केसरी सिंह बारहट

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केसरी सिंह बारहठ (२१ नवम्बर १८७२ – १४ अगस्त १९४१)[1] एक कवि और स्वतंत्रता सैनानी थे।[2] वो भारतीय राज्य राजस्थान की चारण जाति के थे। उनके पुत्र प्रतापसिंह बारहठ भी भारतीय क्रान्तिकारी थे।

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

जन्म[संपादित करें]

उनका जन्म २१ नवम्बर १८७२ को शाहपुरा रियासत के देवपुरा नामक गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम कृष्ण सिंह बारहठ था[3] और उनकी माता बख्तावर कँवर का निधन उनके बाल्यकाल में ही हो गया था। दैव-योग से मातृ-विहीन शिशु की दादी माता श्रृँगार कँवर के स्तनों में ग्यारह वर्ष बाद सहसा दूध का संचारन होने से उन्हीं के द्वारा पालन-पोषण किया गया। ऐसे ममत्व-भरे प्रबुद्ध आँचल के शाये में पलने वाले शैशव में सद्-संस्कारों का उन्नयन स्वभाविक ही हो गया।[4]

शि़क्षा[संपादित करें]

छः वर्ष की आयु में केसरी सिंह की शिक्षा शाहपुर में महन्त सीताराम की देख-रेख में प्रारम्भ हुई। दो साल बाद कृष्ण सिंह ने उदयपुर में काशी से एक विद्वान पंडित गोपीनाथ शास्त्री को बुलाकर केसरी सिंह की औपचारिक शिक्षा-दीक्षा संस्कृत परिपाटी में आरंभ करायी। उस समय के उत्कृष्ट बौद्धिक माप-दण्ड के अनुसार केसरी सिंह ने पूरा 'अमर-कोश' कण्ठष्थ कर लिया था। केसरी सिंह ने संस्कृत एवं हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं बंगला, मराठी एवं गुजराती का भी पर्याप्त अध्ययन किया। ज्योतिष, गणित एवं खगोल शास्त्र में भी उनकी अच्छी गति थी।[5]

बंदी-जीवन[संपादित करें]

ठाकुर केसरी सिंह का देश के शीर्ष क्रांतिकारियों- रासबिहारी बोस, मास्टर अमीरचन्द, लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा, अर्जुनलाल सेठी, राव गोपाल सिंह, खरवा आदि के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था। सन् 1912 में राजपूताना में ब्रिटिश सी.आई.डी.द्वारा जिन व्यक्तियों की निगरानी रखी जानी थी उनमें केसरी सिंह का नाम राष्ट्रीय-अभिलेखागार की सूची में सबसे ऊपर था। केसरी सिंह को शाहपुरा में ब्रिटिश सरकार द्वारा दिल्ली-लाहौर षड्यन्त्र केस में राजद्रोह, षड्यन्त्र व कत्ल आदि के जुर्म लगा कर 21 मार्च 1914 को गिरफ्तार किया गया। जिस दिन केसरी सिंह को गिरफ्तार किया गया उसी दिन से उन्होंने अन्न-त्याग दिया। उन्हें भय था कि गुप्त बातें उगलवाने के लिए पुलिस कोई ऐसी चीज न खिला दे जिससे उनका मस्तिष्क विकृत हो जाय। इस प्रण को उन्होंने पाँच वर्ष तक जेल-जीवन में निभाया। उन्हें कई-कई दिन, रात-रात भर सोने नहीं दिया जाता था। सरकार किसी प्रकार केसर सिंह के विरुद्ध राजनीतिक उद्धेश्य से की गयी हत्या का जुर्म साबित कर उन्हें फाँसी देना चाहती थी। अन्त में केसरी सिंह को 20 साल के आजीवन कारावास की कठोर सजा हुई। इस प्रकार केसरी सिंह को केवल २० वर्ष का आजन्म कारावास ही नहीं हुआ, उसके समूचे परिवार पर विपत्ती की दुहरी मार पड़ी। शाहपुरा राजाधिराज नाहर सिंह ने ब्रिटिश सरकार को खुश रखने के लिए उनकी पेतृक जागीर का गांव, विशाल हवेली एवं चल-अचल सम्पत्ति भी जब्त कर ली। घर के बर्तन तक नीलाम कर दिये गये। सारा परिवार बेघर - बार होकर कण-कण की तरह बिखर गया।


अंतिम-प्रयाण[संपादित करें]

सन् 1941 के अगस्त के प्रारम्भ में केसरी सिंह जी ज्वराक्रांत हुये। कोटा राज्य के पी.एम.ओ डॉ विद्याशंकर की देखरख में उनका इलाज हो रहा था डॉ अब्दुल वहीद उनके पारिवारिक डॉक्टर थे। ९ अगस्त को कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर के देहावसान का रेडियो में समाचार सुनने के बाद जब डॉक्टर अब्दुल वहीद उन्हें देखने आये तो कहा "ठाकुर साहब, आज एक बहुत रंज का समाचार लाया हूँ- रवीन्द्र नाथ ठाकुर नहीं रहे।" यह सुनकर सहज ही उनके मुँह से निकल पड़ा- अब कवी दरबार ऊपर ही लगेगा और पाँच दिन बाद सचमुच ही वह समय आ गया। अंतिम बीमारी में वे केवल अपनी बड़ी पौत्री राजलक्ष्मी के हाथ से ही दवा या पानी लेते थे। राजलक्ष्मी के उस समय के संस्मरण इस प्रकार हैं - "बीमारी के अंतीम सात दिनों में दाता निरंतर गीता और उपनिषदों के श्लोक ही बोला करते थे। किसी से भी वार्तालाप नहीं करते थे। उस दिन 14 अगस्त को साढे ग्यारह बजे हमने वैद्य चंद्रशेखर जी के कहने से कमरे के खिड़की दरवाजे बंद कर परदे लगा दिये थे। बाहर वर्षा हो रही थी। कमरे को इस प्रकार बंद देखकर उन्होंने मुझे कहा - खिड़की दरवाजे बंद क्यों किये हैं? इन्हे खोल दो। क्या तुम सोचते हो कि केसरी सिंह को जाने से यह रोक सकेंगे? फिर अपने पलंग के सामने दीवार पर टंगे हुये उनके पिताश्री की फोटो की और इशारा कर उसे लाने को कहा। मैंने चित्र उतार कर उन्हे दिया। कुछ देर तक वे टक टकी लगाकर चित्र को देखते रहे, उसे आँखों और सर पर लगाया उसके बाद यह प्राचीन दौहा उनकी वाणी से निकल पड़ा -

                         कहाँ जाये कहाँ ऊपने, कहाँ लड़ाये लाड।
                         का जाने केहि खाड में, जाय पड़ेंगे हाड॥

इसके बाद चित्र को वापिस मुझे दे दिया। ठीक बारह बजे उनके मुँह से जोर से 'हरि ओम तत्सत्' का उच्चारण हुआ और उसी के साथ उनके नैत्र सदा के लिए निमीलित हो गये। आश्चर्य की बात यह थी कि बाद में हमने देखा कि उनके कोट में सदा साथ रहने वाली जेब की घड़ी भी बारह बजे संयोगवश ऐसी बन्द हुई कि मरम्मत करवाने पर भी वापस ठिक नहीं हुई।'[6]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. मूलचन्द पेसवानी. "नमन करें क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहठ और समर्पित परिवार को". अजमेरनामा. अभिगमन तिथि २३ दिसम्बर २०१२.
  2. सत्यप्रिया सास्त्री (२००७). भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम में आर्यसमाज का योगदान. हरियाणा साहित्य संस्थान (मूल: द यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफोर्निया. पृ॰ ४५.
  3. सत्यप्रिया सास्त्री (२००७). भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम में आर्यसमाज का योगदान. हरियाणा साहित्य संस्थान (मूल: द यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफोर्निया. पृ॰ ११६.
  4. Book ISBN : 81-260-1617-5
  5. Book ISBN : 81-260-1617-5
  6. Book ISBN : 81-260-1617-5