बाड़मेर

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बाड़मेर
—  city  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य राजस्थान
ज़िला बाड़मेर
जनसंख्या 83,517 (2001 के अनुसार )
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)

• 227 मीटर (745 फी॰)

निर्देशांक: 25°45′N 71°23′E / 25.75°N 71.38°E / 25.75; 71.38 बाड़मेर राजस्थान राज्य का दूसरा बड़ा जिला है। यह अपने स्थापत्य के साथ साथ देश के सबसे बड़े तेल और कोयला उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। यह बाड़मेर जिला का मुख्यालय है। इस शहर की स्थापना बहाड़ राव ने 13वीं शताब्दी में की थी। उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम बाड़मेर पड़ा यानि बार का पहाड़ी किला। एक समय 'मालानी' के नाम से जाना जाने वाला बाड़मेर अपनी जीवंतता के कारण सैलानियों को बहुत भाता है। बाड़मेर की यात्रा की एक विशेषता यह भी है कि यह हमें राजस्थान के ग्रामीण जीवन से रूबरू कराता है। यात्रा के दौरान रास्ते में पड़ने वाले गांव, पारंपरिक पोशाकें पहने लोगों और रेत पर पड़ती सुनहरी धूप, बाड़मेर की यह मनोरम छवि आंखों में बस जाती है। मार्च के महीने में पूरा बाड़मेर रंगों से भर जाता है क्योंकि वह वक्त बाड़मेर महोत्सव का होता है। यह समय यहां आने का सबसे सही समय है।

मुख्य आकर्षण[1][संपादित करें]

जसोल[संपादित करें]

एक समय में जसोल मालाणी का प्रमुख क्षेत्र था। रावल मल्लीनाथ के नाम पर परगने का नाम मालाणी पड़ा, इस प्राचीन गांव का नाम राठौड़ उपवंश के वंशजों के नाम पर पड़ा। यहां पर माता राणी भटियाणी का मंदिर जसोल का मुख्य आकर्षण हैं। यहां एक चमत्कारिक देवी माता रानी भटीयाणी का मन्दिर है। देश भर से इस मंदिर और जसोल हर साल लाखों लोग पहुँचते है।

खेड़[संपादित करें]

राठौड़ वंश के संस्थापक राव सिहा और उनके पुत्र ने खेड़ को गुहिल राजपूतों से जीता और यहां राठौड़ों का गढ़ बनाया। रणछोड़जी का विष्णु मंदिर यहां का प्रमुख आकर्षण है। मंदिर के चारों और दीवार बनी है और द्वार पर गुरुड़ की प्रतिमा लगी है जिसे देख कर लगता है मानो वे मंदिर की रक्षा कर रहे हों। पास ही ब्रह्मा, भैरव, महादेव और जैन मंदिर भी हैं। जो सैलानियो क मुख्य आकर्स्न का केन्द्र है। गुहिल राजपूत यहाँ से भावनगर चले गये और १९४७ तक शासन किया।

किराडु[संपादित करें]

पहाड़ी की तराई में हाथमा गांव के पास स्थित है किराडु। 1161 ई. के शिलालेख से पता चलता है कि पहले इस स्थान का नाम कीरतकूप था। एक समय में यह परमार राजपूतों की राजधानी था। यहां पर पांच मंदिरों के अवशेष मिले हैं जिनमें से एक भगवान विष्णु को और चार अन्य भगवान शिव को समर्पित हैं। पुरातत्व की दृष्टि से इन मंदिरों का बहुत महत्व है। कला प्रेमियों को भी यह मंदिर आकर्षित करते हैं। इनमें से सोमेश्‍वर मंदिर सबसे बड़ा है।

ब्रह्मधाम आसोतरा[संपादित करें]

बालोतरा उपखण्ड मुख्यालय से चंद किलोमीटर की दूरी पर एक आसोतरा गांव है। यह वही गाँव है जहाँ विश्व का दूसरा ब्रह्मा मन्दिर है। जिनका निर्माण ब्रह्मऋषि संत खेतारामजी महाराज ने करवाया था। पहला मन्दिर जो पुष्कर ,राजस्थान में स्थित है। इस मंदिर के साथ साथ संत शिरोमणि खेतेश्वर महाराज के खेतेश्वर जी की समाधि और ब्रम्ह सरोवर विख्यात है। इस मंदिर की मूर्ति 1984 में स्थापित की गई।

मल्लीनाथ मेला[संपादित करें]

तिलवाड़ा में आयोजित होने वाला पशुमेला राज्य का तीसरा बड़ा मेला है। पुष्कर, नागौर के बाद यह राजस्थान का तीसरा बड़ा पशु मेला है जहाँ आने वाले पशुओं की तादात लाखो में होती है।राठौड़ राजवंश के रावल रावल मल्लीनाथ के नाम पर मल्लीनाथ मेला राजस्थान के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक है। यह बाड़मेर जिले के तिलवाडा गांव में चैत्र बुदी एकादशी से चैत्र सुदी एकादशी (मार्च-अप्रैल) में आयोजित किया जाता है। इस मेले में उच्च प्रजाति के गाय, ऊंटों, बकरी और घोडों की बिक्री के लिए लाया जाता है। इस मेले में भाग लेने के लिए सिर्फ गुजरात से ही नहीं बल्कि गुजरात और मध्य प्रदेश से भी लोग आते हैं।

मेवा नगर नाकोड़ा[संपादित करें]

जैन धर्म का राजस्थान का सबसे प्रमुख तीर्थ मेवानगर नाकोड़ा। साल भर में करोड़ो लोगो को अपनी धरा पर देखनी वाली यह जगह सबसे ज्यादा वीवीआईपी विजिट यहाँ देखती है। 12वीं शताब्दी का यह गांव किसी समय विरानीपुर के नाम से जाना जाता था। इस गांव में तीन जैन मंदिर हैं। इनमें से सबसे बड़ा मंदिर नाकोडा पार्श्‍वनाथ का समर्पित है। इसके अलावा एक विष्णु मंदिर भी है जो देखने लायक है। इस जगह का राठौड़ राजवन्श के इतिहास में प्रमुख स्थान है। राठौड़ राजवन्श के रावल सलखा के पुत्र रावल मल्लीनाथ के वन्शज महेचा राठौड़ कहलाते थे, उन मल्लीनाथ के नाम पर ही इसका नाम महेवानगर पड़ा जो कि कालान्तर में मेवा नगर हो गया।

सिद्वेश्वर महादेव मेला माहबार[संपादित करें]

बाड़मेर से २ किलोमीटर की दूरी पर माहबार रोड़ पर सिद्वेश्वर महादेव का मन्दिर आया हुआ है, जहां पर श्री महादेव जी के साथ, सन्तोषीमाता, बंजरग बली आदि के मन्दिर है। जहां हर वर्ष श्रावण महिने में प्रत्येक सोमवार को मेला लगता है। श्रावण के अन्तिम सोमवार की रात्रि में भजन संध्या का आयोजन होता है, जिसमे बड़ी संख्या में श्रद्वालू सम्मिलित होते है।

सूंईया मेला[संपादित करें]

बाड़मेर जिले की चौहटन कस्बा में सूंईया महादेव का मेला भरता है जिसमे दूर दराज से भारी संख्या में लोग आते हैं।

आलम नगरी धोरीमना[संपादित करें]

बाड़मेर जिले से 67 किलोमीटर दूर साचौँर मार्ग पर स्थित है। यहां भगवान श्री जाम्भोजी का पावन मन्दिर, विश्नोई बाहुल क्षेत्र, सरकारी अस्पताल, पुलिस थाना है। यहाँ प्रतिवर्ष आलमजी का पशु मेला लगता है, जिसमें मुख्यतः ऊँट व बैल खरीदे व बेचे जाते हैं।

खेमाबाबा मंदिर बायतु[संपादित करें]

बायतु स्थित खेमाबाबा मंदिर समाज के हर वर्ग में पूजनीय हैं।भादवा और माघ शुक्ल नवमी को यहाँ विशाल मेला लगता है। खेमाबाबा गोगाजी के भक्त थे मेले में भोपो का नृत्य मुख्य आकर्षण है

अंंकलेश्वर महादेव मन्दिर, अरटा[संपादित करें]

यहाँ भगवान शिव जी का शानदार मन्दिर है। यह मंदिर स्कूल परिसर के आगे व बाखासर रोड के दाई ओर स्थित है। यह मंदिर अपनी सुंदर कलाकृति के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात है। इस मंदिर के सामने ओर बाखासर रोड के बायी ओर एक नाडी ओर जोगमाया का मंदिर स्थित है। ये सभी मंदिर अपनी पुरातन सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए हैं।

मेले[संपादित करें]

तिलवाड़ा पशु मेला[संपादित करें]

लूनी नदी के तट पर स्थित तिलवाड़ा गाँव में यह मेला लगता है। यह जिले का प्रमुख पशु मेला है। यह मेला व्यावससायिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यह गाँव तिलवाड़ा रेलवे स्टेशन से ३ किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। यह मेला जिला कृषि तथा पशुधन विभाग द्वारा आयोजित किया जाता है तथा यह प्रत्येक वर्ष बड़्ी चैत्र ११ से चैत्र सुदी ११ तक (मार्च-अप्रैल) में लगता है। हजारों की संख्या में लाग यहाँ इकट्ठे होते हैं तथा संन्यासी रावल के दर्शन हेतु आते है। हजारों जानवारो यहां खरीद-बिक्री के लिए लाए जाते हैं।

नाकोड़ा पार्श्वनाथ[संपादित करें]

पंचपदरा तहसील के मेवानगर गाँव में एक मेला लगता है। यह स्थान बालोतरा शहर से १० किलो मीटर की दूरी पर है। यहाँ पर नाकोड़ा पार्श्वनाथ का जैन मंदिर है, जिसके चारों ओर का वातावरण काफी सुंदर है। यहाँ प्रत्येक वर्ष बड़्ी पूस १० (दिसम्बर-जनवरी) को पार्श्वनाथ का जन्म उत्सव मनाने के लिए मेला लगता है। यहाँ पर तीन जैन मंदिर है, जो पार्श्वनाथ, शांतिनाथ तथा आदिनाथ को समर्पित हैं। हर साल लगभग दस हजार की संख्या में लोग यहाँ इकट्ठे होते हैं, जिसमें ज्यादातर लोग जैन धर्म को मानने वाले होते हैं।

सुईया मेला चौहटन[संपादित करें]

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। ऐसे में प्रथम महाकुंभ मेला और भारत का दूसरा सबसे बड़ा मेला यानी की अर्द्ध महाकुंभ कहा जाने वाला सुईया मेला जो बाड़मेर जिले के चौहटन कस्बे में 12 साल के अंतराल में एक बार लगता है। जिसमें लाखों श्रद्धालु इस पवित्र तीर्थ स्थान के दर्शन कर महा स्नान का लाभ लेते हैं। मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि पांडवों की एस तपोभूमि के दर्शन करने एवं पवित्र स्नान से लाखों पाप धुल जाते हैं ऐसी मान्यता है। पाकिस्तान की सरहद से सटे बाड़मेर जिले के चौहटन में लगने वाले इस मेले को अर्द्ध महाकुंभ के नाम से जाना जाता है। इस दो दिवसीय मेले में लाखों की तादाद में श्रद्धालु भारत के दूर-दूर प्रदेशों से यहां दर्शन करने आते हैं। 12 वर्ष के अंतराल में इस मेले का आयोजन उसी दिन होता है। जिस दिन अमावस्या के साथ सोमवार भी हो और कई नक्षत्रों का संयोग जब मेले के लायक बनता है, तभी इस अर्द्ध महाकुंभ का आयोजन होता है। अनुमान के तौर पर करीब 10 लाख श्रद्धालु इस मेले में शिरकत करते हैंऔर महास्नान का लाभ लेते हैं।

हुडो की ढाणी[संपादित करें]

यह बायतु तहसील का एक गाँव है। जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर सुनहरे धौरो के बीच बसा हुआ एक गाँव है। यहाँ पर भगवान रणछोड़राय का और बाबा रामदेव जी का प्रसिद मन्दिर है। यह जाटो के महीसा स्व. मांगाराम जी ढाका की जन्म स्थली है। आषाढ बदी ग्यारस को बाबा की जागरण रखी जाती है।

विरात्रा माता का मेला[संपादित करें]

चोहटन तहसील से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित विरात्रा में मेला आयोजित किया जाता है। यहाँ साल में तीन बार चैत्र, भाद्रपद तथा माघ में वांकल देवी की पूजा का मेला लगता है। विरात्रा माता की मूर्ति की स्थापना वीर विक्रमादित्य ने की थी। वांकल देवी के पुजारी गहेलड़ा परमार जिनको आदर भाव से भोपा भी कहा जाता है , यहां पर देवी की पूजा करते है। गहेलड़ा( भोपा) पांच गाँवो घोनिया , ढोक , सनाउ , जसाई और परो में निवास करते है। इस स्थान पर मूर्ति लाते हुए विक्रमादित्य ने रात्रि विश्राम किया था।

खेड़मेला[संपादित करें]

पचपद्रा तहसील के अन्तर्गत खेड़ गाँव में हरेक पूर्णिमा पर मंदिर के निकट एक धार्मिक मेला लगता है। राधा अष्टमी भाद्रपद सुदी ८ और ९ (अगस्त-सितम्बर) को एक बड़ा मेला लगता है। यह गाँव बालोतरा से लगभग १० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। खे प्राचीन काल में सभ्यता का मुख्य केन्द्र था।

कल्याण सिंह का मेला[संपादित करें]

यह मेला सिवाना दुर्ग में अलाउद्दीन की सेना के विजय अवसर पर लगता है। यह श्रावण सुदी २ (जुलाई-अगस्त) में प्रत्येक वर्ष लगता है। लगभग ५००० लोग इस अवसर पर जमा होते हैं।

जिले के अन्य मुख्य त्योहारों में होली, शीतला अष्टमी, गणगौर, रक्षा-बंधन, अक्षय-त्रितिया, दशहरा, दीपावली, ईद-उल-जुहा आदि है। महावरी जयंती तथा पयूशन जैन लोगों का महत्वपूर्ण पर्व है।

हरलाल जाट का मेला[संपादित करें]

यह मेला भले ही शिक्षित वर्ग तक सीमित हो लेकिन बलदेव नगर का सबसे पवित्र स्थान है।

सिणधरी पशु मेला[संपादित करें]

लूनी नदी के तट पर स्थित सिणधरी गाँव में यह मेला लगता है। यह जिले का प्रमुख पशु मेला है। यह मेला मनोरंजक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यह शहर बालोतरा एवं बाड़मेर रेलवे स्टेशन से ६० किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। यह प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष बदी ५ (नवंबर-दिसम्बर) में लगता है। जो एक माह तक चलता हैं। हजारों की संख्या में लोग यहाँ इकट्ठे होते हैं। हजारों जानवार यहां खरीद-बिक्री के लिए लाए जाते हैं। तथा ऊनी कपड़ों की अच्छी वैरायटी यहाँ मिलती हैं।

गोयणेश्वर महादेव[संपादित करें]

गोयणेश्वर महादेव का विशाल मेला शिवरात्री को लगता है जो तीन दिन तक चलता है यह बाड़मेर जिले की सिणधरी तहसील के डँडाली गाँव में विशाल पहाड़ी पर मेला लगता है यहीं पर रावळ गुलाबसिह सिणधरी रहा करते थे वे परम गौ भक्त थे यहाँ पर रावळ गूलाबसिह की विशाल प्रतिमा लगी हुई है यहाँ पर दुर्लभ दुर्गम पहाड़ी है और यहाँ दूर दूर से यात्री आते है

बायतु[संपादित करें]

यह प्रसिद्ध लोक देवता खेमा बाबा का जन्म स्थल है। यहाँ पर गुजरात और राजस्थान के दूर दूर से यात्री आते है। भादों सुदी नवमी, माघ सुदी नवमी और चैत्र सुदी नवमी को मेला लगता है।

सिणधरी[संपादित करें]

यहां मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी को मेला लगता हैं जो एक महिने तक चलता हैं।

खरीदारी[संपादित करें]

खरीदारी के शौकीन लोगों के लिए बाड़मेर किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यहां रंगबिरंगी कढ़ाई में जड़े हुए शीशे सैलानियों को आकर्षित करते हैं। विशेषरूप से विदेशी सैलानी इन वस्तुओं को अवश्य खरीदते हैं। पारंपरिक रंगों और बुनाई से बने शॉल, कालीन, दरी और कंबल इस क्षेत्र की खासियत हैं। सदर बाजार के आसपास बनी छोटी-बड़ी दुकानों से इन चीजों की खरीदारी की जा सकती है।

परिवहन[संपादित करें]

वायु मार्ग

नजदीकी हवाई अड्डा जोधपुर है जो देश के बाकि हिस्सों से जुड़ा हुआ है।

रेल मार्ग

बाड़मेर रेलवे के जरिए जोधपुर से जुड़ा है। यहाँ से मुख्यत: चार ट्रेनों का संचालन होता हैं। यहाँ से हरिद्वार ,दिल्ली ,गुहावटी और दक्षिण भारत केे लिए ट्रेने जाती हैं।

सड़क

बाड़मेर सड़कमार्ग के द्वारा राजस्थान के अन्य जिलो और गुजरात राज्य से जुड़ा हुआ है। बाड़मेर जिले में से दो राष्ट्रीय राजमार्ग NH.68और NH.25 गुजरते है। NH.25 जिले को अन्य जिलो और राज्य की राजधानी जयपुर से जोड़ता है। NH.68जिले को गुजरात और राज्य के उतरी जिलो और पंजाब से जोड़ता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]