सामाजिक

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सामाजिक शब्द का शाब्दिक अर्थ सजीव से यह शब्द समाज+ईक पत्यय से बना हैचाहे वो मानव जनसंख्या हों अथवा पशु। यह एक सजीव का अन्य सजीवों के साथ सह-अस्तित्व तथा

निरपेक्षता का सूचक शब्द है कि उनमें इस तरह की अन्





योन्य क्रियाएं होती हैं अथवा नहीं। निरपेक्षता उनकी इच्छा अथवा स्वैच्छा पर निर्भर करती है।

व्युत्पत्ति[संपादित करें]

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सामाजिक विचारक[संपादित करें]

कार्ल मार्क्स के अनुसार मनुष्य वस्तुतः (वास्तविकता में), आवश्यक रूप से और सामाजिक प्राणी की परिभाषानुसार "यूथचारी जीव" (झुण्ड में रहने वाला) काल से और उससे भी पूर्व जीवित रहने के लिए और अपनी आवश्यक्ताओं को पूर्ण करने के लिए सामाजिक सहयोग और संघ निर्माण बिना सम्भव नहीं है।

samajwad Ek Samajik prakriya ismein Samaj se Bandhe Hue samajikaran ki prakriya ke Madhyam se Sanskriti AVN Samajik Jagah Se parichit Hone Ka avsar prapt Hota Hai ISI Madhyam se ek apni Ek Sanskriti AVN Samajik Virasat ko Bhavi pidhi Khush Hoti Hai is Prakar samajikaran Ek Aur vyaktitva Ka Vikas Hota Hai vahin dusri aur Samajik Sansthan prasaran Hota Hai

आधुनिक उपयोग[संपादित करें]

समकालीन समाजों में अक्सर "सामाजिक" शब्द सरकार की आय और धन के पुनर्वितरण नीतियों को संदर्भित किया जाता है जिनका उद्देश्य जनहित के कार्यों से हो जैसे सामाजिक सुरक्षा

ये भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]