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मेघवाल

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मेघवाल या मेघवार (उर्दू: میگھواڑ, सिंधी: ميگھواڙ) एक जातीय समूह है, जो मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम भारत में निवास करता है और इनकी कुछ आबादी पाकिस्तान में भी पाई जाती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, इनकी कुल अनुमानित जनसंख्या लगभग 48,59,000 थी, जिनमें से 44,54,000 भारत में रहते थे। यह समुदाय विभिन्न भाषाएँ बोलता है, जिनमें मारवाड़ी (12,59,000), हिंदी (18,63,000), डोगरी (6,30,000), पंजाबी (6,93,400) और अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ शामिल हैं। कुछ मेघवाल सिख धर्म को भी मानते हैं। इनका पारंपरिक व्यवसाय बुनाई रहा है, और यह एक कृषक जाति मानी जाती है, जिसका मुख्य कार्य खेती करना है। यह समुदाय प्राचीनकाल से हिंदू धर्म से जुड़ा हुआ है, और इनके प्रमुख आराध्य ऋषि मेघ, संत कबीर, बाबा रामदेवजी और गोसाई जी धनी मातंग देव हैं। बाबा रामदेवजी के पुजारी परंपरागत रूप से इसी समुदाय से होते हैं, जिन्हें "रिखिया" कहा जाता है। मेघवाल जाति की सामाजिक स्थिति अन्य अनुसूचित जातियों की तुलना में सामान्यतः बेहतर मानी जाती है, क्योंकि इनका कार्य मुख्यतः बुनाई और कृषि से संबंधित रहा है, और इनका संबंध पशु वध, मांस अथवा चमड़ा संबंधी व्यवसायों से नहीं रहा है। विशेषकर पंजाब में यह समुदाय एक समृद्ध और प्रभावशाली समूह के रूप में स्थापित है।

मेघवंश को राजऋषि वृत्र या मेघ ऋषि से उत्पन्न जाना जाता है।सिंधु सभ्यता के अवशेष (मेघ ऋषि की मुर्ति मिली) भी मेघो से मिलते है। हडप्पा,मोहन-जोद़ङो,कालीबंगा (हनुमानगढ),राखीगङी,रोपङ,शक्खर(सिंध),नौसारो(बलुचिस्तान),मेघढ़(मेहरगढ़ बलुचिस्तान)आदि मेघवंशजो के प्राचीन नगर हुआ करते थे। 3300ई.पू.से 1700ई.पू.तक सिंध घाटी मे मेघो की ही आधिक्य था। 1700-1500ई.पू.मे आर्यो के आगमन से मेघ, अखण्ड भारत के अलग अलग भागो मे बिछुड़ (चले) गये।

आज मेघवालो को बहुत सारी उपजातीयो बांट रखा है जिसमे पूनड़, साहेलिया, पटिर, बरवड़, परिहार, तंवर, इणकिया, डाबी, वर्मा, कटारिया, पटेल, राठौड़, महेश्वरी, शेखावत, राजावत, चौहान, सांवा, गुलशन, बेरवाल, सुरेला, मेहरा, गोठवाल, सोडा, जनागल कालवा, तंवर, सिगला, मंडाङ सिंहमार, पिंडार, भगत, बारुपाल,मिड़ल(मिरल),लोथिया,भड़नोवा(भरनोवा),केम्मपाल, अहम्पा, पंवार, वनल,परिहार (साटिका खुर्द ), लिलावत, जयपाल, चावणीया, तुर्किया, गाडी, देवपाल, जालानी, गोयल-मंगी, पन्नु, भाटि, दिवराया, गोगली, गंढेर, दहीया, मुंशी, कोली, तांती, पान, कड़ेला चौपाल आदि प्रमुख है। [1][2][3][4][not in citation given]

ऐसा विश्वास किया जाता है कि जब भारत में ओद्योगिक कपड़े का आगमन हुआ तो पश्चिम भारत के गांव गांव में फैले *बलाई* अर्थात *बुनकर* पूरी तरह। से बेरोजगार हो गय,,,! बेरोजगार बलाई बुनकर जाति ने कर्ज व भूखमरी की स्थिति में देशी राजाओं से गुहार लगाई । देशी राजा रजवाड़े हर किसी को तो रोजगार दे नही सकते थे । लेकिन उन्होंने प्रतिभाशाली बेरोजगार बलाई बुनकरों में से कुछ को ग्राम चौकीदार की सरकारी नौकरी दी जो *कोटवार* उपजाति बन गय। इसी प्रकार कुछ प्रतिभाशाली बेरोजगार बलाई बुनकरों को संदेशवाहक या हरकारे की सरकारी नौकरी दे जो *चोबेदार* उपजाति बन गई ।इसी प्रकार कुछ प्रतिभाशाली बेरोजगार बलाई बुनकरों को सिंचाई हेतु बनाय गई वर्षा के जल संग्रहण संरचनाओं ,तालाबों, बावड़ी, नहरों के देखभाल की सरकारी नौकरी दी गय जो *मेघवाल* उपजाति बन गई। उस वक्त नगद वेतन नही दिया जाता था,,अपितु कृषि भूमि के टुकड़े अनुवांशिक सेवा शर्त पर दे दिए जाते थे। जो आज भी कुछ परिवारो के पास है। शेष बेरोजगार बलाई बुनकर,,अन्य कृषि श्रम व खेतीबाड़ी में चले गय। इनमे से जो मेहनताने पर कुशल श्रम करने लगे वो,,,*मेहरा* उपजाति हो गय।।ओर जो कर्ज के ब्याज के बदले बिना मेहनताने के अकुशल श्रम करने लगे वो * बेगार बलूटे* कहलाने लगे। कालांतर में ये उपजातियां,, पृथक जातियां बन गई।

अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने अपनी 1871 में छपी पुस्तक ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ में प्रतिपादित किया कि आर्यों के आगमन से पूर्व मेघ असीरिया से पंजाब में आए और सप्त सिंधु (सात नदियों की भूमि) पर बस गए। आर्यों के दबाव के तहत, वे संभवतः पाषाण युग (1400-1200 वर्ष ईसा पूर्व) के दौरान महाराष्ट्र और विंध्याचल क्षेत्र और बाद में बिहार और उड़ीसा में भी बसे। .[5] वे सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित हैं।[6] वे एक संत ऋषि मेघ के वंशज होने का दावा करते हैं,[1] जो अपनी प्रार्थना से बादलों (मेघों) से बारिश ला सकता था।[7] ‘मेघवार’ शब्द संस्कृत शब्द ‘मेघ’ से निकला है जिसका अर्थ है बादल और बारिश और ‘वार’ का अर्थ है ‘युद्ध’, एक ‘समूह’, ‘बेटा’ और ‘बच्चे’ (संस्कृत: वार:).[8][9] अतः ‘मेघवाल’ और ‘मेघवार’ शब्दशः एक लोग हैं, जो मेघवंश के हैं।[10] यह भी कहा जाता है कि मेघ जम्मू और कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे जहाँ बादलों की गतिविधि बहुत होती है। वहाँ रहने वाले लोगों को स्वाभाविक ही (मेघ, बादल) नाम दे दिया गया। मिरासियों (पारंपरिक लोक कलाकार) द्वारा सुनाई जाने वाली लोक-कथाओं में मेघों को सूर्यवंश से जोड़ा जाता है जिस वंश से भगवान राम हुए हैं।[11]

पौराणिक संकेत

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भारतीय पौराणिक कथाओं में राजऋषि वृत्र धार्मिक प्रमुख था और वह सप्त सिंधु क्षेत्र का राजा भी था। समस्त भारत पर शासन करने वाले नागवंशियों का वह पूर्वज था। नागवंशी अपने व्यवहार, शैली, योग्यता और उनकी गुणवत्ता में ईश्वरीय गुणों के लिए जाने जाते थे। वास्तुकला के वे विशेषज्ञ थे। वे नाग या अजगर की पूजा करते थे। मेघवालों को हिरण्यकश्यप, प्रह्लाद, हिरण्याक्ष, विरोचन, राजा महाबली (मावेली), बाण आदि के साथ भी जोड़ा जाता है। [12]

ऐतिहासिक चिह्न

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मौर्य काल के दौरान मेघवंश के चेदी राजाओं ने कलिंग पर शासन किया। वे अपने नाम के साथ महामेघवाहन जोड़ते थे और स्वयं को महामेघवंश का मानते थे।[13] कलिंग के राजा खारवेल ने मगध के पुष्यमित्र को पराजित किया और दक्षिण भारतीय (वर्तमान में तमिलनाडु) क्षेत्रों पर विजय पाई. कलिंग के राजा जैन धर्म का पालन करते थे।[14] मौर्यों के पतन के बाद, मेघवंश के राजाओं ने अपनी शक्ति और स्वतंत्रता पुनः प्राप्त कर ली। चेदी, वत्स, मत्स्य आदि शासकों को मेघ कहा जाता था। गुप्त वंश के उद्भव के समय कौशांबी एक स्वतंत्र राज्य था। इसका शासक मेघराज मेघवंश से था और बौद्ध धर्म का अनुयायी था।[15]

भौगोलिक वितरण

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‘मेघवाल’ मारवाड़, राजस्थान से हैं। 1981 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में मेघ, मेघवाल, मेंघवार के रूप में अधिसूचित लोगों की संयुक्त जनसंख्या 889,300 थी।[16] वे पश्चिमी गुजरात में (पाकिस्तान सीमा के पास) और भारत के अन्य भागों जैसे महाराष्ट्र, पंजाब और हरियाणा में रहते हैं। ‘मेघ’ जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से हैं,[17] और उन्हें मेघ, आर्य मेघ और भगत के नाम से जाना जाता है। कुछ स्थानों पर वे गणेशिया, मेघवंशी, मिहाग, राखेसर, राखिया, रिखिया,सिहमार, रिषिया और अन्य नामों से भी जाने जाते हैं। कुछ महाशा भी यह दावा करते हैं कि वे मेघों से संबंधित हैं।[18] सन् 1947 में भारत के विभाजन के बाद मेघ, जो हिंदू धर्म में धर्मान्तरित हो गए थे, वे भारतीय क्षेत्र में पलायन कर गए।[19] उनमें से अधिकांश सियालकोट से आ कर पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में उनके लिए स्थापित शिविरों में आ बसे। पाकिस्तान में शब्द मेघवाल के स्थान पर मेघवार प्रयोग किया जाता है। सन् 1991 में पंजाब (भारत) में मेघों की जनसंख्या 105157 होने का अनुमान था।[20] सन् 2000 में पाकिस्तान में लगभग 226600 मेघवार रहते थे जो मुख्यतः उत्तर-पूर्व पंजाब के दादू और नवाबशाह शहरों में,[21] और सिंध में अधिकतर बदीन, मीरपुर खास, थारपरकर और उमेरकोट जिलों में बसे थे।[उद्धरण चाहिए]

जाति का दर्जा

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कई कश्मीरी मुसलमान, जो अविभाजित पंजाब और गुजरात राज्यों के मैदानों में आकर बसे और मेघों की भाँति बुनकर थे [22] ‘मेघ’ शब्द इस समुदाय से जुड़े किसी विशेष कार्य का संकेत है, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि राज्यों में इन्हें किसान वर्ग के रूप में वर्गीकृत किया गया है।[23] अर्थात् वे भारत की ऐसी जातियों में शामिल हैं जिन्हें भारतीय संविधान की अनुसूची में निर्दिष्ट किया गया और कुछ विशेष प्रबंध किए गए ताकि वे जातिगत पूर्वाग्रहों के कारण उत्पन्न प्रतिकूल प्रभावों से उबर सकें. [24]

भारद्वाज् अत्री

जीवन शैली

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मेघवंशियों का पेशा कृषि और बुनाई था। वे वर्ष में दो फसलें लेते थे। शेष समय वे अन्य संबंद्ध गतिविधियों में व्यस्त रहते थे।[25] राजस्थान के देहाती इलाके में अभी भी इस समुदाय के कई लोग अभी भी छोटी बस्तियों में रहते हैं। उनके आवास गारे की ईंट से बनी गोलाकार झोपडि़याँ हैं जिन पर रंगीन ज्यामितीय डिजाइन चित्रित होते हैं और जिन्हें विस्तृत जड़ाऊ दर्पण कार्य से सजाया गया होता है।[26] बीते समय में मेघवाल समुदाय का मुख्य व्यवसाय कृषिश्रम था, बुनाई, विशेष रूप से खादी और काष्ठकार्य था और ये अभी भी उनके मुख्य व्यवसायों में हैं। महिलाएँ अपने कढ़ाई के काम के लिए प्रसिद्ध हैं और ऊन तथा सूती कपड़े की बढ़िया बुनकर हैं।[27][28]

मेघवंशियों में से कुछ राजस्थान के गाँवों से मुंबई जैसे बड़े शहरों चले गए हैं। सन् 1936 में बी.एच मेहता, शोधकर्ता ने एक अध्ययन में कहा कि गाँव के मनहूस जीवन से बचने के लिए उनमें से अधिकतर शहरों में गए और महसूस किया कि शहर में भीड़ और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों के बावजूद उनके जीवन में सुधार हुआ है।[29] आज मेघवालों में शिक्षितों की संख्या बढ़ी है और सरकारी नौकरियाँ प्राप्त कर रहे हैं। पंजाब में विशेषकर अमृतसर, जालंधर और लुधियाना जैसे शहरों में वे खेल, हौज़री, शल्य-चिकित्सा उपकरणों और धातुओं से वस्तुओं का उत्पादन करने वाले कारखानों में मज़दूरी कर रहे हैं। उनमें से कुछ का अपना स्वयं का व्यवसाय या लघु उद्योग है। जीवन यापन के लिए छोटा व्यापार और सेवा इकाइयाँ उनका प्रमुख सहारा है।[30] जम्मू-कश्मीर में भूमि सुधारों के सफल कार्यान्वयन के बाद उनमें से कई छोटे किसान बन गए। पाकिस्तान से भारत में आने के बाद मेघों को भी अलवर (राजस्थान) में बंजर भूमि में दी गई। बाबू गोपी चंद ने उन्हें इस प्रक्रिया में बहुत सहायता की। यह अब उपजाऊ भूमि है।

उनके प्रधान भोजन में चावल, गेहूं और मक्का शामिल है और दालों में मूंग, उड़द और चना. वे शाकाहारी नहीं हैं। [7] जम्मू में एक मेघ धार्मिक नेता भगता साध (केरन वाले) के नेतृत्व में एक बहुत बड़ा मेघ समूह शाकाहारी बना। [उद्धरण चाहिए]

पारंपरिक मेघवाल समाज में महिलाओं का दर्जा कमतर है। परिवारों के बीच बातचीत के माध्यम से यौवन से पहले ही विवाह तय कर दिए जाते हैं। शादी के बाद पत्नी पति के घर में आ जाती है। प्रसव के समय वह मायके में जाती है। पिता द्वारा बच्चों का उत्तर दायित्व लेने और पत्नी को मुआवजा देने के बाद तलाक की अनुमति देने की परंपरा है। किसी बात के लिए नापसन्द व्यक्ति का हुक्का-पानी बंद करने की एक सामाजिक बुराई मेघों में है। इसे तुच्छ मामलों में भी इस्तेमाल किया जाता है। इससे मेघ महिलाओं के लिए सामाजिक कठिनाइयाँ बढ़ी हैं।[11]

मेघवालों के प्रारम्भिक इतिहास या उनके धर्म के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। संकेत मिलते हैं कि मेघ शिव और नाग (ड्रैगन के उपासक थे).[31] मेघवाल राजा बली को भगवान के रूप में मानते हैं और उनकी वापसी के लिए प्रार्थना करते हैं।[32] कई सदियों से केरल में यही प्रार्थना ओणम त्योहार का वृहद् रूप धारण कर चुकी है। वे एक नास्तिक और समतावादी ऋषि चार्वाक के भी मानने वाले थे। आर्य चार्वाक के विरोधी थे। दबाव जारी रहा और चार्वाक धर्म का पूरा साहित्य जला दिया गया।[33] इस बात का प्रमाण मिलता है कि 13वीं शताब्दी में कई मेघवाल इस्लाम की शिया निज़ारी शाखा के अनुयायी बन गए और कि निज़ारी विश्वास के संकेत उनके अनुष्ठानों और मिथकों में मिलते हैं।[34] अधिकांश मेगवाल हिंदू है, हालांकि कुछ इस्लाम या ईसाई धर्म जैसे अन्य धर्मों के भी अनुयायी हैं।

मध्यकालीन हिंदू पुनर्जागरण, जिसे भक्ति काल भी कहा जाता है, के दौरान राजस्थान के एक मेघवाल कर्ता राम महाराज, मेघवालों के आध्यात्मिक गुरु बने। [35] कहा जाता है कि 19 वीं सदी के दौरान मेघ आम तौर पर कबीरपंथी थे जो संतमत के संस्थापक संत सत्गुरु कबीर (1488 - 1512 ई.) के अनुयायी थे।[36] आज कई मेघवाल संतमत के अनुयायी हैं जो कच्चे रूप से जुड़े धार्मिक नेताओं का समूह है और जिनकी शिक्षाओं की विशेषता एक आंतरिक, एक दिव्य सिद्धांत के प्रति प्रेम भक्ति और समतावाद है, जो हिंदू जाति व्यवस्था पर आधारित गुणात्मक भेद और हिंदू तथा मुसलमानों के बीच गुणात्मक भेद के विरुद्ध है।[37] वर्ष 1910 तक, स्यालकोट के लगभग 36000 मेघ आर्यसमाजी बन गए थे।[38] भारत के एक सुधारवादी फकीर और राधास्वामी मत के एक गुरु बाबा फकीर चंद ने अपनी जगह सत्गुरू के रूप में काम करने के लिए भगत मुंशी राम को मनोनीत किया जो मेघ समुदाय से थे।[11]

राजस्थान में इनके मुख्य आराध्य बाबा रामदेवजी हैं जिनकी वेदवापूनम (अगस्त - सितम्बर) के दौरान पूजा की जाती है। मेघवाल धार्मिक नेता गोकुलदास ने अपनी वर्ष 1982 की पुस्तक ‘मेघवाल इतिहास’, जो मेघवालों के लिए सम्मान और उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार का प्रयास है और जो मेघवाल समुदाय के इतिहास का पुनर्निर्माण करती है, में दावा किया है कि स्वामी रामदेव स्वयं मेघवाल थे।[39] गाँव के मन्दिरों में चामुंडा माता की प्रतिदिन पूजा की जाती है। विवाह के अवसर पर बंकरमाता को पूजा जाता है।[7] डालीबाई एक मेघवाल देवी है जिसकी पूजा रामदेव के साथ-साथ की जाती है।[16] भारत के जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा राज्यों में पूर्वजपूजा (एक प्रकार का श्राद्ध) की जाती है। जम्मू-कश्मीर में डेरे-डेरियों पर पूर्वजों की वार्षिक पूजा प्रचलित है।[उद्धरण चाहिए] कुछ मेघवार पीर पिथोरो की पूजा करते हैं जिसका मन्दिर मीरपुर खास के पास पिथोरो गाँव में है।[40] केरन के बाबा भगता साध मेघों के धार्मिक नेता और आराध्य पुरुष थे जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में मेघ समुदाय के आध्यात्मिक कल्याण के लिए कार्य किया।[41] बाबा मनमोहन दास ने बाबा भगता साध के उत्तराधिकारी बाबा जगदीश जी महाराज के निधन के बाद गुरु का स्थान ले लिया।


गाँव कलोई, ज़िला थारपारकर, सिंध, पाकिस्तान में एक मेघवाल महिला.

वील : राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में घर की छोटी - मोटी चीजों को सुरक्षित रखने हेतु बनाई गई मिट्टी की महलनुमा चित्रित आकृति वील ' कहलाती है मेघवाल जाति की महिलाएँ इस कला में निपुण होती हैं । राजस्थान में मेघवाल महिलाएँ उनकी सुंदर और विस्तृत वेशभूषा और आभूषणों के लिए प्रसिद्ध हैं। विवाहित महिलाओं को अक्सर सोने की नथिनी, झुमके और कंठहार पहने हुए देखा जा सकता है। यह सब दुल्हन को उसकी होने वाली सास "दुल्हन धन" के रूप में देती है। नथनियाँ और झुमके अक्सर रूबी, नीलम और पन्ना जैसे कीमती पत्थरों से सुसज्जित होते हैं। मेघवाल महिलाओं द्वारा कढ़ाई की गई वस्तुओं की बहुत मांग है। अपने काम में वे प्राथमिक रूप से लाल रंग का प्रयोग करती हैं जो स्थानीय कीड़ों से उत्पादित विशेष रंग से बनता है। सिंध और बलूचिस्तान में थार रेगिस्तान और गुजरात की मेघवाल महिलाओं को पारंपरिक कढ़ाई और रल्ली बनाने का निपुण कारीगर माना जाता है। हाथ से की गई मोहक कशीदाकारी की वस्तुएँ मेघवाल महिलाओं के दहेज का एक हिस्सा होती हैं।[42][43][44]

प्रमुख लोग

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सन्दर्भ

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