूप में 10 मार्च, 1888 को अजमेर में हुई बैठक के हस्ताक्षरकर्ता थे। [4] उन्होंने जोधपुर के चारणों के लिए जाति-प्रमुख के रूप में भी कार्य किया। [8]

जागीर[संपादित करें]

भांडियावास के अपने पैतृक सांसण के अलावा, कविराजा मुरारीदान लूनी के भी जागीरदार थे। 1894 में, कविराजा ने एक उत्कृष्ट किलेदार हवेली का निर्माण किया, जिसे अब फोर्ट चानवा के नाम से जाना जाता है। [9]

जसवंत सिंह द्वितीय के शासनकाल के दौरान, उनके जागीर से राजस्व के अलावा 8,400 रुपये का वार्षिक वेतन प्राप्त था। [2] सरदार सिंह के गद्दी पर बैठने के बाद भी वह सेवा में बने रहे और उन्हें 7,500 रुपये का वार्षिक वेतन प्राप्त था। [6]

हालाँकि, 1941 में, लूनी की जागीर एक प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी की अनुपस्थिति के कारण, उन्हीं के द्वारा पारित मोरीशला कानूनों के परिणामस्वरूप, वापस राज्य में खालसा हो गई। [9] [6]

राजकीय सम्मान[संपादित करें]

महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने सिंहासन पर बैठने के बाद कविराजा मुरारीदान को लाख-पसाव भेंट किया था। दरबार में उनकी स्थिति सर्वोच्च जागीरदारों के समकक्ष थी। वे अपने विद्वता, परोपकार और दूरदर्शिता के लिए पूरे राजपुताना में प्रसिद्ध थे। सरकार ने उन्हें कई बार राज्य प्रशासन से संबंधित कई खिताब और सम्मान देने चाहे, लेकिन उन्हें अस्वीकार कर और अपनी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए केवल महामहोपाध्याय की उपाधि स्वीकार की। [4]

ग्रंथ लेखन[संपादित करें]

कविराजा मुरारीदान न केवल एक कुशल प्रशासक थे, बल्कि एक विपुल लेखक और डिंगल, संस्कृत, प्राकृत और ब्रज सहित कई भाषाओं के प्रसिद्ध विद्वान भी थे। उनके कृतियों में शामिल हैं: [6] [4]

  1. यशवंतयशोभूषण ग्रंथ [10]
  2. जसवंतभूषण, यशवंत-यशो-भूषण का सारांश
  3. तवारीख़ मारवाड़
  4. संक्षिप्त चारण ख्याति
  5. बड़ी चारण ख्याति
  6. सरदारप्रकाशिका
  7. आत्मनिर्णय (वेदांत)
  8. बिहारी सतसाई टीका
  9. नायिका भेद पर एक ग्रंथ

यशवंत-यशो-भूषण[संपादित करें]

कविराजा ने 'यशवंत-यशो-भूषण' नामक अपूर्व अलंकार-ग्रंथ का सृजन किया है, जिसका सार 'जसवंतभूषण' है और जिसका अनुवाद संस्कृत में भी छप चुका है। जैसे चित्रमीमांसा मे अप्पय दीक्षित ने सब अलंकारों को उपमा ही का भेद सिद्ध किया है, वैसे इन्होंने अलंकारों के पृथक् लक्षण न बनाकर उनके नामों के शब्दार्थ से ही लक्षण किया है। प्राचीनों के मत का विवेचन करके शब्दार्थ ही में आनेवाले अलंकारों को उस अलंकार की कोटि मे गिना है । नाम से ही लक्षण की कल्पना करना इस ग्रन्थ की विशेषता है।[4] [11] [12]

मुरारीदान री ख्यात[संपादित करें]

उपरोक्त सूचीबद्ध ग्रंथों के अलावा, अज्ञात लेखक की ख्यात 'मुरारीदान री ख्यात' का नाम उनके नाम पर रखा गया है। यह ख्यात जोधपुर शहर की प्राचीन दीवारों के भीतरी डिब्बे में खोजी गई थी, जो 1678 में जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु के बाद मुगलों द्वारा जोधपुर पर कब्जा करने से पहले छिपाई गई थी। कविराजा ने इसके महत्व को पहचाना और इसे बहियों में कॉपी किया और अपने संग्रह में संग्रहीत किया। [13]

  • भाटी, विक्रमसिंह (2014)। मुरारीदान की ख्यात: मारवाड़ के सासक एवम राठौर शाखाओं का इतिहास (हिंदी में)। रॉयल प्रकाशन। आईएसबीएन 978-93-82311-43-0 .

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Rudolph, Susanne Hoeber; Rudolph, Lloyd I. (1984). Essays on Rajputana: Reflections on History, Culture, and Administration (अंग्रेज़ी में). Concept Publishing Company.
  2. Bayley, C. S. (2004). Chiefs and Leading Families in Rajputana (अंग्रेज़ी में). Asian Educational Services. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-206-1066-8. Kaviraj Murardan, a member of the Council, and head of the Faujdari (Criminal) Court, is by caste a Charan and is Court Poet of Marwar. He is now fifty-six years of age and was formerly head of the Diwani (Civil) and subsequently of the Appellate Court. He has received the honour of the single tazim from his Chief. He enjoys a grant of two villages and an annual salary in cash of R8,400. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":0" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":0" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है
  3. Adams, Archibald (1899). The Western Rajputana States: A Medico-topographical and General Account of Marwar, Sirohi, Jaisalmir (अंग्रेज़ी में). Junior army & navy stores, limited.
  4. Gulerī, Candradhara Śarmā (1987). Gulerī racanāvalī. Kitābaghara. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":1" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":1" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":1" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":1" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":1" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":1" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है
  5. Shah, P. R. (1982). Raj Marwar During British Paramountcy: A Study in Problems and Policies Up to 1923 (अंग्रेज़ी में). Sharda Publishing House. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-7855-1985-0. The administration was left in the hands of a special committee of Pandit Sukhdeo Prasad and Kaviraj Muraridan. The most important and bold innovations of this committee in the realm of administration were the execution of famine-relief operations on modern principles and the introduction of imperial currency. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":2" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":2" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है
  6. Singh, Rajvi Amar (1992). Mediaeval History of Rajasthan: Western Rajasthan (अंग्रेज़ी में). Rajvi Amar Singh. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":3" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":3" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":3" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है
  7. Rajasthan (India); Sehgal, K. K. (1962). Rajasthan District Gazetteers: Jodphur (अंग्रेज़ी में).
  8. Marcus, George E. (1983). Elites, Ethnographic Issues (अंग्रेज़ी में). University of New Mexico Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-8263-0658-6. Prominent Charan dewans or senior court servants included Kaviraj (court poet) Shyamaldas at Udaipur and Kaviraj Murardan at Jodhpur.
  9. Luni, Fort Chanwa (2018-04-13). "Fort Chanwa Luni, Jodhpur". Fort Chanwa Luni (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2023-03-23. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; ":4" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है
  10. Murardan, Kabiraja (1904). Jaswant jaso bhushan (संस्कृत में). Sanval.
  11. Amarnath, Dr (2023-01-12). Hindi Alochana Ka Alochanatmak Itihas (अंग्रेज़ी में). Rajkamal Prakashan Pvt Ltd. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-92757-60-0.
  12. Seth Arjundas Kediya (1930). Bharti-bhusan.
  13. Sinh, Raghubir (1984). Rao Udaibhan Champawat ri khyat: Up to Rao Rinmal and genealogies of the Rinmalots. Indian Council of Historical Research.