रासो काव्य

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

रासो काव्य हिन्दी के आदिकाल में रचित ग्रन्थ हैं। इसमें अधिकतर वीर-गाथाएं हीं हैं। पृथ्वीराजरासो प्रसिद्ध हिन्दी रासो काव्य है। रास साहित्य जैन परम्परा से संबंधित है तो रासो का संबंध अधिकांशत: वीर काव्य से, जो डिंगल भाषा में लिखा गया ।

रास और रासो शब्द की व्युत्पति संबंधी विद्वानों में मतभेद है । कुछ मत निम्नलिखित हैं -

रासो साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ वीरगाथात्मक काव्य की[संपादित करें]

  • इन रचनाओं में कवियों द्वारा अपने आश्रयदाताओं के शौर्य एवं ऐश्वर्य का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है।
  • यह साहित्य मुख्यतः चारण कवियों द्वारा रचा गया।
  • इन रचनाओं में ऐतिहासिकता के साथ-साथ कवियों द्वारा अपनी कल्पना का समावेश भी किया गया है। अधिकांश रचनाएं संदिग्ध एवं अर्धप्रामाणिक मानी जाती हैं।
  • इन रचनाओं में युद्धप्रेम का वर्णन अधिक किया गया है।
  • इन रचनाओं में वीर रसशृंगार रस की प्रधानता है।
  • इन रचनाओं में डिंगल और पिंगल शैली का प्रयोग हुआ है।
  • इनमें विविध प्रकार की भाषाओं एवं अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है।
  • इन रचनाओं में चारण कवियों की संकुचित मानसिकता का प्रयोग देखने को मिलता है।

प्रमुख रासो ग्रन्थ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. आचार्य रामचन्द्र, शुक्ल (2013). हिंदी साहित्य का इतिहास. इलाहाबाद: लोकभारती प्रकाशन. पृ॰ 24.