कविराज श्यामलदास

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कविराज श्यामलदास () भारत के इतिहासकार थे। आप राजस्थान की संस्कृति और इतिहास के आरम्भिक लेखकों में गिने जाते हैं[1]

जीवन परिचय[संपादित करें]

श्यामलदास का जन्म आषाढ़ कृष्ण ७ विक्रम संवत १८९३ को राजस्थान के ढोकलिया ग्राम में हुआ। इनके तीन भाई और दो बहिनें थीं।

इनका अध्ययन घर पर ही हुआ परम्परा से प्राप्त प्रतिभा तो इनमें भरपूर थी। फारसी और संस्कृत में उनका विशेष अध्ययन हुआ। इनका प्रथम विवाह साकरड़ा ग्राम के भादा कलू जी की बेटी के साथ हुआ। इनसे एक पुत्री का जन्म हुआ। दूसरा विवाह मेवाड़ के भड़क्या ग्राम के गाड़ण ईश्वरदास जी की बेटी के साथ हुआ। इनसे संतानें तो कई हुई पर उसमें से दो पुत्रियां ही जीवित रहीं। (क्रांतिकारी बारहठ केसरीसिंह-पृ. 235)।

विक्रम संवत 1927 के वैशाख में उनके पिता का देहावसान हो गया। उस समय श्यामलदास की आयु ३४ वर्ष की थी। पिता के देहावसान के पश्चात् श्यामलदास गांव से उदयपुर आ गये और पिताजी के दायित्व का निर्वहन करने लगे। इसी वर्ष के आषाढ़ में महाराणा शम्भुसिंह जी मातमपूर्सी के लिए श्यामलदास जी उनकी हवेली पर पधारे। तब से महाराणा की सेवा में रहने लगे। राणाजी का स्वर्गवास वि.स. 1931 में हो गया। श्यामलदास इससे बड़े निराश हुए। शम्भुसिंह की मृत्यु के बाद सज्जन सिंह गद्दी पर बैठे।

सज्जनसिंह जी अल्पवयस्क होते हुए भी विलक्षण बुद्धि वाले थे अतः वे श्यामलदास जी के व्यक्तित्व पर मुग्ध थे। गद्दी पर बैठते ही राणा ने श्यामलदास को उसी प्रेम से अपनाया। महाराणा सज्जनसिंह का राजत्व काल बहुत लम्बा नहीं रहा पर उनके उस काल को मेवाड़ का यशस्वी राजत्व काल कहा जा सकता है जिसका श्रेय तत्कालीन प्रधान श्री श्यामलदास को जाता है।

ग्रन्थकारिता[संपादित करें]

कविराज श्यामलदास ने अपने पिता कमजी दधिवाड़िया सहित मेवाड़ के डौडिया राजपूतों के विषय में दीपंग कुल प्रकाश नामक विस्तृत कविता की रचना की थी[2]। उदयपुर राज्य के शासक महाराणा सज्जन सिंह ने मेवाड़ के प्रामाणिक इतिहास लेखन का उत्तरदायित्व कविराज श्यामलदास को सौंपा था[3]वीर विनोद नामक यह पुस्तक मेवाड़ में लिखित प्रथम विस्तृत इतिहास है[4]। महाराणा सज्जन सिंह के उत्तराधिकारी महाराणा फ़तेह सिंह इस इतिहास के प्रकाशन के प्रति उदासीन थे। इस कारण यह पुस्तक १९३० ई. तक प्रकाशित नहीं हुई[5]

वार्ताकार तथा शिक्षक[संपादित करें]

कविराज श्यामलदास महाराणा सज्जन सिंह के विश्वासपात्र थे। १८८१ के भील विद्रोह की समस्या के समाधान का कार्य कविराज श्यामलदास ने ही संपन्न किया[6]। आपके शिष्य, गौरीशंकर हीराचंद ओझा भी सुप्रसिद्ध इतिहासकार तथा लेखक थे।

सम्मान और पुरस्कार[संपादित करें]

ब्रिटिश सरकार ने कविराज को महामहोपाध्याय की उपादि प्रदान की तथा केसरे हिन्द के सम्मान से सम्मानित किया[7]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  • मेवाड़ के गौरव - कविराज श्यामल दास
  • लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस संग्रह सूची में वीर विनोद [1]
  • यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो पुस्तकालय संग्रह में कविराज श्यामलदास द्वारा लिखित पुस्तकों की सूची [2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. दशरथ शर्मा (१९७०) लेक्चर्स ऑन राजपूत हिस्टरी एंड कल्चर, प्रकाशक: मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली पृष्ठ १ ISBN 0-8426-0262-3
  2. लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस संग्रह सूची
  3. श्रीवास्तव, विजय शंकर (१९८१) कल्चरल कोंटूर्स ऑफ़ इंडिया पृष्ठ ३७, प्रकाशक: अभिनव प्रकाशन दिल्ली ISBN 978-0-391-02358-1
  4. गुप्ता आर. के., बख्शी एस. आर. (२००८) स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री: हेरिटेज ऑफ़ राजपूत पृष्ठ २४७, प्रकाशक: सरूप एंड संस, नई दिल्ली ISBN 978-81-7625-841-8
  5. गुप्ता आर. के., बख्शी एस. आर. पृष्ठ २५५
  6. पति, बिस्वमोई संपादक (२००८) इश्यूज इन मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री पृष्ठ ८८, प्रकाशक: पॉपुलर प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, मुंबई ISBN 978-81-7154-658-9
  7. श्रीवास्तव, विजय शंकर (१९८१) कल्चरल कोंटूर्स ऑफ़ इंडिया पृष्ठ ३७